सुमित्रानन्दन पन्त — ग्रन्थि, परिवर्तन, नौका-विहार

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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सुमित्रानन्दन पन्त

सुमित्रानन्दन पन्त — ग्रन्थि, परिवर्तन, नौका विहार

सुमित्रानन्दन पन्त की प्रमुख रचनाओं का पाठ, शब्दार्थ, सन्दर्भ, प्रसङ्ग, हिन्दी व्याख्या एवं काव्य-सौंदर्य।

1. ग्रन्थि

पद्यांश
इन्दु पर, उस इन्दु-मुख पर, साथ ही थे पड़े मेरे नयन, जो उदय से लाज से रक्तिम हुए थे, पूर्व को पूर्व था पर वह द्वितीय अपूर्व था बाल-रजनी-सी अलका थी डोलती भ्रमित हो शशि के वदन के बीच में अचल, रेखांकित कभी थी कर रही प्रमुखता मुख की सुछवि के काव्य में । एक पल, मेरे प्रिया के दृग- पलक थे उठे ऊपर, सहज नीचे गिरे, चपलता ने इस विकम्पित पुलक से दृढ़ किया मानो प्रणय सम्बन्ध था लाज की मादक सुरा सी लालिमा फैल गालों में, नवीन गुलाब-सी छलकती थी बाढ़ सी सौंदर्य की अधखुले सस्मित गढ़ों में रूप के आवर्त से घूम-फिर कर, नाव से किसके नयन हैं नहीं डूबे भटककर, अटक कर भार से दब कर तरूण सौंदर्य के जब प्रणय का प्रथम परिचय मूकता दे चुकी थी हृदय को, तब यत्न से बैठकर मैंने निकट ही, शान्त हो, विनय वाणी में प्रिया से यों कहा- सलिल-शोभे जो पतित आहत भ्रमर सदय हो तुमने लगाया हृदय से एक तरल तरंग से उसको बचा, दूसरी, में क्यों डुबाती हो पुनः? प्रेम कंटक से अचानक बिद्ध हो जो सुमन तरु से बिलग है हो चुका, निज दया से द्रवित उर में स्थान दे क्या न सरस विकास दोगी उसे? मलिन उर छूकर तिमिर का अरुण-कर कनक आभा में खिलाते हैं कमल, प्रिय बिना तम शेष मेरे हृदय की, प्रणय कलिका की तुम्हीं प्रिय कान्ति हो ।
शब्दार्थ — इन्दु — चन्द्रमा; इन्दु-मुख — चन्द्रमा के समान मुख; नयन — आँखें; रक्तिम — लाल; पूर्व — पूर्व दिशा; अपूर्व — अनोखा/अद्भुत; बाल-रजनी — छोटी रात्रि; अलका — घुँघराले बालों की लट; शशि — चन्द्रमा; वदन — मुख; सुछवि — सुन्दर छवि; दृग — नेत्र; चपलता — चंचलता; विकम्पित — काँपता हुआ; पुलक — रोमांच/हर्ष; प्रणय — प्रेम; मादक — नशा उत्पन्न करने वाला; सुरा — मदिरा; लालिमा — लाल रंग की आभा; छलकती — उमड़ती/बहती; सस्मित — मुस्कान सहित; आवर्त — भँवर; तरुण — युवा/नवीन; मूकता — मौन; यत्न — प्रयास; विनय — नम्रता; सलिल — जल; पतित — गिरा हुआ; आहत — घायल; भ्रमर — भौंरा; सदय — दयालु; तरल — द्रव/बहता हुआ; तरंग — लहर; कंटक — काँटा; बिद्ध — छेदा हुआ/घायल; सुमन — फूल; तरु — वृक्ष; बिलग — अलग; द्रवित — पिघला हुआ/करुणा से भरा; उर — हृदय; सरस — रसपूर्ण/सुन्दर; मलिन — मैला/अंधकारयुक्त; तिमिर — अंधकार; अरुण-कर — लालिमा युक्त किरण; कनक — सोना; आभा — चमक; तम — अंधकार; प्रणय-कलिका — प्रेम की कली; कान्ति — प्रभा/चमक।
सन्दर्भ — प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘ग्रन्थि’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पन्त जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने अपनी प्रिया के अनुपम सौन्दर्य, उसकी लज्जा, चंचल दृष्टि तथा दोनों के मध्य उत्पन्न प्रथम प्रणय-सम्बन्ध का अत्यन्त कोमल एवं भावपूर्ण चित्रण किया है। प्रिया के सौन्दर्य से मुग्ध कवि उसके प्रति अपने प्रेम की व्यथा व्यक्त करते हुए उससे करुणा और प्रेम की याचना करता है तथा अन्त में उसे अपने अन्धकारमय हृदय के लिए प्रकाश प्रदान करने वाली प्रेम-कान्ति के रूप में चित्रित करता है।
हिन्दी व्याख्या — कवि कहता है कि उसकी आँखें अपनी प्रिया के चन्द्रमा के समान सुन्दर मुख पर टिक गई थीं। उसका मुख लज्जा से लाल था और उसके चारों ओर झूलती हुई काली अलकें ऐसी प्रतीत हो रही थीं, जैसे छोटी-सी रात्रि चन्द्रमा के मुख के बीच विचरण कर रही हो। वे अलकें कभी स्थिर होकर उसके मुख की सुन्दरता को और अधिक उभार देती थीं। एक क्षण के लिए प्रिया ने अपनी आँखें ऊपर उठाईं और फिर सहज ही नीचे कर लीं। उसकी चंचल दृष्टि और लज्जा से उत्पन्न रोमांच ने मानो दोनों के प्रेम-सम्बन्ध को दृढ़ कर दिया। उसके कपोलों पर लज्जा की मदिरा जैसी लालिमा नवीन गुलाब के समान खिल रही थी और उसके मुख पर सौन्दर्य की बाढ़-सी उमड़ रही थी। उसके रूप के आकर्षण में पड़कर किसके नयन भटककर और अटककर उसके तरुण सौन्दर्य के भार से डूबे नहीं होंगे? जब मौन संकेतों से हृदय में प्रणय का प्रथम परिचय हो चुका, तब कवि शान्त होकर अपनी प्रिया के निकट बैठा और विनम्र वाणी में कहने लगा—हे प्रिये! जल में गिरे और घायल हुए भ्रमर को तुमने दया करके अपने हृदय से लगाया तथा एक तरंग से उसे बचाया, फिर दूसरी तरंग में उसे पुनः क्यों डुबो रही हो? प्रेम के काँटे से घायल होकर जो फूल अपने वृक्ष से अलग हो चुका है, उसे अपने दया से द्रवित हृदय में स्थान देकर क्या तुम उसे प्रेम का सरस विकास नहीं दोगी? अन्त में कवि कहता है कि जिस प्रकार सूर्य की लाल किरणें अंधकार से मलिन हुए कमलों को स्वर्णिम आभा प्रदान करके खिला देती हैं, उसी प्रकार प्रिय के अभाव से अन्धकारमय उसके हृदय के लिए प्रिया ही प्रेम की कली को खिलाने वाली प्रकाशमयी कान्ति है।
काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पद्यांश में प्रथम प्रेम, प्रिय के सौन्दर्य, लज्जा, आकर्षण तथा प्रेम-वेदना का अत्यन्त कोमल और चित्रात्मक वर्णन हुआ है। ‘इन्दु-मुख’ में प्रिय के मुख की चन्द्रमा से उपमा दी गई है। ‘बाल-रजनी-सी अलका’ में अलकों की रात्रि से तुलना तथा ‘लाज की मादक सुरा-सी लालिमा’ में उपमा द्वारा सौन्दर्य और लज्जा का मनोहर चित्रण हुआ है। ‘छलकती थी बाढ़-सी सौंदर्य की’ में सौन्दर्य की प्रचुरता का सजीव बिम्ब प्रस्तुत किया गया है। ‘रूप के आवर्त’ में रूप के आकर्षण को भँवर के रूप में चित्रित किया गया है। ‘प्रेम-कंटक से बिद्ध’ तथा ‘सुमन’ के माध्यम से प्रेम की पीड़ा को प्रतीकात्मक रूप में व्यक्त किया गया है। अन्त में ‘तिमिर’, ‘अरुण-कर’ और ‘कमल’ के माध्यम से अन्धकार और प्रकाश का सुन्दर प्रतीक-विधान हुआ है। प्रिया को ‘प्रणय-कलिका की कान्ति’ कहना रूपक का सुन्दर उदाहरण है। भाषा कोमल, मधुर, संस्कृतनिष्ठ, भावपूर्ण एवं चित्रात्मक है तथा इसमें श्रृंगार और करुण भाव का सुन्दर समन्वय हुआ है।
पद्यांश
यह बिलम्ब! कठोर हृदय! मग्न को बालुका भी क्या बचाती है? नहीं? निठुर का मुझको भरोसा है बड़ा, गिरि शिलाएँ ही अभय आधार हैं । म्लान तम में ही कलाधर की कला कौमुदी बन कीर्ति पाती है धवल । दीनता के ही बिकम्पित पात्र में, दान बढ़कर छलकता है प्रीति से । प्रिय निराश्रित की कठिन बाँहे नहीं शिथिल पड़ती है प्रलोभन भार से, अल्पता की संकुचित आँखे सदा उमड़ती है अल्प भी अपनाव से । दयानिल से विपुल पुलकित हो सहज, सरल उपकृति का सजल मानस प्रिये । क्षीण करूणालोक का भी लोक को है वृहत् प्रतिबिम्ब दिखलाता सदा । शरद के निर्मल तिमिर की ओट में, नव मिलन के पलक-दल-सा झूमता, कौन मादक कर मुझे है छू रहा प्रिय! तुम्हारी मूकता की आड़ से? यह अनोखी रीति है क्या प्रेम की, जो अपांगो से अधिक है देखता, दूर होकर और बढ़ता है तथा । वारि पीकर पूछता है घर सदा इन्दु की छवि में, तिमिर के गर्भ में, अनिल की ध्वनि में, सलिल की वीचि में, एक उत्सुकता विचरती थी, सरल-सुमन की स्मिति में, लता के अधर में निज पलक मेरी विकलता साथ ही अवनि से, उस से मृगेक्षिणी ने उठा एक पल, निज स्नेह श्यामल दृष्टि से स्निग्ध कर दी दृष्टि मेरी दीप-सी ।
शब्दार्थ — विलम्ब — देर; कठोर हृदय — निर्दयी हृदय; मग्न — डूबा हुआ/लवलीन; बालुका — रेत; निठुर — निर्दयी; गिरि शिलाएँ — पर्वत की चट्टानें; अभय — भय से रहित; म्लान — फीका/मुरझाया हुआ; तम — अंधकार; कलाधर — चन्द्रमा; कौमुदी — चाँदनी; कीर्ति — यश/प्रसिद्धि; धवल — श्वेत/उज्ज्वल; दीनता — असहायता/हीनता; विकम्पित — काँपता हुआ; पात्र — बर्तन/पात्र; दान — देने की वस्तु/उदारता; प्रीति — प्रेम; निराश्रित — जिसका कोई आश्रय न हो; शिथिल — ढीली/कमजोर; प्रलोभन — लालच; अल्पता — कमी/थोड़ी मात्रा; संकुचित — छोटी/सीमित; अपनाव — आत्मीयता/अपनापन; दयानिल — दया रूपी वायु; पुलकित — रोमांचित/प्रसन्न; उपकृति — उपकार; सजल — भावनाओं से भरा/आर्द्र; करूणालोक — करुणा का प्रकाश; वृहत् — विशाल/बड़ा; प्रतिबिम्ब — परछाईं/प्रतिरूप; शरद — वर्षा के बाद आने वाली ऋतु; निर्मल — स्वच्छ/शुद्ध; ओट — आड़; नव मिलन — नया मिलन; पलक-दल — पलकों का समूह; मादक — नशा उत्पन्न करने वाला; मूकता — मौन; अपांग — आँखों की कोर/तिरछी दृष्टि; वारि — जल; इन्दु — चन्द्रमा; गर्भ — भीतर का भाग; अनिल — वायु; सलिल — जल; वीचि — लहर; उत्सुकता — उत्कंठा/जानने की तीव्र इच्छा; सुमन — फूल; स्मिति — मुस्कान; अधर — होंठ; मृगेक्षिणी — हिरणी के समान नेत्रों वाली स्त्री; स्नेह — प्रेम/ममता; श्यामल — साँवली/गहरी; स्निग्ध — कोमल/प्रेमपूर्ण; विकलता — व्याकुलता; अवनि — पृथ्वी; दृष्टि — नजर/नेत्रों की चितवन।
सन्दर्भ — प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘ग्रन्थि’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पन्त जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पद्यांश में कवि अपनी प्रिया के प्रेम और करुणा की प्रतीक्षा करते हुए उसके हृदय की उदारता का वर्णन करता है। कवि कहता है कि सच्चे प्रेम में अभाव और निराश्रयता भी प्रेम को कमजोर नहीं करते, बल्कि थोड़ा-सा अपनापन भी उसे अत्यन्त गहरा बना देता है। प्रकृति के विभिन्न उपमानों के माध्यम से कवि प्रेम की सूक्ष्म अनुभूति और प्रिया की मौन आत्मीयता को व्यक्त करता है। अन्त में प्रिया अपनी स्नेहपूर्ण श्यामल दृष्टि से कवि की व्याकुल आँखों को एक क्षण के लिए स्निग्ध कर देती है।
हिन्दी व्याख्या — कवि अपनी प्रिया से कहता है कि तुम इतनी देर क्यों कर रही हो? क्या कठोर हृदय वाले व्यक्ति को रेत भी बचा सकती है? नहीं। इसलिए उसे किसी कोमल आश्रय की अपेक्षा नहीं है, बल्कि वह तो पर्वत की कठोर चट्टानों को ही निर्भय आधार मानता है। कवि कहता है कि जैसे अंधकार में ही चन्द्रमा की कला अपनी चाँदनी के रूप में उज्ज्वल होकर यश प्राप्त करती है, उसी प्रकार दीनता और अभाव से भरे पात्र में दिया गया थोड़ा-सा दान भी प्रेम से बढ़कर छलक उठता है। सच्चे प्रेम से निराश्रित व्यक्ति की बाँहें प्रलोभन के भार से शिथिल नहीं पड़तीं। जिसके जीवन में अपनापन कम होता है, वह थोड़ा-सा स्नेह पाकर भी अत्यन्त भावुक और प्रेम से भर उठता है। हे प्रिये! तुम्हारी दया रूपी वायु से मेरा हृदय सहज ही अत्यन्त पुलकित हो उठता है और तुम्हारे सरल उपकार से मेरा मन प्रेम से आर्द्र हो जाता है। संसार को मिलने वाला थोड़ी-सी करुणा का प्रकाश भी उसका विशाल प्रतिबिम्ब दिखाता है। शरद ऋतु के निर्मल अंधकार की ओट में जैसे नवीन मिलन की पलकों का समूह झूमता है, वैसे ही कवि अनुभव करता है कि प्रिया की मौनता की आड़ से कोई मादक अनुभूति उसे स्पर्श कर रही है। वह सोचता है कि प्रेम की यह कैसी अनोखी रीति है, जिसमें आँखों की कोर से की गई दृष्टि प्रत्यक्ष दृष्टि से भी अधिक प्रभावशाली होती है और दूर रहने पर भी प्रेम बढ़ता जाता है। चन्द्रमा की छवि, अंधकार के गर्भ, वायु की ध्वनि और जल की लहरों में भी एक प्रकार की प्रेमपूर्ण उत्सुकता दिखाई देती है। सरल फूल की मुस्कान और लता के अधरों में भी वही प्रेम-भाव व्याप्त है। अन्त में प्रिया अपनी आँखें उठाती है और एक क्षण के लिए अपनी स्नेह से भरी श्यामल दृष्टि द्वारा कवि की व्याकुल दृष्टि को इस प्रकार कोमल और शान्त कर देती है, जैसे किसी दीपक को स्निग्ध प्रकाश मिल गया हो।
काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पद्यांश में प्रेम, करुणा, आत्मीयता और मौन प्रणय की अत्यन्त सूक्ष्म एवं भावपूर्ण अभिव्यक्ति हुई है। ‘म्लान तम में ही कलाधर की कला’ में चन्द्रमा और अंधकार के माध्यम से विरोधाभासपूर्ण सौन्दर्य प्रस्तुत किया गया है। ‘दीनता के ही विकम्पित पात्र में, दान बढ़कर छलकता है प्रीति से’ में प्रेम की उदारता का मार्मिक चित्रण है। ‘दयानिल’, ‘करूणालोक’ और ‘प्रतिबिम्ब’ जैसे प्रयोगों में रूपक एवं प्रतीकात्मकता का सुन्दर समन्वय है। ‘शरद के निर्मल तिमिर की ओट’ तथा ‘नव मिलन के पलक-दल’ में अत्यन्त कोमल और मनोहारी बिम्ब उपस्थित हुए हैं। चन्द्रमा, तिमिर, अनिल, सलिल, सुमन और लता के माध्यम से प्रकृति को प्रेम की अनुभूतियों से जोड़ दिया गया है। ‘मृगेक्षिणी’ द्वारा प्रिया के नेत्रों की हिरणी से उपमा अत्यन्त आकर्षक है। अन्तिम पंक्तियों में प्रिया की स्नेहपूर्ण दृष्टि को कवि की दीप-सी दृष्टि को स्निग्ध करने वाली शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। भाषा कोमल, मधुर, संस्कृतनिष्ठ, चित्रात्मक एवं भावप्रवण है तथा सम्पूर्ण पद्यांश में श्रृंगार रस की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है।

2. परिवर्तन

पद्यांश
(१) अहे निष्ठुर परिवर्तन! तुम्हारा ही तांडव नर्तन! विश्व का करुण विवर्तन! तुम्हारा ही नयनोन्मीलन, निखिल उत्थान, पतन! अहे वासुकि सहस्र फन! लक्ष्य अलक्षित चरण तुम्हारे चिन्ह निरंतर छोड़ रहे हैं जग के विक्षत वक्षस्थल पर! शत-शत फेनोच्छ्वासित, स्फीत फुत्कार भयंकर घुमा रहे हैं घनाकार जगती का अंबर! मृत्यु तुम्हारा गरल दंत, कंचुक कल्पान्तर, अखिल विश्व की विवर वक्र कुंडल दिग्मंडल! (२) आज कहाँ वह पूर्ण-पुरातन, वह सुवर्ण का काल? भूतियों का दिगंत-छबि-जाल, ज्योति-चुम्बित जगती का भाल? राशि राशि विकसित वसुधा का वह यौवन-विस्तार? स्वर्ग की सुषमा जब साभार धरा पर करती थी अभिसार! प्रसूनों के शाश्वत-शृंगार, (स्वर्ण-भृंगों के गंध-विहार) गूँज उठते थे बारंबार, सृष्टि के प्रथमोद्गार! नग्न-सुंदरता थी सुकुमार, ऋद्धि औ’ सिद्धि अपार! अये, विश्व का स्वर्ण-स्वप्न, संसृति का प्रथम-प्रभात, कहाँ वह सत्य, वेद-विख्यात? दुरित, दुःख, दैन्य न थे जब ज्ञात, अपरिचित जरा-मरण-भ्रू-पात! (३) अह दुर्जेय विश्वजित! नवाते शत सुरवर नरनाथ तुम्हारे इन्द्रासन-तल माथ; घूमते शत-शत भाग्य अनाथ, सतत रथ के चक्रों के साथ! तुम नृशंस से जगती पर चढ़ अनियंत्रित, करते हो संसृति को उत्पीड़न, पद-मर्दित, नग्न नगर कर, भग्न भवन, प्रतिमाएँ खंडित हर लेते हो विभव, कला, कौशल चिर संचित! आधि, व्याधि, बहुवृष्टि, वात, उत्पात, अमंगल वह्नि, बाढ़, भूकम्प — तुम्हारे विपुल सैन्य दल; अहे निरंकुश! पदाघात से जिनके विह्वल हिल-हिल उठता है टलमल पद-दलित धरातल! (४) जगत का अविरत ह्रतकंपन तुम्हारा ही भय-सूचन; निखिल पलकों का मौन पतन तुम्हारा ही आमंत्रण! विपुल वासना विकच विश्व का मानस-शतदल छान रहे तुम, कुटिल काल-कृमि-से घुस पल-पल; तुम्हीं स्वेद-सिंचित संसृति के स्वर्ण-शस्य-दल दलमल देते, वर्षोपल बन, वांछित कृषिफल! अये, सतत ध्वनि स्पंदित जगती का दिग्मंडल नैश गगन-सा सकल तुम्हारा ही समाधि स्थल!
शब्दार्थ — निष्ठुर — निर्दयी/कठोर; परिवर्तन — एक अवस्था से दूसरी अवस्था में बदलना; तांडव नर्तन — प्रचण्ड नृत्य; विवर्तन — परिवर्तन/उलटफेर; नयनोन्मीलन — आँखों का खुलना/जागरण; निखिल — सम्पूर्ण; उत्थान — उन्नति; पतन — गिरावट; वासुकि — नागराज; सहस्र फन — हजार फनों वाला; अलक्षित — अदृश्य/जिसका लक्ष्य ज्ञात न हो; विक्षत — घायल; वक्षस्थल — छाती; फेनोच्छ्वासित — झागयुक्त फुफकार से युक्त; स्फीत — फूली हुई/प्रचण्ड; फुत्कार — साँप की फुफकार; घनाकार — बादल के समान विशाल/घना; जगती — पृथ्वी; अंबर — आकाश; गरल — विष; दंत — दाँत; कंचुक — साँप की केंचुली; कल्पान्तर — बहुत लम्बा काल/कल्प का अन्तर; विवर — गुफा/छिद्र; वक्र — टेढ़ा; कुंडल — घेरा/लपेट; दिग्मंडल — दिशाओं का समूह; पुरातन — प्राचीन; सुवर्ण — सोना; भूति — वैभव/सम्पत्ति; दिगंत — दिशाओं का अन्त/क्षितिज; छबि — शोभा/सुन्दरता; ज्योति-चुम्बित — प्रकाश से प्रकाशित; भाल — मस्तक; वसुधा — पृथ्वी; यौवन-विस्तार — यौवन की सम्पन्नता; सुषमा — सुन्दरता; साभार — सम्मानपूर्वक; अभिसार — मिलने के लिए जाना; प्रसून — फूल; शाश्वत — सदा रहने वाला; भृंग — भौंरा; गंध-विहार — सुगन्ध में विचरण; प्रथमोद्गार — प्रथम अभिव्यक्ति/पहली ध्वनि; ऋद्धि — समृद्धि; सिद्धि — सफलता/उपलब्धि; संसृति — संसार; दुरित — पाप/दुःख; दैन्य — दरिद्रता/दीनता; जरा-मरण — वृद्धावस्था और मृत्यु; दुर्जेय — जिसे जीतना कठिन हो; विश्वजित — सम्पूर्ण विश्व को जीतने वाला; सुरवर — श्रेष्ठ देवता; नरनाथ — राजा; इन्द्रासन — इन्द्र का सिंहासन; नृशंस — क्रूर/निर्दयी; उत्पीड़न — कष्ट देना; पद-मर्दित — पैरों से कुचला हुआ; नग्न — खाली/विहीन; भग्न — टूटा हुआ; विभव — वैभव/सम्पत्ति; चिर संचित — बहुत समय से संचित; आधि — मानसिक पीड़ा; व्याधि — रोग; बहुवृष्टि — अत्यधिक वर्षा; वात — आँधी/वायु; उत्पात — विनाशकारी घटना; अमंगल — अशुभ घटना; वह्नि — अग्नि; भूकम्प — पृथ्वी का काँपना; निरंकुश — नियंत्रण से मुक्त; पदाघात — पैर का प्रहार; विह्वल — व्याकुल; धरातल — पृथ्वी की सतह; ह्रतकंपन — हृदय को कंपित करने वाला भय; भय-सूचन — भय की सूचना; विपुल — बहुत अधिक/विशाल; वासना — इच्छा/कामना; विकच — खिला हुआ; मानस-शतदल — मन रूपी सौ पंखुड़ियों वाला कमल; कुटिल — टेढ़ा/धूर्त; काल-कृमि — काल रूपी कीड़ा; स्वेद-सिंचित — पसीने से सींचा हुआ; शस्य — अन्न/फसल; दलमल — कुचल देना; वर्षोपल — ओलों की वर्षा; कृषिफल — खेती का फल/फसल; नैश — रात्रि सम्बन्धी; समाधि स्थल — समाधि का स्थान/अन्तिम विश्राम-स्थल।
सन्दर्भ — प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘परिवर्तन’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पन्त जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने परिवर्तन को एक प्रचण्ड, निष्ठुर और सर्वव्यापी शक्ति के रूप में चित्रित किया है। कवि के अनुसार परिवर्तन ही संसार में उत्थान-पतन, निर्माण-विनाश और जीवन-मृत्यु का मूल कारण है। वह प्राचीन स्वर्णिम युग के वैभव और सुख को स्मरण करते हुए बताता है कि परिवर्तन ने उस सुन्दर संसार को भी नष्ट कर दिया। आगे परिवर्तन की विनाशकारी शक्ति को वासुकि नाग, काल और प्रकृति की भयंकर शक्तियों के रूप में चित्रित करते हुए कवि उसके द्वारा नगरों, भवनों, कला और मानव-सम्पदा के विनाश का वर्णन करता है। अन्त में वह परिवर्तन को मानव-जीवन और सम्पूर्ण जगत् की निरन्तर गति, भय और विनाश का प्रतीक मानता है।
हिन्दी व्याख्या — कवि परिवर्तन को सम्बोधित करते हुए कहता है कि हे निष्ठुर परिवर्तन! संसार में होने वाला यह प्रचण्ड नृत्य तुम्हारा ही तांडव है। विश्व में जो करुणाजनक उलटफेर दिखाई देता है, जो कुछ बनता और बिगड़ता है, जो आँखें खुलती हैं और जो पतन होता है, वह सब तुम्हारे कारण ही है। कवि परिवर्तन की तुलना हजार फनों वाले वासुकि नाग से करता है। उसके दिखाई न देने वाले चरणों के निशान निरन्तर संसार के घायल वक्षस्थल पर पड़ते रहते हैं। उसकी भयंकर फुफकारें मानो आकाश को घुमाती हुई सम्पूर्ण पृथ्वी को अपने प्रभाव में ले रही हैं। मृत्यु उसका विषैला दाँत है और कल्पों तक चलने वाली उसकी केंचुली सम्पूर्ण दिशाओं को अपने घेरे में लिए हुए है। इसके बाद कवि उस प्राचीन स्वर्णिम युग को स्मरण करता है, जब संसार वैभव और सौन्दर्य से पूर्ण था। पृथ्वी का यौवन चारों ओर विकसित था और स्वर्ग की सुन्दरता मानो पृथ्वी पर उतरकर उससे मिलन करती थी। फूलों का शाश्वत सौन्दर्य और स्वर्णिम भौरों का सुगन्धित विहार वातावरण को गुंजायमान रखते थे। सृष्टि के आरम्भ की पवित्र ध्वनियाँ सुनाई देती थीं तथा संसार में कोमल सौन्दर्य, ऋद्धि और सिद्धि की अपार सम्पन्नता थी। वह संसार मानो विश्व का स्वर्णिम स्वप्न और सृष्टि का प्रथम प्रभात था, जहाँ पाप, दुःख, दरिद्रता, वृद्धावस्था और मृत्यु का भय ज्ञात नहीं था। कवि पूछता है कि वह स्वर्णिम संसार अब कहाँ चला गया? आगे कवि परिवर्तन को दुर्जेय और विश्व-विजेता के रूप में सम्बोधित करता है। बड़े-बड़े देवता और राजा भी उसके सामने सिर झुकाते हैं तथा मनुष्य का भाग्य उसके रथ के चक्रों के साथ निरन्तर घूमता रहता है। परिवर्तन संसार पर क्रूरता से चढ़कर नगरों को उजाड़ देता है, भवनों को तोड़ देता है, मूर्तियों को खंडित कर देता है और मनुष्य द्वारा युगों से संचित वैभव, कला एवं कौशल को नष्ट कर देता है। मानसिक पीड़ा, रोग, अत्यधिक वर्षा, आँधी, अग्नि, बाढ़ और भूकम्प आदि उसके विशाल सैन्य दल हैं, जिनके प्रहार से धरती व्याकुल होकर काँपने लगती है। अन्त में कवि कहता है कि संसार का निरन्तर हृदय-कंपन परिवर्तन द्वारा उत्पन्न भय की सूचना है और आँखों का मौन झुकना भी उसके आने का संकेत है। संसार की असंख्य इच्छाओं से खिला हुआ मन रूपी कमल भी परिवर्तन से सुरक्षित नहीं है। वह काल रूपी कुटिल कीड़े की तरह उसमें क्षण-क्षण प्रवेश करके उसकी वासनाओं को छानता रहता है। मनुष्य के परिश्रम के पसीने से सींची हुई संसार की स्वर्णिम फसलों को भी परिवर्तन कभी ओलों की वर्षा के समान नष्ट कर देता है। अन्ततः कवि कहता है कि निरन्तर स्पन्दित और ध्वनित होने वाला यह सम्पूर्ण संसार ही मानो परिवर्तन का समाधि-स्थल है।
काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने परिवर्तन की विनाशकारी, सर्वव्यापी और अनिवार्य शक्ति का अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण किया है। ‘अहे निष्ठुर परिवर्तन!’ तथा ‘अहे वासुकि सहस्र फन!’ में सम्बोधन एवं रूपक का सुन्दर प्रयोग हुआ है। परिवर्तन को वासुकि, काल और भयंकर सैन्य-दल के रूप में चित्रित करके उसकी प्रचण्डता को साकार किया गया है। ‘तुम्हारा ही तांडव नर्तन’ में परिवर्तन के विनाशकारी रूप का प्रभावशाली बिम्ब है। दूसरे खण्ड में प्राचीन स्वर्णिम युग का चित्रण करते हुए ‘विश्व का स्वर्ण-स्वप्न’ और ‘संसृति का प्रथम-प्रभात’ जैसे रूपक अत्यन्त आकर्षक हैं। ‘स्वर्ण-भृंगों के गंध-विहार’ में प्रकृति का मनोहारी चित्र उपस्थित हुआ है। तृतीय खण्ड में ‘आधि, व्याधि, बहुवृष्टि, वात, उत्पात, अमंगल, वह्नि, बाढ़, भूकम्प’ द्वारा परिवर्तन की विनाशकारी शक्तियों का क्रमिक एवं प्रभावशाली वर्णन किया गया है। ‘विपुल वासना विकच विश्व का मानस-शतदल’ में मन को खिले हुए कमल के रूप में चित्रित करना रूपक का सुन्दर उदाहरण है। ‘कुटिल काल-कृमि’ में काल को कीड़े के रूप में प्रस्तुत कर उसके विनाशकारी प्रभाव को सजीव बनाया गया है। भाषा संस्कृतनिष्ठ, गम्भीर, ओजपूर्ण, चित्रात्मक एवं प्रभावशाली है। सम्पूर्ण पद्यांश में भयानक, करुण और दार्शनिक भावों का सुन्दर समन्वय दिखाई देता है।

3. नौका विहार

पद्यांश
शांत स्निग्ध, ज्योत्स्ना उज्ज्वल! अपलक अनंत, नीरव भू-तल! सैकत-शय्या पर दुग्ध-धवल, तन्वंगी गंगा, ग्रीष्म-विरल, लेटी हैं श्रान्त, क्लान्त, निश्चल! तापस-बाला गंगा, निर्मल, शशि-मुख से दीपित मृदु-करतल, लहरे उर पर कोमल कुंतल। गोरे अंगों पर सिहर-सिहर, लहराता तार-तरल सुन्दर चंचल अंचल-सा नीलांबर! साड़ी की सिकुड़न-सी जिस पर, शशि की रेशमी-विभा से भर, सिमटी हैं वर्तुल, मृदुल लहर। चाँदनी रात का प्रथम प्रहर, हम चले नाव लेकर सत्वर। सिकता की सस्मित-सीपी पर, मोती की ज्योत्स्ना रही विचर, लो, पालें चढ़ीं, उठा लंगर। मृदु मंद-मंद, मंथर-मंथर, लघु तरणि, हंसिनी-सी सुन्दर तिर रही, खोल पालों के पर। निश्चल-जल के शुचि-दर्पण पर, बिम्बित हो रजत-पुलिन निर्भर दुहरे ऊँचे लगते क्षण भर। कालाकाँकर का राज-भवन, सोया जल में निश्चिंत, प्रमन, पलकों में वैभव-स्वप्न सघन।
शब्दार्थ — शांत — स्थिर/शान्त; स्निग्ध — कोमल/मधुर; ज्योत्स्ना — चाँदनी; उज्ज्वल — प्रकाशमान/चमकीला; अपलक — बिना पलक झपकाए; नीरव — शांत/निःशब्द; भूतल — पृथ्वी का धरातल; सैकत-शय्या — बालू की सेज; दुग्ध-धवल — दूध के समान सफेद; तन्वंगी — पतले शरीर वाली; ग्रीष्म-विरल — ग्रीष्म ऋतु में विरल/कम जल वाली; श्रान्त — थकी हुई; क्लान्त — थकी हुई; तापस-बाला — तपस्विनी कन्या; निर्मल — स्वच्छ/पवित्र; शशि-मुख — चन्द्रमा के समान मुख; दीपित — प्रकाशित; करतल — हथेली; उर — हृदय/वक्षस्थल; कुंतल — केश; सिहर-सिहर — हल्के-हल्के काँपते हुए; तार-तरल — तारों के समान चमकता हुआ; नीलांबर — नीला आकाश; सिकुड़न — संकुचन/सलवट; रेशमी-विभा — रेशम जैसी चमक; वर्तुल — गोलाकार; प्रहर — समय का एक भाग; सत्वर — शीघ्र/जल्दी; सिकता — बालू; सस्मित — मुस्कराती हुई; सीपी — शुक्ति/सीप; विचर — घूमना/विचरण करना; पाल — नाव में लगा कपड़ा जो हवा से नाव चलाता है; लंगर — नाव को रोकने का उपकरण; मृदु — कोमल; मंथर — धीरे-धीरे; तरणि — नाव; हंसिनी — हंस की मादा; तिरना — जल पर चलना/तैरना; शुचि — पवित्र/स्वच्छ; दर्पण — आईना; बिम्बित — प्रतिबिम्बित; रजत-पुलिन — चाँदी के समान चमकता हुआ बालू का किनारा; दुहरा — दोहरा; कालाकाँकर — उत्तर प्रदेश का एक प्रसिद्ध स्थान; राज-भवन — राजा का भवन; प्रमन — प्रसन्न/शांतचित्त; वैभव — ऐश्वर्य/सम्पन्नता; सघन — घना/गहरा।
सन्दर्भ — प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘नौका-विहार’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पन्त जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने चाँदनी रात में गंगा के मनोहारी प्राकृतिक सौन्दर्य तथा नाव-विहार के रमणीय दृश्य का अत्यन्त सजीव चित्रण किया है। कवि को गंगा बालू की सेज पर दूध के समान धवल, थकी हुई तपस्विनी कन्या के समान लेटी हुई दिखाई देती है। उसकी लहरें कोमल केशों और नीले आकाश को चंचल अंचल के समान प्रतीत होती हैं। इसके बाद कवि अपने साथियों के साथ नाव लेकर गंगा में विहार करता है और चाँदनी में नाव की मंथर गति तथा जल में प्रतिबिम्बित प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन करता है।
हिन्दी व्याख्या — कवि कहता है कि चाँदनी से प्रकाशित रात अत्यन्त शांत और कोमल है। पृथ्वी का विशाल धरातल चारों ओर नीरव और स्थिर दिखाई देता है। ग्रीष्म ऋतु के कारण कम जल वाली गंगा बालू की सेज पर दूध के समान सफेद और पतले शरीर वाली युवती के समान लेटी हुई प्रतीत होती है। वह थकी और शांत तपस्विनी कन्या जैसी दिखाई देती है। चन्द्रमा के प्रकाश से उसका जल चमक रहा है और उसकी कोमल लहरें उसके वक्ष पर बिखरे हुए केशों के समान लगती हैं। गंगा के गोरे अंगों पर तारों की तरह चमकता हुआ नीला आकाश किसी चंचल नीले आँचल के समान लहरा रहा है। चन्द्रमा की रेशमी चाँदनी से उसकी गोल-गोल कोमल लहरें ऐसी प्रतीत होती हैं, मानो साड़ी की सिकुड़नों में सिमट गई हों। चाँदनी रात का पहला प्रहर होने पर कवि अपने साथियों के साथ शीघ्रता से नाव लेकर गंगा में निकल पड़ता है। बालू के तट पर पड़ी सीपियाँ चाँदनी के प्रकाश में मुस्कराती हुई प्रतीत होती हैं और उनमें मोतियों जैसी चाँदनी घूमती हुई दिखाई देती है। नाव के पाल खोल दिए जाते हैं और लंगर उठा लिया जाता है। छोटी-सी नाव हंसिनी के समान सुन्दर लगती हुई धीरे-धीरे जल पर तैरने लगती है। शांत और स्वच्छ जल दर्पण के समान है, जिसमें चाँदी जैसे चमकते हुए बालू के तट का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है। जल में प्रतिबिम्बित होने के कारण वे तट कुछ समय के लिए वास्तविकता से दुगुने और अधिक ऊँचे दिखाई देते हैं। कालाकाँकर का राजभवन भी शांत जल में सोया हुआ प्रतीत होता है। ऐसा लगता है जैसे वह निश्चिन्त और प्रसन्न होकर अपनी पलकों में अपने वैभव के सुन्दर और गहरे स्वप्न देख रहा हो।
काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने चाँदनी रात, गंगा, बालू के तट, जल की लहरों, आकाश और नाव-विहार का अत्यन्त मनोहारी एवं सजीव चित्रण किया है। कवि ने गंगा को ‘तापस-बाला’ तथा ‘तन्वंगी’ के रूप में मानवीकृत करके उसके सौन्दर्य को साकार कर दिया है। ‘सैकत-शय्या पर दुग्ध-धवल, तन्वंगी गंगा’ में गंगा के धवल रूप का सुन्दर बिम्ब उपस्थित हुआ है। ‘लहरे उर पर कोमल कुंतल’ तथा ‘चंचल अंचल-सा नीलांबर’ में रूपक और उपमा के माध्यम से गंगा तथा आकाश के सौन्दर्य को अत्यन्त आकर्षक बनाया गया है। नाव को ‘हंसिनी-सी सुन्दर’ कहना उपमा का सुन्दर उदाहरण है। चाँदनी को ‘मोती’ तथा जल को ‘शुचि-दर्पण’ कहना कवि की कल्पनाशीलता को प्रकट करता है। प्रकृति के मानवीकरण के कारण राजभवन भी ‘सोया’ हुआ और ‘पलकों में वैभव-स्वप्न’ देखता हुआ प्रतीत होता है। भाषा कोमल, मधुर, चित्रात्मक एवं संस्कृतनिष्ठ है। सम्पूर्ण पद्यांश में शान्त, सौन्दर्यपूर्ण और प्रकृति-प्रेम से ओत-प्रोत भावों की अभिव्यक्ति हुई है।
पद्यांश
चाँदनी रात का प्रथम प्रहर, हम चले नाव लेकर सत्वर। सिकता की सस्मित-सीपी पर, मोती की ज्योत्स्ना रही विचर, लो, पालें चढ़ीं, उठा लंगर। मृदु मंद-मंद, मंथर-मंथर, लघु तरणि, हंसिनी-सी सुन्दर तिर रही, खोल पालों के पर। निश्चल-जल के शुचि-दर्पण पर, बिम्बित हो रजत-पुलिन निर्भर दुहरे ऊँचे लगते क्षण भर। कालाकाँकर का राज-भवन, सोया जल में निश्चिंत, प्रमन, पलकों में वैभव-स्वप्न सघन। नौका से उठतीं जल-हिलोर, हिल पड़ते नभ के ओर-छोर। विस्फारित नयनों से निश्चल, कुछ खोज रहे चल तारक दल ज्योतित कर नभ का अंतस्तल, जिनके लघु दीपों को चंचल, अंचल की ओट किये अविरल फिरतीं लहरें लुक-छिप पल-पल। सामने शुक्र की छवि झलमल, पैरती परी-सी जल में कल, रुपहरे कचों में ही ओझल। लहरों के घूँघट से झुक-झुक, दशमी का शशि निज तिर्यक्-मुख दिखलाता, मुग्धा-सा रुक-रुक।
शब्दार्थ — प्रहर — समय का एक भाग; सत्वर — शीघ्र/जल्दी; सिकता — बालू; सस्मित — मुस्कराती हुई; सीपी — शुक्ति; ज्योत्स्ना — चाँदनी; विचर — घूमना/विचरण करना; पाल — नाव में लगा कपड़ा जो हवा से नाव चलाता है; लंगर — नाव को रोकने का उपकरण; मृदु — कोमल; मंद-मंद — धीरे-धीरे; मंथर-मंथर — अत्यन्त धीमी गति से; तरणि — नाव; हंसिनी — हंस की मादा; तिरना — जल पर चलना/तैरना; निश्चल — स्थिर; शुचि — स्वच्छ/पवित्र; दर्पण — आईना; बिम्बित — प्रतिबिम्बित; रजत-पुलिन — चाँदी के समान चमकता हुआ बालू का तट; निर्भर — पूर्ण रूप से भरा हुआ; दुहरे — दोहरे; कालाकाँकर — उत्तर प्रदेश का एक प्रसिद्ध स्थान; राज-भवन — राजा का भवन; प्रमन — प्रसन्न/शांतचित्त; वैभव — ऐश्वर्य/सम्पन्नता; सघन — घना/गहरा; जल-हिलोर — जल की लहर; नभ — आकाश; ओर-छोर — चारों दिशाएँ/सीमाएँ; विस्फारित — फैले हुए/खुले हुए; नयन — आँखें; तारक दल — तारों का समूह; ज्योतित — प्रकाशित; अंतस्तल — भीतरी भाग; लघु — छोटे; दीप — प्रकाश देने वाले दीपक; अंचल — वस्त्र का छोर; अविरल — लगातार; लुक-छिप — छिपते और दिखाई देते हुए; शुक्र — शुक्र ग्रह/भोर का चमकीला तारा; छवि — रूप/आभा; झलमल — चमकता हुआ; पैरती — तैरती हुई; परी — अत्यन्त सुन्दर कल्पित स्त्री; रुपहरे — चाँदी जैसे चमकीले; कच — केश; ओझल — छिपा हुआ; घूँघट — मुख को ढकने वाला आवरण; दशमी — शुक्ल या कृष्ण पक्ष की दसवीं तिथि; शशि — चन्द्रमा; तिर्यक्-मुख — तिरछा मुख; मुग्धा — मोहित/भोली सुन्दरी; रुक-रुक — बीच-बीच में रुकते हुए।
सन्दर्भ — प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘नौका-विहार’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पन्त जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने चाँदनी रात में गंगा की शांत धारा पर नाव-विहार करते समय दिखाई देने वाले अत्यन्त रमणीय प्राकृतिक दृश्यों का चित्रण किया है। नाव के धीरे-धीरे जल पर तैरने, चाँदनी में चमकते बालू के तट और जल में प्रतिबिम्बित राजभवन के साथ-साथ कवि आकाश के तारों, शुक्र ग्रह और दशमी के चन्द्रमा के जल में पड़ते प्रतिबिम्ब को भी अत्यन्त मनोहारी रूप में देखता है।
हिन्दी व्याख्या — चाँदनी रात का पहला प्रहर था। कवि अपने साथियों के साथ नाव लेकर शीघ्रता से गंगा में चल पड़ा। बालू के तट पर पड़ी हुई सीपियाँ चाँदनी में ऐसी प्रतीत हो रही थीं, मानो वे मुस्करा रही हों और उन पर मोतियों के समान चाँदनी विचरण कर रही हो। नाव का लंगर उठा लिया गया और उसके पाल खोल दिए गए। छोटी-सी नाव हंसिनी के समान सुन्दर लगती हुई बहुत कोमल और धीमी गति से जल पर तैरने लगी। शांत जल एक स्वच्छ दर्पण के समान था, जिसमें चाँदी जैसे चमकते हुए बालू के तट का प्रतिबिम्ब पड़ रहा था। जल में प्रतिबिम्बित होने के कारण वे तट कुछ क्षणों के लिए वास्तविकता से दुगुने और अधिक ऊँचे दिखाई देते थे। कालाकाँकर का राजभवन भी शांत जल में सोया हुआ प्रतीत होता था। ऐसा लगता था मानो वह निश्चिन्त और प्रसन्न होकर अपनी आँखों में वैभव के गहरे स्वप्न संजोए हुए हो। नाव के चलने से जल में उठने वाली लहरों के कारण ऐसा प्रतीत होता था मानो आकाश के दूर-दूर तक फैले हुए ओर-छोर भी हिल उठे हों। आकाश में असंख्य तारे अपनी छोटी-छोटी ज्योतियों से उसके भीतर के अंधकार को प्रकाशित कर रहे थे। उनकी छोटी ज्योतियों को लहरें अपने चंचल अंचल की ओट में छिपाती और फिर दिखाती हुई पल-पल लुक-छिप का खेल खेल रही थीं। सामने शुक्र ग्रह की चमकती हुई छवि जल में ऐसी दिखाई दे रही थी, मानो कोई परी जल पर तैर रही हो और फिर चाँदी जैसे चमकते केशों में छिप जाती हो। दशमी का चन्द्रमा भी लहरों के घूँघट की ओट से बार-बार झुककर अपना तिरछा मुख दिखा रहा था। वह दृश्य ऐसा प्रतीत होता था, मानो कोई मुग्धा युवती संकोचपूर्वक रुक-रुककर अपना मुख दिखा रही हो।
काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने चाँदनी रात में गंगा पर होने वाले नौका-विहार का अत्यन्त सजीव, मनोहारी और चित्रात्मक वर्णन किया है। ‘लघु तरणि, हंसिनी-सी सुन्दर’ में नाव की हंसिनी से उपमा अत्यन्त आकर्षक है। ‘निश्चल-जल के शुचि-दर्पण’ में जल को दर्पण के रूप में प्रस्तुत करना रूपक का सुन्दर उदाहरण है। जल में प्रतिबिम्बित रजत-पुलिन तथा राजभवन का मानवीकरण करते हुए उसे ‘सोया’ हुआ और ‘वैभव-स्वप्न’ देखता हुआ बताया गया है। तारों को ‘लघु दीप’ और लहरों को उनके प्रकाश को छिपाने वाला ‘चंचल अंचल’ कहना अत्यन्त मनोरम कल्पना है। शुक्र की छवि को ‘परी-सी’ तथा चन्द्रमा को ‘मुग्धा-सा’ बताकर कवि ने प्रकृति में मानवीय सौन्दर्य का आरोप किया है। ‘लहरों के घूँघट’ में मानवीकरण और रूपक का सुन्दर समन्वय है। भाषा कोमल, मधुर, संस्कृतनिष्ठ, लयात्मक एवं चित्रात्मक है। सम्पूर्ण पद्यांश में शान्त, सौन्दर्यपूर्ण और प्रकृति-प्रेम से ओत-प्रोत भावों की अभिव्यक्ति हुई है।
पद्यांश
अब पहुँची चपला बीच धार, छिप गया चाँदनी का कगार। दो बाहों-से दूरस्थ-तीर, धारा का कृश कोमल शरीर आलिंगन करने को अधीर। अति दूर, क्षितिज पर विटप-माल, लगती भ्रू-रेखा-सी अराल, अपलक-नभ नील-नयन विशाल; मा के उर पर शिशु-सा, समीप, सोया धारा में एक द्वीप, ऊर्मिल प्रवाह को कर प्रतीप; वह कौन विहग? क्या विकल कोक, उड़ता, हरने का निज विरह-शोक? छाया की कोकी को विलोक? पतवार घुमा, अब प्रतनु-भार, नौका घूमी विपरीत-धार। डाँड़ों के चल करतल पसार, भर-भर मुक्ताफल फेन-स्फार, बिखराती जल में तार-हार। चाँदी के साँपों-सी रलमल, नाँचतीं रश्मियाँ जल में चल रेखाओं-सी खिंच तरल-सरल। लहरों की लतिकाओं में खिल, सौ-सौ शशि, सौ-सौ उडु झिलमिल फैले फूले जल में फेनिल। अब उथला सरिता का प्रवाह, लग्गी से ले-ले सहज थाह हम बढ़े घाट को सहोत्साह। ज्यों-ज्यों लगती है नाव पार उर में आलोकित शत विचार। इस धारा-सा ही जग का क्रम, शाश्वत इस जीवन का उद्गम, शाश्वत है गति, शाश्वत संगम। शाश्वत नभ का नीला-विकास, शाश्वत शशि का यह रजत-हास, शाश्वत लघु-लहरों का विलास। हे जग-जीवन के कर्णधार! चिर जन्म-मरण के आर-पार, शाश्वत जीवन-नौका-विहार। मैं भूल गया अस्तित्व-ज्ञान, जीवन का यह शाश्वत प्रमाण करता मुझको अमरत्व-दान।
शब्दार्थ — चपला — नाव/चंचल गति वाली; धार — नदी की मुख्य जलधारा; कगार — किनारा; दूरस्थ — दूर स्थित; तीर — किनारा; कृश — पतला/क्षीण; अधीर — व्याकुल; क्षितिज — आकाश और पृथ्वी के मिलने का काल्पनिक स्थान; विटप-माल — वृक्षों की पंक्ति; भ्रू-रेखा — भौंह की रेखा; अराल — टेढ़ी/वक्र; अपलक — बिना पलक झपकाए; नभ — आकाश; नील-नयन — नीली आँखें; विशाल — बहुत बड़ा; उर — हृदय/वक्षस्थल; ऊर्मिल — लहरों से युक्त; प्रतीप — विपरीत दिशा में; विहग — पक्षी; विकल — व्याकुल; कोक — चकवा पक्षी; विरह-शोक — वियोग का दुःख; विलोक — देखना; पतवार — नाव चलाने का उपकरण; प्रतनु — अत्यन्त हल्का/सूक्ष्म; भार — वजन; विपरीत-धार — जलधारा की उलटी दिशा; डाँड़ — नाव खेने का डंडा; करतल — हथेली; मुक्ताफल — मोती; फेन-स्फार — फैला हुआ झाग; तार-हार — तारों की माला; रश्मि — किरण; तरल — द्रव/चंचल; लतिकाएँ — बेलें; शशि — चन्द्रमा; उडु — तारा; फेनिल — झाग से युक्त; उथला — कम गहरा; लग्गी — नाव को आगे बढ़ाने के लिए प्रयुक्त लम्बा बाँस; थाह — गहराई; सहोत्साह — उत्साहपूर्वक; आलोकित — प्रकाशित; शत — सौ; उद्गम — उत्पत्ति का स्थान; शाश्वत — सदा रहने वाला; संगम — मिलन; नीला-विकास — नीले आकाश का विस्तार; रजत-हास — चाँदी जैसी चमकती मुस्कान; विलास — क्रीड़ा/आनन्द; कर्णधार — नाव चलाने वाला/मार्गदर्शक; चिर — सदा/बहुत समय तक; आर-पार — इस ओर से उस ओर तक; अस्तित्व-ज्ञान — अपने होने का बोध; प्रमाण — प्रमाण/सत्य का आधार; अमरत्व — अमर होने की अवस्था।
सन्दर्भ — प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘नौका-विहार’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पन्त जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने गंगा की धारा में नाव-विहार करते हुए प्रकृति के विविध मनोहारी दृश्यों तथा जीवन के शाश्वत सत्य का चित्रण किया है। नाव के बीच धारा में पहुँचने पर गंगा के दोनों किनारों, आकाश, वृक्षों, द्वीप और पक्षियों का सौन्दर्य कवि को आकर्षित करता है। आगे नाव की दिशा बदलने, जल में उठते फेन, चाँदनी की किरणों और लहरों के मनोरम दृश्य के साथ कवि के मन में जीवन-दर्शन के विचार जागते हैं। वह गंगा की निरन्तर गति में संसार और जीवन की शाश्वत गति तथा जन्म-मरण के चिरन्तन क्रम का अनुभव करता है।
हिन्दी व्याख्या — जब नाव गंगा की बीच धारा में पहुँचती है, तब चाँदनी से प्रकाशित किनारा पीछे छिप जाता है। नदी के दोनों दूर स्थित किनारे ऐसे प्रतीत होते हैं, मानो दो बाँहें उसके पतले और कोमल शरीर को आलिंगन करने के लिए व्याकुल हों। बहुत दूर क्षितिज पर वृक्षों की पंक्ति टेढ़ी-मेढ़ी भौंह की रेखा के समान दिखाई देती है और उसके ऊपर फैला हुआ विशाल नीला आकाश किसी विशाल नीले नेत्र के समान लगता है। धारा के समीप एक छोटा-सा द्वीप ऐसा दिखाई देता है, मानो माता के हृदय पर कोई शिशु सोया हुआ हो और वह लहरों के प्रवाह की विपरीत दिशा में स्थित हो। कवि एक पक्षी को देखकर सोचता है कि कहीं यह व्याकुल चकवा तो नहीं है, जो अपने विरह का दुःख दूर करने के लिए उड़ रहा है और जल में दिखाई देने वाली अपनी छाया रूपी चकवी को देख रहा है। इसके बाद नाव की पतवार घुमाई जाती है और नाव का हल्का भार विपरीत दिशा में घूम जाता है। नाविक डाँड़ों को चलाते हुए अपनी हथेलियाँ फैलाता है और जल के झाग रूपी मोतियों को बिखेरता जाता है। पानी में चाँदनी की किरणें चाँदी के साँपों के समान चमकती हुई नृत्य करती हैं और सरल तरल रेखाओं के रूप में खिंचती चली जाती हैं। लहरों की बेलों में सैकड़ों चन्द्रमा और सैकड़ों तारे जैसे चमकते हुए दिखाई देते हैं तथा जल में झाग फैलकर फूलों के समान सुन्दर दृश्य उत्पन्न करता है। आगे नदी का प्रवाह उथला हो जाता है। नाविक लग्गी से जल की गहराई का अनुमान लेते हुए उत्साहपूर्वक घाट की ओर बढ़ते हैं। जैसे-जैसे नाव किनारे के निकट पहुँचती है, कवि के हृदय में जीवन के अनेक गम्भीर विचार प्रकाशित होने लगते हैं। उसे लगता है कि जिस प्रकार नदी निरन्तर बहती रहती है, उसी प्रकार संसार और जीवन का क्रम भी निरन्तर चलता रहता है। जीवन की उत्पत्ति, उसकी गति और उसका संगम शाश्वत है। नीला आकाश, चन्द्रमा की चाँदी जैसी मुस्कान और छोटी-छोटी लहरों का खेल भी निरन्तर बना रहने वाला है। कवि संसार के जीवन-रूपी नाव के कर्णधार को सम्बोधित करके कहता है कि जन्म और मृत्यु के पार भी जीवन की यह नौका-विहार रूपी यात्रा शाश्वत है। इस अनुभूति में कवि अपने व्यक्तिगत अस्तित्व के बोध को भूल जाता है। जीवन के इस शाश्वत सत्य का अनुभव उसे अमरत्व का बोध कराने लगता है।
काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने प्रकृति-सौन्दर्य के साथ जीवन के शाश्वत दर्शन का अत्यन्त सुन्दर समन्वय किया है। ‘दो बाहों-से दूरस्थ-तीर’ में नदी के दोनों किनारों का मानवीकरण करते हुए उन्हें बाँहों के समान बताया गया है। ‘अपलक-नभ नील-नयन विशाल’ में आकाश को विशाल नीले नेत्र के रूप में चित्रित करना रूपक का सुन्दर उदाहरण है। ‘मा के उर पर शिशु-सा’ में द्वीप की शिशु से उपमा अत्यन्त मनोहारी है। ‘चाँदी के साँपों-सी रलमल, नाँचतीं रश्मियाँ’ में चाँदनी की किरणों को चाँदी के साँपों के समान बताकर अद्भुत दृश्य-बिम्ब प्रस्तुत किया गया है। ‘लहरों की लतिकाओं में खिल, सौ-सौ शशि, सौ-सौ उडु’ में अतिशयोक्ति और कल्पनाशीलता का सुन्दर प्रयोग हुआ है। नदी, लहर, चाँदनी, तारे और आकाश के माध्यम से कवि ने दृश्य सौन्दर्य को अत्यन्त सजीव बना दिया है। अन्तिम भाग में प्रकृति के दृश्य को जीवन-दर्शन से जोड़ते हुए नदी की शाश्वत गति को जीवन की निरन्तर गति का प्रतीक बनाया गया है। ‘शाश्वत गति, शाश्वत संगम’ तथा ‘शाश्वत जीवन-नौका-विहार’ में दार्शनिक भावों की गम्भीर अभिव्यक्ति हुई है। भाषा कोमल, मधुर, लयात्मक, चित्रात्मक एवं संस्कृतनिष्ठ है।

4. सुमित्रानन्दन पन्त का जीवन परिचय

जीवन-परिचय — जीवन परिचय

© श्रीमत् परमहंस पाठशाला

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