जयशंकर प्रसाद — आँसू, आशा सर्ग, अरी वरुणा की शान्त कछार,

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद — अरी वरुणा की शान्त कछार, आँसू, आशा सर्ग

अरी वरुणा की शान्त कछार, आँसू खण्डकाव्य एवं आशा सर्ग-कामायनी का शब्दार्थ, सन्दर्भ, प्रसङ्ग, हिन्दी व्याख्या एवं काव्य-सौंदर्य।

1. अरी वरुणा की शान्त कछार

कविता
अरी वरुणा की शांत कछार ! तपस्वी के वीराग की प्यार ! सतत व्याकुलता के विश्राम, अरे ऋषियों के कानन कुञ्ज! जगत नश्वरता के लघु त्राण, लता, पादप, सुमनों के पुञ्ज! तुम्हारी कुटियों में चुपचाप, चल रहा था उज्ज्वल व्यापार. स्वर्ग की वसुधा से शुचि संधि, गूंजता था जिससे संसार . अरी वरुणा की शांत कछार ! तपस्वी के वीराग की प्यार ! तुम्हारे कुंजो में तल्लीन, दर्शनों के होते थे वाद. देवताओं के प्रादुर्भाव, स्वर्ग के सपनों के संवाद. स्निग्ध तरु की छाया में बैठ, परिषदें करती थी सुविचार- भाग कितना लेगा मस्तिष्क, हृदय का कितना है अधिकार? अरी वरुणा की शांत कछार ! तपस्वी के वीराग की प्यार ! छोड़कर पार्थिव भोग विभूति, प्रेयसी का दुर्लभ वह प्यार. पिता का वक्ष भरा वात्सल्य, पुत्र का शैशव सुलभ दुलार. दुःख का करके सत्य निदान, प्राणियों का करने उद्धार. सुनाने आरण्यक संवाद, तथागत आया तेरे द्वार. अरी वरुणा की शांत कछार ! तपस्वी के वीराग की प्यार ! मुक्ति जल की वह शीतल बाढ़, जगत की ज्वाला करती शांत. तिमिर का हरने को दुख भार, तेज अमिताभ अलौकिक कांत. देव कर से पीड़ित विक्षुब्ध, प्राणियों से कह उठा पुकार – तोड़ सकते हो तुम भव-बंध, तुम्हें है यह पूरा अधिकार. अरी वरुणा की शांत कछार ! तपस्वी के वीराग की प्यार ! छोड़कर जीवन के अतिवाद, मध्य पथ से लो सुगति सुधार. दुःख का समुदय उसका नाश, तुम्हारे कर्मो का व्यापार. विश्व-मानवता का जयघोष, यहीं पर हुआ जलद-स्वर-मंद्र. मिला था वह पावन आदेश, आज भी साक्षी है रवि-चंद्र. अरी वरुणा की शांत कछार ! तपस्वी के वीराग की प्यार ! तुम्हारा वह अभिनंदन दिव्य और उस यश का विमल प्रचार. सकल वसुधा को दे संदेश, धन्य होता है बारम्बार. आज कितनी शताब्दियों बाद, उठी ध्वंसों में वह झंकार. प्रतिध्वनि जिसकी सुने दिगन्त, विश्व वाणी का बने विहार. अरी वरुणा की शांत कछार ! तपस्वी के वीराग की प्यार !
शब्दार्थ — वरुणा = वाराणसी की एक प्राचीन नदी, कछार = नदी का किनारा/तटवर्ती भूमि, तपस्वी = तप करने वाला साधु/ऋषि, वैराग्य = सांसारिक विषयों से विरक्ति, सतत = निरन्तर/लगातार, व्याकुलता = बेचैनी/अशान्ति, विश्राम = शान्ति/आराम, कानन = वन, कुञ्ज = लताओं और वृक्षों से घिरा स्थान, नश्वरता = नष्ट होने का स्वभाव/क्षणभंगुरता, त्राण = रक्षा/बचाव, लता = बेल, पादप = वृक्ष/पेड़, सुमन = फूल, पुञ्ज = समूह/समुदाय, कुटी = छोटी झोंपड़ी/आश्रम, उज्ज्वल = पवित्र/प्रकाशमान, व्यापार = कार्य/क्रियाकलाप, वसुधा = पृथ्वी, शुचि = पवित्र, संधि = सम्बन्ध/मेल, तल्लीन = पूर्णतः मग्न, दर्शन = दार्शनिक विचार/शास्त्र, वाद = विचार-विमर्श/बहस, प्रादुर्भाव = प्रकट होना/उद्भव, संवाद = बातचीत/विचार-विनिमय, स्निग्ध = कोमल/शीतल, तरु = वृक्ष, परिषद् = सभा, सुविचार = उत्तम विचार, पार्थिव = सांसारिक/भौतिक, भोग = सांसारिक सुख, विभूति = वैभव/सम्पत्ति, प्रेयसी = प्रिय स्त्री/प्रेमिका, वात्सल्य = माता-पिता का स्नेह, शैशव = बचपन, दुलार = स्नेह/लाड़-प्यार, निदान = कारण/उपाय, उद्धार = मुक्ति/कल्याण, आरण्यक = वन से सम्बन्धित/वनवासी जीवन से सम्बन्धित, तथागत = भगवान बुद्ध, मुक्ति = बन्धन से छुटकारा/निर्वाण, ज्वाला = आग/दाह, तिमिर = अंधकार, अमिताभ = अनन्त प्रकाश वाला/बुद्ध का एक नाम, अलौकिक = संसार से परे/असाधारण, विक्षुब्ध = व्याकुल/अशान्त, भव-बंध = संसार के बन्धन, अतिवाद = किसी बात की अति/चरम मार्ग, मध्य पथ = दोनों अतियों से रहित संतुलित मार्ग, सुगति = श्रेष्ठ गति/कल्याण का मार्ग, समुदय = उत्पत्ति/कारण, जलद = बादल, मन्द्र = गम्भीर एवं धीमा, पावन = पवित्र, रवि = सूर्य, चन्द्र = चन्द्रमा, अभिनंदन = सम्मान/स्तुति, दिव्य = अलौकिक/श्रेष्ठ, विमल = निर्मल/पवित्र, प्रचार = प्रसिद्धि/प्रसार, सकल = सम्पूर्ण, वसुधा = पृथ्वी, ध्वंस = विनाश/खंडहर, झंकार = गूँजती हुई ध्वनि, प्रतिध्वनि = लौटकर सुनाई देने वाली ध्वनि, दिगन्त = दिशाओं का अन्त/क्षितिज, विहार = विचरण/निवास का स्थान।
सन्दर्भ — प्रस्तुत काव्यांश/कविता हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘वरुणा की शान्त कछार’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता छायावादी काव्य के मुख्य स्तम्भ, प्रसिद्ध हिन्दी काव्य, नाटक, कहानी एवं उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत कविता में कवि ने वरुणा नदी के शांत तट को भारतीय आध्यात्मिक, दार्शनिक और मानवीय चेतना की पवित्र भूमि के रूप में चित्रित किया है। कवि को स्मरण है कि इस शांत कछार और उसके वन-कुञ्जों में ऋषि-मुनि सांसारिक व्याकुलताओं से दूर तप, चिन्तन और दर्शन में लीन रहते थे। इन्हीं पवित्र स्थलों पर जीवन, मस्तिष्क और हृदय के अधिकार जैसे गम्भीर विषयों पर विचार-विमर्श होता था। आगे कवि भगवान बुद्ध के आगमन और उनके त्याग, करुणा तथा मानव-कल्याण के संदेश का स्मरण करता है। बुद्ध ने दुःख के कारण और उसके निवारण का मार्ग बताते हुए मनुष्य को भव-बन्धन से मुक्त होने तथा अतियों को छोड़कर मध्य मार्ग अपनाने का उपदेश दिया। कवि के अनुसार मानवता के लिए दिया गया यह पावन संदेश आज भी सूर्य और चन्द्रमा की भाँति इस धरती पर साक्षी रूप में विद्यमान है। शताब्दियाँ बीत जाने पर भी उस महान आध्यात्मिक चेतना की प्रतिध्वनि संसार के कोने-कोने में सुनाई देती है।
हिन्दी व्याख्या —

कवि वरुणा नदी के शांत तट को सम्बोधित करते हुए कहता है कि हे वरुणा की शांत कछार! तुम तपस्वियों के वैराग्य और प्रेम की पवित्र भूमि हो। तुम्हारे वन-कुञ्ज ऋषियों की निरन्तर व्याकुलता को शान्त करने वाले विश्राम-स्थल थे। लताओं, वृक्षों और फूलों के समूहों से सुसज्जित यह स्थान संसार की नश्वरता से मनुष्य को थोड़ी-सी रक्षा प्रदान करने वाला था। तुम्हारी कुटियों में चुपचाप आध्यात्मिक और ज्ञानमय कार्य चलता रहता था। वहाँ पृथ्वी और स्वर्ग के बीच एक पवित्र सम्बन्ध स्थापित करने वाली साधना होती थी, जिसकी पवित्र ध्वनि पूरे संसार में गूँजती थी। तुम्हारे कुञ्जों में ऋषि-मुनि दर्शन और आध्यात्मिक विषयों पर गम्भीर विचार-विमर्श करते थे। देवताओं के प्रकट होने और स्वर्ग के आदर्शों से सम्बन्धित विचारों पर संवाद होता था। वृक्षों की शीतल छाया में विद्वानों की सभाएँ बैठती थीं और यह विचार किया जाता था कि मनुष्य के जीवन में बुद्धि अर्थात् मस्तिष्क का कितना स्थान होना चाहिए और हृदय अर्थात् भावना एवं करुणा का कितना अधिकार होना चाहिए। कवि आगे भगवान बुद्ध के महान त्याग का स्मरण करता है। उन्होंने सांसारिक सुख-वैभव, प्रिय पत्नी का प्रेम, पिता का वात्सल्य और पुत्र का दुलार छोड़कर दुःख के वास्तविक कारण को समझा तथा समस्त प्राणियों के उद्धार का मार्ग खोजा। इसी पवित्र भूमि पर तथागत बुद्ध ने आरण्यक अर्थात् वन-जीवन और आध्यात्मिक साधना से सम्बन्धित अपना संदेश दिया। उनके उपदेशों ने संसार के दुःख और अज्ञान को शान्त करने के लिए मुक्ति का शीतल मार्ग दिखाया। उन्होंने अंधकार और दुःख को दूर करने के लिए अपने अलौकिक ज्ञान का प्रकाश फैलाया तथा दुःख से पीड़ित मनुष्यों को पुकारकर कहा कि वे स्वयं संसार के बन्धनों को तोड़ सकते हैं और मुक्ति प्राप्त करने का उन्हें पूरा अधिकार है। बुद्ध ने जीवन की अतियों को छोड़कर मध्य मार्ग अपनाने का उपदेश दिया। उन्होंने बताया कि दुःख की उत्पत्ति का कारण समझकर उसके नाश का प्रयत्न करना चाहिए और मनुष्य के कर्म ही उसके जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं। इसी पवित्र भूमि से विश्व-मानवता के कल्याण का गम्भीर और महान घोष हुआ था। बुद्ध का वह पावन आदेश आज भी सूर्य और चन्द्रमा को साक्षी बनाकर संसार में विद्यमान है। कवि अन्त में वरुणा की कछार को सम्बोधित करते हुए कहता है कि तुम्हारा वह दिव्य अभिनन्दन और उस महान यश का निर्मल प्रचार सम्पूर्ण पृथ्वी को आज भी धन्य करता है। अनेक शताब्दियाँ बीत जाने के बाद भी विनाश और खंडहरों के बीच उस महान संदेश की झंकार सुनाई देती है। उसकी प्रतिध्वनि संसार के दिगन्त तक पहुँचती है और सम्पूर्ण विश्व मानो उस विश्व-वाणी के विहार का क्षेत्र बन जाता है।

काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत कविता में वरुणा नदी के शांत तट के प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ भारतीय आध्यात्मिक, दार्शनिक और मानवीय चेतना का अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण हुआ है। ‘अरी वरुणा की शांत कछार! तपस्वी के वैराग्य की प्यार!’ में सम्बोधन के साथ मानवीकरण का सुन्दर प्रयोग हुआ है। ‘व्याकुलता के विश्राम’, ‘नश्वरता के लघु त्राण’ तथा ‘स्वर्ग की वसुधा से शुचि संधि’ जैसे प्रयोगों में गहन दार्शनिक भाव व्यक्त हुए हैं। लता, पादप, सुमनों के पुञ्ज द्वारा प्राकृतिक सौन्दर्य का मनोहारी बिम्ब उपस्थित किया गया है। ‘भाग कितना लेगा मस्तिष्क, हृदय का कितना है अधिकार?’ में प्रश्नात्मक शैली द्वारा बुद्धि और भावना के मध्य सम्बन्ध की गम्भीर समस्या प्रस्तुत की गई है। बुद्ध के त्याग का वर्णन करते हुए ‘पार्थिव भोग विभूति’, ‘पिता का वक्ष भरा वात्सल्य’, ‘पुत्र का शैशव सुलभ दुलार’ में त्याग और करुणा का मार्मिक चित्रण हुआ है। ‘मुक्ति जल की शीतल बाढ़’ में रूपक द्वारा बुद्ध के मुक्ति-संदेश को शीतल जल की बाढ़ के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो संसार की दुःख-ज्वाला को शांत करती है। ‘तिमिर’ और ‘तेज’ के माध्यम से अज्ञान और ज्ञान का प्रतीकात्मक विरोध प्रस्तुत हुआ है। ‘जलद-स्वर-मन्द्र’ में गम्भीर एवं प्रभावशाली ध्वनि का बिम्ब है। अन्तिम पंक्तियों में ‘ध्वंसों में उठी झंकार’ और ‘प्रतिध्वनि’ के माध्यम से बुद्ध के शाश्वत संदेश की अमरता को व्यक्त किया गया है। भाषा संस्कृतनिष्ठ, गम्भीर, भावपूर्ण, चित्रात्मक एवं ओजस्वी है तथा कविता में शान्त, करुण, आध्यात्मिक और मानवतावादी भावों का सुन्दर समन्वय हुआ है।

2. आँसू खण्डकाव्य

पद 1–5
बस गयी एक बस्ती हैं,स्मृतियों की इसी हृदय में नक्षत्र लोक फैला है,जैसे इस नील निलय में। 1 ये सब स्फुलिंग हैं मेरी,इस ज्वालामयी जलन के कुछ शेष चिह्न हैं केवल,मेरे उस महा मिलन के ।2 शीतल ज्वाला जलती हैं,ईधन होता दृग जल का यह व्यर्थ साँस चल-चल कर,करती हैं काम अनिल का ।3 बाड़व ज्वाला सोती थी,इस प्रणय सिन्धु के तल में प्यासी मछली-सी आँखें,थी विकल रूप के जल में। 4 बुलबुले सिन्धु के फूटे,नक्षत्र मालिका टूटी नभ मुक्त कुन्तला धरणी,दिखलाई देती लूटी। 5
शब्दार्थ — बस्ती = निवास-स्थान/नगर, स्मृतियाँ = यादें, हृदय = मन/दिल, नक्षत्र लोक = तारों का संसार, नील = नीला, निलय = घर/स्थान, स्फुलिंग = चिनगारी/अग्नि-कण, ज्वालामयी = ज्वाला से भरी हुई, जलन = पीड़ा/दाह, शेष चिह्न = बचे हुए निशान, महा मिलन = महान मिलन/प्रिय से मिलन, शीतल = ठंडी/सुखद, ज्वाला = अग्नि/दाह, ईंधन = जलने का पदार्थ, दृग = आँख, जल = आँसू/पानी, व्यर्थ = निष्फल/बिना प्रयोजन, साँस = श्वास, अनिल = वायु/हवा, बाड़व ज्वाला = समुद्र के भीतर रहने वाली अग्नि, प्रणय = प्रेम, सिन्धु = समुद्र, तल = नीचे का भाग, प्यासी = जिसकी प्यास न बुझी हो, मछली = जल में रहने वाला जीव, विकल = व्याकुल/बेचैन, रूप = सौन्दर्य, बुलबुले = जल में बनने वाले छोटे-छोटे फेनयुक्त गोले, नक्षत्र-मालिका = तारों की माला, नभ = आकाश, मुक्त = स्वतंत्र/खुला हुआ, कुन्तला = केशों वाली/बालों से युक्त, धरणी = पृथ्वी, लूटी = उजड़ी हुई/लुटी हुई।
सन्दर्भ — प्रस्तुत काव्यांश/पद/पदांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘आँसू’ खण्डकाव्य से लिया गया है। इसके रचयिता छायावादी काव्य के मुख्य स्तम्भ, प्रसिद्ध हिन्दी काव्य, नाटक, कहानी एवं उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पदों में कवि ने अपने हृदय में बसी हुई प्रिय की स्मृतियों, प्रेम-विरह की तीव्र पीड़ा तथा अतीत के महान मिलन की शेष स्मृतियों का अत्यन्त मार्मिक चित्रण किया है। कवि के हृदय में पुरानी स्मृतियाँ तारों से भरे आकाश की तरह फैली हुई हैं। प्रेम की ज्वाला से उत्पन्न पीड़ा की चिनगारियाँ उन स्मृतियों के रूप में शेष रह गई हैं। आँसुओं से जलती हुई विरह की ज्वाला और निरर्थक चलती साँसें कवि की व्यथा को और तीव्र करती हैं। प्रेम-सागर के भीतर छिपी बाड़वाग्नि और रूप-सौन्दर्य के लिए व्याकुल आँखों के माध्यम से कवि ने प्रेम की तीव्रता को व्यक्त किया है। अन्त में प्रेम-संसार के टूट जाने पर बुलबुलों और नक्षत्र-मालिका के टूटने तथा आकाश और पृथ्वी के उजड़े हुए रूप का चित्रण किया गया है।
हिन्दी व्याख्या —

पद 1 — कवि कहता है कि उसके हृदय में अब प्रिय की स्मृतियों की एक पूरी बस्ती बस गई है। उसके हृदय के भीतर असंख्य पुरानी यादें इस प्रकार फैली हुई हैं, जैसे नीले आकाश में तारों का संसार फैला हुआ हो। अर्थात् प्रिय से सम्बन्धित स्मृतियाँ उसके मन में स्थायी रूप से बस गई हैं और उसके एकान्त जीवन का आधार बन गई हैं।

पद 2 — कवि के हृदय में जो पीड़ा और जलन है, उसकी ये स्मृतियाँ मानो ज्वाला से निकलने वाली चिनगारियाँ हैं। ये चिनगारियाँ उस महान प्रेम-मिलन के केवल बचे हुए चिह्न हैं, जो अब अतीत की बात बन चुका है। प्रिय के साथ हुए मिलन की स्मृतियाँ ही अब कवि के लिए उसके प्रेम की अन्तिम निशानी रह गई हैं और वही उसके हृदय में विरह की अग्नि को जलाती रहती हैं।

पद 3 — कवि के हृदय में विरह की ऐसी अग्नि जल रही है, जो बाहर से शीतल प्रतीत होती है, किन्तु भीतर निरन्तर दाह उत्पन्न करती है। उसकी आँखों से निकलने वाले आँसू ही इस ज्वाला के ईंधन का कार्य करते हैं। कवि की साँसें व्यर्थ ही चलती रहती हैं और मानो वायु की तरह उस अग्नि को और अधिक प्रज्वलित करने का कार्य करती हैं। इस प्रकार आँसू और साँस दोनों ही उसकी विरह-व्यथा को बढ़ा रहे हैं।

पद 4 — कवि कहता है कि उसके प्रेम रूपी समुद्र की गहराई में बाड़वाग्नि के समान प्रचण्ड विरह-अग्नि छिपी हुई थी। उसकी आँखें उस सौन्दर्य के दर्शन के लिए उसी प्रकार व्याकुल थीं, जैसे पानी के भीतर रहने वाली प्यासी मछली जल के लिए व्याकुल रहती है। यहाँ कवि ने प्रेम की गहराई और प्रिय के रूप-दर्शन की तीव्र लालसा को अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया है।

पद 5 — प्रेम और मिलन का वह सुन्दर संसार अब नष्ट हो चुका है। कवि को ऐसा लगता है जैसे समुद्र के बुलबुले फूट गए हों और तारों की माला टूटकर बिखर गई हो। आकाश रूपी स्त्री के खुले हुए केशों के समान दिखाई देने वाली पृथ्वी अब उजड़ी और लुटी हुई प्रतीत होती है। अर्थात् प्रिय के वियोग के बाद कवि के लिए सम्पूर्ण संसार का सौन्दर्य और आकर्षण समाप्त हो गया है।

काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पदों में प्रेम की मधुर स्मृतियों, विरह की तीव्र पीड़ा तथा प्रिय-वियोग से उत्पन्न हृदय की रिक्तता का अत्यन्त मार्मिक एवं चित्रात्मक वर्णन हुआ है। ‘स्मृतियों की बस्ती’ में स्मृतियों को बस्ती के रूप में प्रस्तुत कर रूपक का सुन्दर प्रयोग हुआ है। ‘नक्षत्र लोक’ और ‘नील निलय’ के माध्यम से हृदय और आकाश का सुन्दर साम्य स्थापित किया गया है। ‘स्फुलिंग’ और ‘ज्वालामयी जलन’ में विरह की पीड़ा को अग्नि और चिनगारियों के रूप में चित्रित किया गया है। ‘शीतल ज्वाला’ में विरोधाभास के माध्यम से विरह की ऐसी पीड़ा व्यक्त की गई है जो भीतर जलाती है, फिर भी बाहर से शीतल प्रतीत होती है। ‘दृग जल’ को अग्नि का ईंधन तथा ‘अनिल’ को अग्नि प्रज्वलित करने वाले साधन के रूप में प्रस्तुत किया गया है। ‘बाड़व ज्वाला’ द्वारा प्रेम-सागर में छिपी विरहाग्नि का प्रभावशाली रूपक प्रस्तुत हुआ है। ‘प्यासी मछली-सी आँखें’ में उपमा द्वारा प्रिय के रूप-दर्शन की तीव्र लालसा व्यक्त की गई है। ‘बुलबुले ... फूटे’ तथा ‘नक्षत्र-मालिका टूटी’ में विनाश और विछोह के सजीव बिम्ब उपस्थित हुए हैं। भाषा भावपूर्ण, चित्रात्मक, प्रतीकात्मक, कोमल एवं अत्यन्त मार्मिक है।
पद 6–10
छिल-छिल कर छाले फोड़े,मल-मल कर मृदुल चरण से धुल-धुल कर बह रह जाते,आँसू करुणा के कण से। 6 इस विकल वेदना को ले,किसने सुख को ललकारा वह एक अबोध अकिंचन,बेसुध चैतन्य हमारा। 7 अभिलाषाओं की करवट,फिर सुप्त व्यथा का जगना सुख का सपना हो जाना,भींगी पलकों का लगना। 8 इस हृदय कमल का घिरना,अलि अलकों की उलझन में आँसू मरन्द का गिरना,मिलना निश्वास पवन में। 9 मादक थी मोहमयी थी,मन बहलाने की क्रीड़ा अब हृदय हिला देती है,वह मधुर प्रेम की पीड़ा। 10
शब्दार्थ — छिल-छिल = बार-बार छिलकर, छाले = घाव/फफोले, फोड़े = तोड़े/फटाए, मल-मल = बार-बार रगड़कर, मृदुल = कोमल, चरण = पैर, धुल-धुल = बार-बार धुलकर, आँसू = अश्रु, करुणा = दया/सहानुभूति, कण = छोटा अंश/बूँद, विकल = व्याकुल/बेचैन, वेदना = पीड़ा/दुःख, ललकारा = चुनौती दी, अबोध = अनजान/भोला, अकिंचन = जिसके पास कुछ भी न हो, बेसुध = अचेत/बेहोश, चैतन्य = चेतना/जीवन, अभिलाषा = इच्छा/कामना, करवट = परिवर्तन/पलटना, सुप्त = सोई हुई, व्यथा = पीड़ा/दुःख, सपना = स्वप्न/कल्पना, भींगी पलकें = आँसुओं से नम आँखें, हृदय कमल = कमल के समान हृदय, अलि = भौंरा, अलक = केश की लट, उलझन = जटिलता/फँसाव, मरन्द = पुष्प-रस/मधु, निश्वास = आह/लम्बी साँस, पवन = हवा, मादक = नशीला/आनन्द देने वाला, मोहमयी = मोह उत्पन्न करने वाली, क्रीड़ा = खेल/मनोरंजन, मधुर = मीठा/सुखद, प्रेम = स्नेह/अनुराग, पीड़ा = दुःख/कष्ट।
सन्दर्भ — प्रस्तुत काव्यांश/पद/पदांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘आँसू’ खण्डकाव्य से लिया गया है। इसके रचयिता छायावादी काव्य के मुख्य स्तम्भ, प्रसिद्ध हिन्दी काव्य, नाटक, कहानी एवं उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पदों में कवि ने प्रेम-विरह की तीव्र वेदना, करुणा से भरे आँसू, जाग्रत होती अभिलाषाओं तथा अतीत के मधुर प्रेम की स्मृतियों से उत्पन्न पीड़ा का मार्मिक चित्रण किया है। कवि के हृदय में प्रेम की पीड़ा इतनी तीव्र है कि उसके कोमल चरण भी मानो घावों से भर गए हैं और करुणा के आँसू उन्हें धोते हुए बह रहे हैं। कवि उस अबोध चेतना को स्मरण करता है, जिसने कभी सुख को चुनौती दी थी। अब सोई हुई व्यथा अभिलाषाओं के कारण फिर जाग उठती है और सुख का स्वप्न आँसुओं से भीगी पलकों में बदल जाता है। हृदय रूपी कमल प्रेम रूपी भँवरे और अलकों की उलझन में घिर जाता है तथा आँसू पुष्प-मकरन्द की तरह गिरकर निश्वास रूपी पवन में मिल जाते हैं। अन्त में कवि स्वीकार करता है कि प्रेम की क्रीड़ा कभी मादक और मोहक थी, किन्तु अब वही मधुर प्रेम-पीड़ा उसके हृदय को गहराई से हिला देती है।
हिन्दी व्याख्या —

पद 6 — कवि के प्रेम-विरह की पीड़ा इतनी अधिक है कि उसके कोमल चरणों में पड़े हुए छाले बार-बार छिलते और फूटते रहते हैं। उन्हें बार-बार मलने और धोने पर करुणा के आँसू ही मानो उस पीड़ा को धोते हुए बह जाते हैं। यहाँ कवि ने अपने जीवन-पथ के कष्टों तथा करुण भावनाओं को अत्यन्त मार्मिक रूप में व्यक्त किया है।

पद 7 — कवि आश्चर्यपूर्वक पूछता है कि इस अत्यन्त व्याकुल और असहनीय वेदना को लेकर किसने सुख को चुनौती दी थी। वह स्वयं अपने उस अबोध, असहाय और चेतनाविहीन रूप को स्मरण करता है, जिसने कभी सुख की प्राप्ति के लिए जीवन में प्रवेश किया था। अब उस सरल और भोले चैतन्य को उसकी भूल का परिणाम पीड़ा के रूप में भुगतना पड़ रहा है।

पद 8 — मनुष्य के मन में दबी हुई अभिलाषाएँ जब करवट लेती हैं, तब पहले से सोई हुई पीड़ा फिर जाग उठती है। जो सुख कभी स्वप्न के समान सुन्दर दिखाई देता था, वह अब दुःख में बदल जाता है। आँखों की पलकों पर आँसू आ जाते हैं और सुख का वही स्वप्न आँसुओं से भीगी पलकों में दिखाई देने लगता है।

पद 9 — कवि अपने हृदय को कमल के समान मानता है। यह हृदय रूपी कमल भौंरे के समान प्रिय की अलकों की उलझन में घिर गया है। प्रेम-विरह के कारण आँखों से आँसू पुष्प के मकरन्द की तरह गिरते रहते हैं और वे निश्वास रूपी पवन में मिल जाते हैं। इस प्रकार कवि ने प्रेम की मधुरता और विरह की पीड़ा को प्रकृति के प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त किया है।

पद 10 — कवि कहता है कि प्रेम की क्रीड़ा कभी अत्यन्त मादक और मोह उत्पन्न करने वाली थी। उस समय प्रेम का अनुभव मन को प्रसन्न और आकर्षित करता था। किन्तु अब वही मधुर प्रेम की स्मृति उसके हृदय को गहराई से हिला देती है। अर्थात् जो प्रेम कभी सुख का स्रोत था, वही प्रिय-वियोग के कारण अब असहनीय पीड़ा का कारण बन गया है।

काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पदों में प्रेम की स्मृति, विरह-वेदना, आँसू और अन्तर्मन की पीड़ा का अत्यन्त मार्मिक, प्रतीकात्मक एवं मनोवैज्ञानिक चित्रण हुआ है। ‘छिल-छिल कर छाले फोड़े, मल-मल’ में पुनरुक्ति-प्रकाश तथा अनुप्रास द्वारा पीड़ा की तीव्रता को प्रभावशाली बनाया गया है। ‘आँसू करुणा के कण’ में आँसुओं को करुणा के बिन्दुओं के रूप में प्रस्तुत किया गया है। ‘विकल वेदना’, ‘अबोध अकिंचन’ आदि में अनुप्रास एवं भाव-साम्य का सुन्दर प्रयोग है। ‘अभिलाषाओं की करवट’ तथा ‘सुप्त व्यथा का जगना’ में मानवीकरण द्वारा भावनाओं को सजीव रूप दिया गया है। ‘हृदय कमल’ में रूपक तथा ‘प्यासी मछली’ के समान भाव-बिम्बों की परम्परा के अनुरूप प्रकृति-प्रतीकों का प्रयोग हुआ है। ‘आँसू मरन्द का गिरना’ में आँसुओं को पुष्प-मकरन्द के रूप में चित्रित किया गया है तथा ‘निश्वास पवन’ में निश्वास को वायु का रूप दिया गया है। ‘मादक’, ‘मोहमयी’, ‘मधुर प्रेम’ जैसे शब्द प्रेम की पूर्व सुखानुभूति और वर्तमान विरह-वेदना के विरोध को उभारते हैं। भाषा कोमल, भावपूर्ण, चित्रात्मक, प्रतीकात्मक एवं अत्यन्त मार्मिक है।
पद 11–15
सुख आहत शान्त उमंगें,बेगार साँस ढोने में यह हृदय समाधि बना हैं,रोती करुणा कोने में। 11 चातक की चकित पुकारें,श्यामा ध्वनि सरल रसीली मेरी करुणार्द्र कथा की,टुकड़ी आँसू से गीली। 12 अवकाश भला हैं किसको,सुनने को करुण कथाएँ बेसुध जो अपने सुख से,जिनकी हैं सुप्त व्यथाएँ। 13 जीवन की जटिल समस्या,हैं बढ़ी जटा-सी कैसी उड़ती हैं धूल हृदय में,किसकी विभूति हैं ऐसी? 14 जो घनीभूत पीड़ा थी,मस्तक में स्मृति-सी छायी दुर्दिन में आँसू बनकर,वह आज बरसने आयी। 15
शब्दार्थ — सुख = आनन्द, आहत = चोट खाई हुई/पीड़ित, शान्त = शांत/स्थिर, उमंगें = उत्साह की तरंगें, बेगार = बिना लाभ के/व्यर्थ, साँस = श्वास, ढोना = वहन करना/ले जाना, समाधि = समाधि-स्थान/गहन ध्यान की अवस्था, करुणा = दया/दुःख की अनुभूति, कोना = स्थान का एक भाग, चातक = एक पक्षी जो वर्षा की बूँद की प्रतीक्षा करता है, चकित = आश्चर्यचकित/व्याकुल, पुकार = आवाज/आह्वान, श्यामा = एक प्रकार की चिड़िया/श्यामा पक्षी, ध्वनि = आवाज, सरल = सहज/सीधी, रसीली = मधुर/आनन्ददायक, करुणार्द्र = करुणा से भरी हुई, कथा = कहानी/वृत्तान्त, टुकड़ी = छोटा अंश/भाग, अवकाश = समय/फुर्सत, करुण = दुःखपूर्ण, बेसुध = अचेत/अपने होश में न रहने वाला, सुप्त = सोई हुई, व्यथा = पीड़ा/दुःख, जटिल = कठिन/उलझी हुई, समस्या = कठिनाई/प्रश्न, जटा = उलझे हुए बालों का समूह, धूल = मिट्टी के सूक्ष्म कण, विभूति = वैभव/महिमा/भस्म, घनीभूत = बहुत अधिक सघन/एकत्रित, पीड़ा = दुःख/कष्ट, मस्तक = सिर, स्मृति = याद, दुर्दिन = बुरा समय/विपत्ति का समय, बरसना = वर्षा के रूप में गिरना।
सन्दर्भ — प्रस्तुत काव्यांश/पद/पदांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘आँसू’ खण्डकाव्य से लिया गया है। इसके रचयिता छायावादी काव्य के मुख्य स्तम्भ, प्रसिद्ध हिन्दी काव्य, नाटक, कहानी एवं उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पदों में कवि ने आहत सुख, नष्ट होती उमंगों, हृदय में संचित करुणा तथा जीवन की जटिल समस्याओं से उत्पन्न गहन पीड़ा का मार्मिक चित्रण किया है। सुख और उमंगों के आहत हो जाने से कवि का जीवन केवल व्यर्थ साँसों का भार ढोता हुआ प्रतीत होता है और उसका हृदय करुणा का समाधि-स्थल बन गया है। प्रकृति में चातक की पुकार और श्यामा पक्षी की मधुर ध्वनि भी कवि को अपनी करुण कथा के आँसू से भीगे हुए अंश जैसी प्रतीत होती है। कवि अनुभव करता है कि अपने सुख में डूबे हुए लोगों के पास दूसरों की करुण कथाएँ सुनने का समय नहीं है। जीवन की जटिल समस्याएँ उलझी हुई जटाओं के समान बढ़ती जा रही हैं और हृदय में मानो पीड़ा की धूल उड़ रही है। अन्त में कवि बताता है कि जो पीड़ा बहुत समय से स्मृति बनकर उसके मस्तक पर घनीभूत होकर छाई हुई थी, वही विपत्ति के समय आँसू बनकर आँखों से बरसने लगी है।
हिन्दी व्याख्या —

पद 11 — कवि के जीवन में सुख और शान्ति की उमंगें आहत होकर समाप्त हो गई हैं। अब उसके पास केवल व्यर्थ चलती हुई साँसों का भार ढोने के अतिरिक्त कुछ नहीं रह गया है। उसका हृदय मानो समाधि-स्थल बन गया है, जिसके किसी एकान्त कोने में करुणा निरन्तर रो रही है। अर्थात् सुख और उत्साह के समाप्त हो जाने के कारण कवि का हृदय दुःख और करुणा से भर गया है।

पद 12 — चातक की आश्चर्य और व्याकुलता से भरी पुकार तथा श्यामा पक्षी की सरल और मधुर ध्वनि भी कवि को अपनी करुण कथा के किसी छोटे-से अंश के समान लगती है। उसकी करुणा से भरी जीवन-कथा इतनी दुःखपूर्ण है कि प्रकृति की पक्षी-ध्वनियाँ भी उसे आँसुओं से भीगी हुई अपनी कथा का ही अंश प्रतीत होती हैं।

पद 13 — कवि कहता है कि आज किसके पास इतनी फुर्सत है कि वह किसी की दुःखभरी कहानी सुन सके? संसार के लोग अपने-अपने सुख में इतने बेसुध हैं कि उन्हें दूसरों की पीड़ा का अनुभव ही नहीं होता। जिन लोगों के भीतर अपनी ही सुप्त व्यथाएँ छिपी हुई हैं, वे भी दूसरों के दुःख को सुनने और समझने के लिए समय नहीं निकाल पाते।

पद 14 — कवि के सामने जीवन की समस्या अत्यन्त जटिल और उलझी हुई दिखाई देती है। वह प्रश्न करता है कि जीवन की यह समस्या इतनी उलझी हुई जटाओं के समान क्यों बढ़ती जा रही है। उसके हृदय में पीड़ा और निराशा की धूल उड़ रही है। वह यह जानना चाहता है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न करने वाली शक्ति या परिस्थिति किसकी विभूति है।

पद 15 — कवि के हृदय में बहुत समय से एकत्रित और सघन पीड़ा स्मृति के समान उसके मस्तक पर छाई हुई थी। वह पीड़ा भीतर ही भीतर दबकर घनीभूत होती रही। अब जब जीवन में दुर्दिन अर्थात् विपत्ति का समय आया, तो वही संचित पीड़ा आँसुओं का रूप धारण करके आँखों से बरसने लगी। इस प्रकार आँसू कवि की वर्षों से संचित वेदना की स्वाभाविक अभिव्यक्ति बन गए हैं।

काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पदों में कवि ने सुख के नष्ट हो जाने, हृदय में संचित करुणा, जीवन की जटिलताओं तथा घनीभूत पीड़ा के आँसू बनकर व्यक्त होने का अत्यन्त मार्मिक एवं मनोवैज्ञानिक चित्रण किया है। ‘सुख आहत शान्त उमंगें’ में सुख और उमंगों के मानवीकरण द्वारा उनकी पीड़ा को सजीव बनाया गया है। ‘यह हृदय समाधि बना है’ में रूपक द्वारा कवि के हृदय को समाधि के समान निस्तब्ध और दुःखमय बताया गया है। ‘चातक की चकित पुकारें, श्यामा ध्वनि’ में प्रकृति के मधुर ध्वनि-बिम्ब का सुन्दर प्रयोग हुआ है। ‘मेरी करुणार्द्र कथा की टुकड़ी आँसू से गीली’ में प्रकृति की ध्वनियों को कवि की करुण कथा से जोड़कर भाव-साम्य स्थापित किया गया है। ‘जीवन की जटिल समस्या’ को ‘बढ़ी जटा-सी’ कहकर उपमा का सुन्दर प्रयोग किया गया है। ‘उड़ती है धूल हृदय में’ में पीड़ा और व्याकुलता का सजीव बिम्ब उपस्थित हुआ है। ‘घनीभूत पीड़ा’ और ‘आँसू बनकर बरसने’ में पीड़ा के क्रमशः संचय और उसकी अभिव्यक्ति का मनोवैज्ञानिक चित्रण है। भाषा भावपूर्ण, चित्रात्मक, प्रतीकात्मक, करुण एवं अत्यन्त मार्मिक है।
पद 16–20
मेरे क्रन्दन में बजती,क्या वीणा, जो सुनते हो धागों से इन आँसू के,निज करुणापट बुनते हो। 16 रो-रोकर सिसक-सिसक कर,कहता मैं करुण कहानी तुम सुमन नोचते सुनते,करते जानी अनजानी। 17 मैं बल खाता जाता था,मोहित बेसुध बलिहारी अन्तर के तार खिंचे थे,तीखी थी तान हमारी। 18 झंझा झकोर गर्जन था,बिजली थी सी नीरदमाला, पाकर इस शून्य हृदय को,सबने आ डेरा डाला। 19 घिर जाती प्रलय घटाएँ,कुटिया पर आकर मेरी तम चूर्ण बरस जाता था,छा जाती अधिक अँधेरी। 20
शब्दार्थ — क्रन्दन = रोना/विलाप, वीणा = एक वाद्ययंत्र, धागे = सूत/तन्तु, आँसू = अश्रु, करुणापट = करुणा का वस्त्र/दुःख की चादर, रो-रोकर = लगातार रोते हुए, सिसक-सिसक = रुक-रुककर रोते हुए, करुण = दुःखपूर्ण, कहानी = कथा/वृत्तान्त, सुमन = फूल, नोचते = तोड़ते/खींचते, जानी-अनजानी = जान-बूझकर या अनजाने में, बल खाता = व्याकुल होकर तड़पता, मोहित = मुग्ध/आकर्षित, बेसुध = अचेत/बेहोश, बलिहारी = न्योछावर/समर्पित, अन्तर = हृदय/भीतरी मन, तार = तन्तु/मन की भावनात्मक नसें, तीखी = प्रखर/तेज, तान = स्वर का खिंचाव/संगीत का स्वर, झंझा = तेज आँधी, झकोर = तेज हवा का झोंका, गर्जन = बादलों की गड़गड़ाहट, बिजली = विद्युत की चमक, नीरद = बादल, माला = श्रृंखला/समूह, शून्य = रिक्त/खाली, हृदय = मन/अन्तःकरण, डेरा डालना = निवास करना/ठहर जाना, प्रलय = महाविनाश, घटाएँ = बादलों के समूह, कुटिया = छोटी झोंपड़ी/घर, तम = अंधकार, चूर्ण = बारीक कण/धूल, अँधेरी = अंधकार से भरी हुई।
सन्दर्भ — प्रस्तुत काव्यांश/पद/पदांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘आँसू’ खण्डकाव्य से लिया गया है। इसके रचयिता छायावादी काव्य के मुख्य स्तम्भ, प्रसिद्ध हिन्दी काव्य, नाटक, कहानी एवं उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पदों में कवि ने अपने हृदय के क्रन्दन, करुण वेदना और आँसुओं के माध्यम से अपनी अन्तःपीड़ा को व्यक्त किया है। कवि के आँसू और करुण क्रन्दन किसी वीणा के करुण स्वर के समान हैं, जिन्हें सुनकर मानो कोई करुणा का वस्त्र बुन रहा है। वह अपनी पीड़ा को रो-रोकर सुनाता है, किन्तु संसार उसकी करुण कथा को समझने के स्थान पर अपने ही सुख और मनोरंजन में लगा हुआ है। कवि की अन्तर्वेदना इतनी तीव्र है कि उसके हृदय के तार खिंचे हुए हैं और उसकी जीवन-वीणा की तान अत्यन्त तीखी हो गई है। उसके शून्य हृदय में आँधी, गर्जन और बिजली के समान अनेक दुःखों ने आकर अपना डेरा डाल दिया है। अन्ततः विपत्ति की प्रलयकारी घटाएँ उसकी कुटिया को घेर लेती हैं और चारों ओर अंधकार तथा निराशा और भी गहरी हो जाती है।
हिन्दी व्याख्या —

पद 16 — कवि अपने क्रन्दन को वीणा के करुण संगीत के समान मानता है। वह पूछता है कि क्या मेरे रोने और विलाप में तुम्हें वीणा की ध्वनि सुनाई देती है? मेरे आँसू ही उस वीणा के धागों के समान हैं, जिनसे तुम मेरी करुणा और दुःख का वस्त्र बुनते हो। अर्थात् कवि की पीड़ा और आँसू उसके अन्तर्मन के करुण संगीत को व्यक्त करते हैं।

पद 17 — कवि कहता है कि वह रो-रोकर और सिसक-सिसक कर अपनी दुःखभरी कहानी सुनाता रहता है। किन्तु जिन्हें उसकी पीड़ा सुननी चाहिए, वे उसकी करुण कथा की ओर ध्यान देने के बजाय फूलों को तोड़ते हुए अपने मनोरंजन में लगे रहते हैं। वे कवि की वेदना को जानकर भी अनजान बने रहते हैं। इससे संसार की संवेदनहीनता और कवि का अकेलापन प्रकट होता है।

पद 18 — कवि की अन्तर्वेदना इतनी तीव्र थी कि वह निरन्तर व्याकुल होकर तड़पता रहता था। प्रेम और पीड़ा से मोहित होकर वह स्वयं को उस भाव पर न्योछावर कर रहा था। उसके हृदय के तार अत्यन्त खिंचे हुए थे और उसकी जीवन-वीणा की तान बहुत तीखी हो गई थी। अर्थात् उसके मन की पीड़ा चरम सीमा तक पहुँच चुकी थी।

पद 19 — कवि के जीवन में दुःखों का प्रचण्ड तूफान उमड़ रहा था। चारों ओर आँधी के झकोरे, बादलों की गर्जना और बिजली की चमक जैसी भयावह स्थितियाँ थीं। उसका हृदय पहले से ही शून्य और रिक्त था, इसलिए इन सभी दुःखद परिस्थितियों ने उसमें आकर अपना स्थायी निवास बना लिया। यहाँ बाहरी प्राकृतिक तूफान के माध्यम से कवि के भीतर उठ रहे भावात्मक तूफान को व्यक्त किया गया है।

पद 20 — कवि की छोटी-सी कुटिया पर मानो प्रलय के बादलों का समूह आकर छा जाता था। चारों ओर घना अंधकार फैल जाता था और ऐसा लगता था जैसे अंधकार के कण ही वर्षा के रूप में बरस रहे हों। इससे पहले से दुःखमय वातावरण और भी अधिक अंधकारपूर्ण हो जाता था। यह दृश्य कवि के जीवन में छाई निराशा, दुःख और अकेलेपन का प्रतीक है।

काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पदों में कवि ने अपनी अन्तर्वेदना, करुण क्रन्दन, संसार की संवेदनहीनता तथा जीवन में छाए दुःख और निराशा का अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण किया है। ‘क्रन्दन में बजती वीणा’ में रूपक के माध्यम से कवि के विलाप को करुण संगीत के रूप में प्रस्तुत किया गया है। ‘आँसू के धागों से करुणापट बुनना’ में आँसुओं को धागे और करुणा को वस्त्र के रूप में चित्रित कर रूपक का सुन्दर प्रयोग हुआ है। ‘रो-रोकर सिसक-सिसक’ में पुनरुक्ति-प्रकाश द्वारा करुण भाव को तीव्र बनाया गया है। ‘अन्तर के तार खिंचे थे, तीखी थी तान’ में हृदय को वीणा तथा भावनाओं को उसके तारों के रूप में प्रस्तुत कर रूपक का प्रभावशाली प्रयोग हुआ है। ‘झंझा-झकोर’, ‘गर्जन’, ‘बिजली’ आदि में प्रकृति के उग्र रूप के माध्यम से कवि की आन्तरिक व्यथा का प्रतीकात्मक चित्रण हुआ है। ‘शून्य हृदय’ में रूपक तथा ‘प्रलय घटाएँ’ में अतिशयोक्तिपूर्ण एवं प्रतीकात्मक कल्पना द्वारा दुःख की व्यापकता व्यक्त हुई है। ‘तम चूर्ण बरस जाता था’ में अंधकार को चूर्ण के रूप में बरसते हुए दिखाकर सजीव बिम्ब उपस्थित किया गया है। भाषा भावपूर्ण, प्रतीकात्मक, चित्रात्मक, संगीतात्मक एवं अत्यन्त करुण है।
पद 21–25
बिजली माला पहने फिर,मुसक्याता था आँगन में हाँ, कौन बरस जाता था,रस बूँद हमारे मन में? 21 तुम सत्य रहे चिर सुन्दर!,मेरे इस मिथ्या जग के थे केवल जीवन संगी,कल्याण कलित इस मग के। 22 कितनी निर्जन रजनी में,तारों के दीप जलाये स्वर्गंगा की धारा में,उज्जवल उपहार चढायें। 23 गौरव था ,नीचे आये,प्रियतम मिलने को मेरे मै इठला उठा अकिंचन,देखे ज्यों स्वप्न सवेरे। 24 मधु राका मुसक्याती थी,पहले देखा जब तुमको परिचित से जाने कब के,तुम लगे उसी क्षण हमको। 25
शब्दार्थ — बिजली = विद्युत/आकाश में चमकने वाली विद्युत-ज्योति, माला = हार/श्रृंखला, मुसक्याता = मुस्कराता हुआ, आँगन = घर का खुला स्थान, बरसना = वर्षा के रूप में गिरना, रस = आनन्द/प्रेम का भाव, बूँद = छोटी मात्रा/बिन्दु, सत्य = वास्तविक/सच्चा, चिर = सदैव/बहुत समय से, सुन्दर = मनोहर, मिथ्या = असत्य/नश्वर, जगत = संसार, जीवन-संगी = जीवन का साथी, कल्याण = मंगल/हित, कलित = युक्त/शोभित, मग = मार्ग/रास्ता, निर्जन = सुनसान/जहाँ कोई न हो, रजनी = रात्रि, तारे = नक्षत्र, दीप = दीपक/प्रकाश का साधन, स्वर्गंगा = आकाशगंगा, उज्ज्वल = प्रकाशमान/चमकीला, उपहार = भेंट, चढ़ाना = अर्पित करना, गौरव = गर्व/सम्मान, प्रियतम = अत्यन्त प्रिय व्यक्ति, अकिंचन = जिसके पास कुछ भी न हो/दीन, इठलाना = गर्व से प्रसन्न होना, स्वप्न = सपना, मधु = मधुरता/मादकता, राका = पूर्णिमा की रात्रि, परिचित = जाना-पहचाना, उसी क्षण = उसी समय।
सन्दर्भ — प्रस्तुत काव्यांश/पद/पदांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘आँसू’ खण्डकाव्य से लिया गया है। इसके रचयिता छायावादी काव्य के मुख्य स्तम्भ, प्रसिद्ध हिन्दी काव्य, नाटक, कहानी एवं उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पदों में कवि ने अपने प्रिय के साथ बिताए मधुर मिलन के क्षणों तथा उनसे जुड़ी सुखद स्मृतियों का अत्यन्त भावपूर्ण चित्रण किया है। कवि को स्मरण होता है कि बिजली की चमक से सजा हुआ आँगन मानो मुस्करा उठता था और प्रेम का रस उसके मन में अमृत-बूँदों की तरह बरसता था। कवि अपने प्रिय को इस नश्वर और मिथ्या संसार में एकमात्र सत्य एवं चिरसुन्दर मानता है, जो उसके जीवन-पथ का सच्चा साथी और कल्याणकारी सहचर था। एकान्त रात्रियों में तारों के दीप जलाकर तथा आकाशगंगा में उज्ज्वल उपहार अर्पित कर उसने अपने प्रेम की अभिव्यक्ति की। प्रिय के स्वयं उसके पास मिलने के लिए आने को कवि अपने जीवन का गौरव मानता है और स्वयं को अकिंचन होते हुए भी स्वप्न-समान आनन्द में मग्न पाता है। अन्त में प्रिय को पहली बार देखते ही कवि को ऐसा अनुभव होता है मानो वह उसे बहुत पहले से जानता-पहचानता हो।
हिन्दी व्याख्या —

पद 21 — कवि को वह समय स्मरण आता है जब आकाश में बिजली की चमक मानो माला के समान दिखाई देती थी और उसके आँगन में प्रसन्नता मुस्करा रही थी। कवि आश्चर्य से पूछता है कि उस समय हमारे मन में प्रेम और आनन्द की रसपूर्ण बूँदों के रूप में कौन बरस रहा था? यहाँ प्रिय के आगमन से उत्पन्न प्रेम और उल्लास को वर्षा की रस-बूँदों के समान बताया गया है।

पद 22 — कवि अपने प्रिय को सम्बोधित करते हुए कहता है कि इस नश्वर और असत्य संसार में केवल तुम ही मेरे लिए सच्चे और सदैव सुन्दर रहे। तुम ही मेरे जीवन के सच्चे साथी थे और जीवन के इस कठिन मार्ग में मेरा कल्याण करने वाले सहचर थे। संसार की अन्य सभी वस्तुएँ परिवर्तनशील थीं, पर प्रिय का प्रेम कवि के लिए स्थायी सत्य था।

पद 23 — कवि को वे एकान्त रात्रियाँ याद आती हैं, जब उसने तारों को दीपक के समान जलाकर अपने प्रिय के लिए प्रेम के उपहार सजाए थे। वह आकाशगंगा की धारा में अपने उज्ज्वल उपहार अर्पित करता था। इन कल्पनाओं के माध्यम से कवि ने अपने प्रेम की पवित्रता, सौन्दर्य और समर्पण को व्यक्त किया है।

पद 24 — कवि के लिए यह बड़े गौरव की बात थी कि उसका प्रिय स्वयं उसके पास उससे मिलने के लिए आया। अपने को अत्यन्त दीन और अकिंचन समझने वाला कवि प्रिय के आगमन से अत्यन्त प्रसन्न होकर गर्व से इठलाने लगा। उसे ऐसा लगा जैसे प्रातःकाल देखा गया कोई सुन्दर स्वप्न साकार हो गया हो।

पद 25 — जब कवि ने पहली बार अपने प्रिय को देखा, तब पूर्णिमा की मधुर चाँदनी भी मानो मुस्करा उठी थी। प्रिय को पहली बार देखने पर भी कवि को ऐसा अनुभव हुआ कि वह उसे बहुत पहले से जानता-पहचानता है। पहली ही दृष्टि में दोनों के बीच एक आत्मीय और परिचित-सा सम्बन्ध स्थापित हो गया।

काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पदों में कवि ने प्रिय के साथ हुए मधुर मिलन, प्रेम की आत्मीयता तथा अतीत की सुखद स्मृतियों का अत्यन्त कोमल और भावपूर्ण चित्रण किया है। ‘बिजली माला पहने’ में बिजली को माला धारण करने वाली नायिका के रूप में प्रस्तुत कर मानवीकरण किया गया है। ‘रस बूँद हमारे मन में बरसना’ में प्रेम और आनन्द को वर्षा की बूँदों के रूप में चित्रित किया गया है। ‘तुम सत्य रहे चिर सुन्दर, मेरे इस मिथ्या जग के’ में सत्य और मिथ्या का विरोधाभास प्रस्तुत कर प्रिय के प्रेम की स्थायित्व-भावना व्यक्त की गई है। ‘जीवन संगी’ और ‘कल्याण कलित मग’ में आत्मीयता एवं समर्पण का भाव है। ‘तारों के दीप’ तथा ‘स्वर्गंगा की धारा’ में आकाशीय सौन्दर्य का मनोहर बिम्ब उपस्थित हुआ है। ‘मधु राका मुसक्याती थी’ में पूर्णिमा की रात का मानवीकरण तथा ‘स्वप्न सवेरे’ में उपमा द्वारा प्रिय के आगमन से उत्पन्न आनन्द को व्यक्त किया गया है। ‘परिचित से जाने कब के’ में पहली भेंट में ही उत्पन्न आत्मीयता और प्रेम की सहज अनुभूति का सुन्दर मनोवैज्ञानिक चित्रण है। भाषा कोमल, मधुर, चित्रात्मक, भावपूर्ण एवं संगीतात्मक है।
पद 26–30
परिचय राका जलनिधि का,जैसे होता हिमकर से ऊपर से किरणें आती,मिलती हैं गले लहर से। 26 मै अपलक इन नयनों से,निरखा करता उस छवि को प्रतिभा डाली भर लाता,कर देता दान सुकवि को। 27 निर्झर-सा झिर झिर करता,माधवी कुंज छाया में चेतना बही जाती थी,हो मन्त्र मुग्ध माया में। 28 पतझड़ था, झाड़ खड़े थे,सूखी-सी फूलवारी में किसलय नव कुसुम बिछा कर,आये तुम इस क्यारी में। 29 शशि मुख पर घूँघट डाले,अंचल में चपल चमक-सी आँखों मे काली पुतली,पुतली में श्याम झलक-सी। 30
शब्दार्थ — परिचय = पहचान/मिलन, राका = पूर्णिमा की रात्रि, जलनिधि = समुद्र, हिमकर = चन्द्रमा, किरण = प्रकाश की रेखा, लहर = तरंग, अपलक = बिना पलक झपकाए, नयन = आँख, निरखना = देखना, छवि = सौन्दर्य/रूप, प्रतिभा = रचनात्मक शक्ति/बुद्धि की चमक, डाली भर लाना = बहुत मात्रा में प्राप्त करना, दान = प्रदान करना, सुकवि = श्रेष्ठ कवि, निर्झर = झरना, झिर-झिर = धीरे-धीरे बहने की ध्वनि, माधवी कुंज = माधवी लता से बना हुआ उपवन, छाया = शीतल आड़, चेतना = होश/सजगता, मन्त्र-मुग्ध = अत्यन्त मोहित/आकर्षित, माया = मोहक प्रभाव, पतझड़ = वह ऋतु जिसमें पेड़ों के पत्ते झड़ते हैं, झाड़ = सूखा या छोटा वृक्ष/झाड़ी, फूलवारी = फूलों की क्यारी/बगीचा, किसलय = नए कोमल पत्ते, नव कुसुम = नए फूल, क्यारी = फूल-पौधे लगाने का छोटा स्थान, शशि = चन्द्रमा, मुख = चेहरा, घूँघट = चेहरे को ढकने वाला वस्त्र, अंचल = वस्त्र का छोर, चपल = चंचल/क्षणिक, चमक = प्रकाश/दीप्ति, पुतली = आँख के बीच का काला भाग, श्याम = साँवला/गहरा काला, झलक = हल्की दिखाई देने वाली छवि।
सन्दर्भ — प्रस्तुत काव्यांश/पद/पदांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘आँसू’ खण्डकाव्य से लिया गया है। इसके रचयिता छायावादी काव्य के मुख्य स्तम्भ, प्रसिद्ध हिन्दी काव्य, नाटक, कहानी एवं उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पदों में कवि ने अपने प्रिय के प्रथम परिचय, उसके सौन्दर्य के आकर्षण तथा उसके आगमन से प्रकृति और कवि के अन्तर्मन में उत्पन्न परिवर्तन का अत्यन्त मनोहर चित्रण किया है। कवि को पूर्णिमा के चन्द्रमा और समुद्र की लहरों के मिलन में प्रिय के साथ अपने परिचय की मधुरता दिखाई देती है। वह प्रिय की छवि को अपलक निहारता रहता है और मानता है कि उसकी प्रेरणा से उसकी प्रतिभा समृद्ध होकर श्रेष्ठ काव्य की रचना कर सकती है। माधवी-कुंज की शीतल छाया में प्रिय की उपस्थिति से उसकी चेतना मानो झरने की तरह बहती हुई सम्मोहन में डूब जाती है। पतझड़ से सूनी और उजड़ी हुई फूलवारी में प्रिय का आगमन नए पत्तों और फूलों के आगमन के समान जीवन और सौन्दर्य भर देता है। अन्त में कवि प्रिय के मुख, घूँघट, आँखों की पुतलियों और उनमें झलकते श्याम सौन्दर्य का अत्यन्त कोमल चित्र प्रस्तुत करता है।
हिन्दी व्याख्या —

पद 26 — कवि अपने प्रिय से हुए प्रथम परिचय को पूर्णिमा की रात में समुद्र और चन्द्रमा के मधुर सम्बन्ध के समान बताता है। जिस प्रकार पूर्णिमा का चन्द्रमा समुद्र को अपनी किरणों से आलोकित करता है और उसकी किरणें ऊपर से आकर समुद्र की लहरों से गले मिलती हैं, उसी प्रकार प्रिय के साथ कवि का परिचय प्रेम और आत्मीयता से पूर्ण था।

पद 27 — कवि कहता है कि वह प्रिय की सुन्दर छवि को बिना पलक झपकाए लगातार देखा करता था। प्रिय के सौन्दर्य को देखकर उसकी रचनात्मक प्रतिभा जाग उठती थी। वह मानो सौन्दर्य और कल्पना की पूरी डाली भरकर लाता था और उसे श्रेष्ठ कवि को दान कर देता था। अर्थात् प्रिय की सुन्दरता कवि की काव्य-प्रतिभा की प्रेरणा बन गई थी।

पद 28 — माधवी लताओं से घिरे कुंज की छाया में वातावरण अत्यन्त मोहक था। वहाँ झरने के समान धीरे-धीरे झिर-झिर ध्वनि होती थी। इस मनोहर वातावरण और प्रिय के सौन्दर्य के प्रभाव से कवि की चेतना भी बहती हुई-सी प्रतीत होती थी और वह मन्त्र-मुग्ध होकर उस माया में डूब जाता था।

पद 29 — उस समय पतझड़ का मौसम था। फूलवारी सूनी पड़ी थी और वृक्षों पर सूखी शाखाएँ दिखाई दे रही थीं। ऐसे नीरस और उजड़े हुए वातावरण में प्रिय का आगमन हुआ। प्रिय के आने से ऐसा लगा मानो नई कोमल पत्तियों और नए फूलों की चादर बिछ गई हो। अर्थात् प्रिय के आगमन ने कवि के जीवन में फिर से सौन्दर्य, उल्लास और नवजीवन भर दिया।

पद 30 — कवि अपने प्रिय के मुख-सौन्दर्य का अत्यन्त मनोहर चित्र प्रस्तुत करता है। उसका चन्द्रमा के समान मुख घूँघट से ढका हुआ है और उसके अंचल में बिजली जैसी चंचल चमक दिखाई देती है। उसकी आँखों की काली पुतलियों में श्याम रंग की मनोहर झलक दिखाई देती है। इस प्रकार कवि ने प्रिय के मुख, घूँघट और आँखों की छवि को अत्यन्त कोमल एवं आकर्षक रूप में प्रस्तुत किया है।

काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पदों में प्रिय के सौन्दर्य, प्रथम परिचय, प्रेमानुभूति तथा उसके आगमन से प्रकृति में उत्पन्न नवजीवन का अत्यन्त मनोहर और चित्रात्मक वर्णन हुआ है। ‘राका जलनिधि’ में पूर्णिमा की रात और समुद्र के सम्बन्ध का सुन्दर बिम्ब प्रस्तुत हुआ है तथा ‘किरणें ... गले लहर से मिलती हैं’ में मानवीकरण द्वारा चन्द्रकिरणों और लहरों के मिलन को प्रेम-मिलन का रूप दिया गया है। ‘अपलक इन नयनों से’ में प्रिय की छवि के प्रति कवि के गहन आकर्षण का भाव व्यक्त हुआ है। ‘प्रतिभा डाली भर लाता’ में रूपक द्वारा प्रिय के सौन्दर्य को कवि की रचनात्मक प्रतिभा का स्रोत बताया गया है। ‘निर्झर-सा झिर-झिर’ में उपमा तथा ध्वनि-अनुकरण द्वारा प्राकृतिक वातावरण की मधुरता को सजीव बनाया गया है। ‘पतझड़’ और ‘किसलय नव कुसुम’ के विरोधी बिम्बों द्वारा प्रिय के आगमन से जीवन में आए परिवर्तन को प्रभावशाली बनाया गया है। ‘शशि मुख’ में मुख की चन्द्रमा से उपमा तथा ‘अंचल में चपल चमक’ में बिजली की कल्पना द्वारा नायिका के सौन्दर्य का मनोहर चित्रण हुआ है। ‘आँखों में काली पुतली, पुतली में श्याम झलक’ में सूक्ष्म सौन्दर्य-चित्रण है। भाषा कोमल, मधुर, चित्रात्मक, अलंकारपूर्ण एवं भावपूर्ण है।

3. आशा सर्ग-कामायनी

पद 1–4
ऊषा सुनहले तीर बरसती,जयलक्ष्मी सी उदित हुयी । उधर पराजित कालरात्रि भी,जल में अन्तर्निहित हुयी ।। 1 वह विवर्णमुख त्रस्त प्रकृति का, आज लगा हँसने फिर से । वर्षा बीती हुयी सृष्टि में, शरद विकास नए सिर से ।। 2 नवकोमल आलोक विखरता,हिम- संसृति पर भर अनुराग । सित सरोज पर क्रीडा करता,जैसे मधुमय पीत पराग ।। 3 धीरे-धीरे हिम-आच्छादन,हटने लगा धरातल से । जगीं वनस्पतियाँ अलसाई,मुख धोती शीतल जल से ।। 4
शब्दार्थ — ऊषा = प्रभात, सुनहले तीर = स्वर्णिम किरणें, जयलक्ष्मी = विजय की देवी/विजय की शोभा, उदित = प्रकट/उदय होना, पराजित = हारा हुआ, कालरात्रि = अंधकारमयी रात्रि, अन्तर्निहित = भीतर छिपी हुई, विवर्णमुख = जिसका मुख फीका पड़ गया हो, त्रस्त = भयभीत/व्याकुल, प्रकृति = प्राकृतिक संसार, शरद = वर्षा के बाद आने वाली ऋतु, विकास = प्रस्फुटन/खिलना, नवकोमल = नया और कोमल, आलोक = प्रकाश, विखरता = फैलता हुआ, हिम-संसृति = हिम से ढकी धरती, अनुराग = प्रेम/स्नेह, सित सरोज = सफेद कमल, क्रीडा = खेल, मधुमय = मधु के समान मधुर, पीत पराग = पीले रंग का फूलों का परागकण, हिम-आच्छादन = बर्फ की परत/हिम का आवरण, धरातल = पृथ्वी की सतह, वनस्पतियाँ = पेड़-पौधे, अलसाई = आलस्य से भरी हुई, शीतल जल = ठंडा पानी।
सन्दर्भ — प्रस्तुत काव्यांश/पद/पदांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘आशा’ सर्ग से लिया गया है। ‘आशा’ सर्ग कामायनी महाकाव्य का द्वितीय सर्ग है, जिसके रचयिता छायावादी काव्य के मुख्य स्तम्भ, प्रसिद्ध हिन्दी काव्य, नाटक, कहानी एवं उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पदों में कवि ने वर्षा ऋतु के समाप्त होने के बाद शरद ऋतु के आगमन का अत्यन्त मनोहारी प्राकृतिक चित्र प्रस्तुत किया है। शरद के निर्मल प्रभात में ऊषा की स्वर्णिम किरणों के फैलने से रात्रि का अन्धकार समाप्त हो जाता है। प्रकृति, जो वर्षा के कारण उदास और म्लान हो गई थी, पुनः प्रसन्न दिखाई देने लगती है। हिम से ढकी धरती पर कोमल प्रकाश फैलता है, सफेद कमलों पर पीला पराग ऐसा प्रतीत होता है मानो मधुरता से भरा हुआ हो। धीरे-धीरे हिम का आवरण हटने पर वनस्पतियाँ भी जागकर शीतल जल से अपना मुख धोती हुई प्रतीत होती हैं। इस प्रकार कवि ने शरद ऋतु के सौन्दर्य और प्रकृति के नवजीवन का चित्रण किया है।
हिन्दी व्याख्या —

पद 1 — कवि कहता है कि प्रातःकाल की ऊषा अपनी स्वर्णिम किरणों के रूप में चारों ओर प्रकाश बिखेर रही है। उसका उदय विजय की देवी के समान प्रतीत होता है। ऐसा लगता है मानो ऊषा ने अन्धकाररूपी कालरात्रि को पराजित कर दिया हो। पराजित रात्रि अब जल में छिपकर अपना अस्तित्व बनाए हुए है। यहाँ प्रकाश के आगमन और अन्धकार के विनाश का अत्यन्त सुन्दर चित्र प्रस्तुत किया गया है।

पद 2 — वर्षा ऋतु के कारण प्रकृति का मुख म्लान और भयभीत-सा दिखाई दे रहा था। वर्षा समाप्त होने पर अब शरद ऋतु के आगमन से वही उदास प्रकृति पुनः प्रसन्न होकर हँसती हुई प्रतीत होती है। चारों ओर नई सृष्टि और नवीन सौन्दर्य का विकास होने लगता है। कवि ने प्रकृति के इस परिवर्तन को मानवीय भावनाओं से जोड़कर अत्यन्त सजीव बना दिया है।

पद 3 — शरद ऋतु में नया और कोमल प्रकाश हिम से ढकी हुई धरती पर फैल रहा है और उसके प्रति प्रेम तथा अनुराग उत्पन्न कर रहा है। सफेद कमलों पर पड़ने वाला पीला पराग ऐसा लगता है, मानो मधुरता से भरा हुआ कोई पदार्थ वहाँ क्रीड़ा कर रहा हो। इस दृश्य में श्वेत और पीले रंगों का मनोहारी मेल प्रकृति के सौन्दर्य को और अधिक आकर्षक बना देता है।

पद 4 — शरद ऋतु के आगमन के साथ धरती पर पड़ा हुआ हिम का आवरण धीरे-धीरे हटने लगता है। हिम के हटते ही सोई और आलस्य से भरी हुई वनस्पतियाँ जाग उठती हैं। वे ऐसी प्रतीत होती हैं मानो शीतल जल से अपना मुख धोकर नवीन जीवन और ताजगी प्राप्त कर रही हों। कवि ने प्रकृति के जागरण का अत्यन्त कोमल और सजीव चित्र प्रस्तुत किया है।

काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पदों में शरद ऋतु के आगमन तथा प्रकृति के नवजीवन का अत्यन्त मनोहारी चित्रण हुआ है। ऊषा की स्वर्णिम किरणों, पराजित कालरात्रि, प्रसन्न होती प्रकृति, हिम से ढकी धरती, सफेद कमलों और पीले पराग के माध्यम से प्राकृतिक सौन्दर्य को सजीव बनाया गया है। ‘जयलक्ष्मी सी’, ‘कालरात्रि’, ‘प्रकृति का हँसना’ तथा ‘वनस्पतियों का मुख धोना’ आदि प्रयोगों में मानवीकरण एवं उपमा का सुन्दर प्रयोग हुआ है। ‘सित सरोज’, ‘पीत पराग’ तथा ‘नवकोमल आलोक’ में चित्रात्मकता और रंग-सौन्दर्य स्पष्ट दिखाई देता है। भाषा सरल, कोमल, भावपूर्ण एवं काव्यात्मक है। सम्पूर्ण पदों में प्रकृति के प्रति कवि का सौन्दर्यानुराग तथा नवीन जीवन की आशावादी भावना अभिव्यक्त हुई है।
पद 5–8
नेत्र निमीलन करती मानो,प्रकृति प्रबुद्ध लगी होने, जलधि लहरियों की अँगड़ाई,बार-बार जाती सोने ।। 5 सिंधुसेज पर धरा वधू अब,तनिक संकुचित बैठी-सी, प्रलय निशा की हलचल स्मृति में,मान किये सी ऐठीं-सी ।। 6 देखा मनु ने वह अतिरंजित,विजन का नव एकांत, जैसे कोलाहल सोया हो,हिम-शीतल-जड़ता-सा श्रांत ।। 7 इंद्रनीलमणि महा चषक था,सोम-रहित उलटा लटका। आज पवन मृदु साँस ले रहा,जैसे बीत गया खटका ।। 8
शब्दार्थ — नेत्र निमीलन = आँखें बंद करना, प्रबुद्ध = जाग्रत/जागी हुई, जलधि = समुद्र, लहरियाँ = समुद्र की तरंगें, अँगड़ाई = शरीर को खींचकर आलस्य दूर करना, सिंधु = समुद्र, सेज = शय्या/बिस्तर, धरा = पृथ्वी, वधू = नवविवाहिता स्त्री, संकुचित = सिमटी हुई, प्रलय निशा = प्रलय की रात, हलचल = उथल-पुथल/अशान्ति, स्मृति = याद, मान = रूठने का भाव, ऐठीं-सी = अकड़कर/रूठकर बैठी हुई, अतिरंजित = बहुत अधिक विस्तृत/बढ़ा-चढ़ा हुआ, विजन = निर्जन, एकांत = अकेलापन/निर्जन स्थान, कोलाहल = शोर-गुल, हिम-शीतल = बर्फ के समान ठंडा, जड़ता = चेतनाहीनता/निष्क्रियता, श्रांत = थका हुआ, इंद्रनीलमणि = नीले रंग का बहुमूल्य रत्न, चषक = प्याला, सोम = अमृत/सोमरस, रहित = बिना, उलटा लटका = विपरीत दिशा में लटका हुआ, पवन = वायु/हवा, मृदु = कोमल, साँस लेना = धीरे-धीरे वायु का चलना, खटका = भय/चिन्ता/आशंका।
सन्दर्भ — प्रस्तुत काव्यांश/पद/पदांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘आशा’ सर्ग से लिया गया है। ‘आशा’ सर्ग कामायनी महाकाव्य का द्वितीय सर्ग है, जिसके रचयिता छायावादी काव्य के मुख्य स्तम्भ, प्रसिद्ध हिन्दी काव्य, नाटक, कहानी एवं उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पदों में कवि ने प्रलय के पश्चात् शान्त और निस्तब्ध प्रकृति का अत्यन्त सजीव चित्रण किया है। प्रलय की भयंकर हलचल समाप्त हो चुकी है और अब प्रकृति मानो धीरे-धीरे जागकर पुनः शान्ति की अवस्था में आ रही है। समुद्र की लहरियाँ भी अँगड़ाई लेकर बार-बार सोती हुई प्रतीत होती हैं। प्रलय की स्मृति से धरा भयभीत एवं संकुचित वधू के समान बैठी है। मनु को चारों ओर ऐसा निर्जन और शान्त वातावरण दिखाई देता है, मानो समस्त कोलाहल थककर सो गया हो। आकाश इंद्रनीलमणि के विशाल प्याले के समान तथा सोमरहित उलटे चषक के समान दिखाई देता है और मन्द पवन के चलने से ऐसा अनुभव होता है कि प्रलय का भय अब समाप्त हो गया है।
हिन्दी व्याख्या —

पद 5 — प्रलय के पश्चात् प्रकृति का वातावरण अब शान्त हो गया है। ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति पहले आँखें बंद करके सो रही थी और अब धीरे-धीरे जाग उठी है। समुद्र की लहरियाँ भी अँगड़ाई लेती हुई दिखाई देती हैं, परन्तु वे बार-बार फिर सोने के लिए चली जाती हैं। कवि ने समुद्र की लहरों की गति को सोने-जागने वाले मनुष्य के समान बताकर प्रकृति को सजीव बना दिया है।

पद 6 — समुद्ररूपी शय्या पर पृथ्वी अब नववधू के समान संकुचित होकर बैठी हुई प्रतीत होती है। प्रलय की भयंकर रात में जो उथल-पुथल हुई थी, उसकी स्मृति अभी उसके मन में विद्यमान है। इसलिए वह उस घटना से रूठी हुई स्त्री के समान कुछ ऐंठी और सहमी हुई दिखाई देती है। कवि ने पृथ्वी को वधू के रूप में कल्पित करके उसके मनोभावों को अत्यन्त मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है।

पद 7 — मनु ने चारों ओर फैले हुए निर्जन और नवीन एकांत को देखा। प्रलय के बाद का वातावरण इतना शांत और निस्तब्ध था कि ऐसा लगता था मानो संसार का सारा कोलाहल थककर सो गया हो। हिम के समान शीतलता और जड़ता से भरा हुआ यह वातावरण स्वयं भी थका हुआ प्रतीत होता है। इस प्रकार मनु को प्रलय के बाद एक विचित्र नीरवता का अनुभव होता है।

पद 8 — कवि ने आकाश को इंद्रनीलमणि से बने हुए एक विशाल प्याले के समान माना है, जिसमें अब सोमरस नहीं है और जो उलटा लटका हुआ है। प्रलय की भयंकरता समाप्त हो चुकी है। अब वातावरण में शान्ति व्याप्त है और मन्द पवन धीरे-धीरे चल रहा है। उसकी गति ऐसी प्रतीत होती है जैसे प्रलय से उत्पन्न भय और आशंका अब पूरी तरह समाप्त हो गई हो।

काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पदों में प्रलय के पश्चात् प्रकृति की शान्त, निस्तब्ध एवं स्निग्ध अवस्था का अत्यन्त मनोहारी चित्रण हुआ है। कवि ने प्रकृति को मानवीय रूप प्रदान करके उसके विभिन्न रूपों को सजीव बना दिया है। ‘प्रकृति प्रबुद्ध लगी होने’ में मानवीकरण, ‘जलधि लहरियों की अँगड़ाई’ में मानवीकरण तथा ‘धरा वधू’ में रूपक का सुन्दर प्रयोग हुआ है। ‘प्रलय निशा’ प्रलय की भयंकरता की स्मृति कराती है, जबकि ‘कोलाहल सोया हो’ में मानवीकरण द्वारा निस्तब्धता को अत्यन्त प्रभावशाली बनाया गया है। ‘इंद्रनीलमणि महा चषक’ में आकाश की नीलिमा का सुन्दर बिम्ब प्रस्तुत हुआ है। भाषा चित्रात्मक, भावपूर्ण एवं कोमल है तथा प्रकृति के माध्यम से प्रलय के बाद उत्पन्न शान्ति और नवीन जीवन की सम्भावना को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया गया है।
पद 9–12
वह विराट था हेम घोलता,नया रंग भरने को आज। 'कौन'? हुआ यह प्रश्न अचानक,और कुतूहल का था राज़! 9 विश्वदेव, सविता या पूषा,सोम, मरूत, चंचल पवमान । वरूण आदि सब घूम रहे हैं,किसके शासन में अम्लान? 10 किसका था भू-भंग प्रलय-सा,जिसमें ये सब विकल रहे। अरे प्रकृति के शक्ति-चिह्न,ये फिर भी कितने निबल रहे! 11 विकल हुआ सा काँप रहा था,सकल भूत चेतन समुदाय। उनकी कैसी बुरी दशा थी,वे थे विवश और निरुपाय। 12
शब्दार्थ — विराट = विशाल/असीम, हेम = सोना, घोलता = मिलाता हुआ, नया रंग = नवीन रूप/नवीन आभा, कुतूहल = जिज्ञासा, विश्वदेव = समस्त देवताओं का समूह, सविता = सूर्य, पूषा = एक वैदिक देवता, सोम = सोमरस/चन्द्रमा, मरूत = वायु के देवता, पवमान = बहती हुई वायु/शुद्ध करने वाला, वरूण = जल के अधिपति वैदिक देवता, शासन = अधिकार/नियन्त्रण, अम्लान = मुरझाया हुआ नहीं/ताजा, भू-भंग = पृथ्वी का विनाश/भंग होना, प्रलय = महाविनाश, विकल = व्याकुल/परेशान, शक्ति-चिह्न = शक्तियों के प्रतीक, निबल = निर्बल/शक्तिहीन, सकल = सम्पूर्ण, भूत = प्राणी/जीव, चेतन = जीवित/सचेतन, समुदाय = समूह, विवश = असहाय, निरुपाय = जिसके पास कोई उपाय न हो।
सन्दर्भ — प्रस्तुत काव्यांश/पद/पदांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘आशा’ सर्ग से लिया गया है। ‘आशा’ सर्ग कामायनी महाकाव्य का द्वितीय सर्ग है, जिसके रचयिता छायावादी काव्य के मुख्य स्तम्भ, प्रसिद्ध हिन्दी काव्य, नाटक, कहानी एवं उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पदों में कवि ने प्रलय के पश्चात् दिखाई देने वाले विराट और रहस्यमय प्राकृतिक दृश्य तथा सम्पूर्ण चेतन जगत की असहाय अवस्था का चित्रण किया है। मनु के सामने प्रकृति का विराट रूप उपस्थित है, जो मानो स्वर्ण घोलकर संसार को नया रंग प्रदान करने में लगा हुआ है। इस अद्भुत दृश्य को देखकर मनु के मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि इस समस्त सृष्टि का नियामक कौन है। सूर्य, सोम, मरुत, पवमान, वरुण आदि देवतागण भी मानो किसी महान शक्ति के शासन में घूम रहे हैं। प्रलय की भयंकरता ने प्रकृति की इन शक्तियों को भी विचलित और निर्बल कर दिया था। समस्त चेतन प्राणी भय से काँपते हुए विवश और निरुपाय दिखाई दे रहे थे।
हिन्दी व्याख्या —

पद 9 — मनु को प्रकृति का एक अत्यन्त विराट और अद्भुत रूप दिखाई देता है। ऐसा लगता है मानो वह विराट सत्ता सोने को घोलकर संसार में एक नया रंग और नया रूप भरने में लगी हुई है। इस अद्भुत दृश्य को देखकर मनु के मन में अचानक यह प्रश्न उठता है कि इस समस्त सृष्टि को संचालित करने वाला कौन है। इस प्रश्न के साथ उनके मन में उस महान शक्ति को जानने की तीव्र जिज्ञासा उत्पन्न हो जाती है।

पद 10 — मनु सोचते हैं कि विश्वदेव, सविता, पूषा, सोम, मरुत, पवमान, वरुण आदि अनेक देवता अपनी-अपनी शक्तियों के साथ संसार में कार्य करते हैं। फिर भी प्रश्न यह है कि इन सभी को कौन संचालित करता है और किसके शासन के अधीन ये सभी अपनी-अपनी गति से कार्य कर रहे हैं। कवि के मन में परम सत्ता की खोज की जिज्ञासा व्यक्त हुई है, जो समस्त प्राकृतिक एवं दैवी शक्तियों की नियामक है।

पद 11 — मनु के मन में यह प्रश्न उठता है कि ऐसी भयंकर पृथ्वी-विनाशकारी प्रलय किसकी शक्ति से हुई थी, जिसमें प्रकृति की समस्त शक्तियाँ भी व्याकुल हो उठी थीं। कवि आश्चर्य व्यक्त करता है कि प्रकृति की शक्ति के प्रतीक माने जाने वाले ये महान देवता भी प्रलय के सामने कितने असहाय और निर्बल हो गए थे। इससे प्रलय की अपार शक्ति और उसकी भयंकरता का अनुमान होता है।

पद 12 — प्रलय के प्रभाव से सम्पूर्ण चेतन प्राणियों का समुदाय भय और व्याकुलता से काँप रहा था। उनकी दशा अत्यन्त दयनीय थी। वे पूरी तरह विवश और असहाय हो गए थे तथा उनके पास इस भयंकर संकट से बचने का कोई उपाय नहीं था। कवि ने इन पंक्तियों में प्रलय के व्यापक प्रभाव तथा उसके सामने समस्त जीव-जगत की असहायता का अत्यन्त मार्मिक चित्र प्रस्तुत किया है।

काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पदों में प्रलय के बाद की विराटता, रहस्यात्मकता और सम्पूर्ण सृष्टि की असहाय स्थिति का प्रभावशाली चित्रण हुआ है। ‘विराट था हेम घोलता’ में विराट सत्ता की कल्पना अत्यन्त प्रभावशाली है। ‘नया रंग भरने’ के माध्यम से सृष्टि के पुनर्निर्माण का सुन्दर बिम्ब प्रस्तुत हुआ है। ‘कौन?’ के माध्यम से मनु की जिज्ञासा और परम सत्ता की खोज की दार्शनिक भावना व्यक्त हुई है। ‘विश्वदेव, सविता या पूषा, सोम, मरूत, चंचल पवमान, वरूण’ आदि वैदिक देवताओं के उल्लेख से काव्य में पौराणिक एवं वैदिक वातावरण का निर्माण हुआ है। ‘किसके शासन में अम्लान?’ तथा ‘किसका था भू-भंग प्रलय-सा’ में प्रश्नात्मक शैली के माध्यम से रहस्य और जिज्ञासा को तीव्र किया गया है। ‘प्रकृति के शक्ति-चिह्न’ में रूपकात्मकता तथा ‘विकल हुआ सा काँप रहा था’ में चित्रात्मकता दिखाई देती है। भाषा ओजपूर्ण, भावगर्भित, चित्रात्मक एवं दार्शनिक है।
पद 13–16
देव न थे हम और न ये हैं,सब परिवर्तन के पुतले। हाँ कि गर्व-रथ में तुरंग-सा,जितना जो चाहे जुत ले। 13 "महानील इस परम व्योम में,अतंरिक्ष में ज्योतिर्मान। ग्रह, नक्षत्र और विद्युत्कण ,किसका करते से-संधान! 14 छिप जाते हैं और निकलते,आकर्षण में खिंचे हुए। तृण, वीरुध लहलहे हो रहे ,किसके रस से सिंचे हुए? 15 सिर नीचा कर किसकी सत्ता,सब करते स्वीकार यहाँ। सदा मौन हो प्रवचन करते,जिसका, वह अस्तित्व कहाँ? 16
शब्दार्थ — देव = देवता, परिवर्तन = बदलाव, पुतले = कठपुतलियाँ/खिलौने, गर्व-रथ = अहंकाररूपी रथ, तुरंग = घोड़ा, जुत ले = लगाकर अपने अनुसार चलाए, महानील = अत्यन्त नीला, परम व्योम = महान आकाश, अंतरिक्ष = आकाश और पृथ्वी के बीच का स्थान, ज्योतिर्मान = प्रकाशमान, ग्रह = ग्रह, नक्षत्र = तारामंडल/तारे, विद्युत्कण = बिजली के चमकीले कण, संधान = सम्बन्ध/सामंजस्य/गति, आकर्षण = खिंचाव, तृण = घास, वीरुध = लता-पौधे, लहलहे = हरे-भरे, रस = जीवनदायी द्रव/पोषक तत्त्व, सत्ता = शक्ति/अधिकार/अस्तित्व, स्वीकार = मान लेना, मौन = चुप, प्रवचन = उपदेश/ज्ञान की बात, अस्तित्व = होने का भाव/सत्ता।
सन्दर्भ — प्रस्तुत काव्यांश/पद/पदांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘आशा’ सर्ग से लिया गया है। ‘आशा’ सर्ग कामायनी महाकाव्य का द्वितीय सर्ग है, जिसके रचयिता छायावादी काव्य के मुख्य स्तम्भ, प्रसिद्ध हिन्दी काव्य, नाटक, कहानी एवं उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पदों में कवि ने संसार की परिवर्तनशीलता तथा उस अदृश्य और परम सत्ता की खोज का दार्शनिक चित्रण किया है, जिसके शासन में देवता, ग्रह-नक्षत्र, विद्युत्कण तथा सम्पूर्ण प्राकृतिक जगत संचालित होते हैं। मनु अनुभव करते हैं कि देवता भी परिवर्तन के अधीन हैं और मनुष्य भी उसी परिवर्तनशील संसार का अंग है। आकाश में स्थित ग्रह-नक्षत्र किसी अदृश्य शक्ति के आकर्षण से अपनी-अपनी गति में लगे हुए हैं। पृथ्वी पर घास और वनस्पतियाँ किसी अदृश्य जीवनदायी शक्ति के रस से पल्लवित हो रही हैं। अन्त में मनु उस परम सत्ता को जानना चाहते हैं, जिसके सामने सम्पूर्ण सृष्टि सिर झुकाती है और जो स्वयं मौन रहकर अपने अस्तित्व का ज्ञान कराती है।
हिन्दी व्याख्या —

पद 13 — मनु कहते हैं कि न तो हम देवता थे और न ये देवता स्थायी रूप से देवता हैं। सभी परिवर्तन के अधीन हैं और परिवर्तन के ही पुतले हैं। मनुष्य या देवता अपनी शक्ति और सामर्थ्य पर चाहे कितना भी गर्व क्यों न करे, अहंकार के रथ में जुते हुए घोड़े के समान वह भी परिस्थितियों और परिवर्तन की शक्ति के अनुसार चलने के लिए विवश है। अतः किसी को भी अपनी शक्ति पर अभिमान नहीं करना चाहिए।

पद 14 — मनु आकाश की ओर देखते हुए विचार करते हैं कि इस अत्यन्त विशाल और गहरे नीले आकाश तथा अन्तरिक्ष में सूर्य, ग्रह, नक्षत्र और विद्युत के चमकीले कण अपनी-अपनी गति से प्रकाशमान हैं। प्रश्न यह है कि ये सब किस अदृश्य शक्ति के निर्देशन और आकर्षण के कारण एक-दूसरे से सम्बन्ध स्थापित किए हुए हैं तथा अपने निश्चित मार्ग पर चल रहे हैं। कवि के मन में उस परम नियामक सत्ता को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होती है।

पद 15 — आकाश में ग्रह और नक्षत्र कभी दिखाई देते हैं और कभी ओझल हो जाते हैं। वे किसी अदृश्य आकर्षण-शक्ति से खिंचे हुए अपनी गति में निरन्तर गतिशील हैं। दूसरी ओर पृथ्वी पर घास और लताएँ हरी-भरी होकर विकसित हो रही हैं। मनु के मन में प्रश्न उठता है कि इन्हें जीवन प्रदान करने वाला वह कौन-सा रस है, जिससे सिंचित होकर ये वनस्पतियाँ लहलहा रही हैं। यहाँ कवि सम्पूर्ण प्रकृति के पीछे कार्य करने वाली अदृश्य शक्ति की खोज करता है।

पद 16 — मनु पूछते हैं कि इस संसार में ऐसी कौन-सी सत्ता है, जिसके सामने सभी सिर झुकाकर उसकी शक्ति और प्रभुता को स्वीकार करते हैं। वह परम सत्ता स्वयं मौन रहती है, फिर भी उसका अस्तित्व संसार के प्रत्येक कार्य और प्रत्येक वस्तु में मानो निरन्तर उपदेश देता रहता है। मनु उस अदृश्य परम सत्ता का वास्तविक स्वरूप और उसका स्थान जानना चाहते हैं। इस प्रकार इन पंक्तियों में परमात्मा की खोज और उसकी सर्वव्यापक सत्ता का दार्शनिक भाव व्यक्त हुआ है।

काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पदों में कवि ने परिवर्तनशील संसार के माध्यम से उस परम और अदृश्य सत्ता की खोज का दार्शनिक भाव अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया है। ‘सब परिवर्तन के पुतले’ में संसार की परिवर्तनशीलता का सुन्दर प्रतिपादन हुआ है तथा ‘गर्व-रथ में तुरंग-सा’ में उपमा एवं रूपक का मनोहारी प्रयोग हुआ है। ‘महानील इस परम व्योम’ में आकाश का चित्रात्मक बिम्ब प्रस्तुत किया गया है। ग्रह, नक्षत्र और विद्युत्कणों के उल्लेख से विराट ब्रह्माण्ड का दृश्य उपस्थित होता है। ‘आकर्षण में खिंचे हुए’ तथा ‘तृण, वीरुध लहलहे हो रहे’ के माध्यम से प्रकृति की जीवनदायिनी शक्ति का चित्रण हुआ है। अन्तिम पद में ‘सिर नीचा कर’ तथा ‘मौन हो प्रवचन करते’ जैसे प्रयोगों द्वारा मानवीकरण एवं विरोधाभास का सुन्दर समन्वय दिखाई देता है। भाषा दार्शनिक, प्रश्नात्मक, भावगर्भित एवं चित्रात्मक है। इन पदों में मनु की जिज्ञासा के माध्यम से परम सत्ता के रहस्य को जानने की उत्कट आकांक्षा व्यक्त हुई है।
पद 17–20
हे अनंत रमणीय कौन तुम?यह मैं कैसे कह सकता। कैसे हो? क्या हो? इसका तो,भार विचार न सह सकता। 17 हे विराट! हे विश्वदेव! तुमकुछ हो,ऐसा होता भान। मंद्-गंभीर-धीर-स्वर-संयुत,यही कर रहा सागर गान। 18 यह क्या मधुर स्वप्न-सी झिलमिल,सदय हृदय में अधिक अधीर। व्याकुलता सी व्यक्त हो रही,आशा बनकर प्राण समीर। 19 यह कितनी स्पृहणीय बन गई,मधुर जागरण सी-छबिमान। स्मिति की लहरों-सी उठती है,नाच रही ज्यों मधुमय तान। 20
शब्दार्थ — अनंत = जिसका अन्त न हो/असीम, रमणीय = सुन्दर/मनोहर, भान = अनुभव/आभास, विराट = विशाल/असीम, विश्वदेव = समस्त विश्व के देवता/विश्वव्यापी सत्ता, मंद = धीमा, गंभीर = गम्भीर/गहरी, धीर = स्थिर/संयमित, स्वर = आवाज, संयुत = युक्त/मिला हुआ, सागर = समुद्र, गान = गीत, मधुर = मीठा/सुहावना, स्वप्न = सपना, झिलमिल = चमकती हुई, सदय = दयालु/कोमल हृदय वाला, अधीर = व्याकुल/उतावला, व्याकुलता = बेचैनी/उत्कंठा, आशा = उम्मीद, प्राण समीर = जीवनदायिनी वायु/प्राणों की हवा, स्पृहणीय = जिसकी इच्छा की जाए/कामना योग्य, जागरण = जागने की अवस्था, छबिमान = सुन्दर रूप वाला/आभायुक्त, स्मिति = मुस्कान, लहरें = तरंगें, मधुमय = मधुरता से भरा हुआ, तान = स्वर का विस्तार/संगीत की लय।
सन्दर्भ — प्रस्तुत काव्यांश/पद/पदांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘आशा’ सर्ग से लिया गया है। ‘आशा’ सर्ग कामायनी महाकाव्य का द्वितीय सर्ग है, जिसके रचयिता छायावादी काव्य के मुख्य स्तम्भ, प्रसिद्ध हिन्दी काव्य, नाटक, कहानी एवं उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पदों में कवि ने मनु के मन में उत्पन्न उस परम, अनन्त और विराट सत्ता के प्रति जिज्ञासा तथा उसके अनुभव से जागृत होती आशा का अत्यन्त भावपूर्ण चित्रण किया है। मनु उस असीम और रमणीय सत्ता को पहचानना तो चाहते हैं, किन्तु उसके स्वरूप का सम्पूर्ण वर्णन करने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं। समुद्र के मन्द, गम्भीर और धीर स्वर में होने वाले गान से उन्हें उस विराट सत्ता की उपस्थिति का आभास होता है। उनके कोमल हृदय में एक मधुर स्वप्न के समान आशा की झिलमिलाहट उत्पन्न होती है और यही आशा उनके प्राणों में व्याकुलता तथा नवीन जीवन-संचार का अनुभव कराती है। धीरे-धीरे यह आशा मधुर जागरण का रूप धारण कर लेती है और स्मिति की लहरों तथा मधुर संगीत की तान के समान उनके हृदय में आनन्द एवं नवीन चेतना भर देती है।
हिन्दी व्याख्या —

पद 17 — मनु उस अनन्त, असीम और अत्यन्त सुन्दर सत्ता को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि हे अनन्त और रमणीय! तुम कौन हो, यह मैं कैसे बता सकता हूँ? तुम किस प्रकार के हो और तुम्हारा वास्तविक स्वरूप क्या है, इसका विचार करना भी मेरे लिए सम्भव नहीं है। तुम्हारी विराटता और रहस्यमयता इतनी अधिक है कि मेरा मन तुम्हारे स्वरूप का पूरा भार वहन करने में समर्थ नहीं है। यहाँ मनु की परम सत्ता के प्रति जिज्ञासा और अपनी सीमित बुद्धि की असमर्थता व्यक्त हुई है।

पद 18 — मनु को अनुभव होता है कि हे विराट और हे विश्वव्यापी सत्ता! तुम अवश्य कोई महान शक्ति हो। समुद्र का मन्द, गम्भीर और धीर स्वर वाला निरन्तर गान मानो इसी विराट सत्ता के अस्तित्व की घोषणा कर रहा है। समुद्र की गंभीर ध्वनि से मनु को उस अदृश्य सत्ता की उपस्थिति का आभास होता है। प्रकृति की ध्वनियाँ उन्हें परम सत्ता के अस्तित्व का संकेत देती हुई प्रतीत होती हैं।

पद 19 — मनु के हृदय में एक मधुर स्वप्न के समान आशा की झिलमिलाहट दिखाई देने लगती है। उनका कोमल और संवेदनशील हृदय इस नवीन अनुभूति से और अधिक अधीर हो उठता है। उनके भीतर की व्याकुलता अब आशा का रूप धारण कर लेती है। यह आशा उनके प्राणों की वायु के समान उन्हें जीवित रखने वाली और आगे बढ़ने की प्रेरणा देने वाली बन जाती है।

पद 20 — मनु के हृदय में उत्पन्न आशा अब अत्यन्त आकर्षक और कामना योग्य बन गई है। वह एक मधुर जागरण के समान सुन्दर और प्रकाशमय प्रतीत होती है। यह आशा उनके हृदय में मुस्कान की लहरों के समान उठती है और ऐसा अनुभव होता है मानो मधुर संगीत की कोई तान उनके भीतर नृत्य कर रही हो। इस प्रकार आशा मनु के जीवन में नवीन आनन्द, उत्साह और चेतना का संचार करती है।

काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पदों में मनु के हृदय में परम सत्ता के प्रति उत्पन्न जिज्ञासा और उसी से जन्म लेने वाली आशा का अत्यन्त भावपूर्ण चित्रण हुआ है। ‘हे अनंत रमणीय’ तथा ‘हे विराट! हे विश्वदेव!’ जैसे सम्बोधन भावों की तीव्रता को व्यक्त करते हैं। ‘कैसे हो? क्या हो?’ में प्रश्नात्मक शैली द्वारा मनु की जिज्ञासा और विस्मय को प्रभावशाली बनाया गया है। ‘मंद्-गंभीर-धीर-स्वर’ में विशेषणों की क्रमिक योजना से समुद्र की गम्भीर ध्वनि का श्रव्य बिम्ब उपस्थित होता है। ‘मधुर स्वप्न-सी झिलमिल’ तथा ‘आशा बनकर प्राण समीर’ में उपमा एवं रूपक का सुन्दर प्रयोग हुआ है। ‘स्मिति की लहरों-सी’ और ‘मधुमय तान’ में आशा को दृश्य एवं श्रव्य दोनों रूपों में साकार किया गया है। भाषा कोमल, भावपूर्ण, संगीतात्मक एवं चित्रात्मक है। सम्पूर्ण पदों में निराशा से आशा की ओर बढ़ते मनु के मनोभावों तथा नवीन जीवन-चेतना का अत्यन्त सुन्दर चित्रण हुआ है।
पद 21–24
जीवन-जीवन की पुकार है,खेल रहा है शीतल-दाह। किसके चरणों में नत होता,नव-प्रभात का शुभ उत्साह। 21 मैं हूँ, यह वरदान सदृश क्यों,लगा गूँजने कानों में, मैं भी कहने लगा, 'मैं रहूँ'शाश्वत नभ के गानों में। 22 यह संकेत कर रही सत्ता,किसकी सरल विकास-मयी। जीवन की लालसा आज क्यों,इतनी प्रखर विलास-मयी? 23 तो फिर क्या मैं जिऊँ, और भी,जीकर क्या करना होगा? देव बता दो, अमर-वेदना,लेकर कब मरना होगा? 24
शब्दार्थ — पुकार = आवाज/आह्वान, शीतल-दाह = शीतलता देने वाली पीड़ा/ठंडी जलन, चरण = पैर/पद, नत = झुका हुआ, नव-प्रभात = नया सवेरा, शुभ = मंगलमय, उत्साह = उमंग/जोश, वरदान = ईश्वर की कृपा से प्राप्त उपहार, सदृश = समान, गूँजने = प्रतिध्वनित होने, शाश्वत = सदा रहने वाला, नभ = आकाश, सत्ता = शक्ति/अस्तित्व, संकेत = इशारा/सूचना, सरल = सहज/सीधा, विकास-मयी = विकास से युक्त, लालसा = तीव्र इच्छा, प्रखर = तीव्र/तेज, विलास-मयी = आनन्द और ऐश्वर्य से युक्त, अमर-वेदना = कभी समाप्त न होने वाली पीड़ा, जिऊँ = जीवित रहूँ, शाश्वत = सदा रहने वाला।
सन्दर्भ — प्रस्तुत काव्यांश/पद/पदांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘आशा’ सर्ग से लिया गया है। ‘आशा’ सर्ग कामायनी महाकाव्य का द्वितीय सर्ग है, जिसके रचयिता छायावादी काव्य के मुख्य स्तम्भ, प्रसिद्ध हिन्दी काव्य, नाटक, कहानी एवं उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पदों में कवि ने प्रलय के बाद मनु के हृदय में जाग्रत होती जीवन की आकांक्षा, आत्मबोध तथा भविष्य के प्रति नवीन उत्साह का चित्रण किया है। प्रकृति के नवप्रभात के साथ मनु को जीवन की पुकार सुनाई देती है और उनके भीतर जीने की इच्छा जाग्रत होती है। उन्हें अपने अस्तित्व का बोध होता है तथा वे शाश्वत जीवन में अपने अस्तित्व को बनाए रखने की कामना करने लगते हैं। मनु अनुभव करते हैं कि कोई अदृश्य सत्ता संसार के सरल और निरन्तर विकास का संकेत दे रही है। इससे उनके भीतर जीवन की लालसा अत्यन्त प्रबल हो जाती है। अन्ततः वे उस परम सत्ता से प्रश्न करते हैं कि यदि उन्हें जीवन मिला है तो उन्हें आगे क्या करना चाहिए और जीवन की इस अमर पीड़ा का अन्त कब होगा।
हिन्दी व्याख्या —

पद 21 — मनु को चारों ओर से जीवन की पुकार सुनाई देती है। प्रकृति में कहीं शीतलता है तो कहीं पीड़ा की अनुभूति, फिर भी जीवन अपनी गति से निरन्तर आगे बढ़ रहा है। नवप्रभात का शुभ और नवीन उत्साह मानो किसी महान सत्ता के चरणों में नतमस्तक हो रहा है। इस प्रकार नए सवेरे के साथ प्रकृति में जीवन और उत्साह का संचार दिखाई देता है।

पद 22 — मनु के कानों में यह भाव गूँजने लगता है कि ‘मैं हूँ’ अर्थात् उनका अपना अस्तित्व भी एक वरदान के समान है। इस आत्मबोध से उनके भीतर जीने की इच्छा जाग उठती है। वे कहने लगते हैं कि मैं भी इस शाश्वत आकाश के गीतों में सदा विद्यमान रहूँ। यहाँ मनु के भीतर आत्मचेतना, अस्तित्व-बोध और अमर रहने की आकांक्षा का उदय हुआ है।

पद 23 — मनु अनुभव करते हैं कि कोई अदृश्य सत्ता संसार के सहज और निरन्तर विकास का संकेत दे रही है। प्रकृति में जीवन का विस्तार और विकास देखकर उनके मन में जीवन के प्रति तीव्र आकर्षण उत्पन्न होता है। वे आश्चर्य करते हैं कि आज उनके भीतर जीवन जीने की इच्छा इतनी अधिक प्रबल और आनन्दमय क्यों हो गई है। यह जीवन के प्रति जाग्रत हुई नवीन लालसा का भाव है।

पद 24 — जीवन की तीव्र आकांक्षा जाग्रत होने पर मनु के मन में एक नया प्रश्न उठता है कि यदि उन्हें अभी और जीना है, तो इस जीवन को किस उद्देश्य से जीना होगा और उन्हें आगे क्या करना चाहिए। वे देव अर्थात् परम सत्ता से मार्गदर्शन की प्रार्थना करते हुए पूछते हैं कि इस जीवन की अमर पीड़ा को लेकर उन्हें कब तक जीना और अन्ततः कब मरना होगा। इन पंक्तियों में मनु के जीवन-संघर्ष, जिज्ञासा और अस्तित्व के उद्देश्य को जानने की व्याकुलता व्यक्त हुई है।

काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पदों में प्रलय के पश्चात् मनु के भीतर जाग्रत होती जीवन-चेतना, आत्मबोध, जीवन-लालसा और भविष्य के प्रति उत्साह का अत्यन्त प्रभावपूर्ण चित्रण हुआ है। ‘जीवन-जीवन की पुकार’ तथा ‘नव-प्रभात का शुभ उत्साह’ में मानवीकरण द्वारा प्रकृति को सजीव बनाया गया है। ‘किसके चरणों में नत होता’ में मानवीय भावों के माध्यम से प्रकृति की विनम्रता का सुन्दर चित्रण है। ‘मैं हूँ’ की पुनरावृत्ति आत्मबोध और अस्तित्व की चेतना को प्रभावशाली बनाती है। ‘शाश्वत नभ के गानों’ में आकाश का संगीतात्मक एवं कल्पनात्मक बिम्ब प्रस्तुत हुआ है। ‘विकास-मयी सत्ता’ तथा ‘जीवन की लालसा’ में दार्शनिक भावों की अभिव्यक्ति हुई है। अन्तिम पदों में प्रश्नात्मक शैली के माध्यम से मनु की जिज्ञासा, व्याकुलता और जीवन के उद्देश्य को जानने की उत्कट इच्छा व्यक्त हुई है। भाषा भावपूर्ण, दार्शनिक, संगीतात्मक एवं चित्रात्मक है।
पद 25–28
एक यवनिका हटी, पवन से प्रेरित मायापट जैसी। और आवरण-मुक्त प्रकृति थी हरी-भरी फिर भी वैसी। 25 स्वर्ण शालियों की कलमें थीं,दूर-दूर तक फैल रहीं। शरद-इंदिरा की मंदिर की,मानो कोई गैल रही। 26 विश्व-कल्पना-सा ऊँचा वह, सुख-शीतल-संतोष-निदान। और डूबती-सी अचला का, अवलंबन, मणि-रत्न-निधान। 27 अचल हिमालय का शोभनतम, लता-कलित शुचि सानु-शरीर। निद्रा में सुख-स्वप्न देखता, जैसे पुलकित हुआ अधीर। 28
शब्दार्थ — यवनिका = पर्दा, प्रेरित = प्रेरणा से चलाया हुआ, मायापट = माया का पर्दा/भ्रम का आवरण, आवरण-मुक्त = पर्दे से रहित/खुला हुआ, हरी-भरी = हरियाली से युक्त, स्वर्ण शालियाँ = सुनहरे धान, कलमें = पौधे/धान की बालियाँ, दूर-दूर तक = बहुत दूर तक, शरद-इंदिरा = शरद ऋतु की लक्ष्मी/शोभा, मंदिर = देवालय, गैल = मार्ग/रास्ता, विश्व-कल्पना = सम्पूर्ण संसार की कल्पना, ऊँचा = ऊर्ध्व/उन्नत, सुख-शीतल = सुख देने वाला और शीतल, संतोष-निदान = संतोष का कारण, अचला = पृथ्वी, अवलंबन = सहारा, मणि-रत्न-निधान = मणि और रत्नों का भंडार, अचल = स्थिर/जिसे हिलाया न जा सके, हिमालय = हिम से आच्छादित पर्वतराज, शोभनतम = अत्यन्त सुन्दर, लता-कलित = लताओं से युक्त, शुचि = पवित्र/स्वच्छ, सानु = पर्वत का ऊपरी भाग/चोटी, पुलकित = रोमांचित/प्रसन्न, अधीर = व्याकुल/उत्सुक।
सन्दर्भ — प्रस्तुत काव्यांश/पद/पदांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘आशा’ सर्ग से लिया गया है। ‘आशा’ सर्ग कामायनी महाकाव्य का द्वितीय सर्ग है, जिसके रचयिता छायावादी काव्य के मुख्य स्तम्भ, प्रसिद्ध हिन्दी काव्य, नाटक, कहानी एवं उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पदों में कवि ने प्रलय के पश्चात् प्रकृति के पुनः अपने वास्तविक और मनोहारी रूप में प्रकट होने तथा शरद ऋतु के अद्भुत सौन्दर्य का चित्रण किया है। पवन के झोंके से मानो माया का पर्दा हट जाता है और उसके पीछे छिपी हुई हरी-भरी प्रकृति दिखाई देने लगती है। दूर-दूर तक फैली स्वर्णिम धान की बालियाँ शरद ऋतु की शोभा के मंदिर तक जाने वाले मार्ग के समान दिखाई देती हैं। इसी प्राकृतिक दृश्य में हिमालय अपने विराट, स्थिर और भव्य रूप में पृथ्वी के लिए सहारे के समान खड़ा दिखाई देता है। लताओं से सुशोभित हिमालय की पवित्र चोटियाँ ऐसी प्रतीत होती हैं, मानो वह स्वयं सुखद स्वप्न में मग्न होकर पुलकित हो रहा हो।
हिन्दी व्याख्या —

पद 25 — कवि कहता है कि पवन के झोंके से ऐसा लगता है मानो प्रकृति के सामने पड़ा हुआ माया का पर्दा हट गया हो। यवनिका के हटते ही प्रकृति अपने वास्तविक रूप में दिखाई देने लगती है। अब वह किसी आवरण में छिपी हुई नहीं है, बल्कि हरी-भरी और पहले जैसी सुन्दर दिखाई दे रही है। यहाँ प्रकृति के सौन्दर्य के पुनः प्रकट होने का अत्यन्त मनोहारी चित्रण किया गया है।

पद 26 — चारों ओर दूर-दूर तक सुनहरे धान के पौधे और उनकी बालियाँ फैली हुई हैं। उनकी स्वर्णिम आभा अत्यन्त आकर्षक लगती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो शरद ऋतु की लक्ष्मी के मंदिर तक पहुँचने के लिए कोई सुनहरी गैल या मार्ग बना हुआ हो। स्वर्णिम धान की बालियों के माध्यम से कवि ने शरद ऋतु की सम्पन्नता और सौन्दर्य को सजीव बना दिया है।

पद 27 — कवि हिमालय का वर्णन करते हुए कहता है कि वह संसार की विराट कल्पना के समान अत्यन्त ऊँचा और भव्य है। वह सुख, शीतलता और संतोष का स्रोत है। समुद्र में डूबती हुई पृथ्वी के लिए वह एक मजबूत सहारे के समान है। साथ ही, उसके भीतर असंख्य मणि और रत्न विद्यमान हैं, इसलिए वह मणि-रत्नों के भंडार के समान भी है। इस प्रकार हिमालय की ऊँचाई, स्थिरता, उपयोगिता और प्राकृतिक सम्पन्नता का वर्णन हुआ है।

पद 28 — हिमालय का अत्यन्त सुन्दर और स्थिर शरीर लताओं से सुशोभित है तथा उसकी चोटियाँ पवित्र और मनोहारी हैं। कवि को ऐसा प्रतीत होता है मानो हिमालय निद्रा में कोई सुखद स्वप्न देख रहा हो और उस स्वप्न से प्रसन्न होकर पुलकित तथा अधीर हो उठा हो। हिमालय को मनुष्य के समान सोते और सुखद स्वप्न देखते हुए प्रस्तुत करके कवि ने उसके प्राकृतिक सौन्दर्य को अत्यन्त सजीव बना दिया है।

काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पदों में प्रलय के पश्चात् प्रकृति के आवरण-मुक्त होकर पुनः हरे-भरे और सुन्दर रूप में प्रकट होने तथा हिमालय के विराट सौन्दर्य का अत्यन्त मनोहारी चित्रण हुआ है। ‘यवनिका हटी’ और ‘मायापट’ के माध्यम से प्रकृति के आवरण हटने का कल्पनापूर्ण चित्र प्रस्तुत किया गया है। ‘स्वर्ण शालियों की कलमें’ में धान की बालियों का अत्यन्त सुन्दर दृश्य-बिम्ब उपस्थित हुआ है तथा ‘शरद-इंदिरा के मंदिर की गैल’ में रूपक एवं उपमा का सुन्दर प्रयोग है। ‘विश्व-कल्पना-सा ऊँचा’ में उपमा, ‘सुख-शीतल-संतोष-निदान’ में अनुप्रासात्मक सौन्दर्य तथा ‘अचला का अवलंबन’ में हिमालय की सहायक सत्ता का सुन्दर चित्रण हुआ है। ‘हिमालय’ को निद्रा में सुख-स्वप्न देखते हुए और ‘पुलकित’ होते हुए प्रस्तुत करना मानवीकरण का सुन्दर उदाहरण है। भाषा चित्रात्मक, भावपूर्ण, कोमल एवं कल्पनाशील है।
पद 29–32
उमड़ रही जिसके चरणों में,नीरवता की विमल विभूति। शीतल झरनों की धारायें,बिखरातीं जीवन-अनुभूति! 29 उस असीम नीले अंचल में,देख किसी की मृदु मुस्कान। मानों हँसी हिमालय की है, फूट चली करती कल गान। 30 शिला-संधियों में टकरा कर,पवन भर रहा था गुंजार। उस दुर्भेद्य अचल दृढ़ता का,करता चारण-सदृश प्रचार। 31 संध्या-घनमाला की सुंदर,ओढे़ रंग-बिरंगी छींट। गगन-चुंबिनी शैल-श्रेणियाँ,पहने हुए तुषार-किरीट। 32
शब्दार्थ — उमड़ रही = उमंगपूर्वक फैल रही/बहुत अधिक मात्रा में प्रकट हो रही, चरण = पैर/पर्वत का आधार, नीरवता = शान्ति/निस्तब्धता, विमल = निर्मल/पवित्र, विभूति = वैभव/सम्पदा, शीतल = ठंडा/सुखद, झरने = पर्वत से गिरने वाली जलधाराएँ, धाराएँ = प्रवाह/जल की लड़ी, बिखरातीं = फैलातीं, जीवन-अनुभूति = जीवन का अनुभव/जीवन का एहसास, असीम = जिसका कोई अन्त न हो, नीला अंचल = नीला आकाश, मृदु = कोमल/मधुर, मुस्कान = हँसी की हल्की अभिव्यक्ति, मानों = जैसे, फूट चली = निकल पड़ी, कल = मधुर/सुन्दर, गान = गीत, शिला-संधियाँ = चट्टानों के बीच की दरारें/जोड़, टकरा कर = भिड़कर, गुंजार = गूँजती हुई ध्वनि, दुर्भेद्य = जिसे भेदा या तोड़ा न जा सके, अचल = स्थिर/न हिलने वाला, दृढ़ता = मजबूती/स्थिरता, चारण = गुणगान करने वाला कवि, प्रचार = प्रसिद्धि/गुणगान का प्रसार, संध्या-घनमाला = संध्या के समय बादलों की माला, ओढ़े = धारण किए हुए, छींट = छिटकाव/रंग-बिरंगे धब्बे, गगन-चुंबिनी = आकाश को छूने वाली, शैल-श्रेणियाँ = पर्वतों की पंक्तियाँ, तुषार = हिम/बर्फ, किरीट = मुकुट।
सन्दर्भ — प्रस्तुत काव्यांश/पद/पदांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘आशा’ सर्ग से लिया गया है। ‘आशा’ सर्ग कामायनी महाकाव्य का द्वितीय सर्ग है, जिसके रचयिता छायावादी काव्य के मुख्य स्तम्भ, प्रसिद्ध हिन्दी काव्य, नाटक, कहानी एवं उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पदों में कवि ने हिमालय के विशाल, शान्त, अचल एवं अत्यन्त मनोहारी प्राकृतिक स्वरूप का चित्रण किया है। हिमालय के चरणों में नीरवता का निर्मल वैभव व्याप्त है और शीतल झरनों की धाराएँ जीवन का नवीन अनुभव कराती हुई बह रही हैं। असीम नीले आकाश के नीचे हिमालय की चोटियाँ ऐसी प्रतीत होती हैं, मानो स्वयं हिमालय मुस्कराकर मधुर गीत गा रहा हो। शिलाओं से टकराती हुई पवन की ध्वनि हिमालय की अटूट दृढ़ता का गुणगान करती है। संध्या के रंग-बिरंगे बादलों की छटा तथा हिम से सुशोभित आकाश-चुम्बी पर्वत-श्रेणियाँ हिमालय के सौन्दर्य को और अधिक भव्य एवं आकर्षक बना देती हैं।
हिन्दी व्याख्या —

पद 29 — हिमालय के चरणों में चारों ओर शान्ति और निस्तब्धता का निर्मल वैभव उमड़ता हुआ दिखाई देता है। वहाँ बहने वाले शीतल झरनों की जलधाराएँ वातावरण में जीवन और ताजगी का अनुभव बिखेरती हैं। हिमालय का यह शांत और पवित्र वातावरण मनुष्य के मन में नवीन जीवन की अनुभूति उत्पन्न करता है।

पद 30 — असीम नीले आकाश के विस्तार में किसी की कोमल मुस्कान दिखाई देने जैसी अनुभूति होती है। कवि को ऐसा लगता है मानो हिमालय स्वयं मुस्करा रहा हो और उसके मुख से मधुर गीत फूटकर निकल रहे हों। हिमालय के प्राकृतिक सौन्दर्य और झरनों की मधुर ध्वनि को कवि ने उसकी मुस्कान और मधुर गान के रूप में कल्पित किया है।

पद 31 — हिमालय की शिलाओं के बीच से गुजरती हुई पवन जब उनसे टकराती है, तब उसमें एक गम्भीर गूँज उत्पन्न होती है। ऐसा लगता है मानो पवन स्वयं चारण-कवि बनकर हिमालय की अटूट, अचल और दुर्भेद्य दृढ़ता का गुणगान तथा प्रचार कर रही हो। हिमालय की विशालता और मजबूती के सामने पवन की यह गुंजार उसके यश का घोष करती हुई प्रतीत होती है।

पद 32 — संध्या के समय आकाश में छाए हुए बादलों की माला अनेक रंगों की सुन्दर छींट से सजी हुई प्रतीत होती है। आकाश को छूने वाली हिमालय की पर्वत-श्रेणियाँ अपने सिर पर बर्फ के मुकुट धारण किए हुए दिखाई देती हैं। इस प्रकार संध्या के रंग-बिरंगे बादलों और हिमाच्छादित पर्वत-शिखरों का मेल हिमालय के सौन्दर्य को अत्यन्त भव्य और आकर्षक बना देता है।

काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पदों में हिमालय के शान्त, भव्य, अचल और सौन्दर्यपूर्ण स्वरूप का अत्यन्त मनोरम चित्रण हुआ है। ‘नीरवता की विमल विभूति’ में नीरवता को वैभव के रूप में प्रस्तुत कर भावात्मक सौन्दर्य उत्पन्न किया गया है। ‘शीतल झरनों की धाराएँ’ जीवन में नवीनता और चेतना का प्रतीक हैं। ‘असीम नीले अंचल’ में आकाश का सुन्दर बिम्ब तथा ‘हँसी हिमालय की’ में मानवीकरण का प्रयोग हुआ है। ‘पवन ... चारण-सदृश प्रचार’ में उपमा और मानवीकरण के माध्यम से पवन को हिमालय का गुणगान करने वाले चारण के रूप में चित्रित किया गया है। ‘संध्या-घनमाला’, ‘रंग-बिरंगी छींट’ तथा ‘तुषार-किरीट’ में रंग, दृश्य और कल्पना का अत्यन्त सुन्दर समन्वय है। हिमालय की चोटियों को ‘तुषार-किरीट’ धारण किए हुए बताना रूपक का मनोहारी उदाहरण है। भाषा चित्रात्मक, संगीतात्मक, भावपूर्ण एवं कल्पनाशील है।
पद 33–36
विश्व-मौन, गौरव, महत्त्व की,प्रतिनिधियों से भरी विभा। इस अनंत प्रांगण में मानों,जोड़ रही है मौन सभा। 33 वह अनंत नीलिमा व्योम की,जड़ता-सी जो शांत रही। दूर-दूर ऊँचे से ऊँचेनिज अभाव में भ्रांत रही। 34 उसे दिखाती जगती का सुख,हँसी और उल्लास अजान। मानो तुंग-तुरंग विश्व की,हिमगिरि की वह सुघर उठान। 35 थी अंनत की गोद सदृश जो,विस्तृत गुहा वहाँ रमणीय। उसमें मनु ने स्थान बनाया,सुंदर, स्वच्छ और वरणीय। 36
शब्दार्थ — विश्व-मौन = संसार की निस्तब्धता, गौरव = महत्ता/गरिमा, महत्त्व = प्रधानता/महानता, प्रतिनिधि = प्रतिनिधित्व करने वाला, विभा = शोभा/आभा, अनंत = जिसका अन्त न हो, प्रांगण = आँगन/विशाल स्थान, मौन सभा = शान्त एवं निःशब्द सभा, नीलिमा = नीला रंग/नीलापन, व्योम = आकाश, जड़ता = चेतनाहीनता/निष्क्रियता, शांत = स्थिर/निस्तब्ध, अभाव = कमी/शून्यता, भ्रांत = भ्रमित/भटकती हुई, जगती = संसार/पृथ्वी, सुख = आनन्द, उल्लास = प्रसन्नता/उत्साह, अजान = अनजान/अनभिज्ञ, तुंग = ऊँचा, तुरंग = घोड़ा, हिमगिरि = हिमालय पर्वत, सुघर = सुन्दर/सुडौल, उठान = ऊँचाई/ऊपर उठने का रूप, गोद = अंक/आश्रय, विस्तृत = फैला हुआ, गुहा = गुफा, रमणीय = सुन्दर/मनोरम, स्थान = जगह, वरणीय = स्वीकार करने योग्य/चुनने योग्य।
सन्दर्भ — प्रस्तुत काव्यांश/पद/पदांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘आशा’ सर्ग से लिया गया है। ‘आशा’ सर्ग कामायनी महाकाव्य का द्वितीय सर्ग है, जिसके रचयिता छायावादी काव्य के मुख्य स्तम्भ, प्रसिद्ध हिन्दी काव्य, नाटक, कहानी एवं उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पदों में कवि ने हिमालय के विशाल एवं गम्भीर वातावरण, आकाश की अनन्त नीलिमा तथा मनु के लिए हिमालय की गुफा में बने आश्रय का अत्यन्त मनोहारी चित्रण किया है। हिमालय का विस्तृत प्रांगण संसार के मौन, गौरव और महत्त्व का प्रतिनिधित्व करने वाली विभूतियों से भरा हुआ प्रतीत होता है। अनन्त आकाश की नीलिमा अपनी निस्तब्धता और शून्यता में दूर-दूर तक फैली हुई है। इसके विपरीत हिमालय की ऊँची उठान मानो संसार के सुख, हँसी और उल्लास को ऊपर उठाकर दिखा रही है। इसी विराट और रमणीय वातावरण में मनु को एक विस्तृत गुफा दिखाई देती है, जो उन्हें अनन्त की गोद के समान सुरक्षित और आश्रयदायक लगती है। मनु उसी गुफा में अपना सुन्दर, स्वच्छ और उपयुक्त निवास बना लेते हैं।
हिन्दी व्याख्या —

पद 33 — हिमालय का विशाल प्रांगण संसार की निस्तब्धता, गौरव और महत्त्व की प्रतिनिधि विभूतियों से भरा हुआ दिखाई देता है। ऐसा लगता है मानो इस अनन्त स्थान में मौन रूप से एक सभा आयोजित हो रही हो, जिसमें प्रकृति की महान और गम्भीर शक्तियाँ बिना कुछ बोले अपनी उपस्थिति प्रकट कर रही हों। हिमालय का वातावरण अत्यन्त गम्भीर, शान्त और गरिमापूर्ण है।

पद 34 — आकाश की अनन्त नीली नीलिमा अत्यन्त शांत और स्थिर दिखाई देती है। वह ऐसी प्रतीत होती है मानो जड़ता के कारण निश्चेष्ट हो गई हो। वह दूर-दूर तक, अत्यन्त ऊँचाई तक अपने अभाव और शून्यता में भटकती हुई-सी फैली हुई है। कवि ने आकाश की असीमता और निस्तब्धता को एक रहस्यमय एवं गम्भीर रूप में प्रस्तुत किया है।

पद 35 — हिमालय की ऊँची और सुन्दर उठान मानो संसार के सुख, हँसी और उल्लास को उस अनन्त आकाश के सामने प्रदर्शित कर रही है, जो स्वयं इन भावों से अनजान है। कवि को हिमालय का ऊँचा स्वरूप ऐसा लगता है जैसे सम्पूर्ण विश्व का कोई ऊँचा और शक्तिशाली घोड़ा ऊपर उठ रहा हो। हिमालय की ऊँचाई में संसार के आनन्द और जीवन की उमंग का सुन्दर प्रतीक दिखाई देता है।

पद 36 — हिमालय में एक ऐसी विस्तृत और सुन्दर गुफा थी, जो मानो अनन्त की गोद के समान सुरक्षित और आश्रय देने वाली थी। वह गुफा रमणीय, स्वच्छ और रहने योग्य थी। मनु ने उसी गुफा को अपना निवास बना लिया। प्रलय से बचने के बाद यह गुफा मनु को सुरक्षा, शान्ति और नवीन जीवन आरम्भ करने के लिए उपयुक्त आश्रय प्रदान करती है।

काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पदों में हिमालय के विराट, गम्भीर, शांत और आश्रयदायक स्वरूप के साथ मनु के सुरक्षित निवास का अत्यन्त मनोरम चित्रण हुआ है। ‘विश्व-मौन, गौरव, महत्त्व’ में भावों की क्रमिक योजना तथा ‘मौन सभा’ में मानवीकरण का सुन्दर प्रयोग हुआ है। ‘अनंत नीलिमा व्योम की’ में आकाश का विशाल और चित्रात्मक बिम्ब प्रस्तुत किया गया है। ‘जड़ता-सी शांत’ में उपमा द्वारा आकाश की निश्चलता को प्रभावशाली बनाया गया है। ‘तुंग-तुरंग विश्व की’ में हिमालय की ऊँचाई और गति की कल्पना को उपमा के माध्यम से सजीव किया गया है। ‘अनंत की गोद सदृश’ में उपमा द्वारा हिमालय की गुफा के सुरक्षित एवं आश्रयदायक स्वरूप को व्यक्त किया गया है। भाषा गम्भीर, चित्रात्मक, भावपूर्ण एवं कल्पनाशील है। सम्पूर्ण पदों में हिमालय को विराट प्रकृति, शान्ति और नवीन जीवन के आश्रय के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
पद 37–40
पहला संचित अग्नि जल रहा, पास मलिन-द्युति रवि-कर से। शक्ति और जागरण-चिन्ह-सा,लगा धधकने अब फिर से। 37 जलने लगा निरंतर उनका,अग्निहोत्र सागर के तीर। मनु ने तप में जीवन अपना,किया समर्पण होकर धीर। 38 सज़ग हुई फिर से सुर-संकृति,देव-यजन की वर माया। उन पर लगी डालने अपनी,कर्ममयी शीतल छाया। 39 उठे स्वस्थ मनु ज्यों उठता है,क्षितिज बीच अरुणोदय कांत। लगे देखने लुब्ध नयन से,प्रकृति-विभूति मनोहर, शांत। 40
शब्दार्थ — संचित = एकत्रित/संग्रह किया हुआ, अग्नि = आग, मलिन-द्युति = फीकी चमक वाला, रवि-कर = सूर्य की किरण, शक्ति = सामर्थ्य, जागरण = जागने की अवस्था, चिन्ह = प्रतीक/निशान, धधकने = तेज जलने, निरंतर = लगातार, अग्निहोत्र = अग्नि में आहुति देकर किया जाने वाला यज्ञ, सागर = समुद्र, तीर = किनारा, तप = तपस्या, समर्पण = अर्पण करना/अपने को सौंप देना, धीर = धैर्यवान/स्थिर, सज़ग = सचेत/जागरूक, सुर-संस्कृति = देवताओं की संस्कृति/दैवी संस्कृति, देव-यजन = देवताओं की पूजा-उपासना/यज्ञ, वर = श्रेष्ठ/उत्तम, माया = शक्ति/प्रभाव, कर्ममयी = कर्म से युक्त, शीतल छाया = ठंडी एवं सुखद छाया, स्वस्थ = निरोग/सुदृढ़, क्षितिज = जहाँ आकाश और पृथ्वी मिले हुए दिखाई देते हैं, अरुणोदय = सूर्य का लालिमा सहित उदय, कांत = सुन्दर/मनमोहक, लुब्ध = आकर्षित/मोहित, नयन = आँखें, प्रकृति-विभूति = प्रकृति का वैभव/प्राकृतिक सौन्दर्य, मनोहर = आकर्षक/सुन्दर।
सन्दर्भ — प्रस्तुत काव्यांश/पद/पदांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘आशा’ सर्ग से लिया गया है। ‘आशा’ सर्ग कामायनी महाकाव्य का द्वितीय सर्ग है, जिसके रचयिता छायावादी काव्य के मुख्य स्तम्भ, प्रसिद्ध हिन्दी काव्य, नाटक, कहानी एवं उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पदों में कवि ने प्रलय के पश्चात् मनु के जीवन में पुनः जाग्रत होती शक्ति, कर्म, तप और देव-संस्कृति का चित्रण किया है। मनु द्वारा सुरक्षित रखी गई अग्नि सूर्य की फीकी किरणों के बीच पुनः शक्ति और जागरण के प्रतीक के रूप में धधक उठती है। समुद्र के किनारे उनका अग्निहोत्र निरन्तर चलता रहता है और मनु धैर्यपूर्वक अपने जीवन को तप में समर्पित कर देते हैं। धीरे-धीरे देव-संस्कृति और देव-यजन की परम्परा पुनः जाग्रत होने लगती है तथा कर्ममयी चेतना मनु के जीवन को सुखद शीतल छाया प्रदान करती है। तप और कर्म से स्वस्थ एवं सुदृढ़ हुए मनु प्रातःकाल के अरुणोदय के समान उठकर प्रकृति के मनोहर और शांत वैभव को आकर्षित होकर देखने लगते हैं।
हिन्दी व्याख्या —

पद 37 — मनु के पास सुरक्षित रखी हुई संचित अग्नि सूर्य की फीकी पड़ती किरणों के बीच जल रही थी। वह अग्नि अब फिर से तेज होकर धधकने लगी। वह केवल अग्नि नहीं थी, बल्कि मनु के जीवन में शक्ति, चेतना और जागरण का प्रतीक थी। प्रलय के बाद बुझ चुकी जीवन-चेतना के पुनः जाग्रत होने का संकेत इस अग्नि के माध्यम से मिलता है।

पद 38 — समुद्र के किनारे मनु का अग्निहोत्र लगातार चलता रहा। मनु ने अत्यन्त धैर्य और दृढ़ता के साथ अपने जीवन को तपस्या में समर्पित कर दिया। उन्होंने तप के माध्यम से अपने जीवन को शुद्ध और अनुशासित किया तथा नवीन सृष्टि के निर्माण के लिए स्वयं को तैयार किया। यहाँ मनु की तपस्या, धैर्य और कर्मनिष्ठा का चित्रण हुआ है।

पद 39 — मनु की तपस्या और साधना के फलस्वरूप देव-संस्कृति फिर से जाग्रत होने लगी। देवताओं की पूजा, यज्ञ और उपासना की श्रेष्ठ परम्परा पुनः स्थापित होने लगी। कर्ममयी चेतना ने मनु पर अपनी शीतल छाया डालनी आरम्भ कर दी। अर्थात् कर्म और साधना के कारण मनु के जीवन में शान्ति, संतुलन और सुख का वातावरण उत्पन्न होने लगा।

पद 40 — तपस्या के कारण स्वस्थ और सुदृढ़ हुए मनु ऐसे उठे, जैसे क्षितिज के मध्य सुन्दर अरुणोदय होता है। उनके भीतर नवीन ऊर्जा और चेतना का संचार हो चुका था। वे मोहित आँखों से चारों ओर फैले प्रकृति के शान्त, सुन्दर और वैभवपूर्ण रूप को देखने लगे। प्रलय के बाद अब प्रकृति का यह नवीन रूप मनु के लिए अत्यन्त आकर्षक और सुखद था।

काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पदों में प्रलय के बाद मनु के जीवन में शक्ति, जागरण, तप, कर्म और देव-संस्कृति के पुनर्जागरण का अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण हुआ है। ‘शक्ति और जागरण-चिन्ह-सा’ में अग्नि को शक्ति और चेतना के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। ‘अग्निहोत्र’ के माध्यम से वैदिक संस्कृति एवं धार्मिक जीवन का संकेत मिलता है। ‘कर्ममयी शीतल छाया’ में रूपक द्वारा कर्म को सुख और शान्ति प्रदान करने वाली शक्ति के रूप में चित्रित किया गया है। ‘मनु ... जीवन अपना किया समर्पण’ में तप, त्याग और कर्मनिष्ठा की भावना व्यक्त हुई है। ‘उठे स्वस्थ मनु ज्यों उठता है, क्षितिज बीच अरुणोदय’ में उपमा के माध्यम से मनु के नवीन जीवन और चेतना का अत्यन्त सुन्दर चित्र प्रस्तुत किया गया है। ‘लुब्ध नयन’ तथा ‘प्रकृति-विभूति’ में प्रकृति के प्रति आकर्षण और सौन्दर्यानुभूति व्यक्त हुई है। भाषा भावपूर्ण, चित्रात्मक, संस्कृतनिष्ठ एवं ओजपूर्ण है तथा सम्पूर्ण पदों में प्रलय के बाद पुनर्निर्माण और नवीन जीवन की आशावादी चेतना अभिव्यक्त हुई है।
पद 41–44
पाकयज्ञ करना निश्चित कर,लगे शालियों को चुनने। उधर वह्नि-ज्वाला भी अपना,लगी धूम-पट थी बुनने। 41 शुष्क डालियों से वृक्षों की,अग्नि-अर्चिया हुई समिद्ध। आहुति के नव धूमगंध से,नभ-कानन हो गया समृद्ध। 42 और सोचकर अपने मन में, "जैसे हम हैं बचे हुए। क्या आश्चर्य और कोई हो,जीवन-लीला रचे हुए। " 43 अग्निहोत्र-अवशिष्ट अन्न कुछ,कहीं दूर रख आते थे। होगा इससे तृप्त अपरिचित,समझ सहज सुख पाते थे। 44
शब्दार्थ — पाकयज्ञ = भोजन पकाकर किया जाने वाला यज्ञ, निश्चित = तय/निर्धारित, शालियाँ = धान की बालियाँ/धान के पौधे, वह्नि = अग्नि, ज्वाला = आग की लौ, धूम-पट = धुएँ का पर्दा, शुष्क = सूखी हुई, डालियाँ = वृक्ष की शाखाएँ, अग्नि-अर्चियाँ = अग्नि की लपटें, समिद्ध = प्रज्वलित/अच्छी तरह जली हुई, आहुति = यज्ञ में अर्पित पदार्थ, धूमगंध = धुएँ की सुगन्ध, नभ = आकाश, कानन = वन, समृद्ध = सम्पन्न/भरपूर, अवशिष्ट = बचा हुआ, अन्न = भोजन/खाद्य पदार्थ, अपरिचित = अनजान व्यक्ति, तृप्त = संतुष्ट/पेट भरा हुआ, सहज = स्वाभाविक/सरल, सुख = आनन्द, जीवन-लीला = जीवन का खेल/जीवन का संचालन।
सन्दर्भ — प्रस्तुत काव्यांश/पद/पदांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘आशा’ सर्ग से लिया गया है। ‘आशा’ सर्ग कामायनी महाकाव्य का द्वितीय सर्ग है, जिसके रचयिता छायावादी काव्य के मुख्य स्तम्भ, प्रसिद्ध हिन्दी काव्य, नाटक, कहानी एवं उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पदों में कवि ने प्रलय के बाद मनु के द्वारा पुनः आरम्भ किए गए यज्ञ, प्रकृति के साथ उनके सामंजस्यपूर्ण जीवन तथा उनके उदार एवं परोपकारी स्वभाव का चित्रण किया है। मनु पाकयज्ञ करने का निश्चय करके धान की बालियाँ चुनते हैं और दूसरी ओर यज्ञ की अग्नि से उठता हुआ धुआँ मानो आकाश में पर्दा बुनने लगता है। सूखी लकड़ियों से यज्ञाग्नि प्रज्वलित होती है और आहुति की सुगन्ध से आकाश तथा वन का वातावरण पवित्र एवं समृद्ध हो जाता है। मनु अपने मन में विचार करते हैं कि जिस प्रकार वे प्रलय से बच गए हैं, उसी प्रकार सम्भव है कि कोई अन्य प्राणी भी बचा हो और कहीं अपना जीवन बिता रहा हो। इसी भावना से वे अग्निहोत्र के बाद बचा हुआ अन्न किसी दूर स्थान पर रख आते हैं, ताकि यदि कोई अपरिचित जीवित प्राणी वहाँ पहुँचे तो उससे तृप्त हो सके। इस परोपकारी भावना से मनु को सहज सुख की अनुभूति होती है।
हिन्दी व्याख्या —

पद 41 — मनु ने पाकयज्ञ करने का निश्चय किया और उसके लिए धान की बालियाँ चुनने लगे। दूसरी ओर यज्ञ की अग्नि की लपटें भी प्रज्वलित होने लगीं और उनसे निकलने वाला धुआँ ऐसा प्रतीत होता था, मानो अग्नि आकाश में धुएँ का पर्दा बुन रही हो। यहाँ यज्ञ की तैयारी तथा प्रकृति के साथ मनु के धार्मिक जीवन का चित्रण हुआ है।

पद 42 — वृक्षों की सूखी डालियों से यज्ञ की अग्नि की लपटें अच्छी तरह प्रज्वलित हो उठीं। यज्ञ में दी जाने वाली आहुतियों से निकलने वाली नवीन धुएँ की सुगन्ध से आकाश और वन का वातावरण सुगन्धित एवं समृद्ध हो गया। यज्ञ के कारण सम्पूर्ण प्राकृतिक वातावरण पवित्र और मंगलमय दिखाई देने लगा।

पद 43 — मनु अपने मन में विचार करते हैं कि जिस प्रकार वे प्रलय जैसी भयंकर विपत्ति से बच गए हैं, उसी प्रकार यह भी सम्भव है कि कोई दूसरा जीव या मनुष्य भी बच गया हो और कहीं अपना जीवन जी रहा हो। इस विचार में मनु की संवेदनशीलता, आशावाद और अन्य जीवों के प्रति सहानुभूति प्रकट होती है। वे अपने अस्तित्व को अकेला मानकर निराश नहीं होते, बल्कि दूसरे जीवन की सम्भावना में विश्वास रखते हैं।

पद 44 — मनु अग्निहोत्र के बाद बचा हुआ कुछ अन्न किसी दूर स्थान पर रख आते थे। उनके मन में यह भावना थी कि यदि कोई अपरिचित और प्रलय से बचा हुआ जीव वहाँ आए तो उस अन्न से उसकी भूख मिट सके। किसी अनजान व्यक्ति के लिए भी भोजन छोड़ देने से मनु को सहज आनन्द और सन्तोष प्राप्त होता था। यह उनके परोपकारी, उदार और सहृदय व्यक्तित्व को प्रकट करता है।

काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पदों में मनु के यज्ञमय जीवन, प्रकृति के साथ उनके सामंजस्य तथा परोपकार की उदात्त भावना का अत्यन्त सुन्दर चित्रण हुआ है। ‘वह्नि-ज्वाला ... धूम-पट बुनने’ में अग्नि को धुएँ का पर्दा बुनते हुए दिखाकर मानवीकरण का सुन्दर प्रयोग किया गया है। ‘अग्नि-अर्चिया हुई समिद्ध’ में अग्नि की प्रज्वलित लपटों का सजीव चित्र उपस्थित हुआ है। ‘नभ-कानन हो गया समृद्ध’ में आहुति की धूमगन्ध से प्रकृति के सम्पूर्ण वातावरण के पवित्र एवं सुगन्धित होने की कल्पना की गई है। ‘क्या आश्चर्य और कोई हो, जीवन-लीला रचे हुए’ में मनु की आशावादी और सहृदय मनोवृत्ति व्यक्त हुई है। अन्तिम पदों में बचा हुआ अन्न अपरिचित के लिए छोड़ आने की भावना द्वारा परोपकार, करुणा और सह-अस्तित्व का आदर्श प्रस्तुत किया गया है। भाषा चित्रात्मक, भावपूर्ण, संस्कृतनिष्ठ एवं संगीतात्मक है।
पद 45–48
दुख का गहन पाठ पढ़कर अब,सहानुभूति समझते थे। नीरवता की गहराई में,मग्न अकेले रहते थे। 45 मनन किया करते वे बैठे,ज्वलित अग्नि के पास वहाँ। एक सजीव, तपस्या जैसे,पतझड़ में कर वास रहा। 46 फिर भी धड़कन कभी हृदय में,होती चिंता कभी नवीन। यों ही लगा बीतने उनका,जीवन अस्थिर दिन-दिन दीन। 47 प्रश्न उपस्थित नित्य नये थे,अंधकार की माया में। रंग बदलते जो पल-पल में,उस विराट की छाया में। 48
शब्दार्थ — दुख = पीड़ा/कष्ट, गहन = गहरा, पाठ = शिक्षा/अनुभव, सहानुभूति = दूसरे के दुःख को समझने और अनुभव करने की भावना, नीरवता = शान्ति/निस्तब्धता, गहराई = गम्भीरता, मग्न = लीन/डूबे हुए, मनन = विचार/चिन्तन, ज्वलित = जलती हुई/प्रज्वलित, सजीव = जीवित/जीवन्त, तपस्या = साधना/कठोर साधन, पतझड़ = वह ऋतु जिसमें वृक्षों के पत्ते झड़ते हैं, वास = निवास/रहना, धड़कन = हृदय की गति, चिंता = फिक्र/व्याकुलता, नवीन = नया, अस्थिर = स्थिर न रहने वाला/चंचल, दीन = दुःखी/हीन अवस्था वाला, प्रश्न = जिज्ञासा/सवाल, उपस्थित = सामने आना/प्रकट होना, अंधकार = प्रकाश का अभाव/अज्ञान, माया = भ्रम उत्पन्न करने वाली शक्ति, विराट = विशाल/असीम, छाया = प्रतिबिम्ब/प्रभाव।
सन्दर्भ — प्रस्तुत काव्यांश/पद/पदांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘आशा’ सर्ग से लिया गया है। ‘आशा’ सर्ग कामायनी महाकाव्य का द्वितीय सर्ग है, जिसके रचयिता छायावादी काव्य के मुख्य स्तम्भ, प्रसिद्ध हिन्दी काव्य, नाटक, कहानी एवं उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पदों में कवि ने प्रलय के पश्चात् मनु के एकाकी जीवन, उनके दुःखपूर्ण अनुभवों से उत्पन्न सहानुभूति, गम्भीर चिन्तन तथा मन में उठने वाली निरन्तर नवीन चिन्ताओं और प्रश्नों का चित्रण किया है। प्रलय के दुःख को भोग लेने के कारण मनु अब दूसरों के दुःख को समझने लगे हैं और नीरव वातावरण में एकान्त जीवन व्यतीत करते हुए आत्मचिन्तन में मग्न रहते हैं। अग्नि के पास बैठकर वे तपस्वी के समान मनन करते हैं। फिर भी उनके हृदय में कभी-कभी नई चिन्ता और बेचैनी उत्पन्न होती रहती है। उनका जीवन अस्थिर और दुःखपूर्ण ढंग से बीत रहा है तथा विराट सत्ता और संसार के रहस्यों से सम्बन्धित अनेक नए प्रश्न उनके सामने उपस्थित होते रहते हैं।
हिन्दी व्याख्या —

पद 45 — मनु ने स्वयं जीवन में अत्यन्त गहरा दुःख भोग लिया था। इस दुःखपूर्ण अनुभव के कारण अब वे दूसरों की पीड़ा को भी समझने और उसके प्रति सहानुभूति रखने लगे थे। प्रलय के बाद चारों ओर व्याप्त निस्तब्धता में वे अकेले और संसार से अलग होकर रहते थे। उनका मन एकान्त और शान्त वातावरण में डूबा रहता था।

पद 46 — मनु वहाँ जलती हुई अग्नि के पास बैठकर निरन्तर गम्भीर चिन्तन किया करते थे। उनका जीवन किसी जीवित तपस्या के समान बन गया था। जिस प्रकार पतझड़ में वृक्ष अपने पत्ते खोकर एकाकी और निस्तब्ध दिखाई देते हैं, उसी प्रकार मनु भी प्रलय के बाद एकान्त जीवन व्यतीत कर रहे थे। उनके जीवन में तप, चिन्तन और वैराग्य की भावना प्रमुख हो गई थी।

पद 47 — यद्यपि मनु तप और चिन्तन में लगे रहते थे, फिर भी उनके हृदय की धड़कन में कभी-कभी नई चिन्ता उत्पन्न हो जाती थी। उनका मन पूरी तरह शान्त नहीं था। इस प्रकार उनका जीवन अस्थिरता, चिन्ता और दुःख के बीच धीरे-धीरे बीतता जा रहा था। प्रलय के बाद का उनका जीवन अभी भी संघर्ष और मानसिक व्याकुलता से भरा हुआ था।

पद 48 — मनु के मन में अंधकारमय परिस्थितियों के बीच प्रतिदिन नए-नए प्रश्न उत्पन्न होते रहते थे। विराट सत्ता और उसके रहस्यमय स्वरूप की छाया में संसार के रूप और अनुभव पल-पल बदलते हुए दिखाई देते थे। इन परिवर्तनों और रहस्यों को देखकर मनु के भीतर जिज्ञासा और अधिक बढ़ती जाती थी। वे जीवन, प्रकृति और उस विराट सत्ता के रहस्य को समझने का प्रयास कर रहे थे।

काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पदों में मनु के एकाकी जीवन, दुःख से उत्पन्न सहानुभूति, तप, आत्मचिन्तन तथा मानसिक जिज्ञासा का अत्यन्त मार्मिक चित्रण हुआ है। ‘दुःख का गहन पाठ पढ़कर’ में दुःख को शिक्षा देने वाले पाठ के रूप में प्रस्तुत कर रूपकात्मक सौन्दर्य उत्पन्न किया गया है। ‘नीरवता की गहराई’ में निस्तब्ध वातावरण की गम्भीरता का सुन्दर चित्रण है। ‘एक सजीव, तपस्या जैसे’ में मनु के जीवन को तपस्या के समान बताकर उनकी साधनामय अवस्था को प्रभावशाली बनाया गया है। ‘पतझड़ में कर वास’ में पतझड़ का बिम्ब मनु के एकाकी और उदास जीवन का प्रतीक बन गया है। ‘धड़कन’, ‘चिंता’, ‘प्रश्न’ आदि के माध्यम से मनु की आन्तरिक मानसिक स्थिति का सूक्ष्म चित्रण हुआ है। ‘अंधकार की माया’ और ‘विराट की छाया’ में रहस्यात्मक एवं दार्शनिक भावों की अभिव्यक्ति हुई है। भाषा गम्भीर, भावपूर्ण, चित्रात्मक एवं दार्शनिक है तथा सम्पूर्ण पदों में मनु के अन्तर्मन की व्याकुलता और जिज्ञासा का प्रभावशाली चित्रण हुआ है।
पद 49–52
अर्ध प्रस्फुटित उत्तर मिलते,प्रकृति सकर्मक रही समस्त। निज अस्तित्व बना रखने में,जीवन आज हुआ था व्यस्त। 49 तप में निरत हुए मनु,नियमित-कर्म लगे अपना करने। विश्वरंग में कर्मजाल के,सूत्र लगे घन हो घिरने। 50 उस एकांत नियति-शासन में,चले विवश धीरे-धीरे। एक शांत स्पंदन लहरों का,होता ज्यों सागर-तीरे। 51 विजन जगत की तंद्रा में,तब चलता था सूना सपना। ग्रह-पथ के आलोक-वृत्त से,काल जाल तनता अपना। 52
शब्दार्थ — अर्ध = आधा, प्रस्फुटित = स्पष्ट/खिला हुआ, उत्तर = जवाब/समाधान, प्रकृति = प्राकृतिक संसार, सकर्मक = कर्मशील/क्रियाशील, समस्त = सम्पूर्ण, निज = अपना, अस्तित्व = होने का भाव/जीवन, व्यस्त = कार्य में लगा हुआ, तप = तपस्या/साधना, निरत = लगा हुआ/लीन, नियमित-कर्म = नियत रूप से किया जाने वाला कार्य, विश्वरंग = संसार रूपी रंगमंच, कर्मजाल = कर्मों का जाल, सूत्र = धागा/संबंध जोड़ने वाला माध्यम, घन = घना, एकांत = अकेलापन/निःसंग अवस्था, नियति = भाग्य/पूर्वनिर्धारित व्यवस्था, शासन = नियंत्रण/व्यवस्था, विवश = असहाय/पराधीन, स्पंदन = हलचल/कम्पन, लहर = तरंग, विजन = सुनसान/निर्जन, तंद्रा = उनींदापन/अर्धनिद्रा, सूना = खाली/निर्जन, ग्रह-पथ = ग्रहों की गति का मार्ग, आलोक-वृत्त = प्रकाश का घेरा, काल-जाल = समय का जाल, तनना = फैलना/विस्तृत होना।
सन्दर्भ — प्रस्तुत काव्यांश/पद/पदांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘आशा’ सर्ग से लिया गया है। ‘आशा’ सर्ग कामायनी महाकाव्य का द्वितीय सर्ग है, जिसके रचयिता छायावादी काव्य के मुख्य स्तम्भ, प्रसिद्ध हिन्दी काव्य, नाटक, कहानी एवं उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पदों में कवि ने प्रलय के पश्चात् प्रकृति और जीवन के पुनः सक्रिय होने, मनु के तप एवं नियमित कर्म में प्रवृत्त होने तथा संसार में कर्म की व्यवस्था के धीरे-धीरे विकसित होने का चित्रण किया है। प्रकृति मनु के प्रश्नों के पूर्ण उत्तर न देकर केवल संकेत रूप में उत्तर देती हुई भी सक्रिय बनी हुई है। प्रत्येक जीव अपने अस्तित्व को बनाए रखने में व्यस्त है। मनु तपस्या में लीन होकर नियमित कर्म करने लगते हैं और संसार रूपी रंगमंच पर कर्मों का जाल धीरे-धीरे घना होने लगता है। नियति के एकान्त शासन में जीवन विवश होकर अपनी गति से आगे बढ़ता रहता है। इस अवस्था को कवि समुद्र-तट पर उठने वाली शान्त लहरों के स्पन्दन से तुलना करता है। निर्जन संसार की तन्द्रा में जीवन का एक सूना स्वप्न चलता रहता है और ग्रहों के प्रकाशमय पथों से समय अपना अदृश्य जाल फैलाता हुआ आगे बढ़ता रहता है।
हिन्दी व्याख्या —

पद 49 — प्रकृति मनुष्य के प्रश्नों के केवल आधे-अधूरे और संकेतात्मक उत्तर देती हुई भी पूरी तरह सक्रिय बनी हुई थी। प्रलय के बाद संसार में जीवन फिर से अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए प्रयत्नशील हो गया था। प्रत्येक जीव अपने जीवन की रक्षा और विकास में व्यस्त था। इस प्रकार प्रकृति में जीवन की गतिविधियाँ धीरे-धीरे पुनः आरम्भ हो रही थीं।

पद 50 — मनु तपस्या में लीन हो गए और नियमित रूप से अपने निर्धारित कर्म करने लगे। उनके कर्मों के साथ संसार रूपी रंगमंच पर कर्मों का जाल भी धीरे-धीरे घना होने लगा। अर्थात् मनु के कर्मों से एक ओर उनका जीवन व्यवस्थित होने लगा और दूसरी ओर संसार में विभिन्न कर्मों और उनके पारस्परिक संबंधों का विस्तार होने लगा।

पद 51 — नियति के एकान्त और निश्चित शासन में जीवन विवश होकर धीरे-धीरे अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। संसार की गति किसी विशेष व्यक्ति की इच्छा से नहीं, बल्कि नियति की व्यवस्था के अनुसार चल रही थी। यह स्थिति समुद्र के किनारे उठने वाली शान्त लहरों के समान थी, जिनमें निरन्तर हल्का-सा स्पन्दन तो रहता है, परन्तु उनकी गति अत्यन्त सहज और शांत होती है।

पद 52 — उस समय निर्जन संसार मानो तन्द्रा की अवस्था में था और उसमें जीवन का एक सूना सपना धीरे-धीरे चल रहा था। आकाश में ग्रहों के अपने-अपने प्रकाशमय मार्गों से समय का अदृश्य जाल निरन्तर फैलता जा रहा था। अर्थात् संसार भले ही सुनसान और निष्क्रिय दिखाई दे रहा था, फिर भी काल अपनी गति से निरन्तर आगे बढ़ रहा था और भविष्य की घटनाओं का ताना-बाना तैयार कर रहा था।

काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पदों में प्रलय के बाद प्रकृति और जीवन के पुनः सक्रिय होने, मनु की तपस्या एवं कर्मशीलता तथा नियति और काल की निरन्तर गति का दार्शनिक एवं चित्रात्मक चित्रण हुआ है। ‘अर्ध प्रस्फुटित उत्तर’ में प्रकृति द्वारा संकेतात्मक उत्तर देने की कल्पना अत्यन्त प्रभावशाली है। ‘जीवन आज हुआ था व्यस्त’ में मानवीकरण द्वारा जीवन को सक्रिय प्राणी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। ‘विश्वरंग’ और ‘कर्मजाल’ में संसार को रंगमंच तथा कर्मों को जाल के रूप में प्रस्तुत कर रूपक का सुन्दर प्रयोग हुआ है। ‘कर्मजाल के सूत्र’ में कर्मों के पारस्परिक संबंधों की कल्पना धागों के रूप में की गई है। ‘एक शांत स्पंदन लहरों का’ में समुद्र की लहरों का सजीव बिम्ब तथा उपमा द्वारा जीवन की सहज गति का चित्रण हुआ है। ‘विजन जगत की तंद्रा’, ‘सूना सपना’ तथा ‘काल-जाल’ में रहस्यात्मक एवं दार्शनिक भावों की अभिव्यक्ति हुई है। भाषा गम्भीर, संस्कृतनिष्ठ, चित्रात्मक एवं दार्शनिक है। सम्पूर्ण पदों में जीवन, कर्म, नियति और काल की शाश्वत गति का सुन्दर समन्वय दिखाई देता है।
पद 53–56
प्रहर, दिवस, रजनी आती थी,चल-जाती संदेश-विहीन। एक विरागपूर्ण संसृति में,ज्यों निष्फल आंरभ नवीन। 53 धवल,मनोहर चंद्रबिंब से,अंकित सुंदर स्वच्छ निशीथ। जिसमें शीतल पवन गा रहा,पुलकित हो पावन उद्गीथ। 54 नीचे दूर-दूर विस्तृत था,उर्मिल सागर व्यथित, अधीर। अंतरिक्ष में व्यस्त उसी सा,रहा चंद्रिका-निधि गंभीर। 55 खुलीं उसी रमणीय दृश्य में,अलस चेतना की आँखें। हृदय-कुसुम की खिलीं अचानक,मधु से वे भीगी पाँखे। 56
शब्दार्थ — प्रहर = समय का एक भाग, दिवस = दिन, रजनी = रात, संदेश-विहीन = बिना किसी संदेश के, विरागपूर्ण = उदासीनता/वैराग्य से युक्त, संसृति = संसार/सृष्टि, निष्फल = बिना फल का/व्यर्थ, आरंभ = प्रारम्भ, धवल = सफेद/उज्ज्वल, मनोहर = सुन्दर/आकर्षक, चंद्रबिंब = चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब/चन्द्रमा का गोलाकार रूप, अंकित = अंकित/छपा हुआ, निशीथ = मध्य रात्रि, शीतल = ठंडा/सुखद, पवन = हवा, पुलकित = प्रसन्न/रोमांचित, पावन = पवित्र, उद्गीथ = मधुर गीत/सामगान, उर्मिल = लहरों से युक्त, व्यथित = दुःखी/पीड़ित, अधीर = व्याकुल/चंचल, अंतरिक्ष = आकाश, चंद्रिका-निधि = चन्द्रमा/चाँदनी का भंडार, गंभीर = गहरा/शांत, रमणीय = सुन्दर/मनोहर, अलस = आलस्य से भरी हुई, चेतना = जागरूकता/जीवन-बोध, हृदय-कुसुम = हृदय रूपी फूल, मधु = शहद/मधुरता, पाँखे = पंखुड़ियाँ।
सन्दर्भ — प्रस्तुत काव्यांश/पद/पदांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘आशा’ सर्ग से लिया गया है। ‘आशा’ सर्ग कामायनी महाकाव्य का द्वितीय सर्ग है, जिसके रचयिता छायावादी काव्य के मुख्य स्तम्भ, प्रसिद्ध हिन्दी काव्य, नाटक, कहानी एवं उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पदों में कवि ने प्रलय के बाद मनु के एकाकी और विरागपूर्ण जीवन में बीतते हुए समय, चाँदनी रात की मनोरम प्रकृति तथा उस रमणीय वातावरण के प्रभाव से मनु की चेतना के पुनः जाग्रत होने का चित्रण किया है। दिन, रात और प्रहर बिना किसी संदेश के आते-जाते रहते हैं और मनु का जीवन मानो निष्फल आरम्भ की तरह विरक्त भाव से बीत रहा है। एक स्वच्छ और सुन्दर मध्यरात्रि में धवल चन्द्रमा के प्रकाश से प्रकृति नहा उठती है तथा शीतल पवन मधुर गीत गाती हुई प्रतीत होती है। नीचे व्यथित और अधीर लहरों वाला समुद्र तथा ऊपर गम्भीर चाँदनी से भरा आकाश एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करते हैं। इसी मनोहर वातावरण में मनु की अलसाई हुई चेतना जाग उठती है और उनके हृदय में आशा तथा नवीन अनुभूति का प्रस्फुटन होने लगता है।
हिन्दी व्याख्या —

पद 53 — प्रलय के बाद मनु के एकान्त जीवन में समय निरन्तर बीतता रहता था। कभी प्रहर, कभी दिन और कभी रात आती और चली जाती थी, किन्तु उनके जीवन में कोई नया संदेश या परिवर्तन नहीं आता था। चारों ओर वैराग्य और उदासी का वातावरण था। ऐसा लगता था मानो इस संसार में जीवन का नया आरम्भ तो हुआ है, लेकिन उसका कोई सार्थक परिणाम नहीं निकल रहा है।

पद 54 — एक रात का दृश्य अत्यन्त सुन्दर और मनोहारी था। स्वच्छ आकाश में धवल चन्द्रमा का सुन्दर प्रतिबिम्ब अंकित था और उसकी चाँदनी से मध्यरात्रि का वातावरण उज्ज्वल हो उठा था। उस शांत वातावरण में शीतल पवन मानो प्रसन्न होकर कोई पवित्र और मधुर गीत गा रही थी। प्रकृति का यह संगीत मन को आनन्द और पवित्रता से भर देने वाला था।

पद 55 — नीचे दूर-दूर तक समुद्र फैला हुआ था। उसकी लहरें निरन्तर उठती-गिरती हुई मानो दुःखी और व्याकुल थीं। दूसरी ओर आकाश में चाँदनी का अथाह विस्तार अत्यन्त गम्भीर दिखाई दे रहा था। समुद्र की व्याकुलता और आकाश की गम्भीर शान्ति के बीच एक अद्भुत प्राकृतिक सामंजस्य दिखाई देता था।

पद 56 — इसी अत्यन्त सुन्दर और मनोहारी प्राकृतिक दृश्य के प्रभाव से मनु की अब तक सोई हुई और आलस्य से भरी चेतना की आँखें खुलने लगीं। उनके हृदय रूपी फूल की पंखुड़ियाँ अचानक खिल उठीं और वे मधुर अनुभूति से भीग गईं। अर्थात् प्रकृति के इस रमणीय वातावरण ने मनु के भीतर सोई हुई संवेदनशीलता, सौन्दर्य-बोध और आशा को पुनः जाग्रत कर दिया।

काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पदों में प्रलय के बाद मनु के विरागपूर्ण एकाकी जीवन, चाँदनी रात के प्राकृतिक सौन्दर्य तथा प्रकृति के प्रभाव से उनकी चेतना के पुनर्जागरण का अत्यन्त मनोहारी चित्रण हुआ है। ‘प्रहर, दिवस, रजनी’ में समय के निरन्तर प्रवाह का क्रमबद्ध चित्रण है। ‘विरागपूर्ण संसृति’ और ‘निष्फल आरंभ’ में मनु के जीवन की उदासी एवं निरर्थकता का भाव व्यक्त हुआ है। ‘धवल, मनोहर चंद्रबिंब’ में चन्द्रमा का सुन्दर दृश्य-बिम्ब उपस्थित किया गया है। ‘शीतल पवन गा रहा’ में मानवीकरण द्वारा पवन को गीत गाने वाली सजीव सत्ता के रूप में प्रस्तुत किया गया है। ‘उर्मिल सागर व्यथित, अधीर’ में समुद्र की लहरों को मानवीय भाव देकर मानवीकरण का सुन्दर प्रयोग हुआ है। ‘हृदय-कुसुम’ में रूपक द्वारा हृदय को फूल के रूप में चित्रित किया गया है तथा ‘मधु से भीगी पाँखे’ में हृदय की मधुर भावानुभूति को पंखुड़ियों के माध्यम से साकार किया गया है। भाषा कोमल, संगीतात्मक, चित्रात्मक एवं भावपूर्ण है।
पद 57–60
व्यक्त नील में चल प्रकाश का,कंपन सुख बन बजता था। एक अतींद्रिय स्वप्न-लोक का,मधुर रहस्य उलझता था। 57 नव हो जगी अनादि वासना,मधुर प्राकृतिक भूख-समान। चिर-परिचित-सा चाह रहा था,द्वंद्व सुखद करके अनुमान। 58 दिवा-रात्रि या-मित्र वरुण की,बाला का अक्षय श्रृंगार, मिलन लगा हँसने जीवन के,उर्मिल सागर के उस पार। 59 तप से संयम का संचित बल,तृषित और व्याकुल था आज। अट्टाहास कर उठा रिक्त का,वह अधीर-तम-सूना राज। 60
शब्दार्थ — व्यक्त = प्रकट/स्पष्ट, नील = नीला आकाश, प्रकाश = रोशनी, कंपन = कम्पन/थरथराहट, सुख = आनन्द, अतींद्रिय = इन्द्रियों से परे, स्वप्न-लोक = स्वप्न का संसार, मधुर = मीठा/सुखद, रहस्य = गूढ़ बात, उलझना = जटिल होना/समझ में न आना, अनादि = जिसका आदि न हो, वासना = इच्छा/कामना, प्राकृतिक = प्रकृति से सम्बन्धित, भूख = तीव्र इच्छा/आवश्यकता, चिर-परिचित = बहुत समय से परिचित, द्वंद्व = दो विपरीत भावों का संघर्ष, अनुमान = अटकल/कल्पना, दिवा = दिन, रात्रि = रात, मित्र = सूर्य, वरुण = जल के देवता, बाला = युवती/कन्या, अक्षय = कभी समाप्त न होने वाला, श्रृंगार = सजावट/सौन्दर्य, मिलन = संयोग/एक होना, उर्मिल = लहरों से युक्त, तप = तपस्या, संयम = इन्द्रियों पर नियंत्रण, संचित = एकत्रित किया हुआ, तृषित = प्यासी/अत्यन्त इच्छुक, व्याकुल = बेचैन, अट्टाहास = जोर से हँसना/प्रचण्ड हास्य, रिक्त = खाली/शून्य, अधीर = बेचैन, तम = अंधकार, सूना = निर्जन/खाली, राज = राज्य/सत्ता।
सन्दर्भ — प्रस्तुत काव्यांश/पद/पदांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘आशा’ सर्ग से लिया गया है। ‘आशा’ सर्ग कामायनी महाकाव्य का द्वितीय सर्ग है, जिसके रचयिता छायावादी काव्य के मुख्य स्तम्भ, प्रसिद्ध हिन्दी काव्य, नाटक, कहानी एवं उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पदों में कवि ने प्रकृति के रमणीय वातावरण से मनु के अन्तर्मन में जाग्रत होने वाली नवीन अनुभूतियों, अनादि वासना तथा जीवन के मिलन की आकांक्षा का चित्रण किया है। नीले आकाश में फैले प्रकाश का कम्पन मनु को अतीन्द्रिय स्वप्नलोक के मधुर रहस्य का अनुभव कराता है। उनके भीतर अनादि काल से सोई हुई प्राकृतिक इच्छा फिर जाग उठती है और उन्हें किसी चिर-परिचित सुख की चाह होने लगती है। दिन और रात के रूप में प्रकृति का शाश्वत श्रृंगार जीवन के मिलन की सम्भावना का संकेत देता है। दूसरी ओर तप और संयम से संचित शक्ति अब तृप्ति की आकांक्षा से व्याकुल हो उठती है और अब तक रिक्त तथा सुनसान जीवन में तीव्र हलचल उत्पन्न होने लगती है।
हिन्दी व्याख्या —

पद 57 — नीले आकाश में फैले हुए प्रकाश का हल्का कम्पन मानो सुखद संगीत के रूप में सुनाई दे रहा था। इस मनोहारी वातावरण में मनु को इन्द्रियों से परे किसी स्वप्नलोक के मधुर और रहस्यमय संसार का अनुभव होने लगा। प्रकृति का यह अलौकिक सौन्दर्य उनके मन में एक ऐसी अनुभूति उत्पन्न कर रहा था, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना कठिन था।

पद 58 — मनु के भीतर अनादि काल से विद्यमान कोई स्वाभाविक इच्छा या वासना फिर से जाग उठी। यह इच्छा प्रकृति की स्वाभाविक भूख के समान थी। उन्हें ऐसा लगने लगा कि कोई बहुत पुराना और चिर-परिचित सुख उन्हें अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। उनके मन में सुख और उसके विपरीत भावों का एक मधुर द्वंद्व उत्पन्न होने लगा तथा वे उस सुख की सम्भावना का अनुमान करने लगे।

पद 59 — दिन और रात, जो सूर्य और वरुण आदि प्राकृतिक शक्तियों से सम्बन्धित हैं, मानो किसी युवती के कभी समाप्त न होने वाले श्रृंगार के समान दिखाई दे रहे थे। प्रकृति निरन्तर नए रूप में सजती-सँवरती रहती है। इसी शाश्वत प्राकृतिक सौन्दर्य के बीच जीवन का मिलन मानो समुद्र की लहरों के उस पार मुस्कराने लगा था। यहाँ मनु के जीवन में नवीन प्रेम और मिलन की सम्भावना का संकेत मिलता है।

पद 60 — मनु ने तपस्या और संयम के द्वारा जो शक्ति संचित की थी, वह अब तृप्ति की इच्छा से व्याकुल हो उठी। उनके भीतर दबे हुए भाव और इच्छाएँ जाग्रत होने लगीं। अब तक जो जीवन रिक्त, अंधकारमय और सुनसान था, उसमें मानो अधीरता ने प्रचण्ड अट्टहास कर हलचल उत्पन्न कर दी। अर्थात् तप और संयम से दबे हुए स्वाभाविक मानवीय भाव अब प्रबल होकर अभिव्यक्ति की ओर बढ़ने लगे।

काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पदों में प्रकृति के सौन्दर्य से मनु के अन्तर्मन में जाग्रत होने वाली नवीन अनुभूति, अनादि वासना, मिलन की आकांक्षा तथा संयमित भावनाओं के उद्वेलन का अत्यन्त मनोवैज्ञानिक चित्रण हुआ है। ‘प्रकाश का कंपन सुख बन बजता था’ में प्रकाश को ध्वनि और सुख के रूप में अनुभव कराकर इन्द्रिय-संकर का सुन्दर प्रयोग किया गया है। ‘अतींद्रिय स्वप्न-लोक’ में रहस्यात्मक एवं अलौकिक अनुभूति व्यक्त हुई है। ‘अनादि वासना’ तथा ‘प्राकृतिक भूख’ में मनुष्य की सहज और शाश्वत इच्छाओं का संकेत मिलता है। ‘दिवा-रात्रि ... बाला का अक्षय श्रृंगार’ में प्रकृति का मानवीकरण करते हुए दिन-रात को युवती के शाश्वत श्रृंगार के रूप में प्रस्तुत किया गया है। ‘मिलन लगा हँसने’ में मानवीकरण द्वारा मिलन को सजीव रूप दिया गया है। ‘अट्टहास कर उठा रिक्त का ... राज’ में मानवीकरण तथा विरोधाभासपूर्ण कल्पना द्वारा रिक्त और सुनसान जीवन में उत्पन्न तीव्र भाव-हलचल को प्रभावशाली बनाया गया है। भाषा संगीतात्मक, चित्रात्मक, भावपूर्ण, रहस्यात्मक एवं मनोवैज्ञानिक है।
पद 61–64
धीर-समीर-परस से पुलकित,विकल हो चला श्रांत-शरीर। आशा की उलझी अलकों से,उठी लहर मधुगंध अधीर। 61 मनु का मन था विकल हो उठा,संवेदन से खाकर चोट। संवेदन जीवन जगती को,जो कटुता से देता घोंट। 62 "आह कल्पना का सुंदर,यह जगत मधुर कितना होता! सुख-स्वप्नों का दल छाया में,पुलकित हो जगता-सोता। 63 संवेदन का और हृदय का,यह संघर्ष न हो सकता। फिर अभाव असफलताओं की,गाथा कौन कहाँ बकता? 64
शब्दार्थ — धीर = शांत/गंभीर, समीर = वायु/हवा, परस = स्पर्श, पुलकित = रोमांचित/प्रसन्न, विकल = व्याकुल/अधीर, श्रांत = थका हुआ, शरीर = देह, आशा = उम्मीद, अलक = लट/केश की लट, उलझी अलकें = उलझी हुई केश-लटें, लहर = तरंग, मधुगंध = मधुर सुगन्ध, अधीर = व्याकुल/चंचल, संवेदन = अनुभूति/भावना, चोट = आघात/पीड़ा, जगती = संसार/पृथ्वी, कटुता = कठोरता/कड़वाहट, घोंट = दबा देना/नष्ट कर देना, कल्पना = मन की सृजनात्मक धारणा, मधुर = मीठा/सुखद, सुख-स्वप्न = सुखद कल्पना/आशा, दल = समूह/समुदाय, छाया = आश्रय/आवरण, पुलकित = आनन्दित/रोमांचित, संघर्ष = टकराव/द्वंद्व, अभाव = कमी/वंचना, असफलता = सफलता का न मिलना, गाथा = कहानी/वर्णन, बकता = कहता/वर्णन करता।
सन्दर्भ — प्रस्तुत काव्यांश/पद/पदांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘आशा’ सर्ग से लिया गया है। ‘आशा’ सर्ग कामायनी महाकाव्य का द्वितीय सर्ग है, जिसके रचयिता छायावादी काव्य के मुख्य स्तम्भ, प्रसिद्ध हिन्दी काव्य, नाटक, कहानी एवं उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पदों में कवि ने प्रकृति के मधुर वातावरण से मनु के श्रांत शरीर और विकल मन में उत्पन्न नवीन संवेदनाओं तथा सुखमय जीवन की कल्पना का चित्रण किया है। शान्त और मन्द वायु के स्पर्श से मनु का थका हुआ शरीर पुलकित हो उठता है तथा आशा के रूप में उठती हुई मधुर सुगन्धित लहरें उनके मन को और अधिक व्याकुल करती हैं। संवेदनशील मनु को जीवन की कठोरता और कटु अनुभवों से गहरी चोट पहुँचती है। वे कल्पना करते हैं कि यदि संसार में कटुता के स्थान पर मधुर संवेदना और सुख की अनुभूति होती, तो यह जगत कितना सुन्दर होता। उनके मन में सुखद स्वप्नों से भरे संसार की कल्पना जागती है और वे चाहते हैं कि संवेदन तथा हृदय के बीच कोई संघर्ष न रहे। यदि ऐसा हो जाए तो जीवन में अभाव और असफलताओं की दुःखद कथाएँ कहने की आवश्यकता ही न पड़े।
हिन्दी व्याख्या —

पद 61 — शान्त और मन्द गति से बहने वाली वायु के मधुर स्पर्श से मनु का थका हुआ शरीर रोमांचित हो उठा। आशा की उलझी हुई केश-लटों के समान उठने वाली सुगन्धित लहरें उनके मन में नई अनुभूति और व्याकुलता उत्पन्न करने लगीं। प्रकृति के इस मधुर वातावरण ने मनु के भीतर सोई हुई भावनाओं को जाग्रत कर दिया।

पद 62 — प्रकृति के मधुर संवेदन से स्पर्श पाकर मनु का मन अत्यन्त व्याकुल हो उठा। उन्हें अनुभव हुआ कि जीवन-जगत की कठोरता और कटुता संवेदनशील हृदय को भीतर से पीड़ित करती है। जो संवेदन जीवन को मधुर और मानवीय बना सकता है, वही जब कटु अनुभवों से आहत होता है तो मनुष्य के जीवन को घुटन और पीड़ा से भर देता है।

पद 63 — मनु कल्पना करते हुए कहते हैं कि यदि यह संसार केवल कल्पना के अनुसार सुन्दर और मधुर होता, तो कितना अच्छा होता। यदि चारों ओर सुखद स्वप्नों का समूह छाया रहता, तो मनुष्य आनन्द और पुलक से भरा हुआ जीवन व्यतीत करता तथा सुखपूर्वक जागता और सोता। यहाँ मनु एक ऐसे आदर्श संसार की कल्पना करते हैं, जिसमें दुःख और कटुता का स्थान न हो।

पद 64 — मनु की इच्छा है कि संवेदनशीलता और हृदय के बीच कोई संघर्ष न हो। मनुष्य का हृदय जिस सुख, प्रेम और संवेदना की अपेक्षा करता है, उसे जीवन में सहज रूप से प्राप्त होना चाहिए। यदि हृदय और संवेदनाओं में विरोध न हो तथा जीवन सुखपूर्ण हो, तो फिर अभाव और असफलताओं की दुःखद कहानियाँ कौन और कहाँ कहेगा? अर्थात् मनु ऐसे संसार की कल्पना करते हैं जहाँ मनुष्य की भावनाओं को पीड़ा देने वाले अभाव और असफलताएँ समाप्त हो जाएँ।

काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पदों में प्रकृति के मधुर वातावरण के माध्यम से मनु के अन्तर्मन में जाग्रत संवेदनशीलता, सुख की आकांक्षा और आदर्श जीवन की कल्पना का अत्यन्त मार्मिक चित्रण हुआ है। ‘धीर-समीर-परस’ में अनुप्रास द्वारा मन्द और शान्त वायु के स्पर्श का मधुर प्रभाव व्यक्त हुआ है। ‘आशा की उलझी अलकों’ में आशा का मानवीकरण करते हुए उसकी तुलना उलझी हुई केश-लटों से की गई है। ‘लहर मधुगंध अधीर’ में प्रकृति के सुगन्धित और चंचल वातावरण का सजीव बिम्ब प्रस्तुत हुआ है। ‘संवेदन ... कटुता से देता घोंट’ में संवेदन को जीवन को प्रभावित करने वाली सजीव शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। ‘सुख-स्वप्नों का दल’ में सुखद कल्पनाओं को समूह के रूप में चित्रित किया गया है। ‘हृदय’ और ‘संवेदन’ के संघर्ष के माध्यम से मनुष्य के अन्तर्द्वंद्व को मनोवैज्ञानिक ढंग से अभिव्यक्त किया गया है। अन्तिम पंक्ति में प्रश्नात्मक शैली के माध्यम से अभाव और असफलताओं से मुक्त आदर्श जीवन की कामना व्यक्त हुई है। भाषा कोमल, भावपूर्ण, चित्रात्मक एवं मनोवैज्ञानिक है।
पद 65–68
कब तक और अकेले?,कह दो हे मेरे जीवन बोलो! किसे सुनाऊँ कथा-कहो मत,अपनी निधि न व्यर्थ खोलो।" 65 "तम के सुंदरतम रहस्य,हे कांति-किरण-रंजित तारा। व्यथित विश्व के सात्विक शीतल,बिंदु, भरे नव रस सारा। 66 आतप-तापित जीवन-सुख की,,शांतिमयी छाया के देश। हे अनंत की गणना देते,तुम कितना मधुमय संदेश। 67 आह शून्यते चुप होने में,तू क्यों इतनी चतुर हुई? इंद्रजाल-जननी रजनी तू,क्यों अब इतनी मधुर हुई?" 68
शब्दार्थ — अकेले = एकान्त में/बिना किसी साथी के, जीवन = जिंदगी/प्राण, कथा = कहानी/वृत्तान्त, निधि = खजाना/संचित धन, व्यर्थ = बिना लाभ के, तम = अंधकार, रहस्य = गूढ़ बात, कांति = चमक/प्रभा, किरण = प्रकाश की रेखा, रंजित = रंगा हुआ/प्रभावित, तारा = नक्षत्र, व्यथित = दुःखी/पीड़ित, विश्व = संसार, सात्विक = पवित्र/शुद्ध, शीतल = ठंडा/सुखद, बिंदु = बूंद, नव रस = नवीन भावानुभूति/रस, आतप = धूप/सूर्य का ताप, तापित = तप्त/जलाया हुआ, शांतिमयी = शान्ति से भरी हुई, छाया = आश्रय/शीतलता देने वाला स्थान, अनंत = जिसका अन्त न हो, गणना = हिसाब/गिनती, मधुमय = मधुरता से भरा हुआ, शून्यता = रिक्तता/खालीपन, चुप = मौन, इंद्रजाल = जादू/मायाजाल, जननी = माता/उत्पन्न करने वाली, रजनी = रात, मधुर = मीठी/सुखद।
सन्दर्भ — प्रस्तुत काव्यांश/पद/पदांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘आशा’ सर्ग से लिया गया है। ‘आशा’ सर्ग कामायनी महाकाव्य का द्वितीय सर्ग है, जिसके रचयिता छायावादी काव्य के मुख्य स्तम्भ, प्रसिद्ध हिन्दी काव्य, नाटक, कहानी एवं उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पदों में कवि ने मनु के गहन एकान्त, उनके जीवन-संघर्ष और रात्रि के रहस्यमय सौन्दर्य से उत्पन्न भावानुभूति का चित्रण किया है। लम्बे समय से अकेले रहने के कारण मनु अपने जीवन से ही संवाद करते हुए पूछते हैं कि वे कब तक इसी प्रकार अकेले रहेंगे और अपनी जीवन-कथा किसे सुनाएँगे। इसके बाद वे अंधकार में चमकते तारों को सम्बोधित करते हुए उन्हें व्यथित संसार के लिए सात्त्विक और शीतल अमृत-बिन्दुओं के समान बताते हैं। वे सूर्य के ताप से पीड़ित जीवन को रात्रि की शांतिमयी छाया में मिलने वाले सुख और अनन्तता के मधुर संदेश का अनुभव करते हैं। अन्त में वे शून्यता और रात्रि से प्रश्न करते हैं कि मौन रहकर भी वे इतनी रहस्यमयी और आकर्षक क्यों हो गई हैं तथा इन्द्रजाल की जननी कही जाने वाली रात्रि अब उन्हें इतनी मधुर क्यों लग रही है।
हिन्दी व्याख्या —

पद 65 — मनु अपने जीवन के एकान्त से व्यथित होकर अपने ही जीवन को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि आखिर वे कब तक इसी प्रकार अकेले रहेंगे। वे चाहते हैं कि उनका जीवन स्वयं बोलकर बताए कि उसके भीतर संचित अनुभवों और भावनाओं की कथा किसे सुनाई जाए। वे अपनी जीवन-निधि अर्थात् अपने भीतर संचित भावों और अनुभवों को व्यर्थ में छिपाकर नहीं रखना चाहते, किन्तु उनके सामने ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है, जिससे वे अपनी कथा कह सकें।

पद 66 — मनु रात्रि के अंधकार में चमकते हुए तारों को देखकर उन्हें अंधकार के अत्यन्त सुन्दर रहस्य के रूप में सम्बोधित करते हैं। वे तारे प्रकाश की किरणों से रंगे हुए दिखाई देते हैं। मनु को लगता है कि ये तारे दुःखी संसार के लिए पवित्र और शीतल बिन्दुओं के समान हैं, जिनमें जीवन को नई भावानुभूति और मधुरता से भर देने वाला रस भरा हुआ है।

पद 67 — मनु कहते हैं कि सूर्य के ताप से तपे हुए जीवन के लिए रात्रि की शांतिमयी छाया सुखद आश्रय के समान है। हे अनन्त आकाश में फैले हुए तारो! तुम अपने असंख्य रूपों के माध्यम से मानो अनन्तता का परिचय देते हो और जीवन को कितना मधुर संदेश प्रदान करते हो। रात्रि का शांत और तारामय वातावरण मनु के तप्त एवं दुःखी मन को शान्ति और सुख प्रदान करता है।

पद 68 — मनु शून्यता को सम्बोधित करते हुए आश्चर्य प्रकट करते हैं कि मौन रहने में वह इतनी रहस्यमयी क्यों हो गई है। वे रात्रि से भी पूछते हैं कि जो इन्द्रजाल अर्थात् मायाजाल की जननी है, वह आज उन्हें इतनी मधुर और आकर्षक क्यों लग रही है। यहाँ मनु के मन पर रात्रि के रहस्यमय, शांत और सौन्दर्यमय वातावरण के गहरे प्रभाव को व्यक्त किया गया है।

काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पदों में मनु के एकान्त, आत्म-संवाद, रात्रि के रहस्यपूर्ण सौन्दर्य तथा उसके प्रभाव से उत्पन्न शान्ति और मधुर अनुभूति का अत्यन्त मार्मिक चित्रण हुआ है। ‘हे मेरे जीवन बोलो’ में जीवन का मानवीकरण करते हुए मनु की अन्तर्मन की व्यथा को सजीव बनाया गया है। ‘अपनी निधि न व्यर्थ खोलो’ में जीवन के संचित अनुभवों और भावों को निधि के रूप में प्रस्तुत किया गया है। ‘तम के सुंदरतम रहस्य’ में अंधकार के भीतर छिपे सौन्दर्य और रहस्य की विरोधाभासी कल्पना अत्यन्त प्रभावशाली है। ‘कांति-किरण-रंजित तारा’ में तारों का सुन्दर दृश्य-बिम्ब उपस्थित हुआ है। ‘व्यथित विश्व के सात्विक शीतल बिंदु’ में तारों को शीतल और पवित्र बिन्दुओं के रूप में प्रस्तुत कर रूपकात्मक सौन्दर्य उत्पन्न किया गया है। ‘आतप-तापित जीवन’ में जीवन की पीड़ा तथा ‘शांतिमयी छाया’ में रात्रि से प्राप्त शान्ति का सुन्दर विरोधाभास है। ‘इंद्रजाल-जननी रजनी’ में रात्रि का मानवीकरण तथा रूपक का प्रयोग हुआ है। प्रश्नात्मक शैली ने मनु की जिज्ञासा और विस्मय को प्रभावशाली बनाया है। भाषा रहस्यात्मक, कोमल, भावपूर्ण, चित्रात्मक एवं संगीतात्मक है।
पद 69–72
"जब कामना सिंधु तट आई,ले संध्या का तारा दीप। फाड़ सुनहली साड़ी उसकी,तू हँसती क्यों अरी प्रतीप? 69 इस अनंत काले शासन का,वह जब उच्छंखल इतिहास। आँसू औ'तम घोल लिख रही,तू सहसा करती मृदु हास। 70 विश्व कमल की मृदुल मधुकरी,रजनी तू किस कोने से। आती चूम-चूम चल जाती,पढ़ी हुई किस टोने से। 71 किस दिंगत रेखा में इतनी,संचित कर सिसकी-सी साँस। यों समीर मिस हाँफ रही-सी,चली जा रही किसके पास। 72
शब्दार्थ — कामना = इच्छा/अभिलाषा, सिंधु = समुद्र, तट = किनारा, संध्या = दिन और रात के मिलने का समय, तारा = नक्षत्र, दीप = दीपक/प्रकाश, सुनहली = स्वर्णिम/सोने के रंग की, साड़ी = वस्त्र, फाड़ = चीरकर/हटा कर, प्रतीप = विपरीत/उलटा, अनंत = जिसका अन्त न हो, काला शासन = अंधकार का प्रभुत्व, उच्छृंखल = अनुशासनहीन/बेकाबू, इतिहास = बीती घटनाओं का क्रम, आँसू = अश्रु, तम = अंधकार, घोल = मिलाकर, मृदु = कोमल/हल्का, हास = हँसी, विश्व = संसार, कमल = जल में खिलने वाला पुष्प, मृदुल = कोमल, मधुकरी = मधुमक्खी/मधु संग्रह करने वाली, रजनी = रात्रि, टोना = जादू/मंत्र का प्रभाव, दिगंत = दिशा का अन्त/क्षितिज, रेखा = लकीर, संचित = एकत्रित किया हुआ, सिसकी = दुःख में निकलने वाली धीमी आवाज, साँस = श्वास, समीर = वायु/हवा, हाँफना = तेज-तेज साँस लेना।
सन्दर्भ — प्रस्तुत काव्यांश/पद/पदांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘आशा’ सर्ग से लिया गया है। ‘आशा’ सर्ग कामायनी महाकाव्य का द्वितीय सर्ग है, जिसके रचयिता छायावादी काव्य के मुख्य स्तम्भ, प्रसिद्ध हिन्दी काव्य, नाटक, कहानी एवं उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पदों में कवि ने संध्या और रात्रि के माध्यम से मनु के मन में जाग्रत कामना, प्रकृति के रहस्यमय सौन्दर्य तथा उसके भावात्मक प्रभाव का चित्रण किया है। संध्या के समय समुद्र-तट पर उदित होता हुआ तारा मनु को ऐसा प्रतीत होता है मानो कामना स्वयं दीप लेकर वहाँ आई हो। रात्रि के गहन अंधकार के बीच तारे की मधुर हँसी अंधकार की कठोरता को भंग करती दिखाई देती है। मनु रात्रि को संसार रूपी कमल की कोमल मधुमक्खी के समान मानते हुए उसके रहस्यमय आगमन और स्पर्श पर आश्चर्य करते हैं। अन्त में वे मन्द वायु को ऐसी व्याकुल सत्ता के रूप में देखते हैं, जो मानो किसी दूर दिशा से सिसकती हुई साँस लेकर किसी अज्ञात प्रिय के पास जा रही हो।
हिन्दी व्याख्या —

पद 69 — जब मनु के मन में कामना जाग्रत हुई, तब संध्या के समय समुद्र के किनारे एक तारा दिखाई दिया। वह तारा ऐसा प्रतीत हुआ मानो कामना अपने हाथ में दीप लेकर वहाँ आई हो। मनु रात्रि से सम्बोधित होकर कहते हैं कि हे रात्रि! तू संध्या की स्वर्णिम साड़ी को चीरकर उसके सौन्दर्य को भंग करती हुई क्यों मुस्करा रही है? यहाँ संध्या और रात्रि के परिवर्तन को मानवीय रूप में चित्रित किया गया है।

पद 70 — अनन्त आकाश पर अंधकार का शासन था और उसके भीतर बीती हुई घटनाओं का मानो एक उच्छृंखल इतिहास लिखा जा रहा था। ऐसा लगता था जैसे आँसुओं और अंधकार को मिलाकर रात्रि उस दुःखपूर्ण इतिहास को लिख रही हो। किन्तु इसी गम्भीर और दुःखमय वातावरण के बीच वह अचानक कोमल मुस्कान बिखेर देती है। अर्थात् अंधकार और दुःख के बीच भी आशा तथा आनन्द की हल्की किरण दिखाई देती है।

पद 71 — मनु रात्रि को संसार रूपी कमल की कोमल मधुमक्खी के समान सम्बोधित करते हैं। वे पूछते हैं कि हे रजनी! तू संसार के किस अज्ञात कोने से आती है और किस रहस्यमय शक्ति के प्रभाव में आकर सबको चूमती हुई आगे बढ़ जाती है? रात्रि का आगमन और उसका चारों ओर फैलना मनु को किसी जादुई क्रिया के समान रहस्यमय लगता है।

पद 72 — मनु वायु की गति को देखकर पूछते हैं कि वह किस दिशा के अन्तिम छोर पर अपनी इतनी सारी सिसकियों जैसी साँसें संचित करके ला रही है। वह मन्द वायु उन्हें ऐसी प्रतीत होती है मानो कोई व्याकुल व्यक्ति हाँफता हुआ किसी अज्ञात प्रिय के पास जाने के लिए आगे बढ़ रहा हो। इस कल्पना में प्रकृति के माध्यम से मनु की अपनी आन्तरिक व्याकुलता और किसी मिलन की आकांक्षा व्यक्त हुई है।

काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत पदों में संध्या, रात्रि, तारा और समीर के माध्यम से मनु के मन में जाग्रत कामना, रहस्य, व्याकुलता और मिलन की आकांक्षा का अत्यन्त भावपूर्ण चित्रण हुआ है। ‘कामना ... संध्या का तारा दीप’ में कामना का मानवीकरण तथा तारे को दीप के रूप में प्रस्तुत करने की सुन्दर कल्पना है। ‘सुनहली साड़ी’ में संध्या के स्वर्णिम आकाश का मानवीकरण एवं रूपकात्मक चित्रण हुआ है। ‘काले शासन’ में अंधकार को शासक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। ‘आँसू औ’ तम घोल लिख रही’ में अंधकार और दुःख के मिश्रण से इतिहास लिखने की कल्पना अत्यन्त प्रभावशाली है। ‘विश्व कमल की मृदुल मधुकरी’ में रजनी को संसार रूपी कमल की मधुमक्खी के रूप में प्रस्तुत कर रूपक का सुन्दर प्रयोग हुआ है। ‘चूम-चूम चल जाती’ में रात्रि का मानवीकरण हुआ है। ‘सिसकी-सी साँस’ तथा ‘समीर ... हाँफ रही-सी’ में उपमा द्वारा वायु की गति में व्याकुलता और करुण भाव का संचार किया गया है। प्रश्नात्मक शैली से मनु की जिज्ञासा और अन्तर्मन की बेचैनी प्रभावशाली बनती है। भाषा कोमल, चित्रात्मक, रहस्यात्मक, संगीतात्मक एवं भावपूर्ण है।

4. जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय

जीवन परिचय — यहाँ जयशंकर प्रसाद के जीवन, व्यक्तित्व एवं कृतित्व का परिचय रहेगा।
जयशंकर प्रसाद — अरी वरुणा की शान्त कछार, आँसू, आशा सर्ग

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