मैथिलीशरण गुप्त — राधा, उर्मिला एवं यशोधरा का विरह-वर्णन
राधा, उर्मिला एवं यशोधरा के विरह-वर्णन का शब्दार्थ, सन्दर्भ, प्रसङ्ग, हिन्दी व्याख्या एवं काव्य-सौंदर्य।
1. राधा
भाग — 1
शरण एक तेरे मैं आई,
धरे रहें सब धर्म हरे !
बजा तनिक तू अपनी मुरली,
नाचें मेरे मर्म हरे !
नहीं चाहती मैं विनिमय में
उन वचनों का वर्म हरे !
तुझको—एक तुझी को—अर्पित
राधा के सब कर्म हरे !
यह वृन्दावन, यह वंशीवट,
यह यमुना का तीर हरे !
यह तरते ताराम्बर वाला
नीला निर्मल नीर हरे !
यह शशि रंजित सितघन-व्यंजित
परिचित, त्रिविध समीर हरे !
बस, यह तेरा अंक और यह
मेरा रंक शरीर हरे !
कैसे तुष्ट करेगी तुझको,
नहीं राधिका बुधा हरे !
पर कुछ भी हो, नहीं कहेगी
तेरी मुग्धा मुधा हरे !
शब्दार्थ —शरण = आश्रय, धरे रहें = बने रहें, धर्म = कर्तव्य/धार्मिक बन्धन, हरे = दूर करने वाले, मुरली = बाँसुरी, मर्म = हृदय की गहरी अनुभूति, विनिमय = बदले में लेना-देना, वचन = बातें/प्रतिज्ञाएँ, वर्म = कवच/रक्षा, अर्पित = समर्पित, कर्म = कार्य/क्रियाएँ, वृन्दावन = श्रीकृष्ण की लीला-भूमि, वंशीवट = वृन्दावन में स्थित वह वटवृक्ष जहाँ श्रीकृष्ण बाँसुरी बजाते थे, तीर = किनारा, तरते = तैरते हुए, ताराम्बर = तारों से भरा आकाश, नीला निर्मल नीर = स्वच्छ नीला जल, शशि रंजित = चन्द्रमा से प्रकाशित, सितघन-व्यंजित = श्वेत बादलों से सुशोभित, परिचित = जाना-पहचाना, त्रिविध समीर = तीन प्रकार की सुगन्धित वायु, अंक = गोद/आलिंगन, रंक शरीर = दीन-हीन शरीर, तुष्ट = प्रसन्न, बुधा = बुद्धिमती, मुग्धा = सरल और मोहित नायिका, मुधा = व्यर्थ/निष्फल ॥
सन्दर्भ —यहाँ सन्दर्भ रहेगा।
प्रसङ्ग —यहाँ प्रसङ्ग रहेगा।
हिन्दी व्याख्या —यहाँ हिन्दी व्याख्या रहेगी।
काव्य-सौंदर्य —यहाँ काव्य-सौंदर्य रहेगा।
‘द्वापर’ खण्डकाव्य से
भाग — 2
मेरे तृप्त प्रेम से तेरी
बुझ न सकेगी क्षुधा हरे !
निज पथ धरे चला जाना तू,
अलं मुझे सुधि-सुधा हरे !
सब सह लूँगी रो-रोकर मैं,
देना मुझे न बोध हरे !
इतनी ही विनती है तुझसे,
इतना ही अनुरोध हरे !
क्या ज्ञानापमान करती हूँ,
कर न बैठना क्रोध हरे !
भूले तेरा ध्यान राधिका,
तो लेना तू शोध हरे !
झुक, वह वाम कपोल चूम ले
यह दक्षिण अवतंस हरे !
मेरा लोक आज इस लय में
हो जावे विध्वंस हरे !
रहा सहारा इस अन्धी का
बस यह उन्नत वंश हरे !
मग्न अथाह प्रेम-सागर में
मेरा मानस-हंस हरे !
शब्दार्थ —तृप्त = संतुष्ट, प्रेम = स्नेह, बुझ = शांत कर, क्षुधा = भूख, निज पथ = अपने मार्ग, सुधि = स्मरण, सुधा = अमृत, बोध = ज्ञान, विनती = प्रार्थना, अनुरोध = निवेदन, ज्ञानापमान = ज्ञान का अपमान, क्रोध = गुस्सा, ध्यान = स्मरण, शोध = दण्ड/दोष का प्रायश्चित्त, वाम कपोल = बायाँ गाल, दक्षिण = दायाँ, अवतंस = कान का आभूषण, लोक = संसार, लय = दशा/स्थिति, विध्वंस = नाश, सहारा = आधार, अन्धी = असहाय/दृष्टिहीन, उन्नत वंश = ऊँचा उठा हुआ कुल/वंश, मग्न = डूबा हुआ, अथाह = जिसकी थाह न हो, मानस-हंस = मनरूपी हंस।
सन्दर्भ —यहाँ सन्दर्भ ।
प्रसङ्ग —यहाँ प्रसङ्ग ा।
हिन्दी व्याख्या —यहाँ हिन्दी व्याख्याी।
काव्य-सौंदर्य —यहाँ काव्य-सौंदर्य ।
2. उर्मिला का विरह वर्णन
पद — 1
सखि, नील नभस्सर से उतरा, यह हंस अहा! तरता-तरता ।
अब तारकमौक्तिक, शेष नहीं, निकला जिनको चरता-चरता ।।
अपने हिम बिंदु बचे तब भी, चलता उनको धरता-धरता ।
गड़ जायँ न कंटक भूतल के, कर डाल रहा डरता-डरता ।।
शब्दार्थ —सखि = हे सखी, नील नभस्सर = नीले आकाशरूपी सरोवर, उतरा = नीचे आया, तरता-तरता = तैरते हुए, तारकमौक्तिक = तारारूपी मोती, शेष = बाकी, चरता-चरता = चुनते हुए/भक्षण करते हुए, हिम-बिंदु = ओस की बूँदें, बचे = शेष रह गए, धरता-धरता = सँभालते हुए, कंटक = काँटे, भूतल = पृथ्वी/धरती, गड़ जायँ = चुभ जाएँ, कर डाल रहा = हाथों से दूर करता जा रहा, डरता-डरता = सावधानीपूर्वक।
सन्दर्भ —यहाँ सन्दर्भ रहेगा।
प्रसङ्ग —यहाँ प्रसङ्ग रहेगा।
हिन्दी व्याख्या —यहाँ हिन्दी व्याख्या रहेगी।
काव्य-सौंदर्य —यहाँ काव्य-सौंदर्य रहेगा।
पद — 2
मुझे फूल मत मारो,
मैं अबला बाला वियोगिनी, कुछ तो दया विचारो।
होकर मधु के मीत मदन, पटु, तुम कटु गरल न गारो,
मुझे विकलता, तुम्हें विफलता, ठहरो, श्रम परिहारो।
नहीं भोगनी यह मैं कोई, जो तुम जाल पसारो,
बल हो तो सिन्दूर-बिन्दु यह—यह हरनेत्र निहारो !
रूप-दर्प कंदर्प, तुम्हें तो मेरे पति पर वारो,
लो, यह मेरी चरण-धूलि, उस रति के सिर पर धारो!
शब्दार्थ —अबला = असहाय स्त्री, बाला = युवती, वियोगिनी = विरहिणी, दया = करुणा, मधु = वसन्त/मधुर रस, मीत = मित्र, मदन = कामदेव, पटु = कुशल/निपुण, कटु = कठोर, गरल = विष, गारो = डालो/प्रहार करो, विकलता = व्याकुलता, विफलता = असफलता, श्रम परिहारो = थकान दूर करो/रुक जाओ, भोगनी = भोग करने योग्य स्त्री, जाल = फँसाने का उपाय, बल = सामर्थ्य, सिन्दूर-बिन्दु = माँग का सिंदूर, हरनेत्र = शिव के नेत्र/तीसरा नेत्र, निहारो = देखो, रूप-दर्प = सौन्दर्य का अहंकार, कंदर्प = कामदेव, वारो = प्रहार करो/अर्पित करो, चरण-धूलि = पैरों की धूल, रति = कामदेव की पत्नी, सिर पर धारो = सिर पर रखो/अर्पित करो।
सन्दर्भ —यहाँ सन्दर्भ रहेगा।
प्रसङ्ग —यहाँ प्रसङ्ग रहेगा।
हिन्दी व्याख्या —यहाँ हिन्दी व्याख्या रहेगी।
काव्य-सौंदर्य —यहाँ काव्य-सौंदर्य रहेगा।
पद— 3
विरह संग अभिसार भी, भार जहाँ आभार भी |
मैं पिंजड़े में पड़ी हूँ किन्तु खुला है द्वार भी |
काल कठिन क्यों न हो किन्तु है मेरे लिए उदार भी |
जहाँ विरह ने गार दिया है, किया वहाँ उपकार भी |
सुधबुध हर ली किन्तु दिया है कालज्ञान विचार भी |
जना दिया है उसने मुझको जनजीवन है भार भी |
और मरण? वह बन जाता है कभी हिये का हार भी |
जाना मैंने इस उर में थी ज्वाला भी जलधार भी |
प्रिय ही नहीं, यहाँ मैं भी थी, और एक संसार भी |
शब्दार्थ —विरह = वियोग, संग = साथ, अभिसार = प्रिय से मिलने के लिए जाना, आभार = उपकार के प्रति कृतज्ञता, पिंजड़ा = बंधन/कैद का स्थान, द्वार = निकलने का मार्ग, काल = समय, कठिन = दुःखद/कठोर, उदार = कृपालु/दयालु, गार दिया = नष्ट/जला दिया, उपकार = भलाई, सुधबुध = होश/चेतना, हर ली = छीन ली, कालज्ञान = समय और जीवन की वास्तविकता का ज्ञान, विचार = चिंतन/समझ, जना दिया = समझा दिया, जनजीवन = सांसारिक जीवन, भार = बोझ, मरण = मृत्यु, हिये = हृदय, हार = गले का आभूषण, उर = हृदय, ज्वाला = अग्नि/तीव्र पीड़ा, जलधार = जल की धारा/आँसुओं की धारा, संसार = अपना पूरा जीवन-जगत।
सन्दर्भ —यहाँ सन्दर्भ रहेगा।
प्रसङ्ग —यहाँ प्रसङ्ग रहेगा।
हिन्दी व्याख्या —यहाँ हिन्दी व्याख्या रहेगी।
काव्य-सौंदर्य —यहाँ काव्य-सौंदर्य रहेगा।
पद — 4
कहती मैं, चातकि, फिर बोल,
ये खारी आँसू की बूँदें दे सकतीं यदि मोल!
कर सकते हैं क्या मोती भी उन बोलों की तोल?
फिर भी, फिर भी इस झाड़ी के झुरमुट में रस घोल।
श्रुति-पुट लेकर पूर्वस्मृतियाँ खड़ी यहाँ पट खोल,
देख, आप ही अरुण हुए हैं उनके पांडु कपोल!
जाग उठे हैं मेरे सौ सौ स्वप्न स्वयं हिल-डोल,
और सन्न हो रहे, सो रहे, ये भूगोल-खगोल।
न कर वेदना-सुख से वंचित, बढ़ा हृदय-हिंदोल,
जो तेरे सुर में, सो मेरे उर में कल-कल्लोल!
शब्दार्थ —चातकि = चातक पक्षी, खारी = नमकीन, आँसू = नेत्रों से बहने वाला जल, मोल = मूल्य, बोल = वचन/शब्द, तोल = तुलना/मूल्यांकन, झाड़ी = छोटी-छोटी झाड़ियों का समूह, झुरमुट = घना समूह, रस = आनंद/माधुर्य, श्रुति-पुट = कान, पूर्वस्मृतियाँ = पुरानी यादें, पट खोल = पर्दा हटाकर प्रकट होना, अरुण = लाल, पांडु = पीले/फीके, कपोल = गाल, स्वप्न = सपने, हिल-डोल = हलचल/आंदोलन, सन्न = शांत/निश्चल, भूगोल = पृथ्वी का संसार, खगोल = आकाश का संसार, वेदना = पीड़ा, सुख = आनंद, हृदय-हिंदोल = हृदयरूपी झूला, सुर = स्वर/ध्वनि, उर = हृदय, कल-कल्लोल = मधुर तरंग/आनंदमय ध्वनि।
सन्दर्भ —यहाँ सन्दर्भ रहेगा।
प्रसङ्ग —यहाँ प्रसङ्ग रहेगा।
हिन्दी व्याख्या —यहाँ हिन्दी व्याख्या रहेगी।
काव्य-सौंदर्य —यहाँ काव्य-सौंदर्य रहेगा।
3. यशोधरा का विरह वर्णन
भाग — 1
सखि, वे मुझसे कहकर जाते,
कह, तो क्या मुझको वे,
अपनी पथ-बाधा ही पाते?
मुझको बहुत उन्होंने माना,
मैंने मुख्य उसी को जाना
जो वे मन में लाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
स्वयं सुसज्जित करके क्षण में,
प्रियतम को, प्राणों के पण में,
हमीं भेज देती हैं रण में —
क्षात्र-धर्म के नाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
हुआ न यह भी भाग्य अभागा,
किसपर विफल गर्व अब जागा?
जिसने अपनाया था, त्यागा;
रहे स्मरण ही आते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
नयन उन्हें हैं निष्ठुर कहते,
पर इनसे जो आँसू बहते,
सदय हृदय वे कैसे सहते?
गये तरस ही खाते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
जायें, सिद्धि पावें वे सुख से,
दुखी न हों इस जन के दुख से,
उपालम्भ दूँ मैं किस मुख से?
आज अधिक वे भाते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
गये, लौट भी वे आवेंगे,
कुछ अपूर्व-अनुपम लावेंगे,
रोते प्राण उन्हें पावेंगे,
पर क्या गाते-गाते?
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
शब्दार्थ —सखि = हे सखी, पथ-बाधा = मार्ग में रुकावट, पाते = समझते/मानते, मुख्य = प्रधान/महत्त्वपूर्ण, मन में लाते = इच्छा करते/सोचते, स्वयं = खुद, सुसज्जित = अच्छी तरह तैयार, क्षण = पल, प्रियतम = प्रिय पति, प्राणों के पण = प्राणों की बाजी लगाकर/जीवन को दाँव पर लगाकर, रण = युद्ध, क्षात्र-धर्म = क्षत्रिय का कर्तव्य, नाते = संबंध/कारण से, भाग्य = किस्मत, अभागा = दुर्भाग्यपूर्ण, विफल = निष्फल, गर्व = अभिमान, अपनाया = अपना बनाया, त्यागा = छोड़ दिया, स्मरण = याद, निष्ठुर = कठोर/निर्दयी, सदय = दयालु, तरस = दया, सिद्धि = सफलता, उपालम्भ = शिकायत/उलाहना, किस मुख से = किस अधिकार से/किस प्रकार, अधिक भाते = अधिक प्रिय लगते, अपूर्व = अनोखा, अनुपम = जिसकी तुलना न हो, लावेंगे = लेकर आएँगे, पावेंगे = प्राप्त करेंगे/मिलेंगे।
सन्दर्भ —यहाँ सन्दर्भ रहेगा।
प्रसङ्ग —यहाँ प्रसङ्ग रहेगा।
हिन्दी व्याख्या —यहाँ हिन्दी व्याख्या रहेगी।
काव्य-सौंदर्य —यहाँ काव्य-सौंदर्य रहेगा।
भाग — 2
अब कठोर हो वज्रादपि, ओ कुसुमादपि सुकुमारी।
आर्यपुत्र दे चुके परीक्षा, अब है मेरी बारी।।
मेरे लिए पिता ने सबसे धीर-वीर वर चाहा।
आर्यपुत्र को देख उन्होंने सभी प्रकार सराहा।।
फिर भी हठकर हाय! वृथा ही उन्हें उन्होंने थाहा।
किस योद्धा ने बढ़कर उनका शीर्ष-सिन्धु अवगाहा।
क्योंकर सिद्ध करूँ अपने को मैं उन नर की नारी।
आर्यपुत्र दे चुके परीक्षा, अब है मेरी बारी।।
देख कराल-काल-सा जिसको काँप उठे सब भय से,
गिरे प्रतिद्वन्दी नन्दार्जुन, नागदत्त जिस हय से,
वह तुरंग पालित-कुरंग-सा नत हो गया विनय से,
क्यों न गूँजती रंगभूमि फिर उनके जय-जय-जय से,
निकला वहाँ कौन उन जैसा प्रबल पराक्रमकारी।
आर्यपुत्र दे चुके परीक्षा, अब है मेरी बारी।।
सभी सुन्दरी बालाओं में मुझे उन्होंने माना,
सबने मेरा भाग्य सराहा, सबने रूप बखाना,
खेद किसी ने उन्हें न फिर भी ठीक-ठीक पहचाना,
भेद चुने जाने का अपने मैंने भी अब जाना,
इस दिन के उपयुक्त पात्र की उन्हें खोज थी सारी।
आर्यपुत्र दे चुके परीक्षा, अब है मेरी बारी।।
मेरे रूप-रंग, यदि तुझको अपना गर्व रहा है,
तो उसके झूठे गौरव का तूने भार सहा है,
तू परिवर्तनशील उन्होंने कितनी बार कहा है—
फूला दिन किस अन्धकार में डूब और बहा है,
किन्तु अन्तरात्मा भी मेरा था क्या विकृत-विकारी।
आर्यपुत्र दे चुके परीक्षा, अब है मेरी बारी।।
सिद्धिमार्ग की बाधा नारी! फिर उसकी क्या गति है,
पर उनसे पूछूँ क्या, जिनको मुझसे आज विरति है,
अर्धविश्व में व्याप्त शुभाशुभि मेरी भी कुछ गति है,
मैं भी नहीं अनाथ जगत में, मेरे भी प्रभु-पति हैं,
यदि मैं पतिव्रता तो मुझको कौन भार-भय-भारी।
आर्यपुत्र दे चुके परीक्षा, अब है मेरी बारी।।
शब्दार्थ —वज्रादपि = वज्र से भी, कुसुमादपि सुकुमारी = फूल से भी अधिक कोमल, आर्यपुत्र = श्रेष्ठ पति/श्रीराम, परीक्षा = कठिन कसौटी, धीर-वीर = धैर्यवान और वीर, सराहा = प्रशंसा की, हठकर = हठपूर्वक, वृथा = व्यर्थ, योद्धा = वीर सैनिक, शीर्ष-सिन्धु = सिररूपी समुद्र/सर्वोच्च स्थान, अवगाहा = प्रवेश किया/पार किया, नर = पुरुष, नारी = पत्नी, कराल-काल = भयंकर मृत्यु के समान, प्रतिद्वन्दी = मुकाबला करने वाला, हय = घोड़ा, तुरंग = घोड़ा, पालित-कुरंग = पाले हुए हिरन के समान, नत = झुका हुआ, विनय = नम्रता, रंगभूमि = युद्ध/प्रतियोगिता का मैदान, पराक्रमकारी = वीरता दिखाने वाला, रूप बखाना = सौन्दर्य की प्रशंसा करना, खेद = दुःख/अफसोस, भेद = रहस्य/वास्तविक कारण, पात्र = योग्य व्यक्ति, रूप-रंग = सौन्दर्य, गर्व = अभिमान, गौरव = श्रेष्ठता का भाव, परिवर्तनशील = जो निरन्तर बदलता रहे, अन्तरात्मा = मन की गहरी चेतना, विकृत = बिगड़ा हुआ, विकारी = दोषयुक्त/दुर्गुणों से युक्त, सिद्धिमार्ग = सफलता का मार्ग, बाधा = रुकावट, विरति = विमुखता/दूर रहने की स्थिति, अर्धविश्व = आधा संसार/संसार का बड़ा भाग, शुभाशुभ = शुभ और अशुभ, अनाथ = जिसका कोई सहारा न हो, प्रभु-पति = स्वामी और पति, पतिव्रता = पति के प्रति पूर्ण निष्ठा रखने वाली स्त्री, भार-भय = बोझ और भय।
सन्दर्भ —यहाँ सन्दर्भ ।
प्रसङ्ग —यहाँ प्रसङ्ग ।
हिन्दी व्याख्या —यहाँ हिन्दी व्याख्या ।
काव्य-सौंदर्य —यहाँ काव्य-सौंदर्य ।
4. मैथिलीशरण गुप्त का जीवन परिचय
जीवन परिचय —
यहाँ मैथिलीशरण गुप्त के जीवन, व्यक्तित्व एवं कृतित्व का परिचय रहेगा।
