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अभिज्ञानशाकुन्तल का उपजीव्य एवं कथा-परिवर्तन — हिन्दी एवं संस्कृत में

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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अभिज्ञानशाकुन्तल का उपजीव्य एवं कथा-परिवर्तन — हिन्दी एवं संस्कृत में

महाभारत की मूलकथा, कालिदास द्वारा किए गए मौलिक परिवर्तन एवं मार्मिक अंशों की अवतारणा का विस्तृत अध्ययन।

अभिज्ञानशाकुन्तल का उपजीव्य (हिन्दी में)

साहित्यदर्पणकार के अनुसार 'नाटकं ख्यातवृत्तं स्यात्।' अर्थात् नाटक की कथा को इतिहास-प्रसिद्ध होना चाहिए! क्या यह बात अभिज्ञानशाकुन्तल के साथ भी लागू होती है? इस प्रश्न के सकारात्मक उत्तर में यह बात कही जाती है कि; शकुन्तला एवं दुष्यन्त की कथा प्राचीन साहित्य में दो स्थानों पर उपलब्ध होती है— महाभारत तथा पद्मपुराण। किन्तु पद्मपुराण में पायी जाने वाली कथा कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तल की कथा से बहुत मिलती-जुलती सी है। उसका अन्तिम भाग शाकुन्तल का सारांश मात्र प्रतीत होता है। अतः कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तल का उपजीव्य महाभारत की ही शकुन्तला एवं दुष्यन्त की कहानी होनी चाहिए।

महाभारतीय दुष्यन्त एवं शकुन्तला की कथा

चन्द्रवंशी राजा दुष्यन्त शिकार करता हुआ एक दिन हिमालय की अधित्यका में स्थित कण्वाश्रम में जा पहुँचा। दुष्यन्त कण्वाश्रम में प्रवेश करके वहाँ अपने आने की सूचना दी। उस समय महर्षि कण्व अपने आश्रम में नहीं थे। उसी समय अतिथि-स्वागत में नियुक्त कण्व की पालिता पुत्री शकुन्तला के अनिन्द्य सौन्दर्य को देखकर राजा उस पर मोहित हो गया। शकुन्तला के साथ बातचीत के प्रसंग में जाना कि शकुन्तला महर्षि कण्व की पुत्री नहीं है। वह मेनका में उत्पन्न विश्वामित्र के शुक्र से संभूत है। महर्षि कण्व ने तो उसका पालन-पोषण मात्र किया है। राजा दुष्यन्त ने शकुन्तला के साथ विवाह करना चाहा। पहले तो शकुन्तला इसके लिए तैयार नहीं हुई, किन्तु बाद में वह इस शर्त पर राजा के साथ विवाह करने के लिए तैयार हुई कि राजा के पश्चात् उसके ही गर्भ से उत्पन्न पुत्र राजा के राज्य का अधिकारी होगा। राजा दुष्यन्त ने क्षत्रियों के लिए विहित गान्धर्व रीति से शकुन्तला के साथ विवाह करके उसके साथ सहवास किया। इसके पश्चात् शकुन्तला से यह कह कर कि उसके सिपाही उसे सम्मान से यहाँ से ले जायेंगे, राजा अपनी राजधानी चला गया।

अपनी राजधानी जाते समय राजा को बड़ी चिन्ता थी कि तपोवन से लौटकर महर्षि कण्व जब यह जानेंगे कि मैंने शकुन्तला के साथ विवाह और सहवास किया है, न जाने कौन सा अनर्थ करेंगे?

राजा के चले जाने के पश्चात् जब महर्षि कण्व वन से लौटे तो शकुन्तला तथा दुष्यन्त के विवाह विषयक सम्पूर्ण समाचार को अपने तपोबल से जान लिया। उन्होंने दुष्यन्त एवं शकुन्तला के विवाह की सम्पुष्टि कर दी और उसके तीन वर्ष के पश्चात् शकुन्तला को एक पुत्र आश्रम में ही हुआ। उसका पुत्र सर्वदमन बड़ा पराक्रमी था। अपनी छह वर्ष की अवस्था में ही वह बड़े-बड़े सिंहादि पशुओं का दमन कर देता था। आश्रम में ही छह वर्ष बीत जाने पर महर्षि कण्व ने शकुन्तला तथा उसके पुत्र को अपने शिष्यों के साथ दुष्यन्त के पास भेज दिया। किन्तु वहाँ जाने पर दुष्यन्त ने उन्हें पहचानने से इन्कार कर दिया। शकुन्तला ने राजा को अपने परिचय की याद दिलाने का भरपूर प्रयास किया, किन्तु राजा ने उसे स्वीकार ही नहीं किया। इसके पश्चात् राजा के यहाँ से शकुन्तला चलने के लिए तैयार हुई तो आकाशवाणी हुई कि— "राजन्! शकुन्तला तुम्हारी भार्या है और यह बालक तुम्हारा पुत्र है। तुम इन्हें स्वीकार करो।" इसके पश्चात् राजा ने मन्त्री तथा पुरोहित से परामर्श करके पत्नी शकुन्तला और पुत्र को स्वीकार किया। इसके पश्चात् राजा ने अपने पुत्र का नाम भरत रखा। बीच में राजा ने यह बतलाया कि उसे शकुन्तला के साथ अपने विवाह की बात याद थी किन्तु लोकापवाद के भय से उसने सर्वजनसमक्ष शकुन्तला के साथ अपने विवाह की बात नहीं स्वीकार की थी।

बाद में राजा ने अपने पुत्र भरत को अपना युवराज बनाया तथा शकुन्तला को अपनी पट्टमहिषी। महाभारत की इसी कथा को महाकवि कालिदास ने अपने नाटक अभिज्ञानशाकुन्तल का उपजीव्य बनाया है।

महाभारत की मूलकथा में कालिदास द्वारा परिवर्तन

अब प्रश्न यह होता है कि महाकवि कालिदास ने महाभारत की मूलकथा में कौन-कौन से परिवर्तन किए हैं जिसके कारण अभिज्ञानशाकुन्तल में दुष्यन्त और शकुन्तला की प्रणय-कथा इतनी लोकप्रिय हो गयी? नीचे उन सभी बातों की चर्चा की जा रही है जिनके कारण अभिज्ञानशाकुन्तल इतना आकर्षक नाटक बन सका।

महाकवि कालिदास ने मूलकथा में दो प्रकार का परिष्कार किया— (१) मूलकथा में आवश्यक परिवर्तन, तथा (२) मार्मिक अंशों की अवतारणा। सर्वप्रथम कालिदास के द्वारा कथा में किए गए परिष्कारों की चर्चा की जा रही है—

(१) आखेट करते हुए राजा का आश्रम के समीप पहुँचना तथा दो तपस्वियों द्वारा उसको मृग का वध करने से रोका जाना।

(२) दोनों तपस्वियों द्वारा राजा को कण्वाश्रम में आतिथ्य स्वीकार करने के लिए आग्रह किया जाना। राजा ने कण्वाश्रम में पहुँचकर प्रियंवदा तथा अनसूया के साथ शकुन्तला को आश्रम के वृक्षों को सींचते हुए देखा। राजा दुष्यन्त निसर्ग-सुन्दरी शकुन्तला को देखकर उसके रूप पर मोहित हो जाते हैं। शकुन्तला भी राजा दुष्यन्त को देखकर कामासक्त हो जाती है, किन्तु वह अपने मनोभावों को अभिव्यक्त नहीं होने देती है। प्रियंवदा और अनसूया से बातें करते हुए राजा दुष्यन्त जान लेते हैं कि शकुन्तला कण्व की पालिता पुत्री है। वस्तुतः वह मेनका में विश्वामित्र से सम्भूत एक क्षत्रिय कन्या है।

(३) राजा दुष्यन्त ऋषियों के अनुरोध पर यज्ञों की रक्षा करने के लिए कण्वाश्रम में पुनः आते हैं। कामासक्त शकुन्तला ने नलिनी-पत्र के ऊपर लिखे हुए काम-पत्र को अपनी सखियों के माध्यम से दुष्यन्त तक पहुँचा दिया, और परस्परानुरागी हृदय वाले दुष्यन्त तथा शकुन्तला गान्धर्व-विधि से विवाह के बन्धन में बँध गए।

(४) कुछ दिनों पश्चात् ऋषियों के यज्ञ की रक्षा करके दुष्यन्त शकुन्तला को अपने नाम की अंगूठी पहचान के रूप में प्रदान करके अपनी राजधानी लौट आया। शकुन्तला दुष्यन्त की याद में उदास रहने लगी।

(५) महर्षि कण्व के आश्रम में शकुन्तला अपने पति दुष्यन्त की याद में उदास रहने लगी, उसी बीच महर्षि दुर्वासा उसके आश्रम में आतिथ्य ग्रहण करने हेतु आये, किन्तु विषण्ण-हृदया शकुन्तला उनके आने की आवाज़ नहीं सुन सकी। महर्षि ने शकुन्तला की इस असावधानी को अपना अपमान समझकर शकुन्तला को—

‘विचिन्तयन्ती यमनन्यमानसा,
तपोनिधिं वेत्सि न मामुपस्थितम्।
स्मरिष्यति त्वां न सबोधितोऽपि सन्,
कथां प्रमत्तः प्रथमं कृतामिव॥’

यह शाप देकर लौट जाते हैं, और प्रियंवदा के अनुनय-विनय से प्रसन्न होकर 'आभरणदर्शनेन शापोऽयं निवर्तिष्यति' यह वरदान देकर जाते हैं।

(६) प्रवास से लौटे हुए महर्षि कण्व अपने अग्निशरण में प्रवेश करके छन्दोमयी वाणी—

‘दुष्यन्तेनाहितं तेजः दधानां भूतये भुवः।
अवेहि तनयां ब्रह्मन् अग्निगर्भा शमीमिव॥’

को सुनकर शकुन्तला पर प्रसन्न ही होते हैं और गौतमी, शार्ङ्गरव तथा शारद्वत नामक शिष्यों के साथ शकुन्तला को उसके पति के घर भेज देते हैं।

(७) दुर्वासा के शाप से ग्रस्त होने के कारण राजा अपनी पूर्व-परिणीता शकुन्तला को नहीं पहचानता है। शकुन्तला अपनी पहचान दिखाने के लिए जब अपनी अंगुली देखती है तो उसकी अंगुली में अंगूठी ही नहीं मिलती है, क्योंकि शक्रावतार में शचीतीर्थ में तीर्थ-वन्दन करते समय ही वह जल में गिर चुकी थी। किंकर्तव्यविमूढ़ शकुन्तला जब अपने भाग्य को धिक्कार रही थी तो पुरोहित उसे प्रसवकाल पर्यन्त अपने भवन में रहने की बात कहकर अपने घर को जा रहे थे। उसी समय अचानक अप्सरा मेनका उसे अपनी गोद में उठाकर वहाँ से अदृश्य हो जाती है।

(८) कुछ दिन बाद किसी धीवर के पास से राजकर्मचारी दुष्यन्त के नाम की एक अंगूठी बरामद करते हैं और उसे चोर समझकर पीटते हैं। धीवर बतलाता है कि उसने उस अंगूठी को किसी मछली के पेट से पाया था और वह उसे बेचने के लिए बाज़ार ले आया था। उस अंगूठी को लेकर जब राजश्यालक राजा के पास जाता है तो उस अंगूठी को देखकर राजा को अपनी पूर्वपरिणीता पत्नी शकुन्तला की याद आ जाती है। उसे अपने शकुन्तला के साथ किए हुए व्यवहार को सोचकर बड़ा कष्ट होता है। शकुन्तला के विरहजन्य कष्ट के कारण वह उन्मत्त सा हो जाता है।

(९) राजा दुष्यन्त अपने कष्ट को बहलाने के लिए शकुन्तला का चित्र बनाता है और उसके माध्यम से अपनी सारी मर्मान्तक पीड़ाओं को अभिव्यक्त करता है। अचानक इन्द्र के सन्देश को पाकर वह इन्द्र के रथ पर बैठकर स्वर्ग में जाकर इन्द्र के लिए अजेय दुर्जय नामक दानवों का वध करता है। स्वर्ग से लौटते समय मारीचाश्रम में रुककर जब राजा कश्यप तथा अदिति की वन्दना करने के लिए जाता है तो वहाँ उसे अपनी पत्नी तथा पुत्र की प्राप्ति हो जाती है। वहीं पर महर्षि कश्यप उसे बतलाते हैं कि दुर्वासा के शाप से ग्रस्त होकर पहले वह शकुन्तला को पहचान नहीं पाया था, उसमें उसका अपना कोई दोष नहीं था। इस बात को जानकर शकुन्तला भी प्रसन्न होती है। कश्यप महर्षि के द्वारा अनुगृहीत राजा अपनी पत्नी तथा पुत्र के साथ प्रसन्नतापूर्वक इन्द्र-रथ से ही अपनी राजधानी लौट आता है।

नाटक में कालिदास द्वारा कल्पित मार्मिक अंश

इसके साथ ही महाकवि कालिदास ने जिन मार्मिक अंशों की अवतारणा करके नाटक को अत्यन्त रोचक बनाया है, वे रोचक अंश निम्नांकित हैं—

१. काण्वाश्रमस्य पावनत्व वर्णन।
२. शकुन्तलायाः दिव्यरूपस्य वर्णनम्।
३. भ्रमरस्य घटना।
४. अनसूया, प्रियंवदा, गौतमी, दुर्वासा, वैखानस, शार्ङ्गरव, शारद्वत प्रभृति पात्रों की सृष्टि।
५. तपोवनों तथा आश्रमों का वर्णन एवं तापसों की सृष्टि।
६. कण्व का पितारूप तथा उनका मर्मस्पर्शी उपदेश।
७. शकुन्तला के मुग्धा, विरहिणी तथा पतिव्रता रूपों का वर्णन।
८. प्रकृति के मनोज्ञ रूप, मृग, मयूर, कोकिल, शीतल वायु तथा वन-देवताओं के औदार्य का वर्णन।
९. शकुन्तला तथा दुष्यन्त के मनोविज्ञान का वर्णन।
१०. सानुमती की कल्पना।
११. मारीचाश्रम की कल्पना तथा वहाँ पर राजा द्वारा शकुन्तला का देखा जाना।
१२. अंगूठी के अभिज्ञानत्व की कल्पना।
१३. शृङ्गार के संयोग तथा विप्रयोग इन दोनों रूपों का मनोज्ञ सन्निवेश।

महाकवि कालिदास द्वारा कल्पित ऐसे अनेक मार्मिक अंशों के द्वारा सहृदय को इस नाटक के आगे की कथा के विषय में हमेशा जिज्ञासा बनी रहती है।

अभिज्ञानशाकुन्तलस्योपजीव्यविचारः (संस्कृत में)

साहित्यदर्पणकारस्य विश्वनाथस्यानुसारेण 'नाटकं ख्यातवृत्तं स्यात्।' अयमाशयः— नाटकस्य कथयेतिहासादिप्रसिद्धया भव्यम्। अनेनैव प्रकारेणाभिज्ञानशाकुन्तलस्यापि कथायाः उपजीव्यं किमु वर्तते? पद्मपुराणम् महाभारतं वा? यतः अनयोर्द्वयोरेव प्राचीनसाहित्ययोः दुष्यन्तशकुन्तलयोः प्रणयस्य कथोपवर्णिता वर्तते।

तत्र पद्मपुराणे दुष्यन्तशकुन्तलयोः या कथा समुपलभ्यते तस्यां कथायां तथाविधं प्राचीनत्वं नहायाति यादृशी प्राचीनता महाभारतीयायां दुष्यन्तशकुन्तलयोः प्रणयकथायामास्ते। महाभारतस्य कथा नीरसा वर्तते। पद्मपुराणस्य कथायां तु महाकवेः कालिदासस्याभिज्ञानशाकुन्तलस्यापि प्रभाव आयाति अत एव महाभारतीयेव कथा अभिज्ञानशाकुन्तलस्योपजीव्यभूतेति विद्वद्भिरनुमीयते।

महाभारतीया दुष्यन्तशकुन्तलयोः प्रणयकथा

चन्द्रवंशी राजा दुष्यन्तः मृगयाव्यापृतः सन् हिमालयस्याधित्यकायामवस्थिते महर्षेः कण्वस्याश्रमे जगाम। यदा राजा दुष्यन्तः कण्वस्याश्रमे प्रविवेश तदा महर्षिः कण्वः आश्रमे नासीत्। तदात्वे समागतानाम् अतिथीनाम् समादरकर्मणि शकुन्तला नियुक्ता आसीत्। राजा दुष्यन्तः शकुन्तलायाः अप्रतिमं सौन्दर्यमवलोक्य तस्यां मोहितो बभूव। वार्तालापस्य प्रसङ्गे दुष्यन्तः अज्ञासीत् यत् शकुन्तला मेनकायां संजाता विश्वामित्रशुक्रसंभूता कण्वस्य पालिता पुत्र्यास्ते। तदनन्तरम् राजा दुष्यन्तः शकुन्तलया सह स्वस्य विवाहस्य प्रस्तावमकरोत्। प्रथमं तु शकुन्तला नोद्यताऽसीत् किन्तु यदा राजा दुष्यन्तः प्रतिज्ञे यत् सः तस्यामुत्पन्नमेव पुत्रम् स्वराज्यस्योत्तराधिकारिणं करिष्यति तदा साऽपि तेन सह विवाहं कर्तुमुद्यता बभूव। राजा दुष्यन्तः क्षत्रियोचितेन गान्धर्वेण विधिना विवाहं तया सह कृत्वा तया सह सहवासमप्यकार्षीत्। पुनः स्वराज्ञाधानीं प्रति तम् इदमुक्त्वा जगाम यत् स्वराज्ञाधानीतः सः एकां सेनाम् ताम् नेतुम् प्रेषयिष्यति।

मार्गे गच्छन् राजा दुष्यन्तः स्वेन कृतस्य कर्मणो विषये अतीव चिन्तित आसीत्। सः विचारयामास यत् वनादागत्य महर्षिः कण्वः मया कृतं कर्म ज्ञात्वा न जाने कश्चिदनर्थं करिष्यति।

राज्ञो दुष्यन्तस्य गमनानन्तरम् महर्षिः कण्वः स्वाश्रमं प्रत्याजगाम। सः स्वतपोबलेनैवाज्ञासिषत् सर्वाणि कर्माणि दुष्यन्तशकुन्तलाभ्यां कृतानि। किन्तु तेन कर्मणा कण्वो महर्षिः रुष्टो नहि बभूव! सः तस्य कर्मणः समर्थनमेवाकार्षीत्। तदनन्तरमाश्रमे एव वर्षत्रयानन्तरम् शकुन्तलायां शैशवन्तः जन्म लेभे। तदनन्तरम् शकुन्तला षड्वर्षाणि यावदाश्रमे एव उवास। अस्यामेवाल्यावस्थायां दौष्यन्तिः अतीव पराक्रमी बभूव। सः स्वपराक्रमेणैव सिंहादिकानामपि बलवतां हिंस्राणामपि जीवानां दमनमकरोत् विनाप्रयासम्। अत एव तस्य नाम महर्षिः कण्वः सर्वदमन इत्याकार्षीत्।

षण्णां वर्षाणामनन्तरम् महर्षिः कण्वः स्वशिष्यैः साकं स्वपुत्रीं शकुन्तलाम् दुष्यन्तस्य सविधे प्रेषयामास। किन्तु तत्र गतां शकुन्तलाम् राजा दुष्यन्तः स्वभार्यात्वेन नहि स्वीचकार। सः कथयामास यत् शकुन्तलाम् परिचिनोति एव नहि सः। शकुन्तलात्मानम् परिचाययितुमनेकधा प्रयत्नते स्म, किन्तु जानन्नपि राजा तां नहि स्वीचकार। निराशा शकुन्तला यदा ततः प्रत्यागन्तुमुद्यता बभूव तदा आकाशवाण्याभिहितम्— "राजन् दुष्यन्त! इयं शकुन्तला तव भार्या वर्तते, एवं च बालकः तव पुत्रो वर्तते।" तदनन्तरम् राजा दुष्यन्तः मन्त्रिपुरोधसोः परामर्शेन शकुन्तलाम् पत्नीरूपेण सर्वदमनं च पुत्ररूपेण स्वीकृतवान्। पुनः स्वयमेव राजा दुष्यन्तः स्वीचकार यत् राजा तामभिजानाति स्म, अथापि लोकापवादभीत्या तां नहि सर्वजनसमक्षं स्वीकृतवान्। कालान्तरे राजा सर्वदमनस्य भरत इति नाम चकार। पुनः राजा भरतम् स्वस्य राज्यस्य युवराजमकरोत् शकुन्तलाञ्च पट्टमहिषीमकार्षीत्।

अस्यामेव महाभारतीयायां कथायां स्वप्रखरया प्रतिभया बहूनि परिवर्तनानि कृत्वा महाकविः कालिदासः दुष्यन्तशकुन्तलयोः मूलकथायाम् अभूतपूर्वस्य विच्छित्तिविशेषस्याधानमकार्षीत्।

महाभारतस्य मूलकथायां महाकविकालिदासेन कृतानि मनोज्ञपरिवर्तनानि

इदानीमेष अनुयोग उदेति यत् महाकविना कालिदासेन महाभारतस्य मूलकथायां कानि तथाविधानि परिवर्तनान्यकरोत् येनाभिज्ञानशाकुन्तलस्य दुष्यन्तशकुन्तलयोः प्रणयकथा तथाविधा लोकप्रियतां बभूव? अधस्तात् महाकविकालिदासकृतानां तेषां समेषां परिवर्तनानां चर्चा क्रियते, यैः अभिज्ञानशाकुन्तलं नाम नाटकं सर्वाधिकं लोकप्रियम् अभूत्। महाकविः कालिदासः मूलकथायां द्विविधानि परिवर्तनान्यकार्षीत्— (१) मूलकथायामावश्यकानि परिवर्तनानि, तथा (२) मार्मिकाणामंशानामवतारणं च। अत्र सर्वप्रथमं महाकविकालिदासेन कृतानां मूलकथायां मनोज्ञानां परिष्काराणां चर्चा क्रियते—

१. मृगयाव्यापृतस्य राज्ञः आश्रमस्य सविधे आगमनम्, वैखानसाभ्यां तस्य मृगवधात् प्रतिषेधश्च।

२. उभौ वैखानसौ राजानमाहतुः कण्वाश्रमे गत्वा आतिथ्यं स्वीकर्तुम्। यत्र महर्षेः कण्वस्यानुपस्थितौ अपि दिव्यसुन्दरी शकुन्तला समागतानामतिथीनां सत्कारकर्मणि नियुक्ता वर्तते। कण्वाश्रमे समागतो राजा अनसूयाप्रियंवदाभ्यां साकम् आश्रमस्य बालपादपसेचनकर्मणि व्यापृतां शकुन्तलां विलोक्य तस्या अनिन्द्यं सौन्दर्यं च दर्शं दर्शं वक्ति—

‘शुद्धान्तदुर्लभमिदं वपुराश्रमवासिनो यदि जनस्य।
दूरीकृताः खलु गुणैरुद्यानलता वनलताभिः॥’

एतादृशं शकुन्तलाया अनिन्द्यं रूपं विलोक्य राजा तस्यां मोहितो भवति। पुनः अनसूयाप्रियंवदाभ्यां साकं वार्तयन् सः जानाति यत् शकुन्तला तु कण्वस्य पालिता पुत्री वर्तते, वस्तुत इयं मेनकायां संजाता राजर्षेः विश्वामित्रस्य शुक्रेण संभूता अस्ति। शकुन्तलाऽपि राजानमवलोक्य तस्मिन् मोहिता भवति, किन्तु तस्याः मनोभावाः तदानीं नहि अभिव्यज्यन्ते स्पष्टतया।

३. महर्षेः कण्वस्यानुपस्थितौ महर्षिभिः याचितोऽपि राजा दुष्यन्तः यदा मुनीनां यज्ञरक्षार्थे आश्रमे आयाति तदा दुष्यन्त-शकुन्तले परस्परमन्योन्यासक्ते भवतः। सख्योः माध्यमेन शकुन्तला स्वहस्तैः नलिनीपत्रे लिखितं कामपत्रं राज्ञः सविधे प्रेषितवती। पुनः गान्धर्वेण विधिना दुष्यन्तशकुन्तले दाम्पत्यभावमश्नुवाते।

४. ऋषीणां यज्ञसमाप्तौ राजा दुष्यन्तः शकुन्तलायै स्वनामाङ्कितमङ्गुरीयकम् अभिज्ञानरूपेण दत्त्वा स्वराजधानीमगमत्। दुष्यन्तेन विप्रयुक्ता शकुन्तला शून्यहृदया संजाता।

५. दुष्यन्तविरहव्याकुला शकुन्तला विषण्णवदना सती यदा स्वाश्रमे निवसति स्म, तदात्वे एवातिथ्यं स्वीकर्तुं कण्वाश्रममगमत् महर्षिः दुर्वासा। किन्तु विषण्णा शकुन्तला तस्या इमामनवधानतां महर्षिः स्वापमानं मत्वा—

‘विचिन्तयन्ती यमनन्यमानसा तपोनिधिं वेत्सि न मामुपस्थितम्।
स्मरिष्यति त्वां न सबोधितोऽपि सन् कथां प्रमत्तः प्रथमं कृतामिव॥’

इति शप्त्वा प्रत्यावर्तितो बभूव। किन्तु प्रियंवदायाः प्रार्थनया— 'आभरणदर्शनेन शापोऽयं निवर्तितो भविष्यति' इति वरदानेनानुगृह्य जगाम।

६. प्रवासात् प्रत्यागतो महर्षिः कण्वः स्वाग्निशरणे प्रविश्य—

‘दुष्यन्तेनाहितं तेजो दधानां भूतये भुवः।
अवेहि तनयां ब्रह्मन् अग्निगर्भा शमीमिव॥’

इति छन्दोमयीं वाणीं दुष्यन्तशकुन्तलयोः प्रेम ज्ञात्वा प्रसन्नः सन् गौतमी-शार्ङ्गरव-शारद्वतैः साकं शकुन्तलां स्वपतिगृहं प्रेषयामास।

७. दुर्वाससः शापेन ग्रस्तो राजा दुष्यन्तः पूर्वपरिणीतामपि शकुन्तलां नहि परिचिनोति अतएव तस्याः प्रत्याख्यानं करोति। स्वपरिचयप्रदानाय बहुधा प्रयतमाना सा यदा तदभिज्ञानरूपं नामाङ्कितमङ्गुरीयकं दर्शयितुमैच्छत् तदा तस्याः हस्तं तेनाङ्गुरीयकेण रिक्तमासीत्। यतो मध्येमार्गमेव शक्रावतारे शचीतीर्थवन्दनावसरे तदङ्गुरीयकं जलेऽन्वपतत्। अतएव दुष्यन्तेन प्रत्याख्याता किंकर्तव्यविमूढा शकुन्तला स्वभाग्यं धिक्कुर्वन्ती राजभवनात् निर्गता बभूव, तदैव मेनका सहसा तामङ्के निधाय सहसाऽदृश्या बभूव।

८. तदनन्तरमतीते कस्मिंश्चित्काले राजकर्मचारिणः कस्यचन धीवरस्य सविधे राज्ञो नामाङ्कितमङ्गुरीयकं प्रापुः। तं चौरं मत्वा ताडयामासुः। पुनः तदङ्गुरीयकमादाय राजश्यालकः राजानं दर्शयामास। तदङ्गुलीयकं दृष्ट्वा राजा सस्मरन् स्वपरिणीतां पत्नीं शकुन्तलाम्। शकुन्तलां प्रतिकृतं निजमत्यत्याचारं संस्मृत्य राजाऽतीव दुःखितो बभूव। स्मारं स्मारं निजपरिणीतां पत्नीं राजा दुष्यन्त उन्मत्त इव बभूव।

९. शकुन्तलाविरहजन्यं कष्टं न्यूनं कर्तुं राजा दुष्यन्तः शकुन्तलायाः चित्रं निर्माति। तद् दृश्यमतीव करुणं वर्तते। तदात्वे एव राजा दुष्यन्तः इन्द्रस्य सन्देशमवाप्य स्वर्गलोकं गत्वा इन्द्रायाजेयं दुर्जयनामकं दैत्यगणं जित्वा, इन्द्ररथेनैव प्रत्यागच्छन् मध्येमार्गं मारीचाश्रमे कश्यपादित्ययोः अभिवादनं कर्तुमागतः। तत्र सपुत्रां शकुन्तलां प्रत्यभिजानाति। तत्रैव महर्षिः कश्यपः तं वक्ति यत् दुर्वाससः शापेनैव ग्रस्तः सः तदात्वे शकुन्तलां विस्मृत्य तस्या अनादरमकार्षीत्, तस्मिन् कर्मणि तस्य दोषो नासीत्। तच्छ्रुत्वा शकुन्तलाऽपि राजानं निर्दोषं ज्ञात्वा प्रसन्नतामनुबभूव। पुनः महर्षेः आशीर्वचोभिरनुगृहीतो राजा दुष्यन्तः पत्नीपुत्राभ्यां साकं स्वराजधानीमगमत्।

महाकविकालिदासकल्पिताः मार्मिकप्रसङ्गाः

मूलकथायां परिवर्तनेनैव साकं येषामतीव रोचकानां प्रसङ्गानामवतारणमकरोत् महाकविः कालिदासः अभिज्ञानशाकुन्तले नाम्नि नाटके, ते प्रसङ्गाः निम्नांकिताः सन्ति—

(१) कण्वाश्रमस्य पावनत्ववर्णनम्।
(२) शकुन्तलायाः दिव्यरूपस्य वर्णनम्।
(३) भ्रमरस्य घटनायाः उल्लेखः।
(४) अनसूया-प्रियंवदा-गौतमी-दुर्वासस्-शार्ङ्गरव-शारद्वत-प्रभृतीनां पात्राणां कल्पनम्।
(५) तपोवनानाम् आश्रमाणां वर्णनं तापसपात्राणां कल्पनञ्च।
(६) कण्वस्य पितृरूपस्य कल्पनं तस्य मर्मस्पर्शिन उपदेशाश्च।
(७) शकुन्तलायाः मुग्धा-विरहिणी-पतिव्रतारूपाणां वर्णनम्।
(८) प्रकृतेर्मनोज्ञस्य रूपस्य, मृग-मयूर-कोकिल-शीतलवायु-वनदेवताप्रभृतीनां चौदार्यवर्णनम्।
(९) शकुन्तलायाः दुष्यन्तस्य च मनोविज्ञानस्य वर्णनम्।
(१०) सानुमत्याः कल्पना।
(११) मारीचाश्रमस्य कल्पना राज्ञा तत्र शकुन्तलायाः दर्शनञ्च।
(१२) अङ्गुरीयकस्याभिज्ञानत्वस्य कल्पनम्।
(१३) नाटके शृङ्गारस्य संयोगविप्रयोगयोरुभयोरेव रूपयोः मनोज्ञः सन्निवेशः।

महाकविना कालिदासेन कल्पितैः बहुभिः मार्मिकैरंशैः सहृदयानां नाटकस्याग्रिमायाः कथायाः विषये औत्सुक्यं वर्द्धते। अग्रिमकथायाः विषये सहृदयानां सततमौत्सुक्यवर्धनमेव नाटकस्य ख्यातिं वर्द्धयति। इति शम्।

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