काव्य प्रयोजन की परिभाषा, उद्देश्य तथा भरत, भामह, दण्डी, आनन्दवर्धन, मम्मट और विश्वनाथ आदि आचार्यों के मतों का विस्तृत विवेचन।
काव्य प्रयोजन का तात्पर्य है — काव्य की रचना के पीछे निहित उद्देश्य या प्रयोजन। आचार्यों ने इसे काव्य का आत्मकारण कहा है। काव्य केवल मनोरंजन नहीं, अपितु जीवन के विविध पक्षों के परिष्कार का साधन भी है।
काव्य का प्रयोजन क्या है — यह प्रश्न काव्यशास्त्र के मूलभूत प्रश्नों में से एक है। भामह, दण्डी, मम्मट, विश्वनाथ आदि आचार्यों ने विभिन्न दृष्टियों से काव्य के प्रयोजन का विवेचन किया है। सबसे मूलभूत प्रश्न है—काव्य किसके लिए? बहुत से आलोचक इस प्रश्न को सार्थक नहीं मानते। उनका मत है कि काव्य का प्रयोजन कवि की कलात्मक हृदय-संतुष्टि मात्र है। यह सही बात है कि कवि की अन्तर्वृत्ति में कला रहती है और वह कला का संपादन करके संतुष्टि प्राप्त करता है, किन्तु प्रयोजन इतना ही नहीं है। कविता केवल अन्तर्वृत्ति की वस्तु न होकर बाह्य मूल्यों को भी संरक्षित करती है। कविता का बाह्य मूल्य भी है। काव्य के प्रयोजन को संस्कृत काव्यशास्त्रियों ने अपने ग्रंथों में विशद रूप से विवेचित किया है।
“आचार्य भरत” नाट्यशास्त्र के अन्तर्गत उसके प्रयोजन की चर्चा करते हुए लिखते हैं—
धर्मयशस्यमायुष्यं हितबुद्धिविवर्धनम्।
लोकोपदेशजननं नाट्यमेतद् भविष्यति॥
आचार्य भरत के अनुसार—धर्म, यश की स्थापना, आयु, हित और बुद्धि की वृद्धि तथा लोकोपदेश ही काव्य का प्रयोजन है। इस प्रकार काव्य-नाट्य का प्रयोजन धर्म, यश की स्थापना, आयु, हित-बुद्धि की वृद्धि तथा लोकोपदेश की दृष्टि व्यवस्थित करना है। आचार्य भरत ने नाट्यशास्त्र के अन्तर्गत कई स्थानों पर प्रयोजनों की चर्चा की है और उनके माध्यम से यही निष्कर्ष निकाला है कि लोकहित एवं प्रीति अर्थात् रचनात्मक तृप्ति ही नाट्य का उद्देश्य है। यहाँ 'लोकोपदेश' का अर्थ केवल शुष्क उपदेश नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला मार्गदर्शन है।
“आचार्य भामह” के काव्य प्रयोजन के विषय में सर्वप्रथम स्पष्ट रूप से निर्देश प्राप्त होता है। उन्होंने प्रायः प्रयोजन के सन्दर्भ में सभी परवर्ती स्वीकृत दृष्टियों की ओर संकेत किया है। उनके अनुसार यशवृद्धि रचना का महत्त्वपूर्ण फल है। यश के साथ-साथ उन्होंने अन्य प्रयोजनों की भी चर्चा की है—
धर्मार्थ काममोक्षेषु वैचक्षण्यं कलासु च।
करोति प्रीति कीर्तिं च साधु काव्यनिबन्धनम्॥
इस प्रकार काव्य रचना के प्रयोजन धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, अन्य कलाओं में सिद्धि-प्राप्ति, प्रीति एवं कीर्ति हैं। इन काव्य प्रयोजनों के अन्तर्गत सम्पूर्ण तथ्य समाविष्ट हैं। आचार्य भामह ने यह भी बतलाया है कि लोक-व्यवहार, धर्म एवं नीति के मर्म को समझाने के लिए काव्य एक सरस माध्यम है। यहाँ 'कलासु च' कहकर भामह ने ललित कलाओं में निपुणता को भी काव्य का फल माना है।
“आचार्य दण्डी” ने भी कलाजनित आनन्द का पूर्णतया प्रसार तथा भोग के साथ-साथ अनेक लोकोपयोगी तत्त्वों का निदर्शन काव्य का प्रयोजन माना है। काव्यादर्श की समाप्ति के पश्चात उन्होंने काव्य-रचना के प्रयोजनों की ओर ध्यान आकर्षित किया है—
व्युत्पन्नबुद्धिरमुना विधिदर्शनेन, मार्गणदोषगुणावंशवर्तिनीभिः।
वाग्भिः कृताभिरमणे मदिरेक्षणाभिः, धन्यो युवेव रमते लभते च कीर्तिम्॥
दोषमुक्त एवं गुणयुक्त काव्यवाणी तथा निर्दिष्ट काव्य-मार्गों द्वारा व्युत्पन्नमति वाला रचनाकार मदमत्त नेत्रों वाली रमणियों से अभिसार करता हुआ भाग्यशाली युवक के सदृश अगाध आनन्द का अनुभव करता हुआ कीर्ति की प्राप्ति करता है। दण्डी का मानना है कि यदि संसार में शब्द रूपी ज्योति न होती, तो यह तीनों लोक अंधकारमय होते, अतः शब्द-साधना (काव्य) का प्रयोजन लोक-व्यवहार का प्रकाशक होना है। इसी भाँति आचार्य वामन ने भी काव्य रचना के मुख्य प्रयोजन के रूप में प्रीति (आनन्द) और कीर्ति की चर्चा की है।
“आचार्य आनन्दवर्धन” ने ध्वन्यालोक के अन्तर्गत काव्य रचना का मूल लक्ष्य आनन्द ही माना है। उनके अनुसार काव्य रचना का आनन्द नामक प्रयोजन रचनाकारों को बार-बार आकर्षित करके सहृदयों को तृप्त करता है। यह सत्य है कि काव्य के माध्यम से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार तत्त्वों की प्राप्ति होती है, फिर भी उनसे भिन्न आनन्द नामक तत्त्व सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं काम्य है। आनन्दवर्धन 'प्रीति' को ही काव्य का सर्वप्रमुख प्रयोजन स्वीकार करते हैं।
“आचार्य कुन्तक” ने भी काव्य प्रयोजन विषय की विस्तृत चर्चा की है। उन्होंने बताया कि शास्त्रादि के प्रति भीरु राजकुमारों को रमाने के लिए काव्य का वही उपयोग है, जो ज्वरादि व्याधियों को दूर करने के निमित्त औषधि में मधु के प्रयोग का है—
कटुकौषधवच्छास्त्रमविद्याव्याधिनाशनम्।
आह्लादामृतवत् काव्यमविवेकगदापहम्॥
उनके अनुसार काव्य का यह व्यावहारिक पक्ष है। कुन्तक का मत है कि काव्य के माध्यम से चतुर्वर्ग फल की प्राप्ति अत्यंत सहज और सुखद मार्ग से हो जाती है।
“आचार्य मम्मट” द्वारा दी गयी काव्य प्रयोजन की टिप्पणी सर्वाधिक व्यावहारिक और पूर्ण मानी जाती है। मम्मट कहते हैं—
काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये।
सद्यः परिनिवृत्तये कान्तासम्मितयोपदेशयुजे॥
उनके अनुसार काव्य के छः प्रयोजन हैं— यशवृद्धि, धनार्जन, लोकव्यवहार का ज्ञान, शिवेतर तत्त्वों से रक्षा (अमंगल निवारण), सद्यः परिनिवृत्ति (तत्काल परम आनन्द) तथा कान्तासम्मित उपदेश। मम्मट द्वारा निर्दिष्ट यशवृद्धि तथा धनार्जन—ये दो प्रयोजन रचनाकार के लिए हैं। रचनाकार काव्य-रचना के माध्यम से अक्षय यश की प्राप्ति करता है, साथ ही राजाश्रय प्राप्त करके धनार्जन करता हुआ समृद्ध लोकजीवन यापन करता है। मध्यकाल में राजाश्रय से कवि एवं कवि के द्वारा राज की कीर्ति का परस्पर विस्तार होता था।
सद्यः परिनिवृत्ति का अर्थ है—काव्य-रचना के सम्पर्क में आते ही उसके प्रभाव से सहृदय का भावनिमग्न होकर आनन्दित हो उठना। यह काव्य का 'सकलप्रयोजनमौलिभूत' (सिरमौर) प्रयोजन है।
कान्तासम्मितया उपदेश रचना का महत्त्वपूर्ण धर्म है। काव्य शास्त्र (प्रभुसम्मित) और इतिहास (सुहृत्सम्मित) की तरह आदेश या सलाह नहीं देता, बल्कि कान्ता (प्रियतमा) के समान मधुरता से पाठक के हृदय को प्रभावित कर उसे राम की तरह आचरण करने को प्रेरित करता है।
“राजशेखर” ने काव्यमीमांसा के अन्तर्गत बताया है कि राजा के लिए कवि और कवि के लिए राजा के सदृश कोई उपकारी नहीं होता और दोनों एक-दूसरे की कीर्ति के विस्तार में सहायता करते हैं—
ख्याता नराधिपः कविसंश्रयेण, राजाश्रयेण च गता कवयः प्रसिद्धिम्।
राज्ञा समोऽस्ति न कवेः परोपकारी, राज्ञा न चास्ति कविनासदृशः सहायः॥
इस प्रकार राजाश्रय न केवल धनार्जन के निमित्त, अपितु कवि के यश में भी सहायक होता है। काव्य के तीन उद्देश्य लोकहित से सम्बद्ध हैं और चतुर्थ प्रयोजन का उद्देश्य कला-जनित रचना-तत्त्व का पाठक द्वारा आस्वादन है। शेष तीन काव्य प्रयोजन लोकव्यवहार से जुड़े हैं। काव्य की रचना शिवेतर तत्त्वों से रक्षा के लिए की जाती है। यह वैयक्तिक एवं सामाजिक दोनों स्तरों पर सम्भव है। इसमें (क) लोक-व्यवहार का ज्ञान तथा (ख) कान्तासम्मित उपदेश इसके महत्त्वपूर्ण सन्दर्भ हैं। काव्य के अन्तर्गत सम्पूर्ण लोकजीवन तथा सामाजिक आचरण की पुनर्रचना की जाती है।
“कविराज विश्वनाथ” ने अपनी कृति ‘साहित्यदर्पण’ में बताया है—
चतुर्वर्गफलप्राप्तिः सुखादल्पधियामपि।
काव्यादेव यतस्तेन तत्स्वरूपं निरूप्यते॥
उनके अनुसार काव्य का मुख्य प्रयोजन धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष अर्थात् चतुर्वर्ग की प्राप्ति है। इन वाक्यों के माध्यम से मूलतः परम्परित काव्य प्रयोजनों की ही चर्चा की गई है। आचार्य मम्मट ने परम्परा में कथित काव्य प्रयोजनों पर पूर्णतः विचार करके उनको सूत्ररूप में रखते हुए अन्तिम परिणति प्रदान कर दी है। उनके पश्चात जो भी विचार इस सम्बन्ध में प्रस्तुत किये गये हैं, वे मुख्यतः उन्हीं प्रयोजनों का विस्तार हैं।
आचार्य दण्डी अलंकार और गुण की चर्चा करते हुए अलंकार की उपर्युक्त परिभाषा देते हैं, जिसका अर्थ है काव्य की शोभा बढ़ाने वाले धर्म ही अलंकार हैं, और काव्य का प्रयोजन इसी शोभा के माध्यम से सहृदय को चमत्कृत करना है।
अन्य आचार्यों के मतों का सारांश: आचार्य भामह के अनुसार— “शिक्षार्थ मनोरथार्थं वा काव्यमिति द्विधा मतम्।” अर्थात् काव्य का प्रयोजन या तो शिक्षा देना है या मनोरंजन करना। आचार्य दण्डी ने ‘काव्यादर्श’ में कहा है कि काव्य मनोविनोद का साधन है, परंतु इसके साथ यह लोकहित भी करता है। आचार्य मम्मट के मतानुसार काव्य पाठक के मनोविकारों को शुद्ध करता है और उसे उत्तम भावों की ओर प्रेरित करता है। आचार्य विश्वनाथ ने ‘साहित्यदर्पण’ में काव्य के आनन्ददायक स्वरूप पर बल दिया है। काव्य का प्रयोजन सहृदय को आनन्द प्रदान करना है। परवर्ती आचार्यों ने इसे व्यापक रूप में ग्रहण किया और कहा कि काव्य का प्रयोजन लोकशिक्षा, सदाचार-प्रवर्तन, रसानुभूति तथा आत्मानन्द प्रदान करना है।
✻ प्रमुख विद्वान एवं उनके काव्य प्रयोजन ✻
(A) संस्कृत आचार्य (Sanskrit Scholars)
धर्मयशस्यमायुष्यं हितं बुद्धिविवर्धनम्।
लोकोपदेशजननं नाट्यमेतद् भविष्यति॥ धर्म, यश, आयु, हित-साधन, बुद्धि-विवर्धन और लोकोपदेश।
धर्मार्थकाममोक्षेषु वैचक्षण्यं कलासु च।
करोति कीर्तिं प्रीतिं च साधुकाव्यनिबन्धनम्॥ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष (चतुर्वर्ग), कलाओं में निपुणता, कीर्ति और प्रीति।
चतुर्वर्गफलायत्तं चतुरोदात्तनायकम्।
तदल्पमपि नोपेक्ष्यं काव्यं कीर्तिं जिगीषुणा॥ कीर्ति लाभ, लोक-व्यवहार का प्रकाश और चतुर्वर्ग फल की प्राप्ति।
काव्यं सदृष्टाहृष्टप्रयोजनं प्रीतिकीर्तिहेतुत्वात्। प्रीति/आनन्द (दृष्ट प्रयोजन) और कीर्ति (अदृष्ट प्रयोजन)।
पुरुषार्थचतुष्टयप्राप्तिः, अनर्थनिवारणं, कीर्तिश्च। चतुर्वर्ग फल प्राप्ति, विपत्ति निवारण और कीर्ति।
सहृदयहृदयाह्लादकारी काव्यतत्त्वं व्यवस्थितम्। प्रीति (परम आनन्द) और रसास्वाद।
धर्मार्थादिसुखोपायः सुकुमारक्रमोदितः।
मूर्च्छन्त्यन्तः चमत्कारं तद्विदाह्लादनिर्मितिः॥ राजकुमारों के लिए चतुर्वर्ग सुख का उपाय और सहृदयों का आह्लाद।
काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये।
सद्यः परिनिवृत्तये कान्तासम्मितयोपदेशयुजे॥ यश, अर्थ, व्यवहार-ज्ञान, शिवेतर-क्षति (अमंगल नाश), सद्यः परिनिवृत्ति (आनन्द), कान्तासम्मित उपदेश।
चतुर्वर्गफलप्राप्तिः सुखादल्पधियामपि।
काव्यादेव यतस्तेन तत्स्वरूपं निरूप्यते॥ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की अत्यंत सुलभता से प्राप्ति।
त्रिवर्गसाधनं नाट्यमेतदस्य भविष्यति। धर्म, अर्थ और काम (त्रिवर्ग) की प्राप्ति।
(B) हिन्दी एवं आधुनिक विद्वान (Hindi & Modern)
कीरति भनिति भूति भलि सोई।
सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥ काव्य वही श्रेष्ठ है जो गंगा के समान सबका कल्याण (लोक-हित) करे।
स्वांतः सुखाय तुलसी रघुनाथगाथा... आंतरिक सुख और भक्ति का आनंद।
डेल सो बनाय आय मेलत सभा के बीच, लोगन कवित्त कीबो खेल करि जानो है।
समुझै सुकवि राजैं ऐसी मति जो न गाजैं, और कहा काहूँ के हिये को दुःख ठानो है।
खेती को न काज, न बनज को व्योपार यहाँ, नाहिन सो काम जो पै रारि को बखानो है।
एक लहै तप पुंजन को फल ज्यों तुलसी अरु सूर गोसाईं, ठाकुर तो मन को उमंग करि मानों है॥ काव्य तपस्या के पुंज के समान फलदायक है जो यश और मन की उमंग प्रदान करता है।
जदपि सुजात सुलक्षनी सुबरन सरस सुवृत्त।
भूषन बिनु न विराजई कविता वनिता मित्त॥ काव्य का प्रयोजन अलंकारिक सौन्दर्य और यश की प्राप्ति है।
आगे के सुकवि रीझिहैं तो कविताई,
नतु राधिका कन्हाई सुमिरन को बहानो है। प्रयोजन यश (विद्वानों की प्रशंसा) और ईश्वर भक्ति है।
केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए,
उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए। मनोरंजन के साथ नैतिक उपदेश प्रदान करना।
✻ महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs) ✻
उत्तर : काव्य प्रयोजन का अर्थ है काव्य रचना का मुख्य उद्देश्य। यानी कवि ने कविता क्यों लिखी और पाठक उसे क्यों पढ़े, इसके पीछे का कारण ही प्रयोजन है। आचार्यों ने इसे काव्य का 'आत्मकारण' माना है।
उत्तर : भरतमुनि के अनुसार नाट्य का प्रयोजन धर्म, यश, आयु की वृद्धि, लोकहित और सबसे महत्वपूर्ण 'लोकोपदेश' प्रदान करना है।
उत्तर : मम्मट ने कुल ६ प्रयोजन माने हैं: १. यश, २. अर्थ, ३. व्यवहार-ज्ञान, ४. शिवेतर-क्षति (अमंगल नाश), ५. सद्यः परिनिवृत्ति (तत्काल परम आनन्द), और ६. कान्तासम्मित उपदेश।
उत्तर : 'सद्यः परिनिवृत्ति' (ब्रह्मानन्द सहोदर आनन्द) को मम्मट ने सभी प्रयोजनों में श्रेष्ठ या सिरमौर माना है।
उत्तर : जिस प्रकार प्रियतमा (कान्ता) सरस और मधुर ढंग से अपनी बात मनवा लेती है, उसी प्रकार काव्य भी नीरस उपदेश न देकर सरसता के साथ पाठक को सन्मार्ग पर प्रेरित करता है।
उत्तर : शिव का अर्थ है कल्याण और 'इतर' का अर्थ है भिन्न, यानी अमंगल का नाश। जैसे मयूर कवि ने 'सूर्यशतक' की रचना कर अपना कुष्ठ रोग दूर किया था।
उत्तर : ठाकुर के अनुसार सच्ची कविता का फल 'तप के पुंज' (पुण्य समूह) के समान होता है, जैसा तुलसी और सूर को प्राप्त हुआ।
उत्तर : तुलसीदास ने 'लोक-मंगल' को काव्य का सर्वोच्च फल माना है— "कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई।"
उत्तर : भामह, रुद्रट, कुन्तक और विश्वनाथ ने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष (चतुर्वर्ग) को काव्य का प्रमुख प्रयोजन स्वीकार किया है।
उत्तर : गुप्त जी ने मनोरंजन के साथ 'उचित उपदेश' के मर्म को काव्य का अनिवार्य प्रयोजन माना है।
