हमारे वैज्ञानिक युग की समस्या- महादेवी वर्मा।

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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हमारे वैज्ञानिक युग की समस्या : विस्तृत समीक्षा, सारांश एवं प्रश्नोत्तर

प्रस्तुत लेख में आधुनिक युग की सशक्त विचारिका महादेवी वर्मा द्वारा रचित निबन्ध 'हमारे वैज्ञानिक युग की समस्या' का गहन विश्लेषण है। इसमें भौतिक दूरी घटने के बावजूद बढ़ती हुई मानसिक दूरी और सांस्कृतिक संकट का गम्भीर विवेचन किया गया है।

निबन्ध : हमारे वैज्ञानिक युग की समस्या
निबन्धकार : महादेवी वर्मा
युग : छायावादोत्तर / आधुनिक युग
विधा : विचारात्मक एवं गवेषणात्मक निबन्ध
मूल विषय : भौतिक प्रगति बनाम मानवीय संवेदना
भाषा-शैली : तत्समप्रधान, गंभीर, लाक्षणिक और तर्कपूर्ण

१. निबन्धकार का परिचय

महादेवी वर्मा (1907–1987 ई.) आधुनिक हिन्दी साहित्य की सर्वोपरि कवयित्री और प्रखर गद्यकार हैं। उन्हें 'आधुनिक मीरा' कहा जाता है, किन्तु उनका गद्य उनके काव्य से सर्वथा भिन्न वैचारिक ऊँचाई और सामाजिक गम्भीरता लिए हुए है। महादेवी जी का व्यक्तित्व एक संवेदनशील कलाकार और एक अनुशासनप्रिय मनीषी का अद्भुत संगम है। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से समाज के उपेक्षित वर्गों, नारियों और यहाँ तक कि मानवेतर प्राणियों को भी साहित्य के केंद्र में प्रतिष्ठित किया। उनके निबन्ध संग्रह 'श्रृंखला की कड़ियाँ', 'साहित्यकार की आस्था तथा अन्य निबन्ध' और 'क्षणदा' गम्भीर चिन्तन के प्रमाण हैं। उन्होंने प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्राचार्य के रूप में शिक्षा जगत में भी क्रांतिकारी योगदान दिया। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित महादेवी जी की भाषा संस्कृतनिष्ठ, परिमार्जित और दार्शनिक गहराई से युक्त है। वे केवल भावनाओं की कवयित्री नहीं, बल्कि आधुनिक समस्याओं का समाधान खोजने वाली एक सशक्त दार्शनिक भी थीं।

२. मूल पाठ

निकट की दूरी हमारे वैज्ञानिक युग की अनेक विशेषताओं में सामान्य विशेषता बन गई है। जड़ वस्तुओं में समीपता स्थिति मात्र है, विकास के किसी सचेतन क्रम में प्रतिफलित होने वाला आदान-प्रदान नहीं। एक शिला दूसरी पर गिर कर उसे तोड़ सकती है, एक वृक्ष दूसरे के समीप रहकर उसे छाया दे सकता है, पर यह सब स्थितियाँ उनका पारस्परिक आदान-प्रदान नहीं कहीं जायँगी, क्योंकि वह तो चेतना का ही गुण है।

मनुष्य की निकटता की परिणीति उस साहचर्य में होती है, जो बुद्धि को बुद्धि से मिला कर, अनुभव को अनुभव में लय कर के समष्टिगत बुद्धि को अभेद और समष्टिगत अनुभव को समृद्धि करता है। आधुनिक युग अपने साधनों से दूरातिदूर को निकट लाकर स्थिति मात्र उत्पन्न करने में समर्थ है, जो अभेद बुद्धि और अनुभवों की संगति के बिना अपूर्ण होने के साथ-साथ जीवन क्रम में बाधक भी हो सकती है।

उदाहरणार्थ पथ के सहयात्री भी एक दूसरे के समीप होते हैं, और युद्ध भूमि पर परस्पर विरोधी सैनिक भी, परंतु दोनों प्रकार के सामीप्य परिणामतः कितने भिन्न हैं। पहली स्थिति में एक, दूसरे की रक्षा के लिए प्राण तक दे सकता है; और दूसरी समीपता में एक, दूसरे के बचाव के सारे साधन नष्ट करना चाहता है। हमारे मस्तक पर आकाश में उड़ता हुआ बादल और उमड़ता हुआ बमवर्षक विमान दोनों ही हमारे समीप कहे जाएंगे, परन्तु स्थिति एक होने पर भी परिणाम विरुद्ध ही रहेंगे। जिनके साथ मन शंकारहित नहीं हो सकता उनकी निकटता संघर्ष की जननी है। इसी से आज के युग में मनुष्य पास है, परंतु मनुष्य का शंकाकुल मन पास आने वालों से दूर होता जा रहा है। स्वस्थ आदान-प्रदान के लिए मन की निकटता पहली आवश्यकता है।

हमारे विशाल और विविधता भरे देश की प्रतिभा ने अपनी विकास यात्रा के प्रथम प्रहर में ही जीवन की तत्वगत एकता का ऐसा सूत्र खोज लिया था जिसकी सीमा प्राणिमात्र तक फैल गई। हमारे विकास-पथ पर व्यष्टिगत बुद्धि, समष्टिगत बुद्धि के इतने समीप रही है और व्यक्तिगत हृदय समष्टिगत हृदय का ऐसा अभिन्न संगी रहा है कि अपरिचय का प्रश्न ही नहीं उठता। इसी से संपूर्ण भौगोलिक विभिन्नता और उसमें बँटा जीवन एक ही सांस्कृतिक उच्छ्वास में स्पंदित और अभिन्न रह सका है।

कहीं किसी सुंदर भविष्य में, अपरिचय इस एक्य के सूक्ष्म बन्धन को छिन्न न कर डाले, संभवतः इसी आशंका से अतीत के चिंतकों ने देश के कोने-कोने में बिखरे जीवन को निकट लाने के साधनों की खोज की। ऐसे तीर्थ, जिनकी सीमा का स्पर्श जीवन की चरम सफलता का पर्याय है, ऐसे पुण्यपर्व, जिनकी छाया में वर्ण, देश, भाषा आदि की भित्तियाँ मिट जाती हैं, ऐसी यात्राएँ, जो देश के किसी खंड को अपरिचित नहीं रहने देतीं, आदि सब अपरिचय को दूर रखने के उपाय ही कहे जाएँगे।

अच्छे बुने हुए वस्त्र से जैसे ताना-बाना व्यक्त नहीं होता, वैसे ही हमारी सांस्कृतिक एकता में प्रयास प्रत्यक्ष नहीं है। पर है वह निश्चय ही युगों की अविराम और अथक साधना का परिणाम। राजनीतिक उत्थान-पतन, शासनगत सीमाएँ और विस्तार हमारे मन को बाँधने में असमर्थ ही रहे, अतः किसी भी कोने से आने वाले चिंतन, दर्शन, आस्था या स्वप्न की क्षीणतम चाप भी हमारे हृदय में अपनी स्पष्ट प्रतिध्वनि जगाने में समर्थ हो सकी।

जीवन के सत्य तक पहुँचाने वाले हमारे सिद्धांतों में ऐसा एक भी नहीं है, जिसमें असंख्य तत्वान्वेषियों के चिंतन की रेखाएँ न हों, उसे शिवता देने वाले आदर्शों में ऐसा एक भी नहीं है, जिसमें अनेक साधकों की आस्था की सजीवता न हो, और उसे सुन्दर बनाने वाले सपनों में एक भी ऐसा नहीं है, जिसमें युगों-युगों के स्वप्न-द्रष्टाओं की दृष्टि का आलोक न हो।

पर नया जल तो समुद्र को भी चाहिए, नदी-नालों की तो चर्चा ही व्यर्थ है। यदि अपनी क्रमागत एकता को सजीव और व्यापक रखने में हमारा युग कोई महत्वपूर्ण योगदान नहीं देता, तो वह अपने महान् उत्तराधिकार के उपयुक्त नहीं कहा जायगा।

युगों के उपरान्त हमारा देश एक राजनीतिक इकाई बन सका है, परन्तु आज यदि हम इसे सांस्कृतिक इकाई का पर्याय मान लें, तो यह हमारी भ्रान्ति ही होगी। कारण स्पष्ट है। राजनीतिक इकाई जीवन की बाह्य व्यवस्था से संबंध रखती है, अतः वह बल से भी बनाई जा सकती है। परंतु सांस्कृतिक इकाई आत्मा की उस मुक्तावस्था में बनती है, जिसमें मनुष्य भेद से अभेद की ओर, अनेकता से एकता की ओर चलता है। इस मुक्तावस्था को सहज करने के लिए बुद्धि से बुद्धि और हृदय से हृदय का तादात्म्य अनिवार्य हो जाता है।

इस संबंध में विचार करते समय अपने युग की विशेष स्थिति की ओर भी हमारा ध्यान जाना स्वाभाविक है। हर क्रांति, हर संघर्ष और हर उथल-पुथल अपने साथ कुछ वरदान और कुछ अभिशाप लाते हैं। वर्षा की बाढ़ अपने साथ जो कूड़ा-करकट बहा लाती है, वह उसके वेग में न ठहर पाता है, और न असुन्दर जान पड़ता है, पर बाढ़ के उतर जाने पर जो कूड़ा-कर्कट छिछले जल या तट से चिपक कर स्थिर हो जाता है, वह असुन्दर भी लगता है और जल की स्वच्छता नष्ट भी करता रहता है। दीर्घ और अनवरत प्रयत्न के उपरांत ही लहरें उसे धारा के बहाव में डालकर जल को स्वच्छ कर पाती हैं।

बहुत कुछ ऐसी ही स्थिति हमारे युग की है। संघर्ष के दिनों में राजनीतिक स्वतंत्रता हमारी दृष्टि का केंद्र-बिंदु थी, और समस्याएँ भी जीवन के उसी अंश से संबद्ध रहकर महत्व पाती थीं। परन्तु स्वतंत्रता की प्राप्ति के उपरान्त संघर्ष-जनित वेग के अभाव में हमारी गति में ऐसी शिथिलता आ गयी, जिसके कारण हमारे सांस्कृतिक स्तर का निम्न और जड़ हो जाना स्वाभाविक था। इसके साथ ही जीवन के विविध पक्षों की समस्याएँ अपने-अपने समाधान माँगने लगीं। स्वतंत्रता, अप्राप्ति के दिनों में साध्य और उपभोग के समय साधन मात्र रह जाती है, इसी से वह अपने आप में निरपेक्ष और पूर्ण नहीं कही जाएगी। जो राष्ट्र राजनीतिक स्वतंत्रता को जीवन के सर्वांगीण विकास का लक्ष्य दे सकता है, उसके जीवन में गतिरोध का प्रश्न नहीं उठता, और साधन को साध्य मान लेना, गति के अंत का दूसरा नाम है।

सभ्यता और संस्कृति पर अपना दावा सिद्ध करने के लिए किसी भी समाज के पास उसका लौकिक व्यवहार ही प्रमाण रहता है। अन्य कसौटियाँ महत्वपूर्ण हो सकती हैं, परन्तु प्रथम नहीं।

दर्शन, साहित्य आदि से सम्बद्ध उपलब्धियाँ तो व्यक्ति के माध्यम से आती हैं। कभी वे समष्टि की अव्यक्त या व्यक्त प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं और कभी उनका विरोध। एक अत्यन्त युद्धप्रिय जाति में ऐसा विचारक या साहित्यकार भी उत्पन्न हो सकता है, जो शांति को जीवन का चरम लक्ष्य घोषित करे और ऐसा भी जो उस प्रवृत्ति की महत्ता और उपयोगिता सिद्ध करे।

पर सभ्यता और संस्कृति किसी भी एक में सीमित न होकर सामाजिक विशेषता है, जिसका मूल्यांकन समाजबद्ध व्यक्तियों के पारस्परिक व्यवहार में ही संभव है। वह कृति न होकर जीवन की ऐसी शैली है, जिसकी मिट्टी से साहित्य, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान की कृतियाँ संभव होती हैं।

विगत कुछ वर्षों से हमारे जीवन से संस्कार के बंधन टूटते जा रहे हैं और यदि यही क्रम रहा, तो आसन्न भविष्य में हमारे लिए संस्कृति पर अपना दावा सिद्ध करना कठिन हो जाएगा। हरे पत्ते और सजीव फूल वृन्त से एक रसमयता में बँधे रहते हैं, पर बिखरने वाली पंखुड़ियों और झड़ने वाले पत्ते न वृन्त के रस से सिंचित रहते हैं, न वृन्त की जीवनी-शक्ति से संतुलित।

हमारे समाज के संबंध में भी यही सत्य होता जा रहा है। न वह जीवन के व्यापक नियम से प्राणवंत है और न अपने देशगत संस्कार से रसमय। उसकी यह विच्छिन्नता उसके बिखरने की पूर्व सूचना है या नहीं, यह तो भविष्य ही बता सकेगा, पर इतना तो निर्विवाद सिद्ध है कि यह जीवन के स्वास्थ्य का चिन्ह नहीं।

हमारे विषम आचरण, प्रांत और संस्कृतियाँ आधी प्रमाणित करते हैं कि हमारा मनोजगत ही जबरदस्त है।

यह सत्य है कि हमारी परिस्थितियाँ कठिन हैं, यह भी कि हमारी मानसिक स्थिति हमें न किसी परिस्थिति के निदान का अवकाश देती है और न संघर्ष के अनुरूप साधन खोजने का! हम थकते हैं परन्तु हमारी थकावट के मूल में किसी सुनिश्चित लक्ष्य के प्रति आस्था नहीं है। हमारी क्रियाशीलता रोगी की छटपटाहट और क्षण-क्षण करवटें बदलने की क्रिया है, जो उसकी चिंतनीय स्थिति की अभिव्यक्ति मात्र है। हर मानव-समाज के जीवन में ऐसे संक्रांति-काल आते रहते हैं, जब उसकी मान्यताओं का कायाकल्प होता है, मूल्यांकन के मान नये होते हैं और जन की गति में पुरानी गहराई के साथ नई व्यापकता का संगम होता है।

परन्तु, जैसे नवीन वेगवती तरंग की पुरानी मन्थर लहर में मिलकर अधिक विशाल हो जाना स्वाभाविक और अनायास होता है, वैसे ही संस्कार और अधिक संस्कार, मूल्य और अधिक मूल्य का संगम सहज होता है। सुंदर और सुंदरतर, शिव और शिवतर, आंशिक सत्य और अधिक आंशिक सत्य में कोई तात्विक विरोध नहीं हो सकता। सुंदरतम, शिवतम और पूर्ण सत्य तक पहुँचने के लिए हमें सुंदर, शिव और आंशिक सत्य को कुरूप, अशिव और असत्य बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती और जिस युग में मानव यह सिद्धांत भुला देता है उस युग के सामने सत्य, शिव, सुंदर तक पहुँचने का मार्ग रुद्ध हो जाता है। आलोक तक पहुंचने के लिए जो अपने सब दीपक बुझा देता है, उसे अँधेरे में भटकना ही पड़ेगा। किसी समाज को ऐसे लक्ष्यरहित कार्य से रोकने के लिए अनेक अन्तर-बाह्य संस्कारों की परीक्षा करनी पड़ती है, निर्माण में उसकी आस्था जगानी पड़ती है, संघर्ष को सृजन-योग बनाना पड़ता है।

आधुनिक युग में मानसिक संस्कार के लिए दर्शन, आधुनिक साहित्य, शिक्षा आदि के जितने साधन उपलब्ध हैं, वे न द्रुतगामी हैं न सुलभ। पर, साधनों की खोज में हमारी दृष्टि यंत्र युग की विशाल कठोरता की छाया में भी जीवित रह सकने वाली मानव संवेदना की ओर न जा सके तो आश्चर्य की बात होगी। हमारे चारों ओर कभी प्रदेश, कभी भाषा, कभी जाति, कभी धर्म के नाम पर उठती हुई प्राचीरें प्रमाणित करती हैं कि बौद्धिक दृष्टि से हमारा लक्ष्य अभी कोहरा-छन्न है। पर जिस दिन हमारी बुद्धि में अभेद और सामंजस्य होगा, उस दिन हमारी सांस्कृतिक परंपरा को नई दिशा प्राप्त हो सकेगी। जीवन के नव निर्माण में साहित्य और कला विशेष योगदान देने में समर्थ है, क्योंकि वे मानव भावना के उद्गीथ हैं।

जब भावयोगी मनुष्य, मनुष्य के निकट पहुँचने के लिए दुर्गम पर्वतों और दुस्तर समुद्रों को पार करने में वर्षों का समय बिताता था, उस युग में भी मानव मात्र की एकता के वे ही वैतालिक रहे हैं। आज जब विज्ञान ने वर्षों को घंटों में बदल दिया है, तब भी मनुष्य को मनुष्य से अपरिचित क्यों रहने दें, बुद्धि को बुद्धि का आतंक क्यों बनने दें, और हृदय को हृदय के विरोध में क्यों खड़ा होने दें?

हम विश्वभर से परिचय की यात्रा में निकलने से पहले यदि अपने देश के हर कोने से परिचित हो लें, तो इसे शुभ शकुन ही मानना चाहिए। यदि घर में अपरिचय के समुद्र से विरोध और आशंका के काले बादल उठते रहे, तो हमारे उजले संकल्प पथ भूल जाएंगे। अतः आज दूरी को निकटता बनाने की मुहूर्त में हमें निकट की दूरी से सावधान रहने की आवश्यकता है।

३. निबन्ध का प्रतिपाद्य एवं सारांश

महादेवी वर्मा रचित निबन्ध 'हमारे वैज्ञानिक युग की समस्या' का मूल प्रतिपाद्य आधुनिक वैज्ञानिक प्रगति और मानवीय संवेदनाओं के बीच बढ़ते अंतराल को उजागर करना है। लेखिका के अनुसार, विज्ञान ने 'दूरी' को तो घटा दिया है, किन्तु 'निकटता' को संघर्ष की जननी बना दिया है। सारांशतः, निबन्ध यह स्पष्ट करता है कि जड़ वस्तुओं की समीपता केवल 'स्थिति' मात्र है, जबकि मनुष्यों की समीपता 'साहचर्य' होनी चाहिए। लेखिका ने अतीत के भारत की सांस्कृतिक एकता की प्रशंसा की है, जो भौगोलिक विभिन्नताओं के बावजूद एक थी। वे चेतावनी देती हैं कि राजनीतिक स्वतंत्रता केवल एक 'साधन' है, उसे 'साध्य' मान लेना पतन का कारण बन सकता है। वर्तमान युग में भाषा, जाति और धर्म के नाम पर खड़ी दीवारें हमारी मानसिक संकीर्णता की प्रतीक हैं। अंततः, लेखिका आह्वान करती हैं कि हमें यंत्र युग की कठोरता के बीच 'मानव संवेदना' को बचाए रखना होगा, ताकि भौतिक निकटता 'निकट की दूरी' न बनकर वास्तविक आत्मीयता बन सके।

४. निबन्ध तत्वों के आधार पर 'हमारे वैज्ञानिक युग की समस्या' की समीक्षा

(क) विषय-वस्तु और दार्शनिक गम्भीरता: इस निबन्ध की विषय-वस्तु अत्यंत गम्भीर और शोधपरक है। महादेवी जी ने केवल यंत्रों के दुष्परिणामों पर चर्चा नहीं की, बल्कि विकास के सचेतन क्रम और चेतना के गुणों का विश्लेषण किया है। 'निकट की दूरी' का रूपक आधुनिक समाज की विडंबना को व्यक्त करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली है। लेखिका ने यह सिद्ध किया है कि जब तक मन शंकारहित नहीं होता, तब तक भौतिक समीपता केवल हिंसा और विनाश (बमवर्षक विमान) की वाहक बनती है। विषय का विस्तार व्यष्टिगत बुद्धि से समष्टिगत हृदय तक फैला हुआ है।

(ख) व्यक्तित्व की व्यंजना और सांस्कृतिक दृष्टि: निबन्ध में महादेवी वर्मा का एक संवेदनशील दार्शनिक और भारत की सांस्कृतिक धरोहर के प्रति निष्ठावान व्यक्तित्व उभरता है। वे 'अतीत के चिंतकों' की दूरदर्शिता का सम्मान करती हैं जिन्होंने तीर्थों और उत्सवों के माध्यम से अपरिचय को दूर किया। उनका व्यक्तित्व यहाँ एक 'सर्जक' का है जो समाज को 'संक्रांति-काल' के खतरों से आगाह कर रहा है। वे साधन (स्वतंत्रता) को साध्य मान लेने की मानवीय भूल पर कड़ा प्रहार करती हैं, जो उनके परिपक्व राजनैतिक और सामाजिक दृष्टिकोण का परिचायक है।

(ग) भाषा और शैली का गहन निरीक्षण: लेखिका की भाषा परिमार्जित, संस्कृतनिष्ठ तत्सम प्रधान है, किन्तु उसमें अद्भुत प्रवाह है। शैली 'विचारात्मक' होने के साथ-साथ 'लाक्षणिक' भी है। उन्होंने 'बाढ़ के बाद छिछले जल में अटके कूड़े' का उदाहरण देकर स्वतंत्रता के बाद उपजी सामाजिक शिथिलता का जो चित्रण किया है, वह उनकी उपमान योजना की मौलिकता को दर्शाता है। "आलोक तक पहुँचने के लिए जो अपने सब दीपक बुझा देता है, उसे अंधेरे में भटकना ही पड़ेगा" जैसे सूत्रवाक्य उनकी सूत्रात्मक शैली को प्रौढ़ता प्रदान करते हैं। उनकी गद्य शैली में भी काव्य जैसा नाद और लय विद्यमान है।

(घ) संरचनात्मक सौष्ठव और तार्किकता: निबन्ध की संरचना अत्यंत व्यवस्थित और तर्कसंगत है। लेखिका पहले भौतिक दूरी और मानसिक निकटता के सिद्धांत को स्थापित करती हैं, फिर भारतीय ऐतिहासिक संदर्भों में उसकी पुष्टि करती हैं और अंत में वर्तमान संक्रांति-काल की समस्याओं का निदान प्रस्तुत करती हैं। वे साहित्य और कला को 'मानव भावना के उद्गीथ' मानकर उन्हें समाज के नवनिर्माण का प्रमुख साधन मानती हैं। उनकी तार्किकता भावुकता पर हावी नहीं होती, बल्कि उसे आधार प्रदान करती है।

(ङ) उद्देश्य और वैश्विक प्रासंगिकता: निबन्ध का मुख्य उद्देश्य विज्ञान की अंधी दौड़ में मनुष्य को उसकी 'आत्मा' की याद दिलाना है। लेखिका का यह संदेश आज के इंटरनेट और डिजिटल युग में और भी अधिक प्रासंगिक है, जहाँ हम स्क्रीन के माध्यम से दुनिया के करीब तो हैं, किन्तु एक-दूसरे से सबसे अधिक दूर और शंकित हैं। यह निबन्ध 'वैश्विक गाँव' (Global Village) की अवधारणा को 'मानवीय संवेदना' के साथ जोड़ने का मार्ग दिखाता है। महादेवी जी की यह समीक्षा मानवीय एकता और सामंजस्य की एक शाश्वत पुकार है।

५. कठिन शब्दावली

सचेतन = चेतनायुक्त, प्रतिफलित = परिणाम के रूप में प्राप्त, परिणीति = अंतिम फल/नतीजा, साहचर्य = साथ रहना, समष्टिगत = सामूहिक, अभेद = भेद न होना/एकता, दूरातिदूर = बहुत दूर, शंकाकुल = संदेह से भरा, व्यष्टिगत = व्यक्तिगत, उच्छ्वास = लंबी सांस, भित्तियाँ = दीवारें, क्षीणतम = अत्यंत कमजोर, तत्वान्वेषियों = सत्य की खोज करने वाले, शिवता = कल्याणकारी गुण, क्रमागत = परंपरा से चला आ रहा, तादात्म्य = एकात्मता/एक हो जाना, अनवरत = निरंतर, साध्य = लक्ष्य, सर्वांगीण = सभी अंगों वाला, गतिरोध = रुकावट, लौकिक = सांसारिक, विच्छिन्नता = अलगाव, संक्रांति-काल = बदलाव का कठिन समय, कायाकल्प = पूरी तरह बदलाव, रुद्ध = रुका हुआ, द्रुतगामी = तेज चलने वाला, प्राचीरें = ऊँची दीवारें, कोहरा-छन्न = कुहासे से ढका हुआ, उद्गीथ = मधुर गान, वैतालिक = स्तुति करने वाले/जगाने वाले, मुहूर्त = शुभ समय, निशंक = बिना डर के, अपरिहार्य = जिसे टाला न जा सके, गवेषणा = सूक्ष्म खोज, निरपेक्ष = तटस्थ, विच्छिन्न = कटा हुआ,

६. परीक्षा-उपयोगी महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

प्र. 1. लेखिका ने 'निकट की दूरी' किसे कहा है?

उत्तर : विज्ञान ने साधनों के माध्यम से भौतिक दूरियों को तो कम कर दिया है और लोग शारीरिक रूप से करीब आ गए हैं, किन्तु उनके मन एक-दूसरे के प्रति शंकालु और दूर हैं। इसी विरोधाभास को लेखिका ने 'निकट की दूरी' कहा है।

प्र. 2. जड़ वस्तुओं और मनुष्यों की समीपता में क्या अंतर है?

उत्तर : जड़ वस्तुओं की समीपता केवल 'स्थिति' मात्र है, उनमें कोई सचेतन आदान-प्रदान नहीं होता। इसके विपरीत, मनुष्यों की समीपता 'साहचर्य' में परिणत होनी चाहिए, जिसमें बुद्धि और अनुभवों का तादात्म्य हो।

प्र. 3. प्राचीन भारत के चिंतकों ने अपरिचय को दूर करने के लिए क्या उपाय किए थे?

उत्तर : उन्होंने देश के कोने-कोने में तीर्थों की स्थापना, पुण्यपर्वों का आयोजन और सांस्कृतिक यात्राओं जैसे साधन खोजे थे, ताकि विभिन्न भाषाओं और वर्णों के लोग निकट आकर एकता के सूत्र में बंध सकें।

प्र. 4. राजनीतिक इकाई और सांस्कृतिक इकाई में क्या अंतर बताया गया है?

उत्तर : राजनीतिक इकाई बाह्य व्यवस्था है जो 'बल' से भी बनाई जा सकती है, किन्तु सांस्कृतिक इकाई आत्मा की मुक्तावस्था है जो केवल बुद्धि और हृदय के तादात्म्य से बनती है।

प्र. 5. लेखिका ने बाढ़ के उतर जाने पर बचे 'कूड़े-करकट' का उदाहरण क्यों दिया है?

उत्तर : यह उदाहरण स्वतंत्रता के बाद समाज में आई जड़ता और सांस्कृतिक शिथिलता के लिए दिया गया है। जैसे बाढ़ के बाद कूड़ा किनारों पर चिपक जाता है, वैसे ही संघर्ष के अभाव में समाज में बुराइयाँ स्थिर हो गई हैं।

प्र. 6. "साधन को साध्य मान लेना गति के अंत का नाम है"—इस पंक्ति का आशय क्या है?

उत्तर : स्वतंत्रता केवल जीवन के सर्वांगीण विकास का एक 'साधन' है। यदि हम इसे ही अंतिम 'लक्ष्य' (साध्य) मान लें, तो राष्ट्र की प्रगति और सांस्कृतिक विकास रुक जाएगा।

प्र. 7. लेखिका के अनुसार सभ्यता और संस्कृति का मूल्यांकन किसमें संभव है?

उत्तर : सभ्यता और संस्कृति का मूल्यांकन किसी अकेली कृति में नहीं, बल्कि समाजबद्ध व्यक्तियों के पारस्परिक 'लौकिक व्यवहार' और जीवन जीने की शैली में संभव है।

प्र. 8. संक्रांति-काल से लेखिका का क्या तात्पर्य है?

उत्तर : संक्रांति-काल वह समय है जब पुरानी मान्यताओं का कायाकल्प होता है और समाज में नए मूल्यों का संगम होता है। यह परिवर्तन और नवनिर्माण का काल होता है।

प्र. 9. "साहित्य और कला मानव भावना के उद्गीथ हैं"—लेखक ने ऐसा क्यों कहा?

उत्तर : क्योंकि साहित्य और कला ही वे साधन हैं जो मनुष्य के भीतर की संवेदना को जाग्रत करते हैं और दुर्गम परिस्थितियों में भी मानव-मात्र की एकता का संदेश देते रहे हैं।

प्र. 10. निबन्ध के अंत में लेखिका ने क्या चेतावनी दी है?

उत्तर : लेखिका ने चेतावनी दी है कि यदि हम 'घर' (देश) के भीतर अपरिचय और आशंका के बादलों से घिरे रहे, तो विश्व-परिचय के संकल्प पथ भूल जाएंगे। अतः हमें इस 'निकट की दूरी' से सावधान रहना चाहिए।

साहित्य विश्लेषण श्रृंखला · 'हमारे वैज्ञानिक युग की समस्या' · सर्वाधिकार सुरक्षित

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