गेहूँ बनाम गुलाब-रामवृक्ष बेनीपुरी

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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गेहूँ बनाम गुलाब : विस्तृत समीक्षा, सारांश एवं प्रश्नोत्तर

प्रस्तुत लेख में 'कलम के जादूगर' रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा रचित प्रसिद्ध ललित एवं विचारात्मक निबन्ध 'गेहूँ बनाम गुलाब' का सम्पूर्ण अध्ययन है। यह निबन्ध भौतिकता और आध्यात्मिकता, तथा पेट की भूख और मन की भूख के शाश्वत द्वन्द्व का विश्लेषण करता है।

निबन्ध : गेहूँ बनाम गुलाब
निबन्धकार : रामवृक्ष बेनीपुरी
युग : शुक्ल्योत्तर युग (छायावादोत्तर काल)
विधा : ललित एवं प्रतीकात्मक निबन्ध
मूल विषय : भौतिक प्रगति बनाम सांस्कृतिक उत्थान
भाषा-शैली : ओजपूर्ण, चित्रात्मक, अलंकारिक एवं मर्मस्पर्शी

१. निबन्धकार का परिचय

रामवृक्ष बेनीपुरी (1899–1968 ई.) हिन्दी साहित्य के अत्यंत तेजस्वी और बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे। उन्हें 'कलम का जादूगर' कहा जाता है क्योंकि उनकी लेखन शैली में शब्दों का ऐसा प्रवाह और चित्रात्मकता होती है जो पाठक को मंत्रमुग्ध कर देती है। बेनीपुरी जी स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार और बेजोड़ निबन्धकार थे। उन्होंने 'माटी की मूरतें', 'लाल तारा' और 'गेहूँ बनाम गुलाब' जैसी श्रेष्ठ कृतियाँ दीं। उनकी लेखनी में क्रान्तिकारी जोश के साथ-साथ कोमल मानवीय संवेदनाओं का अद्भुत समन्वय मिलता है। वे समाजवादी विचारधारा से प्रभावित थे, किन्तु उनके साहित्य में भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता का पुट सदैव बना रहा। उनकी भाषा छोटे-छोटे वाक्यों वाली, अलंकारिक और अत्यंत प्रभावशाली है। उन्होंने हिन्दी गद्य को एक नई ऊँचाई और लालित्य प्रदान किया, जिससे वे अपने समकालीन लेखकों में विशिष्ट स्थान रखते हैं।

२. मूल पाठ

गेहूँ हम खाते हैं, गुलाब सूँघते हैं। एक से शरीर की पुष्टि होती है, दूसरे से मानस तृप्‍त होता है। गेहूँ बड़ा या गुलाब? हम क्‍या चाहते हैं - पुष्‍ट शरीर या तृप्‍त मानस? या पुष्‍ट शरीर पर तृप्‍त मानस? जब मानव पृथ्‍वी पर आया, भूख लेकर। क्षुधा, क्षुधा, पिपासा, पिपासा। क्‍या खाए, क्‍या पिए? माँ के स्‍तनों को निचोड़ा, वृक्षों को झकझोरा, कीट-पतंग, पशु-पक्षी - कुछ न छुट पाए उससे ! गेहूँ - उसकी भूख का काफला आज गेहूँ पर टूट पड़ा है? गेहूँ उपजाओ, गेहूँ उपजाओ, गेहूँ उपजाओ ! मैदान जोते जा रहे हैं, बाग उजाड़े जा रहे हैं - गेहूँ के लिए। बेचारा गुलाब - भरी जवानी में सि‍सकियाँ ले रहा है। शरीर की आवश्‍यकता ने मानसिक वृत्तियों को कहीं कोने में डाल रक्‍खा है, दबा रक्‍खा है। किंतु, चाहे कच्‍चा चरे या पकाकर खाए - गेहूँ तक पशु और मानव में क्‍या अंतर? मानव को मानव बनाया गुलाब ने! मानव मानव तब बना जब उसने शरीर की आवश्‍यकताओं पर मानसिक वृत्तियों को तरजीह दी।

यही नहीं, जब उसकी भूख खाँव-खाँव कर रही थी तब भी उसकी आँखें गुलाब पर टँगी थीं। उसका प्रथम संगीत निकला, जब उसकी कामिनियाँ गेहूँ को ऊखल और चक्‍की में पीस-कूट रही थीं। पशुओं को मारकर, खाकर ही वह तृप्‍त नहीं हुआ, उनकी खाल का बनाया ढोल और उनकी सींग की बनाई तुरही। मछली मारने के लिए जब वह अपनी नाव में पतवार का पंख लगाकर जल पर उड़ा जा रहा था, तब उसके छप-छप में उसने ताल पाया, तराने छोड़े ! बाँस से उसने लाठी ही नहीं बनाई, वंशी भी बनाई। रात का काला-घुप्‍प परदा दूर हुआ, तब यह उच्छवसित हुआ सिर्फ इसलिए नहीं कि अब पेट-पूजा की समिधा जुटाने में उसे सहूलियत मिलेगी, बल्कि वह आनंद-विभोर हुआ, उषा की लालिमा से, उगते सूरज की शनै: शनै: प्रस्‍फुटित होनेवाली सुनहली किरणों से, पृथ्‍वी पर चम-चम करते लक्ष-लक्ष ओसकणों से! आसमान में जब बादल उमड़े तब उनमें अपनी कृषि का आरोप करके ही वह प्रसन्‍न नहीं हुआ। उनके सौन्‍दर्य-बोध ने उसके मन-मोर को नाच उठने के लिए लाचार किया, इन्‍द्रधनुष ने उसके हृदय को भी इन्‍द्रधनुषी रंगों में रँग दिया!

मानव-शरीर में पेट का स्‍थान नीचे है, हृदय का ऊपर और मस्तिष्‍क का सबसे ऊपर। पशुओं की तरह उसका पेट और मानस समानांतर रेखा में नहीं है। जिस दिन वह सीधे तनकर खड़ा हुआ, मानस ने उसके पेट पर विजय की घोषणा की। गेहूँ की आवश्‍यकता उसे है, किंतु उसकी चेष्‍टा रही है गेहूँ पर विजय प्राप्‍त करने की। उपवास, व्रत, तपस्‍या आदि उसी चेष्‍टा के भिन्‍न-भिन्‍न रूप रहे हैं। जब तक मानव के जीवन में गेहूँ और गुलाब का सम-तुलन रहा वह सुखी रहा, आनंदमय रहा ! वह कमाता हुआ गाता था और गाता हुआ कमाता था। उसके श्रम के साथ संगीत बँधा हुआ था और संगीत के साथ श्रम। उसका साँवला दिन में गायें चराता था, रात में रास रचाता था। पृथ्‍वी पर चलता हुआ वह आकाश को नहीं भूला था और जब आकाश पर उसकी नजरें गड़ी थीं, उसे याद था कि उसके पैर मिट्टी पर हैं।

किंतु धीरे-धीरे यह सम-तुलन टूटा। अब गेहूँ प्रतीक बन गया हड्डी तोड़नेवाले, उबानेवाले, थकानेवाले, नारकीय यंत्रणाएँ देनेवाले श्रम का - वह श्रम, जो पेट की क्षुधा भी अच्‍छी तरह शांत न कर सके। और गुलाब बन गया प्रतीक विलासिता का - भ्रष्‍टाचार का, गंदगी और गलीज का। वह विलासिता - जो शरीर को नष्‍ट करती है और मानस को भी ! अब उसके साँवले ने हाथ में शंख और चक्र लिए। नतीजा - महाभारत और यदुवंशियों का सर्वनाश ! वह परंपरा चली आ रही है। आज चारों ओर महाभारत है, गृहयुद्ध है, सर्वनाश है, महानाश है! गेहूँ सिर धुन रहा है खेतों में, गुलाब रो रहा है बगीचों में - दोनों अपने-अपने पालन-कर्ताओं के भाग्‍य पर, दुर्भाग्‍य पर !

चलो, पीछे मुड़ो। गेहूँ और गुलाब में हम एक बार फिर सम-तुलन स्‍थापित करें। किंतु मानव क्‍या पीछे मुड़ा है? मुड़ सकता है? यह महायात्री चलता रहा है, चलता रहेगा ! और क्या नवीन सम-तुलन चिरस्‍थायी हो सकेगा? क्‍या इतिहास फिर दुहराकर नहीं रहेगा? नहीं, मानव को पीछे मोड़ने की चेष्‍टा न करो। अब गुलाब और गेहूँ में फिर सम-तुलन लाने की चेष्‍टा में सिर खपाने की आवश्‍यकता नहीं। अब गुलाब गेहूँ पर विजय प्राप्‍त करे ! गेहूँ पर गुलाब की विजय - चिर विजय! अब नए मानव की यह नई आकांक्षा हो! क्‍या यह संभव है? बिलकुल सोलह आने संभव है !

विज्ञान ने बता दिया है - यह गेहूँ क्‍या है। और उसने यह भी जता दिया है कि मानव में यह चिर-बुभुक्षा क्‍यों है। गेहूँ का गेहुँत्‍व क्‍या है, हम जान गए हैं। यह गेहुँत्‍व उसमें आता कहां से है, हमसे यह भी छिपा नहीं है। पृथ्‍वी और आकाश के कुछ तत्‍व एक विशेष प्रतिक्रिया के पौदों की बालियों में संगृहीत होकर गेहूँ बन जाते हैं। उन्‍हीं तत्‍वों की कमी हमारे शरीर में भूख नाम पाती है ! क्‍यों पृथ्‍वी की कुड़ाई, जुताई, गुड़ाई! हम पृथ्‍वी और आकाश के नीचे इन तत्‍वों को क्‍यों न ग्रहण करें? यह तो अनहोनी बात - युटोपिया, युटोपिया! हाँ, यह अनहोनी बात, युटोपिया तब तक बनी रहेगी, जब तक मानव संहार-काण्‍ड के लिए ही आकाश-पाताल एक करता रहेगा। ज्‍यों ही उसने जीवन की समस्‍याओं पर ध्‍यान दिया, यह बात हस्‍तामलकवत् सिद्ध होकर रहेगी !

और, विज्ञान को इस ओर आना है; नहीं तो मानव का क्‍या, सर्व ब्रह्माण्‍ड का संहार निश्चित है ! विज्ञान धीरे-धीरे इस ओर भी कदम बढ़ा रहा है ! कम से कम इतना तो अवश्‍य ही कर देगा कि गेहूँ इतना पैदा हो कि जीवन की परमावश्‍यक वस्‍तुएँ हवा, पानी की तरह इफरात हो जायँ। बीज, खाद, सिंचाई, जुताई के ऐसे तरीके और किस्‍म आदि तो निकलते ही जा रहे हैं जो गेहूँ की समस्‍या को हल कर दें ! प्रचुरता - शारीरिक आवश्‍यकताओं की पूर्ति करने वाले साधनों की प्रचुरता - की ओर आज का मानव प्रभावित हो रहा है !

प्रचुरता? - एक प्रश्‍न चिह्न! क्‍या प्रचुरता मानव को सुख और शांति‍ दे सकती है? 'हमारा सोने का हिंदोस्‍तान' - यह गीत गाइए, किंतु यह न भूलिए कि यहाँ एक सोने की नगरी थी, जिसमें राक्षसता निवास करती थी! जिसे दूसरे की बहू-बेटियों को उड़ा ले जाने में तनिक भी झिझक नहीं थी। राक्षसता - जो रक्‍त पीती थी, जो अभक्ष्‍य खाती थी, जिसके अकाय शरीर था, दस शिर थे, जो छह महीने सोती थी ! गेहूँ बड़ा प्रबल है - वह बहुत दिनों तक हमें शरीर का गुलाम बनाकर रखना चाहेगा! पेट की क्षुधा शांत कीजिए, तो वह वासनाओं की क्षुधा जाग्रत कर बहुत दिनों तक आपको तबाह करना चाहेगा।

तो, प्रचुरता में भी राक्षसता न आवे, इसके लिए क्‍या उपाय? अपनी मनोवृत्तियों को वश में करने के लिए आज का मनोविज्ञान दो उपाय बताता है - इंद्रियों के संयमन की ओर वृत्तियों को उर्ध्‍वगामी करने की। संयमन का उपदेश हमारे ऋषि-मुनि देते आए हैं। किंतु, इसके बुरे नतीजे भी हमारे सामने हैं - बड़े-बड़े तपस्वियों की लंबी-लंबी तपस्‍याएँ एक रम्‍भा, एक मेनका, एक उर्वशी की मुस्‍कान पर स्‍खलित हो गईं! आज भी देखिए। गांधीजी के तीस वर्ष के उपदेशों और आदेशों पर चलनेवाले हम तपस्‍वी किस तरह दिन-दिन नीचे गिरते जा रहे हैं। इसलिए उपाय एकमात्र है - वृत्तियों को उर्ध्‍वगामी करना !

कामनाओं को स्‍थूल वासनाओं के क्षेत्र से ऊपर उठाकर सूक्ष्‍म भावनाओं की ओर प्रवृत्त कीजिए। शरीर पर मानस की पूर्ण प्रभुता स्‍थापित हो - गेहूँ पर गुलाब की ! गेहूँ के बाद गुलाब - बीच में कोई दूसरा टिकाव नहीं, ठहराव नहीं ! गेहूँ की दुनिया खत्‍म होने जा रही है। वह दुनिया जो आर्थिक और राजनीतिक रूप में हम सब पर छाई है। जो आर्थिक रूप से रक्‍त पीती रही, राजनीतिक रूप में रक्‍त बहाती रही ! अब दुनिया आने वाली है जिसे हम गुलाब की दुनिया कहेंगे। गुलाब की दुनिया -मानस का संसार - सांस्‍कृतिक जगत्।

अहा, कैसा वह शुभ दिन होगा हम स्‍थूल शारीरिक आवश्‍यकताओं की जंजीर तोड़कर सूक्ष्‍म मानव-जगत् का नया लोक बनाएँगे? जब गेहूँ से हमारा पिण्‍ड छूट जायगा और हम गुलाब की दुनिया में स्‍वच्‍छंद विहार करेंगे ! गुलाब की दुनिया - रंगों की दुनिया, सुगंधों की दुनिया! भौंरे नाच रहे, गूँज रहे; फुल सूँघनी फुदक रही, चहक रही! नृत्‍य, गीत - आनंद, उछाह! कहीं गंदगी नहीं, कहीं कुरूपता नहीं, आंगन में गुलाब, खेतों में गुलाब, गालों पर गुलाब खिल रहे, आँखों से गुलाब झाँक रहा ! जब सारा मानव-जीवन रंगमय, सुगंधमय, नृत्‍यमय, गीतमय बन जायगा! वह दिन कब आयेगा ! वह आ रहा है - क्‍या आप देख नहीं रहे हैं ! कैसी आँखें हैं आपकी। शायद उन पर गेहूँ का मोटा पर्दा पड़ा हुआ है। पर्दे को हटाइए और देखिए वह अलौकिक स्‍वर्गिक दृश्‍य इसी लोक में, अपनी इस मिट्टी की पृथ्‍वी पर ही! शौके दीदार अगर है, तो नजर पैदा कर !

३. निबन्ध का प्रतिपाद्य एवं सारांश

'गेहूँ बनाम गुलाब' निबन्ध का मूल प्रतिपाद्य मानव सभ्यता के विकास में भौतिक आवश्यकताओं और मानसिक/सांस्कृतिक आकांक्षाओं के बीच संतुलन को रेखांकित करना है। लेखक ने 'गेहूँ' को शारीरिक भूख, श्रम, आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्था का प्रतीक माना है, जबकि 'गुलाब' सौंदर्य-बोध, कला, संस्कृति और मानसिक तृप्ति का प्रतीक है। सारांशतः, निबन्ध यह स्पष्ट करता है कि मनुष्य को मनुष्य 'गुलाब' ने बनाया है, क्योंकि केवल पेट भरना पशुत्व का लक्षण है। प्राचीन काल में गेहूँ और गुलाब का संतुलन था, किन्तु आधुनिक युग में गेहूँ 'नारकीय श्रम' का और गुलाब 'गलीज विलासिता' का प्रतीक बन गया है। बेनीपुरी जी का मानना है कि अब पीछे मुड़ने का समय नहीं है, बल्कि विज्ञान की सहायता से गेहूँ (शारीरिक आवश्यकताओं) की प्रचुरता पैदा कर उस पर गुलाब (मानसिक प्रभुता) की विजय स्थापित करनी होगी। निबन्ध का अंतिम संदेश वृत्तियों को ऊर्ध्वगामी (Sublimation) कर एक ऐसी 'गुलाब की दुनिया' बनाने का है जहाँ केवल उल्लास, सुगंध और पवित्रता हो।

४. निबन्ध तत्वों के आधार पर गेहूँ बनाम गुलाब की समीक्षा

(क) विषय-वस्तु और प्रतीकात्मक गम्भीरता: 'गेहूँ बनाम गुलाब' निबन्ध की विषय-वस्तु अत्यंत व्यापक और दार्शनिक है। बेनीपुरी जी ने 'गेहूँ' और 'गुलाब' जैसे दो साधारण प्रतीकों के माध्यम से मानव सभ्यता के इतिहास, अर्थशास्त्र और भविष्य के विजन को एक साथ पिरो दिया है। विषय का शोधपरक पक्ष यह है कि लेखक मनुष्य की शारीरिक संरचना (पेट नीचे, हृदय ऊपर, मस्तिष्क सबसे ऊपर) को ही सभ्यता के सोपानक्रम का आधार मानते हैं। वे सिद्ध करते हैं कि प्रचुरता आने पर भी यदि वृत्तियाँ ऊर्ध्वगामी नहीं हुईं, तो समाज में 'राक्षसता' (जैसे रावण की सोने की लंका) व्याप्त हो जाएगी।

(ख) व्यक्तित्व की व्यंजना और ललित तत्व: निबन्ध में लेखक का एक भावुक स्वप्नद्रष्टा और क्रान्तिकारी विचारक रूप उभरता है। बेनीपुरी जी का व्यक्तित्व यहाँ 'कलम के जादूगर' के रूप में मुखरित है, जो समाज को 'गेहूँ के पर्दे' को हटाकर 'अलौकिक स्वर्गिक दृश्य' देखने के लिए ललकारता है। उनकी संवेदनशीलता तब दिखती है जब वे 'बेचारे गुलाब' की सिसकियों पर दुखी होते हैं। वे केवल सूचना नहीं देते, बल्कि पाठक की सोई हुई चेतना को 'शौके दीदार' पैदा करने के लिए प्रेरित करते हैं।

(ग) भाषा और शैली का सूक्ष्म विश्लेषण: निबन्ध की भाषा अत्यंत ओजपूर्ण, चित्रात्मक और छोटे वाक्यों वाली है। शैली में 'संवादात्मकता' और 'तार्किकता' का अद्भुत संगम है। "गेहूँ हम खाते हैं, गुलाब सूँघते हैं" जैसे सरल वाक्य से शुरू होकर निबन्ध "हस्तामलकवत्" जैसे गम्भीर दार्शनिक निष्कर्ष तक पहुँचता है। लेखक ने प्रश्नवाचक शैली (गेहूँ बड़ा या गुलाब?) का प्रयोग कर पाठक को आत्म-मन्थन के लिए विवश किया है। उर्दू के लयात्मक शब्दों (इफरात, गलीज, शौके दीदार) और संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग शैली को एक विशिष्ट चमक प्रदान करता है।

(घ) मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण: समीक्षा का यह पक्ष अत्यंत महत्वपूर्ण है कि लेखक ने वृत्तियों के 'संयमन' (Suppression) के स्थान पर 'ऊर्ध्वगामी' (Sublimation) करने का मनोवैज्ञानिक उपाय सुझाया है। वे विज्ञान को केवल विनाश का साधन नहीं, बल्कि गेहूँ की प्रचुरता पैदा करने वाली शक्ति के रूप में देखते हैं, जो अंततः मनुष्य को पेट की चिंता से मुक्त कर आत्मा की खोज (गुलाब की ओर) में लगा सके। उनकी दृष्टि भविष्यद्रष्टा की है जो 'यूटोपिया' को यथार्थ में बदलने की क्षमता रखती है।

(ङ) उद्देश्य और सामाजिक प्रासंगिकता: निबन्ध का मुख्य उद्देश्य यांत्रिक और आर्थिक दासता से जूझते मनुष्य को सांस्कृतिक मुक्ति का मार्ग दिखाना है। आज के उपभोक्तावादी युग में, जहाँ मनुष्य केवल 'गेहूँ' (पैसा और संसाधन) के पीछे भाग रहा है और 'गुलाब' (नैतिक मूल्य और मानसिक शांति) को भूल चुका है, बेनीपुरी जी की यह समीक्षा और भी प्रासंगिक हो गई है। यह निबन्ध एक ऐसे समाज के निर्माण की प्रेरणा देता है जहाँ भौतिक समृद्धि और आत्मिक शांति का समन्वय हो। अंततः, यह निबन्ध 'सांस्कृतिक पुनर्जागरण' का एक सशक्त घोषणापत्र है।

५. कठिन शब्दावली

पुष्टि = मजबूती/पोषण, क्षुधा = भूख, पिपासा = प्यास, काफला = दल/समूह, तरजीह = प्राथमिकता, समिधा = हवन की सामग्री, प्रस्‍फुटित = खिलना/निकलना, आरोप = थोपना, सम-तुलन = बराबरी, गलीज = गंदा/गिनौना, यंत्रणा = कष्ट, चिर-बुभुक्षा = हमेशा रहने वाली भूख, संगृहीत = इकट्ठा किया हुआ, युटोपिया = काल्पनिक लोक (आदर्श नगर), हस्‍तामलकवत् = हथेली पर रखे हुए आँवले के समान स्पष्ट, इफरात = बहुत अधिक मात्रा, अभक्ष्य = जो खाने योग्य न हो, अकाय = विशाल शरीर वाला, उर्ध्‍वगामी = ऊपर की ओर उठना, स्खलित = गिरना/भ्रष्ट होना, पिण्‍ड छूटना = पीछा छूटना, शौके दीदार = दर्शन की इच्छा, तरसा = अभिलाषी, संयमन = नियंत्रण, प्रचुरता = अधिकता, प्रभुता = अधिकार, विहार = घूमना, अलौकिक = ईश्वरीय, मानस = मन/आत्मा, उच्छवसित = गहरी सांस लेना,

६. परीक्षा-उपयोगी महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

प्र. 1. 'गेहूँ' और 'गुलाब' किन प्रवृत्तियों के प्रतीक हैं?

उत्तर : 'गेहूँ' मनुष्य की शारीरिक आवश्यकताओं, भूख, आर्थिक प्रगति और राजनैतिक व्यवस्था का प्रतीक है, जबकि 'गुलाब' सौंदर्य, कला, संस्कृति और मानसिक शांति का प्रतीक है।

प्र. 2. लेखक के अनुसार मनुष्य 'मानव' कब बना?

उत्तर : लेखक के अनुसार मनुष्य तब मानव बना जब उसने केवल पेट भरने (गेहूँ) की पशु-वृत्ति को छोड़कर मानसिक तृप्ति और सौंदर्य (गुलाब) को प्राथमिकता देना शुरू किया।

प्र. 3. "मानव शरीर में पेट का स्थान नीचे है और मस्तिष्क का ऊपर"—इस पंक्ति का दार्शनिक आशय क्या है?

उत्तर : इसका आशय यह है कि प्रकृति ने मनुष्य को इस तरह बनाया है कि उसकी शारीरिक भूख (पेट) गौण हो और उसकी मानसिक एवं बौद्धिक चेतना (मस्तिष्क) सर्वोपरि हो।

प्र. 4. प्राचीन काल में 'गेहूँ और गुलाब' का संतुलन कैसा था?

उत्तर : प्राचीन काल में मनुष्य कमाता हुआ गाता था और गाता हुआ कमाता था। उसके श्रम के साथ संगीत और गाय चराने (श्रम) के साथ रास रचाना (कला) जुड़ा हुआ था।

प्र. 5. 'राक्षसता' को रोकने के लिए लेखक ने क्या उपाय सुझाया है?

उत्तर : लेखक ने सुझाव दिया है कि केवल प्रचुरता से सुख नहीं मिलता। इसके लिए मनुष्य को अपनी वृत्तियों को ऊर्ध्वगामी (स्थूल वासनाओं से ऊपर उठाकर सूक्ष्म भावनाओं की ओर) करना होगा।

प्र. 6. लेखक 'गुलाब की दुनिया' किसे कहते हैं?

उत्तर : 'गुलाब की दुनिया' वह सांस्कृतिक जगत है जहाँ गंदगी और कुरूपता नहीं होगी, जहाँ हर ओर आनंद, संगीत, नृत्य और मानवीय संवेदनाओं का सुगंधित वातावरण होगा।

प्र. 7. विज्ञान की इस निबन्ध में क्या भूमिका बताई गई है?

उत्तर : विज्ञान की भूमिका गेहूँ (साधनों) की इतनी प्रचुरता पैदा करने की है कि मनुष्य पेट की चिंता से मुक्त होकर अपना सारा समय और ऊर्जा 'गुलाब' (सांस्कृतिक विकास) में लगा सके।

प्र. 8. 'शौके दीदार अगर है, तो नजर पैदा कर'—इस उक्ति का क्या तात्पर्य है?

उत्तर : इसका तात्पर्य है कि यदि हम एक सुंदर और सुखद भविष्य देखना चाहते हैं, तो हमें अपनी संकुचित और केवल भौतिकवादी दृष्टि को बदलकर एक संवेदनशील और सांस्कृतिक दृष्टि विकसित करनी होगी।

प्र. 9. "गेहूँ पर गुलाब की विजय" का क्या अर्थ है?

उत्तर : इसका अर्थ है कि मनुष्य के जीवन पर उसकी मानसिक और सांस्कृतिक चेतना का पूर्ण अधिकार हो, न कि वह केवल रोटी और भौतिक संसाधनों का गुलाम बनकर रह जाए।

प्र. 10. बेनीपुरी जी ने निबन्ध के अंत में किस शुभ दिन की कल्पना की है?

उत्तर : उन्होंने उस दिन की कल्पना की है जब सारा मानव-जीवन रंगमय, सुगंधमय और गीतमय बन जाएगा और मनुष्य स्थूल आवश्यकताओं की जंजीरें तोड़कर सूक्ष्म मानव-जगत में विहार करेगा।

साहित्य विश्लेषण श्रृंखला · 'गेहूँ बनाम गुलाब' · सर्वाधिकार सुरक्षित

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