विद्यापति — विद्यापति के पद
विद्यापति के पदों का शब्दार्थ, सन्दर्भ, प्रसङ्ग, हिन्दी व्याख्या एवं काव्य-सौंदर्य।
जीवन एवं काल: महाकवि विद्यापति का जन्म 14वीं शती के उत्तरार्ध (लगभग 1350-1374 ई.) में बिहार के मिथिला क्षेत्र (वर्तमान मधुबनी जिला) के बिस्फी नामक ग्राम में एक विद्वान ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम गणपति ठाकुर था। विद्यापति मिथिला नरेश राजा शिवसिंह और रानी लखिमा देई के आश्रय में रहे।
काव्यगत विशेषताएँ एवं उपाधियाँ: विद्यापति को 'मैथिलकोकिल', 'अभिनव जयदेव', 'कविशेखर' और 'कविकंठहार' जैसी उपाधियों से विभूषित किया गया है। इन्होंने संस्कृत, अवहट्ठ और मैथिली तीनों भाषाओं में उत्कृष्ट काव्य-रचना की। इनकी 'पदावली' में राधा-कृष्ण के लौकिक एवं अलौकिक प्रेम, संयोग-वियोग तथा नख-शिख सौन्दर्य का अद्वितीय चित्रण मिलता है।
भाषा-शैली: इनकी मैथिली पदावली में अप्रतिम गेयता, माधुर्य, संगीतात्मकता और नाद-सौन्दर्य विद्यमान है। इन्होंने उपमा, रूपक, व्यतिरेक एवं उत्प्रेक्षा अलंकारों का सहज और प्रभावशाली प्रयोग किया है।
प्रमुख रचनाएँ: पदावली (मैथिली), कीर्तिलता, कीर्तिपताका (अवहट्ठ), पुरुष-परीक्षा, भूपरिक्रमा, शैवसर्वस्वसार, गंगावाक्यावली, दानवाक्यावली (संस्कृत)।
1. विद्यापति के पद
चानन = चन्दन, विषम = विपरीत, भुषन = भूषण, एकसरि = अकेले, ठाढ़ = खड़े, हेरथि = देखते हैं, दगध = दग्ध, झामर = झुलसा हुआ, चन्द्रबदनि = चन्द्रमा के समान मुख वाली, जीउति = जीवित, गाओल = गाया, झटझारी = शीघ्रता से।
यह पद मंदाकिनी के “विद्यापति पदावली” से लिया गया है। इसके रचयिता मैथिलकोकिल विद्यापति हैं।
यह पद उस स्थिति का वर्णन करता है जब गोपियाँ श्रीकृष्ण के विरह में व्याकुल हैं।
गोपी कहती हैं कि अब मुख मुरझा गया, भूषण भारी लगते हैं, हरि स्वप्न में भी नहीं आते। वे कदम के वृक्ष के नीचे खड़ी राह देखती हैं। श्रीकृष्ण बिना हृदय जल रहा है।
यह पद विप्रलम्भ शृंगार रस का अत्यंत मार्मिक उदाहरण है।
माधव = श्रीकृष्ण, परिनाम = परिणाम/अन्त, निरासा = निराश, सपनहुँ = स्वप्न में भी, एकसरि = अकेले/अकेली, ठाठि = खड़ी होकर, कदम-तर = कदम्ब के नीचे, हेरथि = देखती हैं, दगध = दग्ध/जलना, झामर = म्लान/झुलसी हुई, उधब = उद्धव, मधुपुर = मथुरा, चन्द्र बदनि = चन्द्रमुखी, जीउति = जीवित रहेगी, बध लागत = वध का पाप लगेगा, गुनमति नारी = गुणवती स्त्री, झटकारी = शीघ्रता से।
यह पद मंदाकिनी के “विद्यापति पदावली” से लिया गया है। इसके रचयिता मैथिलकोकिल विद्यापति हैं।
यह पद उस स्थिति का वर्णन करता है जब गोपियाँ श्रीकृष्ण के विरह में व्याकुल हैं।
गोपी कहती हैं कि अब मुख मुरझा गया, भूषण भारी लगते हैं, हरि स्वप्न में भी नहीं आते। वे कदम के वृक्ष के नीचे खड़ी राह देखती हैं। श्रीकृष्ण बिना हृदय जल रहा है।
यह पद विप्रलम्भ शृंगार रस का अत्यंत मार्मिक उदाहरण है।
दुखक = दुःख का, नहि ओर = कोई अन्त नहीं, बादर = बादल, भादर = भाद्रपद मास, सून = सूना, झम्पि = झम-झम करके, संतत = निरन्तर, कंत = प्रियतम, पाहुन = अतिथि, काम = कामदेव, दारुण = भयंकर, सघन = घने, खर सर = तीक्ष्ण बाण, कुलिस = वज्र, दादुर = मेंढक, डाहुक = एक पक्षी, तिमिर = अन्धकार, जामिनि = रात्रि, अथिर = चंचल, बिजुरि = बिजली, पांति = पंक्ति, गमओब = बिताऊँ।
यह पद मैथिलकोकिल विद्यापति की पदावली से लिया गया है। इसमें विरहिणी नायिका ने भाद्रपद मास की वर्षा-ऋतु में श्रीकृष्ण-वियोग से उत्पन्न अपने असह्य दुःख का वर्णन किया है।
विरहिणी सखी से कहती है कि भाद्रपद की घनघोर वर्षा, बादलों की गर्जना, बिजली की चमक और चारों ओर का अन्धकार उसके विरह-दुःख को और भी बढ़ा रहे हैं। प्रिय के बिना दिन-रात बिताना उसके लिए अत्यन्त कठिन हो गया है।
विरहिणी सखी से कहती है कि मेरे दुःख का कोई अन्त नहीं है। भाद्रपद मास में चारों ओर घने बादल उमड़-घुमड़कर निरन्तर बरस रहे हैं और मेरा घर सूना पड़ा है। प्रियतम मेरे लिए कामदेव के तीक्ष्ण बाणों के समान अत्यन्त कष्टदायक हो गए हैं। आकाश में बार-बार बिजली चमकती है, मोर प्रसन्न होकर नाच रहे हैं, मेंढक और डाहुक बोल रहे हैं। चारों दिशाओं में घोर अन्धकार छाया है और बिजली की चंचल पंक्तियाँ दिखाई दे रही हैं। ऐसी परिस्थिति में प्रिय हरि के बिना मैं दिन-रात कैसे बिताऊँ?
पद में विप्रलम्भ शृंगार रस की अत्यन्त मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। वर्षा-ऋतु के प्राकृतिक दृश्यों को विरह-वेदना के उद्दीपन के रूप में प्रस्तुत किया गया है। बादल, बिजली, मोर, मेंढक और अन्धकार के सजीव चित्रण से वातावरण अत्यन्त प्रभावपूर्ण बन गया है। अनुप्रास तथा ध्वन्यात्मकता के कारण पद में संगीतात्मकता और भाव-सघनता उत्पन्न हुई है।
पुछसि = पूछती हो, अनुभव = अनुभूति, पिरीति = प्रेम, अनुराग = प्रेमभाव, तिल-तिले = क्षण-क्षण, नूतन = नया, निहारल = देखा, तिरपित = तृप्त, स्रवनहि = कानों से, मधु बोल = मधुर वचन, सुति-पथ = सुनने का मार्ग, परस = स्पर्श, जामिनि = रात्रि, रभसे = आनन्दपूर्वक, हिये = हृदय, जुड़न = शान्ति, विदग्ध = प्रेम में निपुण, अनुमोदइ = आनन्द लेते हैं।
यह पद मैथिलकोकिल विद्यापति की पदावली से लिया गया है। इसमें कवि ने प्रेम की अनुभूति को अत्यन्त सूक्ष्म और आत्मीय ढंग से व्यक्त किया है।
नायिका अपनी सखी से कहती है कि तुम मेरे प्रेम के अनुभव के विषय में क्या पूछती हो? मेरे लिए प्रिय का प्रेम प्रत्येक क्षण नया होता जाता है। उसके रूप, वाणी और स्पर्श की स्मृतियाँ भी हृदय को पूर्ण तृप्त नहीं कर पातीं।
नायिका कहती है कि सखी, तुम मेरे प्रेम के अनुभव के बारे में क्या पूछती हो? मैं जितना अपने प्रेम और अनुराग का वर्णन करती हूँ, वह उतना ही प्रत्येक क्षण नया अनुभव होता है। जन्म से अब तक मैंने प्रिय का रूप देखा है, फिर भी मेरी आँखें उससे तृप्त नहीं हुईं। मैंने उसके मधुर वचन सुने हैं, फिर भी कानों को तृप्ति नहीं मिली और उसके स्पर्श का अनुभव भी पूर्ण नहीं हुआ। उसके साथ अनेक मधुर रात्रियाँ कब बीत गईं, इसका पता ही नहीं चला। हृदय में उसे लाखों युगों तक सँजोकर रखने पर भी हृदय को पूर्ण शान्ति नहीं मिली। कवि विद्यापति कहते हैं कि प्रिय के समान कोई दूसरा व्यक्ति मिलकर भी प्राणों को वह आनन्द नहीं दे सकता।
इस पद में संयोग शृंगार रस की मधुर एवं अनुभूतिपरक अभिव्यक्ति है। प्रेम की अतृप्ति और निरन्तर नवीनता को अत्यन्त स्वाभाविक ढंग से व्यक्त किया गया है। अतिशयोक्ति के माध्यम से प्रेम की गहनता को प्रभावशाली बनाया गया है। भाषा सरल, मधुर, भावपूर्ण तथा गीतात्मक है।
नव = नवीन, बृन्दावन = वृन्दावन, तरूगन = वृक्षों का समूह, विकसित = खिले हुए, नवल = नवीन, मलयानिल = मलय पर्वत से आने वाली सुगन्धित वायु, अलि = भौंरे, कूल = समूह, विहरइ = विहार करते हैं, किसोर = किशोर, कालिंदी = यमुना, पुलिन = नदी का तट, रसाल = आम्रवृक्ष, मुकुल = कली, मधु-मातल = मधु के कारण मस्त, उमताई = उन्मत्त होकर, नागरि = नायिका, भाँति = प्रकार, मति माँति = मन को मोहित करते हैं।
यह पद मैथिलकोकिल विद्यापति की पदावली से लिया गया है। इसमें कवि ने वसन्त ऋतु में नवीन सौन्दर्य से सजे वृन्दावन और वहाँ श्रीकृष्ण के प्रेम-विहार का मनोरम चित्र प्रस्तुत किया है।
कवि वसन्त ऋतु में वृन्दावन की नवीन शोभा का वर्णन करते हुए बताते हैं कि चारों ओर नवीन वृक्ष, फूल, सुगन्धित वायु और मस्त भौंरों का समूह है तथा श्रीकृष्ण और गोपियाँ प्रेम में विभोर होकर विहार कर रहे हैं।
वसन्त के आगमन पर वृन्दावन का रूप प्रतिक्षण नया दिखाई दे रहा है। वृक्षों पर नये पत्ते और खिले हुए फूल शोभा पा रहे हैं। नवीन वसन्त और सुगन्धित मलय पवन से भौंरों के समूह मस्त हो रहे हैं। यमुना के तट और कुंजवन की शोभा देखते ही बनती है। किशोर श्रीकृष्ण वहाँ नवीन प्रेम में विभोर होकर विहार कर रहे हैं। आम की नई-नई मंजरी के मधुर रस से मस्त होकर कोयलों के समूह गा रहे हैं। नवयुवतियों के मन प्रेम से उन्मत्त होकर इस नवीन रस के वन की ओर दौड़ रहे हैं। श्रीकृष्ण और गोपियों के नित्य नवीन प्रेम-क्रीड़ा के ये दृश्य मन को मोहित कर लेते हैं।
पद में संयोग शृंगार रस की मनोहारी अभिव्यक्ति है। ‘नव’ शब्द की बार-बार पुनरावृत्ति से वसन्त की नवीनता और सौन्दर्य का प्रभाव अत्यन्त गहरा हुआ है। प्रकृति और प्रेम का अद्भुत सामंजस्य दिखाई देता है। अनुप्रास तथा पुनरुक्ति-प्रकाश की छटा पद को अत्यन्त मधुर और संगीतात्मक बनाती है।
लता = बेलें, तरुअर = वृक्ष, मण्डप = विवाह-मण्डप, ससधर = चन्द्रमा, धवलिए = सफेद करके, भीति = दीवार, अइपन = अल्पना, पल्लव = नये पत्ते, बसंत-बिबाहा = वसन्त का विवाह, कानन = वन, मधुकर = भौंरे, रमनी = स्त्रियाँ, दुजबर = श्रेष्ठ द्विज (यहाँ कोयल), मकरंद = पुष्परस, हथोदक = हाथ धोने का जल, विधु = चन्द्रमा, बरियाती = बाराती, समीर = वायु, किंसुक = पलाश, तोरन = द्वार पर सजाने की वस्तु, लावा = विवाह में प्रयुक्त धान, केसर = केसर, कुसुम = फूल, पंचबान = कामदेव।
यह पद मैथिलकोकिल विद्यापति की पदावली से लिया गया है। इसमें कवि ने वसन्त ऋतु को वर के रूप में कल्पित करके उसके वन में होने वाले विवाह का अत्यन्त मनोरम रूपक प्रस्तुत किया है।
कवि वसन्त के आगमन को विवाह के रूप में चित्रित करते हैं। वन विवाह-मण्डप बन जाता है, भौंरे और कोयल विवाह के गीत तथा मन्त्र गाते हैं और प्रकृति की विभिन्न वस्तुएँ विवाह की सामग्री का रूप धारण कर लेती हैं।
वन में लताओं और वृक्षों ने मिलकर ऐसा मण्डप बना दिया है जो अत्यन्त सुन्दर है। चन्द्रमा की निर्मल चाँदनी से उसकी दीवारें उजली दिखाई देती हैं। भूमि पर सुन्दर अल्पना बनाई गई है और नये पल्लवों से सजावट की गई है। कवि सखी से कहते हैं कि हे माता, ध्यान लगाकर देखो, वन में वसन्त का विवाह होने जा रहा है। भौंरों के समूह मंगलगीत गा रहे हैं और कोयल पुरोहित बनकर विवाह-मन्त्र पढ़ा रही है। पुष्पों का मकरन्द हथोदक का जल है, शीतल समीर बाराती है और चन्द्रमा वर के रूप में उपस्थित है। पलाश के फूल मोतियों के समान तोरण बनाते हैं तथा फूलों की बेलें लावा बिखेर रही हैं। केसर और फूलों से सिन्दूरदान हो रहा है। इस प्रकार सम्पूर्ण प्रकृति वसन्त के विवाह में सम्मिलित होकर उत्सव मना रही है।
इस पद में रूपक अलंकार की अत्यन्त सुन्दर योजना है। सम्पूर्ण वसन्त-ऋतु को विवाह के रूप में चित्रित किया गया है। प्रकृति की प्रत्येक वस्तु को विवाह की सामग्री अथवा पात्र के रूप में प्रस्तुत करना कवि की कल्पनाशक्ति का परिचायक है। पद में उत्सव और संयोग शृंगार का मनोहर वातावरण है तथा भाषा अत्यन्त चित्रात्मक, मधुर और संगीतात्मक है।
अभिनव = नवीन, पल्लव = नये पत्ते, बइसंक = आसन, धवल = सफेद, पुरहर = पूजा की सामग्री, मकरंद = पुष्परस, मन्दाकिनि = गंगा, असोग = अशोक, पुनमन्त = पूर्णिमा के समान, चुमाओन = मंगल-आशीर्वाद की क्रिया, राय बसन्त = राजा वसन्त, सुधानिधि = चन्द्रमा, दधि = दही, भंगर = भृंग (भौंरा), केतकि = केतकी, पटबास = वस्त्र की सुगन्धित सामग्री।
यह पद मैथिलकोकिल विद्यापति की पदावली से लिया गया है। इसमें कवि ने वसन्त के आगमन का उत्सवपूर्ण चित्र प्रस्तुत करते हुए प्रकृति को मांगलिक वातावरण से युक्त दिखाया है।
कवि वसन्त के आगमन को एक मांगलिक अवसर के रूप में प्रस्तुत करते हैं। नवीन पल्लव, कमल, अशोक, मकरन्द, चन्द्रमा और सुगन्धित पुष्पों के माध्यम से वसन्त के स्वागत की तैयारी की गई है।
नवीन पल्लवों से आसन बनाया गया है और सफेद कमल के फूल पूजा की सामग्री के समान सुशोभित हैं। पुष्पों का मकरन्द पवित्र जल के रूप में प्रस्तुत किया गया है और लाल अशोक के फूल दीपक के समान शोभा दे रहे हैं। आज पूर्णिमा जैसा पवित्र दिन है, इसलिए राजा वसन्त का मंगल-स्वागत किया जा रहा है। चन्द्रमा दही के समान श्वेत और पूर्ण दिखाई देता है। भौंरों के समूह गुनगुना रहे हैं। केसरिया पलाश के फूल सिन्दूर के समान चमक रहे हैं और केतकी के फूलों की सुगन्ध वातावरण में फैल रही है। कवि विद्यापति इस सम्पूर्ण दृश्य को अत्यन्त मनोहारी रूप में प्रस्तुत करते हैं।
पद में वसन्त के आगमन का उत्सवपूर्ण एवं चित्रात्मक वर्णन हुआ है। प्रकृति की वस्तुओं को मांगलिक सामग्री के रूप में प्रस्तुत करने से रूपक की सुन्दर योजना दिखाई देती है। लाल अशोक और केसरिया पुष्पों के साथ श्वेत चन्द्रमा का वर्णन दृश्य-सौन्दर्य बढ़ाता है। भाषा मधुर, ललित और गीतात्मक है।
सरसिज = कमल, सर = तालाब, सूर = सूर्य, जौबन = यौवन, तन = शरीर, मदन = कामदेव, बोदन = पीड़ा, बोलछड = बोलने में चतुर, परबोधी = चेतना देने वाला, भमर = भौंरे, नीरसि = रस लेकर, भाजरि = भटककर, पिक = कोयल, सिनेह = स्नेह, अछत = अक्षुण्ण, पयोनिधि = समुद्र, नीरा = जल, गुनगाहक = गुणों का प्रशंसक।
यह पद मैथिलकोकिल विद्यापति की पदावली से लिया गया है। इसमें विरहिणी नायिका अपने प्रिय के वियोग में प्रकृति के उद्दीपनकारी वातावरण से उत्पन्न पीड़ा को व्यक्त करती है।
विरहिणी कहती है कि उसका भाग्य ही उसके विरुद्ध है। चारों ओर वसन्त का आनन्दमय वातावरण है, भौंरे फूलों पर मँडरा रहे हैं और कोयल मधुर स्वर में बोल रही है, किन्तु प्रिय के बिना यह सब उसे अत्यन्त कष्ट देता है।
कमल के बिना सरोवर और सरोवर के बिना कमल का कोई अर्थ नहीं, उसी प्रकार यौवन के बिना शरीर और शरीर के बिना यौवन का भी कोई महत्त्व नहीं। विरहिणी सखी से कहती है कि मेरा भाग्य बहुत ही विरोधी है। मेरा प्रिय अत्यन्त मधुर बोलने वाला है, फिर भी उसके बिना मेरा शरीर चेतनाहीन-सा हो गया है। चारों ओर भौंरे फूल-फूल पर मँडरा रहे हैं और उनका रस पी रहे हैं। मन्द पवन चल रही है तथा कोयल कुहू-कुहू कर रही है। ऐसे वातावरण में विरहिणी अपने प्रिय के बिना कैसे जीवित रह सकती है? कवि विद्यापति कहते हैं कि हे कमलमुखी, तुम्हारा प्रिय तुम्हारे गुणों का प्रशंसक है।
पद में विप्रलम्भ शृंगार रस की मार्मिक अभिव्यक्ति है। कमल-सरोवर और शरीर-यौवन की उपमा द्वारा प्रिय और प्रेयसी के पारस्परिक सम्बन्ध को स्पष्ट किया गया है। वसन्त की प्राकृतिक गतिविधियाँ विरह की पीड़ा को और तीव्र करती हैं। उपमा, अनुप्रास तथा विरोधाभास की सुन्दर छटा पद को प्रभावशाली बनाती है।
अनुखन = प्रत्येक क्षण, सुमिरत = स्मरण करते हुए, मधाई = सुन्दर हो गई, सभावहिं = स्वभाव को, विसरल = भूल गई, लुबधाई = मोहित होकर, अपरूप = अनुपम, सिनेह = प्रेम, जरजर = दुर्बल, जिवइते = जीवित रहने में, संदेह = सन्देह, सहचरि = सखी, कातर = व्याकुल, दिठि = दृष्टि, छल-छल = आँसुओं से भरी, बानि = वाणी, पुनतहिं = मिलने पर, दारुन = कठोर/प्रबल, विरहक बाधा = विरह की पीड़ा, दारू = लकड़ी, दहन = जलना, आकुल = व्याकुल, परान = प्राण, बल्लभ = प्रिय, सुधामुखि = अमृत के समान मुख वाली।
यह पद मैथिलकोकिल विद्यापति की पदावली से लिया गया है। इसमें राधा के श्रीकृष्ण-विरह तथा निरन्तर कृष्ण-स्मरण से उत्पन्न उनकी प्रेममयी अवस्था का अत्यन्त मार्मिक चित्रण किया गया है।
राधा प्रत्येक क्षण माधव का स्मरण करते-करते स्वयं माधवमयी हो गई हैं। उनका मन अपने स्वभाव और अपने अस्तित्व को भूल चुका है। कृष्ण-वियोग में उनका शरीर क्षीण हो रहा है और उनकी वाणी में भी केवल राधा और माधव का नाम रह गया है।
राधा हर क्षण माधव का स्मरण करती हुई इतनी माधवमयी हो गई हैं कि उन्हें अपने स्वभाव और अपने गुणों का भी भान नहीं रहा। माधव का प्रेम अद्भुत है; उनके विरह में राधा का शरीर अत्यन्त दुर्बल हो गया है और उनके जीवित रहने में भी सन्देह होने लगा है। प्रातःकाल सखी उनकी व्याकुल दृष्टि देखती है तो उनकी आँखों से आँसू छलकते रहते हैं। वे हर क्षण ‘राधा-राधा’ रटती हैं और उनकी वाणी आधी-आधी रह जाती है। जब राधा माधव से मिलती हैं तो माधव राधामय हो जाते हैं और माधव राधा से मिलने पर राधामयी हो जाती हैं। उनका प्रबल प्रेम टूटता नहीं, बल्कि विरह की बाधा के कारण और बढ़ता जाता है। दोनों की प्रेमावस्था ऐसी है जैसे दो ओर से जलती हुई लकड़ी के बीच फँसा हुआ कीट व्याकुल होकर जलता है।
पद में विप्रलम्भ शृंगार रस की चरम अनुभूति व्यक्त हुई है। राधा का माधवमय हो जाना प्रेम की तन्मयता को दर्शाता है। ‘राधा’ और ‘माधव’ नामों की पुनरावृत्ति से भाव की तीव्रता और संगीतात्मकता बढ़ी है। दोनों ओर से जलती लकड़ी में फँसे कीट का बिम्ब विरह की असहनीय पीड़ा को अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करता है।
सरस = मनोहर, बसन्त = वसन्त ऋतु, दखिन पवन = दक्षिण दिशा से आने वाली वायु, सपनहुँ = स्वप्न में भी, रूप = सौन्दर्य, बचन = वचन, भाखिए = कहकर, बदन = मुख, चान = चन्द्रमा, विहि = विधाता, कटि = कमर, तुलित = तुलना किया हुआ, लोचन = नेत्र, कमल = कमल के फूल, पंकज = कमल, यौवति = युवती, लक्ष्मी समाने = लक्ष्मी के समान।
यह पद मैथिलकोकिल विद्यापति की पदावली से लिया गया है। इसमें कवि ने वसन्त ऋतु के मनोहर वातावरण में एक सुन्दरी युवती के अद्वितीय रूप-सौन्दर्य का वर्णन किया है।
कवि एक सुन्दरी के रूप का वर्णन करते हुए कहते हैं कि उसके मुख, कमर और नेत्रों की तुलना संसार की किसी भी सुन्दर वस्तु से नहीं की जा सकती। विधाता ने उसके रूप की रचना अद्वितीय ढंग से की है।
वसन्त ऋतु का मनोहर समय है और दक्षिण दिशा से मन्द-मन्द वायु बह रही है। कवि कहते हैं कि उस युवती के रूप और वाणी की समानता किसी से नहीं की जा सकती। उसके मुख की तुलना चन्द्रमा से भी नहीं हो सकती, क्योंकि उसका मुख चन्द्रमा से कहीं अधिक सुन्दर है। विधाता ने अनेक बार कमर की रचना की होगी, फिर भी उसकी कमर के समान सुन्दर कमर नहीं बना सका। उसकी आँखें कमल के समान हैं, परन्तु संसार में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जो यह जान सके कि उसके नेत्रों के समान कमल कहाँ मिलेंगे। उसके नेत्रों के सामने कमल भी अपनी हीनता के कारण जल में छिप जाता है। विद्यापति कहते हैं कि हे सुन्दर युवती, तुम्हारे शरीर के सभी अंग लक्ष्मी के समान शोभायमान हैं।
इस पद में संयोग शृंगार तथा रूप-सौन्दर्य वर्णन की प्रधानता है। कवि ने चन्द्रमा और कमल जैसे पारम्परिक उपमानों को भी नायिका के सौन्दर्य के सामने तुच्छ सिद्ध किया है। व्यतिरेक और उपमा की सुन्दर योजना से नायिका के अद्वितीय सौन्दर्य को प्रभावशाली बनाया गया है। भाषा अत्यन्त कोमल, मधुर और चित्रात्मक है।
रसिया = रसिक प्रिय, बिपिन = वन, बंसिया = बाँसुरी, चरणारविन्द = कमल के समान चरण, दसिया = दासी, छलहुँ = थी, कुल-हँसिया = कुल की हँसी, मदन = कामदेव, भुजंगम = सर्प, डसिया = डसा हुआ, सरन = शरण, दुर्जसिया = अपयश, बनितामनि = स्त्रियों में रत्न (सुन्दरी), गोआरिनी = गोपिका, हुलसिआ = हर्षित होकर।
यह पद मैथिलकोकिल विद्यापति की पदावली से लिया गया है। इसमें प्रेमिका द्वारा श्रीकृष्ण के प्रति अपने अनन्य समर्पण, प्रेम और उनकी शरण में रहने की दृढ़ भावना व्यक्त की गई है।
नायिका श्रीकृष्ण से बाँसुरी न बजाने की विनती करती है और उनके चरणों की दासी बनकर सदा उनकी शरण में रहने का संकल्प व्यक्त करती है। वह संसार के अपयश की परवाह न करते हुए अपने प्रेम को सर्वोपरि मानती है।
नायिका अपने प्रिय श्रीकृष्ण से कहती है कि हे रसिक, अब वन में बाँसुरी मत बजाइए। मैं बार-बार आपके चरण-कमलों को पकड़कर सदा आपकी दासी बनकर रहूँगी। मैं पहले कैसी थी और आगे कैसी हो जाऊँगी, यह कौन जानता है; यदि मेरे कारण कुल की हँसी भी हो जाए तो उसका मुझे कोई भय नहीं है। प्रेम का अनुभव मेरे हृदय को कामदेव रूपी सर्प के डसने के समान व्याकुल कर चुका है। हे नन्दनन्दन, मैं आपकी शरण कभी नहीं छोड़ूँगी, चाहे संसार मुझे अपयश ही क्यों न दे। विद्यापति कहते हैं कि हे सुन्दरी, तुम्हारे मुख ने उस रसिक प्रिय को भी जीत लिया है। हे गोपिका, तुम्हारा भाग्य धन्य है कि तुम्हारा हृदय प्रिय के प्रेम से पूर्णतः हर्षित है।
पद में संयोग शृंगार रस के साथ प्रेम की अनन्यता और आत्मसमर्पण की भावना व्यक्त हुई है। ‘मदन भुजंगम’ का रूपक प्रेम की तीव्रता और उसकी व्याकुलता को अत्यन्त प्रभावशाली बनाता है। नायिका का लोक-लाज और अपयश की चिन्ता छोड़कर प्रिय की शरण ग्रहण करना प्रेम की दृढ़ता को दर्शाता है। भाषा सरल, भावपूर्ण और गीतात्मक है।
2. विद्यापति का जीवन-परिचय
विद्यापति के जीवन, व्यक्तित्व एवं कृतित्व का परिचय।
3. विद्यापति भक्त कवि अथवा श्रृंगारी कवि
विद्यापति के भक्त एवं श्रृंगारी काव्य के आधार पर विषय का विवेचन।
4. चतुर्थ विषय
चतुर्थ विषय का विवरण।
5. पञ्चम विषय
पञ्चम विषय का विवरण।
6. षष्ठ विषय
षष्ठ विषय का विवरण।
