जगत प्रवाह : विस्तृत समीक्षा, सारांश एवं प्रश्नोत्तर
प्रस्तुत लेख में 'भारतेन्दु युग' के प्रखर निबन्धकार पंडित बालकृष्ण भट्ट द्वारा रचित दार्शनिक निबन्ध 'जगत प्रवाह' का सम्पूर्ण विश्लेषण है। यह निबन्ध कालचक्र की गतिशीलता, मानवीय नियति और सामाजिक पतन का गम्भीर विवेचन करता है।
१. निबन्धकार का परिचय
पंडित बालकृष्ण भट्ट (1844–1914 ई.) आधुनिक हिन्दी गद्य के निर्माताओं में सर्वोपरि हैं। वे भारतेन्दु मण्डल के सबसे प्रभावशाली लेखक और निर्भीक पत्रकार थे। उन्होंने 'हिन्दी प्रदीप' नामक मासिक पत्र का लगभग 33 वर्षों तक संपादन किया, जिसके माध्यम से उन्होंने हिन्दी निबन्ध कला को विकसित किया। भट्ट जी को आचार्य शुक्ल ने 'हिन्दी का स्टील' कहा है। उनकी लेखन शैली में जहाँ एक ओर वेदों और उपनिषदों की गम्भीरता है, वहीं दूसरी ओर लोक-जीवन की कहावतों और मुहावरों की जीवंतता भी है। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों, राजनैतिक पराधीनता और दार्शनिक विषयों पर लगभग एक हजार निबन्ध लिखे। उनके निबन्धों में तार्किकता और राष्ट्रीय चेतना का अद्भुत मेल मिलता है। वे हिन्दी के उन गिने-चुने लेखकों में से हैं जिन्होंने भाषा को परिमार्जित करने के साथ-साथ उसे जन-सरोकारों से जोड़ा।
२. मूल पाठ
बालकृष्ण भट्ट का निबन्ध “जगत प्रवाह” संसार की निरन्तर गति, परिवर्तनशीलता, समय की शक्ति और मनुष्य के जीवन की अस्थिरता का गम्भीर विवेचन प्रस्तुत करता है। लेखक ने जगत को एक ऐसे प्रबल प्रवाह के रूप में देखा है, जिसे कोई मनुष्य रोक नहीं सकता।
वेगगामी झरने, नदियाँ, समुद्र इत्यादि का प्रवाह रुक जा सकता है। प्रद्योतित बुद्धि की नई अकिल वाले इस समय के विज्ञानियों ने अनेक ऐसे यंत्र, औजार और कलें ईजाद की है, जिसके द्वारा वे तीखी से तीखी धाराओं के प्रवाह को रोक दे सकते हैं या उसके प्रवाह को उलट दे सकते हैं। किन्तु आज तक ऐसा कोई बुद्धिमान न हुआ जो जगत के प्रवाह को रोक देता या उसे एक ओर से दूसरी ओर पलट देता।
चौकसी के साथ अनुसन्धान करते रहो तो पता लग जाता है कि अमुक नदी या झरने के प्रवाह का प्रारम्भ कहाँ से, कब से है और कब तक रहेगा। ख्याल सही नहीं है— माफ कीजिए, बेअदबी होती है। साहब जिसे अपमान, आत्मगौरव और धर्माचरण कहते हैं वह भी रुपये के लिए है और रुपये से सधता है। बड़े से बड़े मनस्वी, तपस्वी, संयमी, न्यायशील सब रुपये के लिए तपस्या इत्यादि से हाथ धो बैठते हैं।
मैंने बड़े-बड़े तपस्वी और मनस्वियों को आजमाया, रुपया देख सब फिसल गए। इसी के लिए बाप-बेटों में चल जाती है, भाई-भाई कट मरते हैं। उन रुपयों की कमी हमको नहीं है। ज्यों-ज्यों आपका घिष्ट-पिष्ट मेरे साथ बढ़ता जाएगा, आप जानोगे कि मैं कौन हूँ, मेरी इतिहास किस प्रकार का है।
वृन्दावन इसकी बातें सुन अचम्भे में आया। थोड़ी देर तक सोचता रहा कि यह तो कोई अद्भुत पुरुष है, मेरे मित्र ने क्या समझ इसे मेरे पास भेजा। यद्यपि वृन्दावन को अपनी लियाकत का कुछ कम घमण्ड न था, किन्तु इस समय यह उसके रोब में आ गया और गिड़गिड़ाता हुआ धीमी आवाज में बोला—मैं आपका नाम जानना चाहता हूँ, वर्णमाला के किन-किन अक्षरों को वह सुशोभित करता है।
उसने कहा—मेरे कई एक नाम हैं। भिन्न-भिन्न समाज और संप्रदाय वालों ने अपने-अपने ढंग पर अपनी पसन्द और रुचि के अनुकूल मेरा नाम धर रक्खा है, किन्तु साधारण रीति पर सब लोग मुझे सिद्धार्थक कहकर पुकारते हैं।
इतने में गाड़ी अपने ठिकाने पहुँच गयी, दोनों उतरे। अपने नौकरों में से एक को इसने इशारे से बुलाकर कहा—‘देखो, बाबू साहब को किसी तरह की तकलीफ न होने पावे।’ वह तो कोठी के भीतर चला गया।
नौकर अपनी जात की कमीनगी के मुताबिक जैसा इन लोगों का दस्तूर होता है कि मालिक की आँख के सामने कुछ, मालिक की आँख की ओट में हुआ कि हाहा-ठीठी टाल-बटाल। खासकर जब उनको इसका कुछ पता नहीं लगता। बुद्धिमानों ने इस विषय में भाँति-भाँति के अनुमान किये हैं और अकिल भिड़ाया है सही, पर ठीक ऐसा ही है यह निश्चय किसी को न हुआ।
सच तो यों है कि जब तक यह प्रवाह अपने पूर्ण वेग से चला जाता है तभी तक कुशल है। जरा सा मन्द पड़ा या एक निमेष मात्र को भी रुका कि कयामत या प्रलय का सामान जुट जाते देर नहीं लगती।
योगाभ्यासी तथा वेदान्ती मन को मार शान्ति-शान्ति पुकारते हैं। यह नहीं विचारते कि जगत के प्रवाह में पड़े हुए को शान्ति कहाँ? जमदेश, दारा, सिकन्दर से प्रबल प्रतापियों को कौन कहे, राम, युधिष्ठिर सरीखे जो अंशावतार माने गए हैं, जगत के प्रवाह में पड़ उनका भी कहीं ठिकाना न लगा।
प्रातःकालीन गगन मंडल के एक देश में नक्षत्र-समूह सदृश थोड़े समय तक जगमगाते हुए इस प्रवाह में पड़ न मालूम कहाँ विलाय गए।
यह प्रवाह ऐसा प्रचंड है कि एक-दो मनुष्य की क्या, देश के देश को अपनी एक लहर में बटोर न जाने कहाँ ले जा फेंकता है—जहाँ कई करोड़ मनुष्य बसते थे, जहाँ के लोग मनुष्य जाति के सिरमोर थे, जो देश सभ्यता की सीमा थी, वह इस प्रचण्ड जगत प्रवाह में पड़ ऐसा अस्त हुआ कि उसकी पुरानी बातें किस्से-कहानियों का मजमून और चण्डूबाजों की गप्पें हो गईं और जगत का प्रवाह जैसा का तैसा बना ही रहा।
प्राचीन भारत, प्राचीन पारस, प्राचीन यूनान, प्राचीन रोम इसके निदर्शन हैं। इस प्रवाह में पड़ा हुआ जिसे जो सवार है वह अपने गीत गाए जाता है, अपने स्थिर निश्चय और उत्साह से जरा भी मुँह नहीं मोड़ता।
पुराने आर्यों ने इस प्रवाह को त्रिगुण-विभाग माना है। जहाँ जिस भू-भाग में जब इस प्रवाह का वेग सीधा और मनुष्य-जाति के अनुकूल रहा, प्रकृति के सब काम जब तक स्वभाव अनुसार होते रहे, तब तक वहाँ सतयुग या सतोगुण का उदय रहा।
वहाँ के स्थावर-जंगम सर्जित पदार्थ मात्र में सात्त्विक भाव का प्रकाश रहा। प्रत्येक मनुष्य यावत् अभ्युदय और स्वर्ग-सुख का अनुभव करते हुए कृतकृत्य, पूर्णकाम और आप्तकाम रहे। किसी अंश में कहीं से किसी तरह की किसी त्रुटि का नाम न रहा।
इसी को उन्नति, तरक्की, सभ्यता, उदारभाव, स्वतंत्रता, जो चाहो सो कहो।
भारत में न जानिए कितनी बार उस प्रवाह की प्रेरणा से चक्रवत् पलटा खाते सतोगुण का उदय हो चुका है। सतोगुण में क्रम-क्रम हानि और घटती का होना ही रजोगुण है। अपने प्रादुर्भाव में प्रमाद, आलस्य, तृष्णा, स्वार्थ, परदृष्टि, हिंसा, अपने और पराये की निरख, विषय-भाव आदि बढ़ जाता है।
विलायत में इन दिनों रजोगुण ही बढ़ा-चढ़ा है। बल्कि युग-संध्या के क्रम पर तमोगुण की तरक्की होती जाती है।
वह प्रवाह जब तमोगुण के साथ टकराता है तब राग-द्वेष, बैर, फूट, ईर्ष्या, द्वेष, हिंसा, पैशुन्य, विषयलंपटता, चित्र की क्षुद्रता और कदर्यता बढ़ती है। कालचक्र की वक्रगति हिंदुस्तान में उसी तमोगुण को प्रवाहित कर रही है जिसे अवनति, तनज्जुली, घटती, जघन्यता, पराधीनता, बिगाड़—चाहे जिस नाम से पुकारो तुम्हें अधिकार है।
उनकी तो बात ही और है जो उसमें पगे हुए इसी को बड़ा भारी सुख मान रहे हैं। नहीं तो नरक के प्राणी भी हमें ऐसों के पराधीन निकृष्ट जीवन से अधिक श्रेष्ठ और सुखी हैं।
यहाँ पर हमारे एक प्रिय मित्र का कहना हमें याद आता है जिनका सिद्धांत है कि मरने के बाद रूह को फिर जन्म लेना पड़ता है। यह खयाल सच है तो हिंदुस्तान के नागरिक समाज के बीच नरक भूमि में जन्म ले पराधीन जीवन से सहारा के रेगिस्तान में भी स्वच्छंद जीवन अच्छा।
भागवत के उस श्लोक को लिखने वाला हमें इस समय मिलता तो कम से कम गिन के तीन गहरी चपत उसे जमाते, जिसने लिखा है कि स्वर्ग में देवगण भी सोचते हैं और इस बात के लिए तरसते हैं कि भारत की कर्मभूमि में किसी तरह एक बार हमारा जन्म होता तो हम अपने जन्म को सफल करते।
बड़े नामी लेखक जिन्होंने इस प्रवाह के अंतर्गत किसी बुराई के संशोधन के लिए हजारों पेज लिख डाला, प्रसिद्ध वक्ता जिन्होंने चाहा कि हम एक छोर से दूसरे तक अपनी मेघ-गंभीर वक्तृक्ता और बातों से उन बुराइयों को उच्छिन्न कर दें, पर उनका वह परिश्रम प्रबल-प्रवाह सागर में एक बिंदु भी न हुआ और उनके लेख और वक्तृक्ता का अणु मात्र भी कहीं असर न देखा गया।
हमने बहुत चाहा कि बाल-विवाह कुरीत को अपने बीच से हटा दें। कोई अंक ऐसा नहीं जाता जिसमें दो-एक मजबूत धक्के इस कुरीत के प्रबल प्रभाव को देती हूं कि एक आदमी को भी अपने पंथ की प्रकृति के नियमों में कुछ ऐसी मोहिनी शक्ति है कि कोई कितना ही इस प्रवाह से बचना चाहे, नहीं बच सकता है।
सूर्यदेव के प्रतिदिन उदय और अस्त से आयुष्य घटती जाती है। कार्य के बोझ से लदे हुए अपने व्यापार में व्यापृत, बार-बार जन्म लेना, बुढ़ा जाना, अनेक प्रकार की विपत्ति और मरण देख किसको त्रास नहीं होता। मोहमयी प्रमाद-मदिरा को पीकर संपूर्ण जगत उन्मत्त हो रहा है।
इस तरह महाप्रवाहपूर्ण भव-सागर के पार होने को धैर्य एकमात्र उत्तम उपाय है। सच है—‘धीरज धरै सो उतरै पारा’ और भी महाभारत के वन-पर्व में इस जन्म-मरण रूपी महानदी के प्रवाह का बहुत उत्तम रूपक दर्शा धैर्य को नौका-रूप एकमात्र अवलंब निश्चय किया है। यथा—
भाँति-भाँति की कामना और लोभ, नक्र-मकरपूर्ण पाँच इन्द्रियों के विषय जिस नदी का जल-प्रवाह हैं, उससे पार जाना चाहें तो धैर्य की नौका पर चढ़ फिर-फिर जन्म-मरण के क्लेश से छूट सकता है।
३. निबन्ध का प्रतिपाद्य एवं सारांश
बालकृष्ण भट्ट रचित निबन्ध 'जगत प्रवाह' का मूल प्रतिपाद्य समय की अजेय शक्ति और संसार की शाश्वत गतिशीलता को स्पष्ट करना है। लेखक के अनुसार, विज्ञान नदियों और झरनों के वेग को तो रोक सकता है, किन्तु 'जगत प्रवाह' (कालचक्र) को मोड़ना असम्भव है। सारांशतः, निबन्ध में मनुष्य के जीवन की अस्थिरता और अर्थ-लोलुपता पर तीखा प्रहार किया गया है। लेखक 'सिद्धार्थक' और 'वृन्दावन' के संवाद के माध्यम से बताते हैं कि आज के युग में धर्म, गौरव और तपस्या—सब कुछ 'रुपये' के अधीन हो गया है। निबन्ध में सांख्य दर्शन के तीन गुणों (सत, रज, तम) के आधार पर युगों का विभाजन किया गया है। लेखक भारत की वर्तमान पराधीनता और पतन को 'तमोगुण' का प्रभाव मानते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि बड़े-बड़े प्रतापी राजा (सिकन्दर, दारा) और अंशावतार (राम, युधिष्ठिर) भी इस प्रवाह में विलीन हो गए। अंततः, इस दुखमयी भवसागर से पार पाने का एकमात्र साधन 'धैर्य' (धृति) की नौका है, जो मनुष्य को लोभ और मोह के भँवर से निकाल सकती है।
४. निबन्ध तत्वों के आधार पर जगत प्रवाह की समीक्षा
(क) विषय-वस्तु और दार्शनिक गहराई: 'जगत प्रवाह' की विषय-वस्तु गम्भीर दार्शनिकता और सामाजिक यथार्थ का अनूठा मिश्रण है। भट्ट जी ने काल को एक ऐसे महाप्रवाह के रूप में चित्रित किया है जो सम्पूर्ण सभ्यताओं (भारत, रोम, यूनान) को लील जाता है। निबन्ध में केवल आध्यात्मिकता नहीं है, बल्कि तत्कालीन पराधीन भारत की 'तनज्जुली' (गिरावट) पर गहरी पीड़ा भी है। विषय का विस्तार भौतिक जगत के विज्ञान से शुरू होकर सूक्ष्म त्रिगुणात्मक विश्लेषण (सत, रज, तम) तक जाता है, जो लेखक के शोधपरक दृष्टिकोण को प्रमाणित करता है।
(ख) व्यक्तित्व की व्यंजना और बेबाकी: पंडित बालकृष्ण भट्ट का व्यक्तित्व उनके निबन्धों में अत्यंत प्रखर और बेबाक होकर उभरता है। वे 'भागवत' के उस श्लोककार को भी 'चपत' लगाने की बात करते हैं जो भारत में जन्म लेने के लिए देवताओं के तरसने की बात करता है, क्योंकि भट्ट जी को तत्कालीन गुलाम भारत का निकृष्ट जीवन नरक से भी बदतर लगता है। उनके व्यक्तित्व में एक सुधारवादी तेवर है जो बाल-विवाह जैसी कुरीतियों के विरुद्ध 'मजबूत धक्के' देने का प्रयास करता है। वे एक ऐसे निष्पक्ष प्रेक्षक के रूप में दिखते हैं जो धन के प्रभाव में फिसलते हुए मनस्वियों को देखकर व्यथित हैं।
(ग) भाषा-शैली का सूक्ष्म निरीक्षण: भट्ट जी की भाषा भारतेन्दु युग की प्रतिनिधि भाषा है—संस्कृतनिष्ठ तत्समता के साथ उर्दू के शब्दों (मजमून, बेअदबी, तनज्जुली) और ग्रामीण मुहावरों का सहज प्रवाह। उनकी शैली 'संवादपरक' और 'विचारात्मक' है। सिद्धार्थक और वृन्दावन का प्रसंग निबन्ध में कथात्मकता का पुट देता है। शैली में 'आर्ष' प्रभाव है, जहाँ वे अपनी बात की पुष्टि के लिए महाभारत और अन्य शास्त्रों के श्लोकों का प्रयोग करते हैं। "घिष्ट-पिष्ट" और "हाहा-ठीठी" जैसे शब्दों का प्रयोग भाषा में सजीवता और व्यंग्य का रंग भर देता है।
(घ) संरचनात्मक तर्कशीलता और उद्देश्य: निबन्ध की संरचना सोपानवत है—प्रवाह की अजेयता, धन का प्रभाव, ऐतिहासिक विनाश, त्रिगुणात्मक युग-विभाजन और अंत में समाधान। लेखक का उद्देश्य पाठक को संसार की नश्वरता का बोध कराना और उसे पराधीनता व मोह की 'प्रमाद-मदिरा' से जगाना है। वे सिद्ध करते हैं कि उपदेशों और वक्तृताओं से समाज तब तक नहीं बदलता जब तक काल का प्रवाह अनुकूल न हो।
(ङ) प्रासंगिकता और निष्कर्ष: आज के उपभोक्तावादी युग में, जहाँ 'रुपया' ही सर्वोपरि हो गया है, भट्ट जी की यह समीक्षा और भी सटीक बैठती है। निबन्ध का अंत 'धैर्य' की नौका के साथ करना लेखक की सकारात्मक सोच को दर्शाता है। यह निबन्ध हिन्दी गद्य साहित्य की वह अमूल्य निधि है जो पाठकों को आत्म-चिन्तन और सांस्कृतिक उत्थान के लिए प्रेरित करती है। भारतेन्दु युग के गद्य का यह एक शोधपरक और कलात्मक शिखर है।
५. कठिन शब्दावली
६. परीक्षा-उपयोगी प्रश्नोत्तर
उत्तर : क्योंकि वैज्ञानिक नदियों और समुद्रों के प्रवाह को तो यंत्रों द्वारा रोक सकते हैं, किन्तु समय और सृष्टि की गति (कालचक्र) को पलटने या रोकने की शक्ति किसी भी मनुष्य में नहीं है।
उत्तर : सिद्धार्थक के अनुसार वर्तमान समय में आत्मगौरव, अपमान और धर्माचरण—सब कुछ 'रुपये' के लिए है और रुपये से ही सधता है। बड़े-बड़े तपस्वी भी धन के सामने विचलित हो जाते हैं।
उत्तर : लेखक के अनुसार जब तक जगत का प्रवाह अपने पूर्ण वेग से चलता है, तब तक कुशलता है। यदि यह प्रवाह एक निमेष (पल) मात्र के लिए भी रुक जाए, तो प्रलय का सामान जुट जाता है।
उत्तर : लेखक ने प्राचीन भारत, पारस (ईरान), यूनान और रोम का उदाहरण दिया है, जो कभी सभ्यता के शिखर पर थे, किन्तु जगत प्रवाह में पड़कर आज केवल कहानियों का विषय रह गए हैं।
उत्तर : रजोगुण बढ़ने पर समाज में प्रमाद, आलस्य, तृष्णा, स्वार्थ, हिंसा और अपने-पराये का भेद बढ़ जाता है। लेखक के अनुसार वर्तमान में विलायत (पश्चिम) में रजोगुण बढ़ा हुआ है।
उत्तर : लेखक ने हिंदुस्तान की वर्तमान अवनति, पराधीनता और जघन्यता के लिए 'तमोगुण' को उत्तरदायी माना है, जो कालचक्र की वक्रगति के कारण प्रवाहित हो रहा है।
उत्तर : लेखक ने व्यंग्य किया है कि यदि वह श्लोककार मिलता तो उसे 'तीन चपत' लगाते, क्योंकि उसने लिखा कि देवता भारत में जन्म लेने को तरसते हैं, जबकि वर्तमान पराधीन जीवन नरक से भी बदतर है।
उत्तर : मोहमयी प्रमाद-मदिरा को पीकर सम्पूर्ण जगत उन्मत्त (पागल) हो गया है, जहाँ लोग मृत्यु और विपत्ति को सामने देखकर भी अपनी नश्वरता के प्रति सचेत नहीं होते।
उत्तर : महाभारत के वन-पर्व का सन्दर्भ देते हुए लेखक ने बताया है कि 'धैर्य' (धृति) की नौका ही एकमात्र उपाय है, जिस पर चढ़कर मनुष्य जन्म-मरण के क्लेश और कामनाओं के भँवर से बच सकता है।
उत्तर : इसकी शैली विचारात्मक और दार्शनिक है, जिसमें संस्कृत के श्लोकों, उर्दू की शब्दावली और संवादपरक प्रसंगों का प्रयोग कर विषय को गम्भीर और प्रभावी बनाया गया है।

लेख कई स्थान पर असम्बद्ध शैली में है तथापि मन्थन प्रशंसनीय है। भागवत् के रचयिता के प्रति अपशब्दों का प्रयोग धिक्करणीय है।
जवाब देंहटाएंयह निबन्ध भारतेन्दु युग के प्रसिद्ध निबन्धकार श्री बालकृष्ण भट्ट जी का है। उस समय हिन्दी खड़ी बोली अपने प्रारम्भिक अवस्था में थी ।
जवाब देंहटाएंभले यह साहब बड़े साहित्यकार हों, पर उनका यह निबंध बहुत कमज़ोर लगा। कई स्थानों पर लगा, कहना क्या चाहते हो भाई। कई शब्द संग्रहणीय हैं इस निबंध के।
जवाब देंहटाएंइन्होने जब इस निबन्ध को लिखा तब हिन्दी गद्य लिखने का प्रचलन ही नहीं था। हिन्दी साहित्य की प्रारम्भिक अवस्था थी, खड़ी बोली का कोई स्वरूप ही नहीं था इसके बावजूद इनकी निष्ठा को कमतर नहीं आंका जा सकता । इनका महत्व समय की दृष्टि से अप्रतिम है ।
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