मारेसि मोहिं कुठाँउ : विस्तृत समीक्षा, सारांश एवं प्रश्नोत्तर
प्रस्तुत लेख में 'द्विवेदी युग' के प्रकाण्ड विद्वान और भाषाशास्त्री पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी द्वारा रचित व्यंग्यात्मक एवं गवेषणात्मक निबन्ध 'मारेसि मोहिं कुठाँउ' का गहन विश्लेषण है। इसमें शब्दों के इतिहास और सांस्कृतिक द्वन्द्व को अनूठे ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
१. निबन्धकार का परिचय
पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी (1883–1922 ई.) हिन्दी साहित्य के द्विवेदी युग के एक ऐसे विलक्षण प्रतिभा संपन्न साहित्यकार हैं, जिन्होंने बहुत कम लिखकर भी अमरत्व प्राप्त किया। वे मूलतः भाषाशास्त्री, इतिहासकार और कहानीकार थे। उनकी कहानी 'उसने कहा था' हिन्दी कहानी साहित्य का मील का पत्थर मानी जाती है। गुलेरी जी की विद्वत्ता का क्षेत्र अत्यंत व्यापक था; वे संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश और अंग्रेजी सहित अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे। उनके निबन्धों में 'पुरातत्व' और 'भाषा-विज्ञान' के साथ 'विनोद' (Humor) का जो मेल मिलता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। 'मारेसि मोहिं कुठाँउ', 'कछुआ धर्म' और 'पुरानी हिन्दी' उनके अत्यंत चर्चित लेख हैं। वे काशी नागरी प्रचारिणी सभा से सक्रिय रूप से जुड़े रहे। उनका लेखन पाठकों की तार्किक बुद्धि को जाग्रत करने के साथ-साथ भाषा की ऐतिहासिक यात्रा का परिचय भी कराता है।
२. मूल पाठ
जब कैकेयी ने दशरथ से यह वर माँगा कि राम को वनवास दे दो तब दशरथ तिलमिला उठे, कहने लगे कि चाहे मेरा सिर माँग ले अभी दे दूँगा, किन्तु मुझे राम के विरह से मत मार। गोसाईं तुलसीदासजी के भाव भरे शब्दों में राजा ने सिर धुन कर लम्बी साँस भर कर कहा 'मारेसि मोहिं कुठाँउ' - मुझे बुरी जगह पर घात किया। ठीक यही शिकायत हमारी आर्यसमाज से है। आर्यसमाज ने भी हमें कुठाँव मारा है, कुश्ती में बुरे पेच से चित पटका है।
हमारे यहाँ पूँजी शब्दों की है। जिससे हमें काम पड़ा, चाहे और बातों में हम ठगे गए पर हमारी शब्दों की गाँठ नहीं कतरी गई। राज के और धन के गठकटे यहाँ कई आये पर शब्दों की चोरी (महाभारत के ऋषियों के कमलनाल की ताँत की चोरी की तरह) किसी ने न की। यही नहीं, जो आया उससे हमने कुछ ले लिया।
पहले हमें काम असुरों से पड़ा, असीरियावालों से। उनके यहाँ असुर शब्द बड़ी शान का था। असुर माने वाला प्राणवाला, जबरदस्त। हमारे इन्द्र को भी यही उपाधि हुई, पीछे चाहे शब्द का अर्थ बुरा हो गया। फिर काम पड़ा पणियों से - फिनीशियन व्यापारियों से। उनसे हमने पण धातु पाया, जिसका अर्थ लेन-देन करना, व्यापार करना है। एक पणि उनमें ऋषि भी हो गया, जो विश्वामित्र के दादा गाधि की कुर्सी के बराबर जा बैठा। कहते हैं कि उसी का पोता पाणिनि था, जो दुनिया को चकरानेवाला सर्वांगसुन्दर व्याकरण हमारे यहाँ बना गया। पारस के पार्श्वों या पारसियों से काम पड़ा तो वे अपने सूबेदारों की उपाधि क्षत्रप या छत्रपावन् या महाक्षत्रप हमारे यहाँ रख गए और गुस्तास्य, विस्तास्य के वजन के कृश्वाश्व, श्यावाश्व, बृहदश्व आदि ऋषियों और राजाओं के नाम दे गये। यूनानी यवनों से काम पड़ा तो वे यवन की स्त्री यवनी तो नहीं, पर यवन की लिपि यवनानी शब्द हमारे व्याकरण को भेंट कर गये। साथ ही बारह राशियाँ मेष, वृष, मिथुन आदि भी यहाँ पहुँचा गये। इन राशियों के ये नाम तो उनकी असली ग्रीक शकलों के नामों के संस्कृत तक में हैं, पुराने ग्रंथकार तो शुद्ध यूनानी नाम आर, तार, जितुम आदि काम में लेते थे। ज्योतिष में यवन सिद्धांत को आदर से स्थान मिला। वराहमिहिर की स्त्री यवनी रही हो या न रही हो, उसने आदर से कहा है कि म्लेच्छ यवन भी ज्योति:शास्त्र जानने से ऋषियों की तरह पूजे जाते हैं। अब चाहे वेल्युयेबल सिस्टम भी वेद में निकाला जाय पर पुराने हिंदू कृतघ्न और गुरुमार नहीं थे। सेल्युकस निकेटर की कन्या चन्द्रगुप्त मौर्य के जमाने में आयी, यवन-राजदूतों ने विष्णु के मंदिरों में गरुड़ध्वज बनाये और यवन राजाओं की उपाधि सोटर, त्रातर का रूप लेकर हमारे राजाओं के यहाँ आ लगी। गांधार से न केवल दुर्योधन की माँ गांधारी आई, बालवाली भेड़ों का नाम भी आया। बल्ख से केसर और हींग का नाम बाल्हीक आया। घोड़ों के नाम पारसीक, कांबोज, वनायुज, बाल्हीक आये। शकों के हमले हुए तो शाकपार्थिव वैयाकरणों के हाथ लगा और शक संवत् या शाका सर्वसाधारण के। हूण वंक्षु (Oxus) नदी के किनारे पर से यहाँ चढ़ आये तो कवियों को नारंगी उपमा मिली कि ताजा मुड़े हुए हूण की ठुड्डी की-सी नारंगी। कलचुरी राजाओं को हूणों की कन्या मिली। पंजाब में वाहीक नामक जंगली जाति आ जमी तो बेवकूफ, बौड़म के अर्थ में (गौर्वाहीक:) मुहाविरा चल गया। हाँ, रोमवालों से कोरा व्यापार ही रहा, पर रोमक सिद्धान्त ज्योतिष के कोष में आ गया। पारसी राज्य न रहा पर सोने के सिक्के निष्क द्रम्भ (दिरहम) और दीनार (डिनारियस) हमारे भंडार में आ गये। अरबों ने हमारे 'हिंदसे' लिये तो ताजिक, मुथहा, इत्थशाल आदि दे भी गये, कश्मीरी कवियों को प्रेम अर्थ में हेवाक दे गए। मुसलमान आये तो सुलताना का सुरत्राण, हमीर का हम्मीर, मुगल का मुँगल, मसजिद का मसीति: कई शब्द आ गये। लोग कहते हैं कि हिन्दुस्तान अब एक हो रहा है, हम कहते हैं कि पहले एक था, अब बिखर रहा है। काशी की नागरी प्रचारिणी सभा वैज्ञानिक परिभाषा का कोष बनाती है। उसी की नाक के नीचे बाबू लक्ष्मीचन्द वैज्ञानिक पुस्तकों में नयी परिभाषा काम में लाते हैं। पिछवाड़े में प्रयाग की विज्ञान-परिषद् और ही शब्द गढ़ती है। मुसलमान आये तो कौन-सी बाबू श्यामसुन्दर की कमिटी बैठी थी कि सुलतान को सुरत्राण कहो और मुगल को मुगल? तो कभी कश्मीरी कवि या गुजराती कवि या राजपूताने के पंडित सब सुरत्राण कहने लग गये। एकता तब थी कि अब?
बौद्ध हमारे यहीं से निकले थे। उस समय के वे आर्यसमाजी ही थे। उन्होंने भी हमारे भंडार को भरा। हम तो 'देवानां प्रिय' मूर्ख को कहा करते थे। उन्होंने पुण्य-श्लोक धर्माशोक के साथ यह उपाधि लगाकर इसे पवित्र कर दिया। हम निर्वाण के माने दिये का बिना हवा के बुझना ही जानते थे, उन्होंने मोक्ष का अर्थ कर दिया। अवदान का अर्थ परम सात्विक दान भी उन्होंने किया।
बकौल शेक्सपीयर के जो मेरा धन छीनता है, वह कूड़ा चुराता है, पर जो मेरा नाम चुराता है वह सितम ढाता है, आर्यसमाज ने मर्मस्थल पर वह मार की है कि कुछ कहा नहीं जाता, हमारी ऐसी चोटी पकड़ी है कि सिर नीचा कर दिया। औरों ने तो गाँव को कुछ न दिया, उन्होंने अच्छे-अच्छे शब्द छीन लिये। इसी से कहते हैं कि 'मारेसि मोहिं कुठाँउ'। अच्छे-अच्छे पद तो यों सफाई से ले लिये हैं कि इन पुरानी दुकानों का दिवाला निकल गया। लेने की देने पड़ गये।
हम अपने आपको 'आर्य' नहीं कहते, 'हिन्दू' कहते हैं। जैसे परशुराम के भय से क्षत्रियकुमार माता के लहँगों में छिपाये जाते थे वैसे ही विदेशी 'शब्द' 'हिन्दू' की शरण लेनी पड़ती है और आर्यसमाज पुकार-पुकार कर जले पर नमक छिड़कता है कि हैं क्या करते हो? हिन्दू माने काला चोर, काफिर। अरे भाई कहीं बसने भी दोगे? हमारी मंडलियाँ भले, 'सभा' कहलावें, 'समाज' नहीं कहला सकतीं। न आर्य रहे न समाज रहा तो क्या अनार्य कहें और समाज कहें (समाज पशुओं का टोला होता है)? हमारी सभाओं के पति या उपपति (गुस्ताखी माफ, उपसभापति से मुराद है) हो जावें किन्तु प्रधान या उपप्रधान नहीं कहा सकते। हमारा धर्म वैदिक धर्म नहीं कहलावेगा, उसका नाम रह गया है - सनातन धर्म। हम हवन नहीं कर सकते, होम करते हैं। हमारे संस्कारों की विधि संस्कार विधि नहीं रही, वह पद्धति (पैर पीटना) रह गयी। उनके समाज-मंदिर होते हैं, हमारे सभा-भवन होते हैं। और तो क्या 'नमस्ते' का वैदिक फिकरा हाथ से गया, चाहे जयरामजी कह लो, चाहे जयश्रीकृष्ण, नमस्ते मत कह बैठना। ओंकार बड़ा मांगलिक शब्द है। कहते हैं कि यह पहले-पहल ब्रह्मा का कंठ फाड़कर निकला था। प्रत्येक मंगल-कार्य के आरम्भ में हिन्दू श्री गणेशाय नम: कहते हैं। अभी इस बात का श्रीगणेश हुआ है - इस मुहावरे का अर्थ है कि अभी आरम्भ हुआ है। एक वैश्य यजमान के यहाँ मृत्यु हो जाने पर पंडित जी गरुड़ पुराण की कथा कहने गये। आरम्भ किया, श्री गणेशाय नम:। सेठ जी चिल्ला उठे - 'वाह महराज! हमारे यहाँ तो ... और आप कहते हैं कि श्री गणेशाय नम:। माफ करो।' तब से चाल चल गयी है कि गरुड़पुराण की कथा में श्री गणेशाय नम: नहीं कहते हैं श्रीकृष्णाय नम: कहते हैं। उसी तरह अब सनातनी हिन्दू न बोल सकते हैं न लिख सकते हैं, संध्या या यज्ञ करने पर जोर नहीं देते। श्रीमद्-भागवत की कथा या ब्राह्मण-भोजन पर सन्तोष करते हैं।
और तो और, आर्यसमाज ने तो हमें झूठ बोलने पर लाचार किया। यों हम लिल्लाही झूठ न बोलते, पर क्या करें। इश्कबाजी और लड़ाई में सब कुछ जायज है। हिरण्यगर्भ के माने सोने की कौंधनी पहने हुए कृष्णचन्द्र करना पड़ता है, 'चत्वारि श्रृंगा' वाले मंत्र का अर्थ मुरली करना पड़ता है, 'अष्ट-वर्षोष्टवर्षो वा' में अष्ट च अष्ट च एकशेष करना पड़ता है। शतपथ ब्राह्मण के महावीर नामक कपालों की मूर्तियाँ बनाना पड़ता है। नाम तो रह गया हिन्दू। तुम चिढ़ाते हो कि इसके माने होते हैं काला, चोर या काफिर। अब क्या करें? कभी तो इसकी व्युत्पत्ति करते हैं कि हि+इंदु। कभी मेरुतंत्र का सहारा लेते हैं कि 'हीनं च दूष्यत्येव हिन्दुरित्युच्यते प्रिये।' यह उमा-महेश्वर संवाद है, कभी सुभाषित के श्लोक 'हिंदवो विंध्यमाविशन्' को पुराना कहते हैं और यह उड़ा जाते हैं कि उसी के पहले 'यवनैरवनि: क्रांता' भी कहा है, कभी महाराज कश्मीर के पुस्तकालय में कालिदास रचित विक्रम महाकाव्य में 'हिन्दूपति: पाल्यताम्' पद प्रथम श्लोक में मानना पड़ता है। इसके लिए महाराज कश्मीर के पुस्तकालय की कल्पना की, जिसका सूचीपत्र डाक्टर स्टाइन ने बनाया हो, वहाँ पर कालिदास के कल्पित काव्य की कल्पना कालिदास के विक्रम संवत् चलानेवाले विक्रम के यहाँ होने की कल्पना तथा यवनों से अस्पृष्ट (यवन माने मुसलमान! भला यूनानी नहीं) समय में हिन्दू पद के प्रयोग की कल्पना, कितना दु:ख तुम्हारे कारण उठाना पड़ता है।
बाबा दयानन्द ने चरक के एक प्रसिद्ध श्लोक का हवाला दिया कि सोलह वर्ष से कम अवस्था की स्त्री में पच्चीस वर्ष से कम पुरुष का गर्भ रहे तो या तो वह गर्भ में ही मर जाय, या चिरंजीवी न हो या दुर्बलेंद्रिय जीवे। हम समझ गये कि यह हमारे बालिका-विवाह की ज़ड़ कटी नहीं, बालिकारभस पर कुठार चला। अब क्या करें? चरक कोई धर्म ग्रंथ तो है नहीं कि जोड़ की दूसरी स्मृति में से दूसरा वाक्य तुर्की-बतुर्की जवाब में दे दिया जाय। धर्म-ग्रन्थ नहीं है, आयुर्वेद का ग्रंथ है इसलिए उसके चिरकाल न जीने या दुर्बलेंद्रिय होकर जीने की बात का मान भी कुछ अधिक हुआ। यों चाहे मान भी लेते और व्यवहार में मानते ही हैं - पर बाबा दयानन्द ने कहा तो उसकी तरदीद होनी चाहिए। एक मुरादाबादी पंडित जी लिखते हैं कि हमारे परदादा के पुस्तकालय में जो चरक की पोथी है, उसमें पाठ है -
३. निबन्ध का प्रतिपाद्य एवं सारांश
पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी रचित 'मारेसि मोहिं कुठाँउ' निबन्ध का मूल प्रतिपाद्य भाषा के ऐतिहासिक विकास और सनातन धर्म बनाम आर्यसमाज के भाषाई द्वन्द्व को उजागर करना है। गुलेरी जी व्यंग्यात्मक ढंग से कहते हैं कि भारत में धन और साम्राज्य की चोरी तो होती रही, लेकिन शब्दों की पूँजी सुरक्षित रही। निबन्ध का सारांश यह है कि भारत ने युगों-युगों से विदेशी जातियों (यूनानी, शक, हूण, अरब, मुसलमान) से शब्द उधार लिए और उन्हें अपनी संस्कृति में आत्मसात किया। लेकिन आर्यसमाज के उदय ने सनातनी हिंदुओं से उनके पारंपरिक और प्रिय शब्दों (जैसे आर्य, सभा, प्रधान, नमस्ते) को छीन लिया है या उन्हें प्रयोग करने में संकोच पैदा कर दिया है। लेखक यह भी दर्शाते हैं कि सनातनी हिंदू अपने 'हिंदू' शब्द के अस्तित्व को बचाने के लिए कैसी-कैसी काल्पनिक व्युत्पत्तियाँ गढ़ते हैं। अंततः, यह निबन्ध भाषाई समन्वय के खोते हुए गौरव और आधुनिक धार्मिक संस्थाओं के बीच छिड़ी भाषाई कुश्ती का सजीव चित्रण है।
४. निबन्ध तत्वों के आधार पर मारेसि मोहिं कुठाँउ की समीक्षा
(क) विषय-वस्तु और गवेषणात्मक दृष्टिकोण: 'मारेसि मोहिं कुठाँउ' निबन्ध की विषय-वस्तु अत्यंत रोचक और शोधपरक है। गुलेरी जी ने इसमें 'शब्दों के इतिहास' (Etymology) को आधार बनाया है। वे असुर, पणि, यवन, हूण और मुगलों से आए शब्दों की एक लंबी सूची प्रस्तुत करते हैं, जो यह सिद्ध करती है कि भारतीय संस्कृति सदैव समन्वयवादी रही है। लेखक ने दशरथ के 'कुठाँव' (गलत जगह चोट) वाले प्रसंग से आर्यसमाज द्वारा सनातनी परंपराओं पर किए गए भाषाई प्रहार को जिस प्रकार जोड़ा है, वह उनकी विषय-वस्तु के अनूठेपन को दर्शाता है।
(ख) व्यंग्य और हास्य का समन्वय: इस निबन्ध में गुलेरी जी का धारदार व्यंग्य अपने चरम पर है। वे सनातनी हिंदुओं की उन विवशताओं पर हँसते हैं जहाँ उन्हें 'नमस्ते' त्यागकर 'जयरामजी' कहना पड़ता है, क्योंकि नमस्ते पर आर्यसमाज का अधिकार हो गया है। शेक्सपियर के उद्धरण के माध्यम से वे बताते हैं कि नाम की चोरी धन की चोरी से अधिक दुखदायी होती है। उपसभापति को 'उपपति' कहने का भाषाई भ्रम और 'गौर्वाहीक' मुहावरे का प्रयोग निबन्ध में हास्य की धारा प्रवाहित करता है।
(ग) भाषा-शैली और भाषिक पुरातत्व: गुलेरी जी की भाषा प्रकाण्ड पांडित्य और सरल प्रवाह का मिश्रण है। वे एक ही निबन्ध में संस्कृत के श्लोक, रामायण के संदर्भ, अंग्रेजी के वैज्ञानिक शब्द और अरबी-फारसी के मुहावरे सहजता से पिरो देते हैं। उनकी शैली 'पुरातत्व' की खुदाई जैसी है, जहाँ वे एक-एक शब्द की जड़ें खोदकर निकालते हैं। जैसे—पण धातु से पणि, पाणिनि और व्यापार का संबंध जोड़ना। उनकी शैली पाठक को सूचना देने के साथ-साथ बौद्धिक आनंद भी प्रदान करती है।
(घ) व्यक्तित्व की व्यंजना और सांस्कृतिक चेतना: निबन्ध में लेखक का एक उदारवादी किन्तु अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ व्यक्तित्व उभरता है। वे इस बात से दुखी हैं कि पहले भारत भाषाई रूप से एक था, लेकिन अब वैज्ञानिक परिभाषाओं और धार्मिक संस्थाओं के नाम पर बिखर रहा है। उनके व्यक्तित्व में एक तार्किक आलोचक छिपा है जो सनातनियों द्वारा 'हिंदू' शब्द के बचाव में गढ़ी गई काल्पनिक कथाओं (जैसे मेरुतंत्र या कश्मीर पुस्तकालय की कल्पना) की पोल खोलता है।
(ङ) प्रासंगिकता और निष्कर्ष: यह निबन्ध आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक है क्योंकि यह बताता है कि कट्टरता किस प्रकार भाषा को संकुचित कर देती है। गुलेरी जी यह संदेश देते हैं कि भाषा और संस्कृति को खुले मन से स्वीकार करना चाहिए। यह निबन्ध केवल आर्यसमाज और सनातनी विवाद का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह हिन्दी आलोचना और भाषा-विज्ञान का एक अनूठा समन्वय है, जो द्विवेदी युग की साहित्यिक ऊँचाई को प्रमाणित करता है।
५. कठिन शब्दावली
६. परीक्षा-उपयोगी महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
उत्तर : यह शीर्षक रामायण के उस प्रसंग से लिया गया है जहाँ राजा दशरथ, कैकेयी द्वारा राम के वनवास का वरदान माँगने पर कहते हैं कि तुमने मुझे मर्मस्थल (कुठाँव) पर चोट पहुँचाई है।
उत्तर : लेखक के अनुसार आर्यसमाज ने सनातनी हिंदुओं के श्रेष्ठ और पवित्र शब्दों (जैसे आर्य, सभा, नमस्ते, प्रधान) को अपना लिया है, जिससे सनातनी अब उन शब्दों का प्रयोग करने में खुद को पराया महसूस करते हैं।
उत्तर : गुलेरी जी बताते हैं कि असुर शब्द पहले असीरिया वालों के यहाँ 'प्राणवान' या 'शक्तिशाली' के अर्थ में प्रयुक्त होता था और इंद्र को भी यह उपाधि मिली थी, बाद में इसका अर्थ बुरा हो गया।
उत्तर : लेखक के अनुसार पणि (फिनीशियन व्यापारी) शब्द से 'पण' धातु बना जिसका अर्थ व्यापार है और इन्हीं पणियों के वंशज पाणिनि थे जिन्होंने महान व्याकरण की रचना की।
उत्तर : पंजाब की वाहीक नामक जंगली जाति के भारत आने पर उनके नाम से 'बौड़म' या 'बेवकूफ' के अर्थ में 'गौर्वाहीक:' (बैल के समान वाहीक) मुहावरा चल पड़ा।
उत्तर : क्योंकि 'नमस्ते' शब्द को आर्यसमाज ने अपनी पहचान बना लिया है, इसलिए सनातनी हिंदू अब नमस्ते के स्थान पर जयरामजी या जयश्रीकृष्ण कहना अधिक पसंद करते हैं।
उत्तर : सनातनी हिंदू इसे बचाने के लिए 'हि+इन्दु' जैसी व्युत्पत्तियाँ करते हैं या कश्मीर के पुस्तकालय में कालिदास के कल्पित काव्यों में इस शब्द के होने का दावा करते हैं।
उत्तर : पहले 'देवानां प्रिय' शब्द मूर्ख के लिए प्रयुक्त होता था, लेकिन बौद्धों ने सम्राट अशोक के नाम के साथ इसे जोड़कर इसे अत्यंत पवित्र और सम्मानित बना दिया।
उत्तर : लेखक का मत है कि भारत पहले भाषाई रूप से अधिक एक था जब सब एक जैसे शब्द अपना लेते थे, लेकिन अब परिभाषाओं और धार्मिक संस्थाओं के कारण यह बिखर रहा है।
उत्तर : स्वामी दयानन्द ने आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथ 'चरक' का सहारा लिया, जिसमें कम आयु में विवाह और गर्भधारण के शारीरिक दुष्परिणामों का वर्णन है।
