भाषा — परिभाषा, उत्पत्ति, प्रकार, भेद-विभेद, प्रकृति एवं संरचना

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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भाषा — परिभाषा, उत्पत्ति, प्रकार, भेद-विभेद, प्रकृति एवं संरचना
मूल धातु : संस्कृत 'भाष्' धातु (अर्थ : बोलना या व्यक्त वाणी)
मूल प्रकृति : सामाजिक, अर्जित एवं यादृच्छिक (Arbitrary) व्यवस्था
प्रमुख घटक : ध्वनि (Phoneme), पद/रूप (Morpheme), वाक्य (Syntax), अर्थ (Semantics)
अध्ययन विधा : भाषा-विज्ञान (Linguistics)
विकास की दिशा : संयोग से वियोग की ओर (स्थूल से सूक्ष्म/सरल की ओर)
सर्वोच्च कार्य : विचार-विनिमय, ज्ञान-संरक्षण एवं संस्कृति-संवहन

१. भाषा की परिभाषा एवं व्युत्पत्ति

मानव सामाजिक प्राणी है और उसके विचार, भावनाएँ तथा अनुभूतियाँ अभिव्यक्त करने का प्रमुख माध्यम भाषा है। भाषा केवल संप्रेषण का साधन ही नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और मानवीय बौद्धिक विकास का आधार भी है। भाषा शब्द संस्कृत के भाष् धातु से बना है जिसका अर्थ है बोलना या कहना अर्थात् भाषा वह है जिसे बोला जाय।

"भाष्यते व्यक्तवाग् रूपेण अभिव्यज्यते इति भाषा।"
अर्थात्— व्यक्त वाणी के रूप में जिसकी अभिव्यक्ति की जाती है, उसे भाषा कहते हैं।

संघटनात्मक दृष्टि से भाषा-शास्त्रियों ने भाषा की परिभाषा दी है— भाषा मनुष्य-समाज में विचारों, भावों और अनुभवों को व्यक्त करने का प्रमुख साधन है। यह ध्वनि-प्रत्ययों, शब्दों, वाक्यों तथा व्याकरणिक संरचनाओं द्वारा अभिव्यक्ति का एक सुसंगठित माध्यम है।

मानव-सभ्यता के विकास में भाषा की भूमिका मूलभूत और अनिवार्य मानी गई है— यह ज्ञान-संरक्षण, संस्कृति-संवहन और सामाजिक व्यवहार का आधार है। यदि मनुष्य के पास भाषा का वरदान न होता, तो यह सम्पूर्ण संसार गूँगे और अंधकारमय वातावरण में सिमट कर रह जाता। महर्षि दण्डी ने काव्यादर्श में ठीक ही कहा है— "इदमन्धं तमः कृत्स्नं जायेत भुवनत्रयम्। यदि शब्दाह्वयं ज्योतिरासंसारं न दीप्यते॥"

२. विद्वानों द्वारा दी गई भाषा की परिभाषाएँ

भाषा को लेकर प्राचीन एवं अर्वाचीन भारतीय आचार्यों तथा भाषा-विज्ञानियों ने अपनी प्रामाणिक परिभाषाएँ दी हैं—

(क) भारतीय आचार्यों एवं विद्वानों के अनुसार परिभाषाएँ :

  1. महर्षि पतंजलि : "व्यक्ता वाचि वर्णा येषा त इमे व्यक्तवाचः" अर्थात् जो वाणी वर्णों में व्यक्त हो उसे भाषा कहते हैं।
  2. महर्षि पाणिनि : "भाषा मनुष्य की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है।"
  3. आचार्य भर्तृहरि : "वाक्यं नाम मनोवृत्तिः।" (भाषा (वाक्) मनोभावों की अभिव्यक्ति है।)
  4. पण्डित कामता प्रसाद 'गुरु' : "भाषा वह साधन है, जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचार दूसरों पर भली भाँति प्रकट कर सकता है और दूसरों के विचार आप स्पष्टतया समझ सकते हैं।"
  5. स्वामी दयानन्द सरस्वती : "वाणी वह साधन है जिससे जीव अपने हृदय के भावों को प्रकट करता है।"
  6. राजा राममोहन राय : "भाषा वह साधन है जिससे समाज अपने विचारों और संस्कृति को स्थिर रखता है।"
  7. डॉ० पाण्डुरंग दामोदर गुणे : "ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा हृद्गत भावों तथा विचारों का प्रकटीकरण ही भाषा है।"
  8. डॉ० भोलानाथ तिवारी : "भाषा निश्चित प्रयत्न के फलस्वरूप मनुष्य के मुख से निःसृत वह सार्थक ध्वनि समष्टि है, जिसका विश्लेषण और अध्ययन हो सके।"
  9. डॉ० श्याम सुन्दरदास : "मनुष्य और मनुष्य के बीच वस्तुओं के विषय में अपनी इच्छा और मति का आदान-प्रदान करने के लिए व्यक्त ध्वनि संकेतों का जो व्यवहार होता है उसे भाषा कहते हैं।"
  10. डॉ० सुनीति कुमार चटर्जी : "भाषा मनुष्य की सामाजिक आवश्यकता है, जिसके बिना संस्कृति का विकास असंभव है।"
  11. डॉ० मंगलदेव शास्त्री : "भाषा मनुष्यों की उस चेष्टा या व्यापार को कहते हैं, जिससे मनुष्य अपने उच्चारणोपयोगी शरीरावयवों से उच्चारण किये गये वर्णात्मक या व्यक्त शब्दों द्वारा अपने विचारों को प्रकट करते हैं।"
  12. आचार्य देवेन्द्र नाथ शर्मा : "भाषा यादृच्छिक, रूढ़ उच्चारित संकेत की वह प्रणाली है जिसके माध्यम से मनुष्य परस्पर विचार-विनिमय सहयोग अथवा भावाभिव्यक्ति करते हैं।"
  13. डॉ० सुकुमार सेन : "अर्थवान, कण्ठोद्‌गीर्ण ध्वनि-समष्टि ही भाषा है।"
  14. डॉ० बाबूराम सक्सेना : "जिन ध्वनि चिह्नों द्वारा मनुष्य परस्पर विचार-विनिमय करता है, उनको समष्टि रूप से भाषा कहते हैं।"
  15. डॉ० राजेन्द्र प्रसाद : "भाषा वह माध्यम है जिससे मनुष्य का व्यक्तित्व, समाज और संस्कृति एक सूत्र में बंधते हैं।"
  16. डॉ० रामविलास शर्मा : "भाषा समाज की चेतना का दर्पण है।"

(ख) पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार भाषा की परिभाषाएँ :

  1. फर्डिनांड द सॉस्यूर (Ferdinand de Saussure) : भाषा सामाजिक संकेत-तंत्र (system of signs) है। ("Language is a system of signs that express ideas.")
  2. नोम चॉम्स्की (Noam Chomsky) : भाषा मानवीय मस्तिष्क की अन्तर्निहित क्षमता है। ("Language is a set of sentences constructed out of a finite set of elements.")
  3. हेनरी स्वीट (Henry Sweet) : "ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा विचारों को प्रकट करना ही भाषा है।"
  4. मैक्समूलर (Max Müller) : "भाषा और कुछ नहीं है, केवल मानव की चतुर बुद्धि द्वारा आविष्कृत ऐसा उपाय है जिसकी मदद से हम अपने विचार सरलता और तत्परता से दूसरों पर प्रकट कर सकते हैं और जो चाहते हैं कि इसकी व्याख्या प्रकृति की उपज के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्य कृत पदार्थ के रूप में करना उचित है।"
  5. जोसेफ वांद्रेये (J. Vendryes) : "भाषा एक प्रकार का चिह्न है, चिह्न से तात्पर्य उन प्रतीकों से है, जिनके द्वारा मनुष्य अपना विचार दूसरों पर प्रकट करता है। ये प्रतीक भी कई प्रकार के होते हैं। जैसे नेत्रग्राह्य, श्रोत्रग्राह्य एवं स्पर्शग्राह्य। वस्तुतः भाषा की दृष्टि से श्रोत्रग्राह्य प्रतीक ही सर्वश्रेष्ठ है।"
  6. बेनेदेत्तो क्रोचे (Benedetto Croce) : "भाषा उस स्पष्ट, सीमित तथा सुसंगठित ध्वनि को कहते हैं जो अभिव्यंजना के लिए नियुक्त की जाती है।"
  7. ओत्तो येस्पर्सन (Otto Jespersen) : "मनुष्य ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा अपना विचार प्रकट करता है। मानव मस्तिष्क वस्तुतः विचार प्रकट करने के लिए ऐसे शब्दों का निरन्तर उपयोग करता है। इस प्रकार के कार्य-कलाप को ही भाषा की संज्ञा दी जाती है।"
  8. बर्नार्ड ब्लॉख तथा जॉर्ज एल. ट्रेगर (B. Bloch & G. L. Trager) : "भाषा यादृच्छिक वाचिक ध्वनि-संकेतों की वह पद्धति है, जिसके द्वारा मानव समुदाय परस्पर सहयोग एवं विचारों का आदान-प्रदान करता है।" ("A language is a system of arbitrary vocal symbols by means of which a social group cooperates.")
  9. एलन एच. गार्डिनर (Alan H. Gardiner) : "विचारों की अभिव्यक्ति के लिए जिन व्यक्त एवं स्पष्ट ध्वनि संकेतों का व्यवहार किया जाता है, उन्हें भाषा कहते हैं।"
  10. एडगर एच. स्त्रुतेवाँ (E. H. Sturtevant) : "भाषा यादृच्छिक ध्वनि-संकेतों की वह पद्धति है जिसके द्वारा मानव समुदाय परस्पर सहयोग एवं विचार-विनिमय करते हैं।"
ब्लॉख, ट्रेगर एवं आधुनिक भाषा-शास्त्रियों के कथनानुसार भाषा के ४ अनिवार्य आधार-तत्व :
  1. भाषा एक पद्धति (System) है — यानी एक सुसम्बद्ध और सुव्यवस्थित योजना या संघटन है, जिसमें कर्ता, कर्म, क्रिया, आदि व्यवस्थित रूप में आ सकते हैं।
  2. भाषा संकेतात्मक (Symbolic) है — अर्थात् इसमें जो ध्वनियाँ उच्चारित होती हैं, उनका किसी वस्तु या कार्य से सम्बन्ध होता है। ये ध्वनियाँ संकेतात्मक या प्रतीकात्मक होती हैं।
  3. भाषा वाचिक ध्वनि-संकेत (Vocal) है — अर्थात् मनुष्य अपनी वागिन्द्रिय की सहायता से जिन संकेतों का उच्चारण करता है, वे ही भाषा के अंतर्गत आते हैं।
  4. भाषा यादृच्छिक संकेत (Arbitrary) है — यादृच्छिक से तात्पर्य है - ऐच्छिक, अर्थात् किसी भी विशेष ध्वनि का किसी विशेष अर्थ से मौलिक अथवा दार्शनिक सम्बन्ध नहीं होता। प्रत्येक भाषा में किसी विशेष ध्वनि को किसी विशेष अर्थ का वाचक ‘मान लिया जाता’ है। फिर वह उसी अर्थ के लिए रूढ़ हो जाता है। कहने का अर्थ यह है कि वह परम्परानुसार उसी अर्थ का वाचक हो जाता है। दूसरी भाषा में उस अर्थ का वाचक कोई दूसरा शब्द होगा (जैसे हिन्दी में 'जल', अंग्रेजी में 'Water' और अरबी में 'आब')।

३. भाषा की उत्पत्ति के प्रमुख सिद्धान्त

भाषा की उत्पत्ति मानव सभ्यता के इतिहास की सर्वाधिक रहस्यमय पहेलियों में से एक रही है। भाषा-विज्ञान के आचार्यों ने भाषा के उद्भव की व्याख्या हेतु निम्नलिखित प्रमुख सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है:

  1. दिव्योत्पत्ति सिद्धान्त (Divine Theory) — यह संसार का प्राचीनतम सिद्धान्त है, जिसका उल्लेख विभिन्न धर्म ग्रन्थों में मिलता है। इसके अनुसार भाषा मनुष्यकृत न होकर ईश्वर द्वारा निर्मित है। जैसे— वेदों को ईश्वर की वाणी (अपौरुषेय), बौद्ध परम्परा में पालि को 'मूलभाषा' तथा इस्लाम में कुरान की भाषा को ईश्वरीय माना गया है।
  2. ध्वनि-अनुकरण सिद्धान्त (Bow-wow Theory) — इसके अनुसार प्रारम्भिक मनुष्य ने प्रकृति की बाह्य ध्वनियों (पशु-पक्षियों, नदी-झरनों आदि) का अनुकरण करते हुए भाषा का विकास किया; जैसे— भौं-भौं से कुत्ता, म्याऊँ-म्याऊँ से बिल्ली, काँव-काँव से कौआ आदि।
  3. सहज / मनोभावाभिव्यक्ति सिद्धान्त (Pooh-pooh Theory) — मानव हृदय में हर्ष, शोक, घृणा, विस्मय या क्रोध के समय जो स्वाभाविक भावनात्मक उद्गार (आह, ओह, हाय, छी-छी, उफ़) अनायास ही मुख से निकल पड़े, वे ही धीरे-धीरे परिमार्जित होकर भाषा का मूल बने।
  4. रणन / अनुरणन सिद्धान्त (Ding-Dong Theory) — इसके समर्थक प्लेटो, हेस एवं मैक्समूलर हैं। इस मत के अनुसार जिस प्रकार संसार की प्रत्येक धातु पर चोट करने से एक विशेष रणन या गूँज उत्पन्न होती है, उसी प्रकार बाह्य जगत् के संघात से आदिम मनुष्य के भीतर एक विशेष ध्वनि-प्रतिक्रिया जागृत हुई जिसने शब्दों को जन्म दिया।
  5. इंगित सिद्धान्त (Gesture Theory) — इसके प्रतिपादक डॉ० राये (Dr. Rae) एवं रिचर्ड्स हैं। इनका मानना है कि मनुष्य पहले हाथों व मुख के अंग-संचालन द्वारा अपने भाव व्यक्त करता था। जब हाथों में औजार आ गए या अंधकार हुआ, तो उन्हीं चेष्टाओं के साथ मुख से उच्चरित ध्वनियाँ जुड़कर भाषा बन गईं।
  6. संकेत सिद्धान्त (Agreement / Social Contract Theory) — इसके प्रवर्तक दार्शनिक रूसो (Rousseau) हैं। इस मत के अनुसार आदिम काल में मनुष्यों ने आपस में एकत्र होकर विचार-विनिमय की सुविधा हेतु विभिन्न वस्तुओं और क्रियाओं के लिए सर्वसम्मति से निश्चित ध्वनि-संकेत तय कर लिए।
  7. धातु सिद्धान्त (Root Theory) — इसके प्रतिपादक हेज (Heyse) और मैक्समूलर हैं। इनका मानना है कि संसार की सभी भाषाएँ कुछ मूल धातुओं (Roots) से उत्पन्न हुई हैं। मनुष्य को प्रकृति से लगभग ४००-५०० मूल ध्वनियाँ (धातुएँ) मिलीं, जिनसे सारे शब्द गढ़े गए।
  8. श्रम-ध्वनि सिद्धान्त (Yo-He-Ho Theory) — इसके प्रतिपादक न्वारे (Noiré) हैं। इनका मत है कि जब मनुष्य मिलकर कोई भारी शारीरिक श्रम करता है (जैसे पत्थर खींचना, नाव खेना या बोझ उठाना), तो श्वास के दबाव के कारण मुख से स्वतः कुछ ध्वनियाँ फूट पड़ती हैं (जैसे हइयो-हइयो, दम लगाओ आदि), जो भाषा का आधार बनीं।
  9. सम्पर्क सिद्धान्त (Contact Theory) — इसके प्रतिपादक जी० रेवेज (G. Révész) हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार मनुष्य मूलतः सामाजिक प्राणी है। एक-दूसरे के निकट आने, प्रेम और मैत्री-सम्पर्क स्थापित करने की स्वाभाविक लालसा ने भाषा को जन्म दिया।
  10. समन्वय सिद्धान्त (Synthesis Theory) — प्रसिद्ध भाषाविद् हेनरी स्वीट (Henry Sweet) का मानना है कि भाषा किसी एक सिद्धान्त का परिणाम नहीं है, अपितु अनुकरण, मनोभाव, श्रम और संकेत आदि अनेक सिद्धान्तों के समन्वय का संयुक्त फल है।
  11. सामाजिक संव्यवहार सिद्धान्त — समाज में आपसी सहयोग, श्रम-विभाजन और दिन-प्रतिदिन के व्यावहारिक लेन-देन की अनिवार्य आवश्यकता ने भाषा को गढ़ा।
  12. संरचनावादी मत — भाषा कोई ईश्वरीय या आकस्मिक चमत्कार नहीं, अपितु यह एक विकसित सांस्कृतिक संरचना है जो मानव-चेतना के साथ-साथ समय के थपेड़ों से क्रमिक रूप से निर्मित हुई।

निष्कर्षतः भाषा न तो किसी एक क्षण में बनी, न ही किसी एक कारण से— यह मानव-समूहों की निरंतर भाषिक क्रिया का परिणाम है।

४. भाषा के प्रकार एवं वर्गीकरण

भाषा-विज्ञान में भाषा को विभिन्न दृष्टिकोणों और आधारों पर प्रकार या वर्गों में बाँटा जाता है:

  1. व्युत्पत्ति एवं उद्गम के आधार पर :
    • प्राकृतिक भाषा (Natural Language) : जो मानव समाज में स्वाभाविक एवं ऐतिहासिक प्रवाह के रूप में विकसित हुई; जैसे— संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, तमिल।
    • कृत्रिम भाषा (Artificial Language) : जिसे किसी विशिष्ट उद्देश्य (कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग या वैश्विक संचार) हेतु योजनाबद्ध ढंग से गढ़ा गया; जैसे— एस्पेरान्तो (Esperanto), C++, पायथन (Python)।
    • मिश्रित भाषा (Mixed Language / Pidgin & Creole) : दो या अधिक भिन्न भाषाओं के सम्पर्क से उत्पन्न हाइब्रिड भाषा।
  2. संरचना एवं व्याकरण के आधार पर (Typological Classification) :
    • विश्लेषणात्मक / अयोगात्मक (Analytic / Isolating) : जिसमें प्रकृति और प्रत्यय अलग-अलग रहते हैं; जैसे— चीनी, वियतनामी।
    • संश्लेषणात्मक / योगात्मक (Synthetic / Agglutinative) : जिसमें मूल शब्द और प्रत्यय आपस में घनिष्ठता से जुड़े होते हैं; जैसे— संस्कृत (संयोगात्मक), तुर्की, फिनिश।
    • बहुसंयोगी (Polysynthetic / Incorporating) : जिसमें पूरा वाक्य ही एक लम्बे मिश्रित शब्द के रूप में गूँथ दिया जाता है; जैसे— अमेरिकी-इंडियन (एस्किमो/बास्क) भाषाएँ।
  3. उपयोग एवं सामाजिक व्याप्ति के आधार पर :
    • बोली (Dialect) : सीमित भौगोलिक क्षेत्र में बोली जाने वाली घरेलू व अनौपचारिक भाषा।
    • साहित्यिक भाषा (Literary Language) : जो उच्च कोटि के काव्य, दर्शन, कथा-साहित्य व नाटक के सृजन हेतु प्रयुक्त होती है; जैसे— अवधी, ब्रजभाषा, संस्कृत।
    • मानकीकृत भाषा (Standard Language) : व्याकरणसम्मत, परिष्कृत, शिक्षा और शासन की सर्वमान्य भाषा।
  4. संचार माध्यम एवं इंद्रिय-बोध के आधार पर :
    • मौखिक भाषा (Oral/Spoken Language) : वागिन्द्रियों द्वारा उच्चारित और कानों द्वारा सुनी जाने वाली स्वाभाविक भाषा।
    • लिखित / लिपिबद्ध भाषा (Written Language) : ध्वनि-संकेतों को आँखों द्वारा दृश्य प्रतीकों (लिपियों) में अंकित करने वाली भाषा।
    • सांकेतिक भाषा (Sign Language) : मूक-बधिरों द्वारा हाथ, मुख और शरीर के आंगिक इशारों से की जाने वाली अभिव्यक्ति।

५. भाषा के विविध रूप एवं भेद-विभेद

भाषा-अध्ययन में कई भेद-विभेद महत्वपूर्ण माने जाते हैं, भाषा के विविध रूप होते हैं जो निम्न हैं—

  1. बोली (DIALECT) — बोली भाषा का स्थानीय व सीमित क्षेत्रीय रूप है। इसका दायरा छोटा होता है, इसमें व्याकरण के कठोर नियम नहीं होते और यह दैनिक बातचीत के काम आती है (जैसे— भोजपुरी, मगही, मालवी, मारवाड़ी)।
  2. लिखित और मौखिक भाषा (विभाषा, उपभाषा, प्रान्तीय भाषा) — मौखिक भाषा अधिक स्वाभाविक, परिवर्तनशील और क्षणभंगुर होती है, जबकि लिखित भाषा नियमबद्ध, मानकीकृत और दीर्घकाल तक ज्ञान को सुरक्षित रखने वाली होती है। जब किसी बोली में विपुल साहित्य रचा जाता है और उसका क्षेत्र विस्तृत होता है, तो वह 'विभाषा' या 'उपभाषा' कहलाती है (जैसे ब्रज, अवधी, मैथिली)। प्रान्तीय भाषा किसी पूरे राज्य की भाषा होती है (जैसे गुजराती, पंजाबी, मराठी)।
  3. देशज और विदेशी शब्द — देशज वे शब्द हैं जो देश की विभिन्न बोलियों या अज्ञात स्थानीय स्रोतों से आवश्यकतानुसार भाषा में आ गए हैं (जैसे— लोटा, पगड़ी, खिड़की, डिबिया)। विदेशी वे शब्द हैं जो राजनीतिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक सम्पर्क के कारण अन्य विदेशी भाषाओं से आकर घुल-मिल गए (जैसे अरबी का 'किताब', फारसी का 'कागज़', अंग्रेजी का 'डॉक्टर/रेल')।
  4. तत्सम-तद्भव भेद — तत्सम (तत् + सम = उसके समान) : संस्कृत के वे शब्द जो अपने मूल रूप में बिना किसी विकार के हिन्दी में प्रयुक्त होते हैं (जैसे— सूर्य, अग्नि, रात्रि, जल)। तद्भव (तत् + भव = उससे उत्पन्न) : जो प्राकृत और अपभ्रंश से होते हुए समय के साथ बदलकर सरल बन गए (जैसे— सूरज, आग, रात, पानी)।
  5. मानक या परिनिष्ठित भाषा (STANDARD LANGUAGE) — यह भाषा का व्याकरणसम्मत, परिष्कृत, त्रुटिहीन और सर्वमान्य आदर्श रूप है। इसका प्रयोग औपचारिक शिक्षा, न्यायपालिका, शासन, पत्रकारिता और मुद्रण में होता है। खड़ी बोली हिन्दी आज की मानक भाषा है।
  6. कृत्रिम भाषा (Artificial Language) — यह भाषा स्वाभाविक रूप से विकसित न होकर मानव द्वारा विशेष प्रयोजन (वैज्ञानिक, कम्प्यूटेशनल अथवा सार्वभौमिक अन्तर्राष्ट्रीय सम्पर्क) के लिए बनाई जाती है; जैसे— 'एस्पेरान्तो' (Esperanto) अथवा कम्प्यूटर भाषाएँ (HTML, Java)।
  7. विशिष्ट भाषा (Professional / Jargon Language) — किसी विशिष्ट व्यवसाय, व्यापार, ज्ञान की शाखा या वर्ग के लोगों द्वारा प्रयुक्त पारिभाषिक शब्दावली वाली भाषा; जैसे— विधि (कानून) की भाषा, चिकित्सा-विज्ञान की भाषा, वाणिज्य व शेयर बाजार की तकनीकी शब्दावली।
  8. व्यक्ति बोली (Idiolect) — प्रत्येक व्यक्ति के बोलने का अपना एक नितांत निजी ढंग, उच्चारण-शैली, स्वर-तान और शब्द-चयन होता है। समाज के एक ही वर्ग के दो व्यक्तियों की भाषा में भी जो सूक्ष्म अंतर होता है, उसे 'व्यक्ति बोली' (Idiolect) कहते हैं।
  9. अपभाषा, अपभ्रष्ट भाषा या अमानक भाषा (SLANG) — यह समाज के किसी विशिष्ट समूह, गली-मुहल्लों, अपराधियों अथवा युवाओं द्वारा प्रयुक्त अनौपचारिक, विकृत और अशालीन शब्दावली होती है, जो शिष्ट समाज और मानक व्याकरण में मान्य नहीं होती।
  10. कूट भाषा (Secret / Cryptic Language) — गुप्तचरों, सुरक्षा बलों, व्यापारिक दलालों या विशिष्ट गिरोहों द्वारा प्रयुक्त वह सांकेतिक भाषा, जिसका अर्थ केवल वही समझ सकते हैं जिन्हें उसका कूट (Code) ज्ञात हो, ताकि तीसरे व्यक्ति तक रहस्य न पहुँचे।
  11. राष्ट्रभाषा (National Language) — किसी देश के बहुसंख्यक निवासियों द्वारा प्रयुक्त, उनकी सांस्कृतिक चेतना, ऐतिहासिक एकता और जन-मन का प्रतिनिधित्व करने वाली भाषा को 'राष्ट्रभाषा' कहा जाता है (जैसे भारत में जन-जन की सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी)।

इन विभेदों से भाषा के विकास, विविधता और संरचना को बेहतर समझा जा सकता है।

६. भाषा की प्रवृत्ति एवं २५ प्रमुख विशेषताएँ

भाषा-वैज्ञानिकों ने भाषा के स्वरूप का गहन विश्लेषण कर उसकी निम्नलिखित २५ सार्वभौमिक प्रवृत्तियाँ और विशेषताएँ प्रतिपादित की हैं—

  1. भाषा समाजजनित है। सामाजिक सम्पत्ति है — भाषा का उद्भव और विकास समाज के बीच ही सम्भव है। कोई भी व्यक्ति अकेले निर्जन द्वीप पर जन्म लेकर भाषा नहीं सीख सकता; यह समाज की साझी धरोहर है।
  2. भाषा चिन्हों का व्यवस्थित समूह है। यह सतत प्रवहमान, सहज और नैसर्गिक होता है — भाषा मनमाने संकेतों का ढेर नहीं, अपितु एक सुगठित व्याकरणिक व्यवस्था है जो नदी की धारा की भाँति अविरल बहती रहती है।
  3. भाषा गतिशील और परिवर्तनशील है। भाषा का कोई स्थायी रूप नहीं है — भाषा कभी स्थिर (Stagnant) नहीं रहती। समय, भूगोल और समाज की आवश्यकताओं के साथ इसके रूप, उच्चारण और अर्थ बदलते रहते हैं ("कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी")।
  4. भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है — यह अंतःकरण के विचारों, वैज्ञानिक ज्ञान और दार्शनिक अनुभूतियों को दूसरों तक पहुँचाने का सबसे सशक्त माध्यम है।
  5. भाषा अर्जित सम्पत्ति है — भाषा किसी को माँ के पेट से विरासत में नहीं मिलती; बालक जिस वातावरण और समाज में पलता है, वहीं से भाषा का अर्जन करता है।
  6. भाषा भाव-सम्प्रेषण का माध्यम है — मानव-मन के समस्त कोमल-कठोर संवेग (प्रेम, दया, क्रोध, उत्साह) भाषा के द्वारा ही एक हृदय से दूसरे हृदय तक पहुँचते हैं।
  7. भाषा अनुकरण एवं व्यवहार से सीखी जाती है — बालक अपने माता-पिता और समाज के बड़े लोगों के उच्चारण का अनुकरण करके और दैनिक व्यवहार में प्रयोग करके ही भाषा सीखता है।
  8. भाषा जटिलता से सरलता तथा संयोगात्मकता से वियोगात्मकता की ओर उन्मुख होती है — मानव का स्वभाव श्रम-बचत (मुख-सुख) का है। इसलिए भाषा कठिन संरचनाओं से सरल की ओर बढ़ती है; जैसे वैदिक संस्कृत (संयोगात्मक) से चलकर आज की हिन्दी (वियोगात्मक/परसर्ग प्रधान) बन गई।
  9. भाषा परम्परागत वस्तु है — भाषा का निर्माण कोई एक व्यक्ति अचानक नहीं करता; यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी पूर्वजों से उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त होती है।
  10. प्रत्येक भाषा की संरचना पृथक होती है — संसार की प्रत्येक भाषा का अपना स्वतंत्र ध्वनि-तंत्र, पद-रचना, वाक्य-विन्यास और व्याकरण होता है (जैसे हिन्दी में 'कर्ता-कर्म-क्रिया' और अंग्रेजी में 'कर्ता-क्रिया-कर्म')।
  11. भाषा सर्वोत्तम ज्योति है — भाषा अज्ञान के अन्धकार को मिटाकर सम्पूर्ण मानव जाति के अन्तःकरण को आलोकित करने वाली परम ज्योति है।
  12. भाषा समाज को एकसूत्र में बाँधती है — यह भौगोलिक और सांस्कृतिक भिन्नताओं के बावजूद सम्पूर्ण राष्ट्र और समाज के विभिन्न घटकों को एकता के सूत्र में पिरोती है।
  13. भाषा सर्वशक्तिसम्पन्न है — भाषा के भीतर क्रांति का बिगुल बजाने, शांति स्थापित करने, विज्ञान की खोजों को लिपिबद्ध करने और मानव-मस्तिष्क को रूपांतरित करने की असीम शक्ति होती है।
  14. भाषा सर्वव्यापक है — मानव-जीवन का ऐसा कोई भी कोना, व्यवहार, व्यापार अथवा ज्ञान-विज्ञान नहीं है जो भाषा के अधिकार-क्षेत्र से बाहर हो।
  15. भाषा विराट् और विश्वकर्मा है — भाषा सम्पूर्ण मानवीय सभ्यता, दर्शन, साहित्य और संस्कृति का निर्माण करने वाली साक्षात् विश्वकर्मा (शिल्पी) है।
  16. भाषा का प्रवाह अविच्छिन्न है — भाषा नदी के जल के समान अनादि काल से चली आ रही है और अनन्त भविष्य की ओर बिना रुके प्रवाहित होती रहती है; इसका कोई अंतिम बिन्दु नहीं होता।
  17. भाषा परम्परागत वस्तु है (निरन्तरता) — यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत के रूप में प्राप्त होती है, व्यक्ति इसमें सुधार या परिमार्जन तो कर सकता है किन्तु इसे शून्य से निर्मित नहीं कर सकता।
  18. भाषा सामाजिक वस्तु है — भाषा का मूल्य और अस्तित्व केवल सामाजिक संदर्भों में है; समाज के बिना भाषा का कोई अर्थ नहीं है।
  19. भाषा मानव की अक्षय निधि है — समस्त पूर्वजों का ज्ञान, वेद, पुराण, इतिहास और विज्ञान भाषा के रूप में ही सुरक्षित रहता है, जो कभी नष्ट नहीं होता।
  20. भाषा सत् असत् दोनों का ही बोधक है — भाषा केवल सत्य और यथार्थ को ही व्यक्त नहीं करती, अपितु यह कल्पना, मिथक, असत्य और अमूर्त भावनाओं को भी साकार रूप देने में समर्थ है।
  21. भाषा पैतृक एवं जन्मसिद्ध नहीं है — कोई बालक किसी भाषा को जन्मजात संपत्ति के रूप में लेकर नहीं आता। यदि भारतीय बच्चे को बचपन से इंग्लैंड में पाला जाए, तो वह हिन्दी नहीं बल्कि अंग्रेजी बोलेगा।
  22. भाषा भाव संप्रेषण का साधन है — यह अंतःचेतना के सूक्ष्मतम अनुभावों और संवेदनाओं को सम्प्रेषित करने का एकमात्र माध्यम है।
  23. भाषा की ऐतिहासिक तथा भौगोलिक सीमा भी होती है — प्रत्येक भाषा का एक निश्चित काल-खण्ड (इतिहास) होता है और एक निश्चित भू-भाग (भूगोल) होता है जहाँ वह बोली और समझी जाती है।
  24. भाषा स्थिरीकरण से प्रभावित होती है — जब भाषा व्याकरण, साहित्य और शब्दकोश के नियमों में बँध जाती है, तो उसमें मानकीकरण व स्थायित्व आता है, यद्यपि इसकी बोलचाल की धारा नीचे बदलती रहती है।
  25. भाषा में सामाजिक दृष्टि से स्तरभेद होता है — समाज के विभिन्न वर्गों (शिक्षित-अशिक्षित, ग्रामीण-शहरी, उच्च-मध्यम वर्ग) के आधार पर भाषा में रूपभेद और स्तरभेद (Social Dialects / Sociolects) पाया जाता है।

७. भाषा की दार्शनिक एवं व्यावहारिक प्रकृति (Nature of Language)

भाषा न तो पूर्ण रूप से प्राकृतिक है और न ही पूर्णतः कृत्रिम। यह मानव बुद्धि, समाज, अनुभव और संस्कृति का मिश्रण है। भाषा-विज्ञान और दर्शन के आलोक में भाषा की प्रकृति को निम्नलिखित चार गहन आधारों पर समझा जा सकता है:

(क) द्वैध प्रकृति (Duality of Patterning) : भाषा की सबसे अद्भुत प्रकृति यह है कि यह दोहरे स्तर पर कार्य करती है। प्राथमिक स्तर पर हमारे पास अर्थहीन स्वनिम (ध्वनियाँ जैसे— क, म, ल) होते हैं, किन्तु जब इन्हें एक निश्चित क्रम में संयोजित किया जाता है, तो द्वितीय स्तर पर 'कमल' जैसा एक अर्थवान शब्द जन्म लेता है। सीमित ध्वनियों से असीमित वाक्यों का निर्माण भाषा की अनोखी रचनात्मक क्षमता है।

(ख) यादृच्छिकता (Arbitrariness) एवं रूढ़ि : भाषा की प्रकृति पूर्णतः यादृच्छिक (Arbitrary) है। इसका अर्थ यह है कि किसी वस्तु और उसे पुकारने वाले शब्द के बीच कोई प्राकृतिक, भौतिक या अनिवार्य दार्शनिक सम्बन्ध नहीं होता। उदाहरण के लिए, जिसे हम हिन्दी में 'पेड़' कहते हैं, उसे अंग्रेजी में 'Tree', संस्कृत में 'वृक्ष' और अरबी में 'शज़र' कहा जाता है। समाज ने परम्परा से जिस वस्तु के लिए जो ध्वनि मान ली, वह उसी अर्थ के लिए रूढ़ (Conventional) हो गई।

(ग) विविक्तता एवं विस्थापन (Displacement) : मानव भाषा की यह अद्वितीय प्रकृति है कि वह 'यहाँ और अभी' (Here and Now) के दायरे से परे जा सकती है। हम जो प्रत्यक्ष नहीं है— भूतकाल की घटनाएँ, भविष्य की कल्पनाएँ, लोक-परलोक, आत्मा, ईश्वर जैसी अमूर्त अवधारणाओं पर भी भाषा के माध्यम से सुगमता से विचार-विमर्श कर सकते हैं। पशु-पक्षियों की भाषा में यह विस्थापन का गुण नहीं पाया जाता।

(घ) सामाजिक एवं सांस्कृतिक संवाहन : भाषा केवल जैविक गुण नहीं है, अपितु यह एक सामाजिक उत्पाद है। यह मानव-संस्कृति की संवाहिका है। भाषा अपने समाज के भूगोल, मान्यताओं, खान-पान और दर्शन को अपने भीतर समोए रखती है। भाषा के माध्यम से ही एक पीढ़ी अपनी सभ्यता का सम्पूर्ण ज्ञान अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करती है।

८. भाषा की संरचना एवं संघटक अंग (Structure of Language)

भाषा की संरचना मुख्यतः ध्वनि, शब्द, वाक्य और अर्थ के समन्वय पर आधारित होती है। आधुनिक भाषा-विज्ञान के अनुसार भाषा एक बहु-स्तरीय पिरामिड की भाँति है, जिसके निम्नलिखित चार मूलभूत आधार-स्तम्भ (Structural Levels) हैं:

  1. १. ध्वनि-स्तर / स्वनिम-व्यवस्था (Phonological Structure) :

    यह भाषा की लघुतम, अविभाज्य और भौतिक इकाई है। मनुष्य की वागिन्द्रियों (कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ) से निःसृत होने वाली ध्वनियों का अध्ययन 'स्वन-विज्ञान' (Phonetics) और उनके अर्थ-भेदक रूपों का अध्ययन 'स्वनिम-विज्ञान' (Phonemics) कहलाता है। जैसे— /क्/, /प्/, /त्/ आदि मूल ध्वनियाँ हैं।

  2. २. पद / रूप-स्तर / रूपिम-व्यवस्था (Morphological Structure) :

    जब एक या अधिक स्वनिम मिलकर एक अर्थवान इकाई बनाते हैं, तो उसे 'रूपिम' (Morpheme) या 'पद' कहा जाता है। यह भाषा की लघुतम अर्थवान इकाई है। इसके अंतर्गत शब्दों की रचना, मूल धातु, उपसर्ग, प्रत्यय, सन्धि, समास तथा विभक्ति-रूपों का विश्लेषण किया जाता है। जैसे— 'विद्या + आलय = विद्यालय', 'मानव + ता = मानवता' आदि।

  3. ३. वाक्य-स्तर / वाक्य-विन्यास (Syntactic Structure) :

    पदों या शब्दों को व्याकरणिक नियमों के अनुसार एक सुव्यवस्थित क्रम में पिरोकर पूर्ण विचार व्यक्त करने वाली संरचना 'वाक्य' (Sentence) कहलाती है। वाक्य-विज्ञान (Syntax) में पद-क्रम, अन्विति (Agreement), कारक-सम्बन्ध और वाक्य-रूपान्तरण का अध्ययन होता है। जैसे हिन्दी की मानक वाक्य-संरचना [कर्ता + कर्म + क्रिया] होती है— "राम (कर्ता) पुस्तक (कर्म) पढ़ता है (क्रिया)।"

  4. ४. अर्थ-स्तर / अर्थ-विज्ञान (Semantic & Pragmatic Structure) :

    ध्वनि, पद और वाक्य की समस्त संरचनाओं का परम उद्देश्य 'अर्थ' की प्रतीति कराना है। अर्थ-विज्ञान (Semantics) में शब्दों और वाक्यों के वाच्यार्थ, लक्ष्यार्थ, व्यंग्यार्थ, अर्थ-परिवर्तन की दिशाओं (अर्थ-विस्तार, अर्थ-संकोच, अर्थादेश) तथा सन्दर्भगत व्यवहार (Pragmatics) का सूक्ष्म दार्शनिक अध्ययन किया जाता है। बिना सार्थक अर्थ के कोई भी ध्वनि-समूह भाषा की संज्ञा नहीं पा सकता।

९. परीक्षा-उपयोगी महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

प्र. १. 'भाषा' शब्द की व्युत्पत्ति क्या है और इसका मूल अर्थ क्या है?

उत्तर : भाषा शब्द संस्कृत की 'भाष्' धातु में 'टाप्' प्रत्यय लगने से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ है— बोलना, कहना या व्यक्त वाणी। अर्थात् व्यक्त वाणी के रूप में जिसकी अभिव्यक्ति की जाती है, उसे भाषा कहते हैं ("भाष्यते व्यक्तवाग् रूपेण अभिव्यज्यते इति भाषा")।

प्र. २. भाषा को 'यादृच्छिक ध्वनि-संकेत' क्यों कहा जाता है?

उत्तर : 'यादृच्छिक' (Arbitrary) का अर्थ है— ऐच्छिक या माना हुआ। किसी शब्द और उसके द्वारा व्यक्त होने वाली वस्तु के बीच कोई स्वाभाविक या ईश्वरीय सम्बन्ध नहीं होता। समाज अपनी सुविधा के अनुसार किसी ध्वनि को किसी वस्तु का प्रतीक मान लेता है और वह रूढ़ हो जाता है; जैसे हिन्दी में 'पानी', अंग्रेजी में 'Water' और संस्कृत में 'जलम्'।

प्र. ३. भाषा की उत्पत्ति के 'डिंग-डॉन्ग' (Ding-Dong) और 'यो-हे-हो' (Yo-He-Ho) सिद्धान्त क्या हैं?

उत्तर : डिंग-डॉन्ग सिद्धान्त (रणन सिद्धान्त) के प्रतिपादक मैक्समूलर हैं; इसके अनुसार बाह्य जगत् के आघात से आदिम मानव के भीतर एक कम्पन या ध्वनि-अनुगूँज उत्पन्न हुई जिसने भाषा को जन्म दिया। यो-हे-हो सिद्धान्त (श्रम-ध्वनि सिद्धान्त) के जनक न्वारे (Noiré) हैं; इसके अनुसार सामूहिक भारी शारीरिक श्रम करते समय श्वास के आवेग से मुख से स्वतः निकली ध्वनियों से भाषा बनी।

प्र. ४. बोली (Dialect) और मानक भाषा (Standard Language) में क्या मुख्य अंतर है?

उत्तर : बोली किसी सीमित क्षेत्र में घरेलू बातचीत हेतु प्रयुक्त होती है, इसका कोई कठोर व्याकरण या व्यापक मानक स्वरूप नहीं होता। जबकि मानक भाषा का क्षेत्र विस्तृत होता है, वह व्याकरणसम्मत, परिमार्जित तथा शिक्षा, शासन, न्यायालय और साहित्य की सर्वमान्य प्रामाणिक भाषा होती है।

प्र. ५. भाषा की संरचना के चार प्रमुख आधार-स्तम्भ कौन-से हैं?

उत्तर : भाषा की संरचना के चार प्रमुख घटक हैं: (१) स्वनिम (ध्वनि-स्तर), (२) रूपिम (पद/शब्द-स्तर), (३) वाक्य-विन्यास (वाक्य-स्तर), और (४) अर्थ-विज्ञान (अर्थ-स्तर)

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