सेनापति

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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सेनापति — कवि सेनापति

सेनापति

सेनापति का जीवन परिचय तथा पदों का शब्दार्थ, सन्दर्भ, प्रसङ्ग, हिन्दी व्याख्या एवं विशेष/काव्यसौंदर्य।

सेनापति का जीवन परिचय

उत्तर- ## सेनापति का जीवन परिचय सेनापति रीतिकालीन हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध कवि थे। उनका जन्म संवत् 1612 (1555 ई.) के लगभग उत्तर प्रदेश के वर्तमान क्षेत्र से संबंधित माना जाता है। वे सनाढ्य ब्राह्मण परिवार में उत्पन्न हुए थे। उनके पिता का नाम काशीराम तथा पितामह का नाम पं. कृष्णदत्त था। उनके पितामह संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान थे, इसलिए सेनापति को संस्कृत साहित्य और काव्यशास्त्र का अच्छा ज्ञान पारिवारिक वातावरण से ही प्राप्त हुआ। सेनापति का प्रमुख आश्रय ओरछा के राजा इन्द्रजीत सिंह थे। इन्द्रजीत सिंह उनका अत्यन्त सम्मान करते थे और उन्हें अपना गुरु मानते थे। सेनापति संस्कृत तथा हिन्दी दोनों भाषाओं के विद्वान थे। उन्होंने विशेष रूप से प्रकृति-वर्णन, ऋतु-वर्णन, भक्ति तथा शृंगार से सम्बन्धित कविताओं की रचना की। उनकी काव्य-भाषा ब्रजभाषा है, जिसमें भावों की सहज अभिव्यक्ति के साथ अलंकारों का सुन्दर प्रयोग मिलता है। सेनापति की प्रमुख रचनाओं में **‘कवित्त-रत्नाकर’** का विशेष स्थान है। इसमें उनके कवित्तों के माध्यम से प्रकृति, ऋतुओं, भक्ति और जीवन के विविध पक्षों का प्रभावपूर्ण चित्रण मिलता है। वर्षा, वसन्त, ग्रीष्म और शिशिर ऋतुओं के उनके वर्णन अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। प्रकृति के सूक्ष्म निरीक्षण, चित्रात्मकता, ध्वनि-सौन्दर्य और भावात्मक अभिव्यक्ति के कारण सेनापति का हिन्दी काव्य में विशिष्ट स्थान है। वे रीतिकाल के उन कवियों में माने जाते हैं जिन्होंने **कवित्त छन्द को प्रभावशाली और कलात्मक अभिव्यक्ति** प्रदान की।

सेनापति के पद

पद संख्या 01

सारंग धुनि सुनावै धन रस बरसावै, मोर मन हरषावै अति अभिराम है। जीवन अधार बड़ी गरज करनहार, तपति हरनहार देत मन काम है।। सीतल सुभग जाकी छाया जग 'सेनापति', पावत अधिक तन मन बिसराम है। संपै संग लीने सनमुख तेरे बरसाऊ, आयौ घनस्याम सखि मानौं घनस्याम है।।

शब्दार्थ: सारंग = मेघ, धुनि = ध्वनि, धन = वर्षा का जल, रस = जल, अभिराम = मनोहर, तपति = गर्मी, हरनहार = दूर करने वाला, सीतल = शीतल, संपै = सम्पत्ति/सामग्री, घनस्याम = श्यामवर्ण के मेघ।
सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्य सेनापति के वर्षा-वर्णन से सम्बन्धित है, जिसमें कवि ने मेघ के आगमन और उसके शीतल प्रभाव का मनोहारी चित्रण किया है।
प्रसङ्ग: वर्षा ऋतु के आगमन पर मेघों की गर्जना, वर्षा और शीतल छाया से प्रसन्न होकर कवि उसके सौन्दर्य तथा उपयोगिता का वर्णन करता है।
हिन्दी व्याख्या: सेनापति कहते हैं कि मेघ अपनी मधुर गर्जना सुनाकर जल की वर्षा करता है, जिससे मेरा मन अत्यन्त प्रसन्न हो उठता है। उसकी गर्जना जीवन का आधार है और वह तपती हुई धरती की गर्मी को दूर करके मन की इच्छाओं को पूरा करता है। उसकी शीतल और सुन्दर छाया संसार को सुख एवं विश्राम प्रदान करती है। हे सखी! ऐसा लगता है मानो मेघ अपने साथ सारी सम्पदा लेकर हमारे सामने बरसने के लिए आ गया हो और ऐसा प्रतीत होता है जैसे स्वयं श्यामवर्ण का घन सामने आ गया हो।
टिप्पणी: 1. अलंकार: उपमा — मेघ की तुलना घनश्याम से की गई है। अनुप्रास — 'घनस्याम सखि मानौं घनस्याम' में वर्ण-साम्य है।
2. रस: शृंगार रस
3. छन्द: कवित्त
4. भाव: वर्षा के आगमन से उत्पन्न आनन्द, शीतलता और मनोविनोद का भाव व्यक्त हुआ है।
पद संख्या 02

सदा नंदी जाकौं आसा कर है विराजमान, नीकी घनसार हूँ तैं बरन है तन कौं। सैन सुख राखै सुधा दुति जाके सेखर है, जाके गौरी की रति को मथन मदन कौं।। जो है सब भूतन कौं अन्तर निवासी रमैं, घरै उर भोगी भेष धरत नगन कौं। जानि बिन कहैं जानि 'सेनापति' कहैं मानि, बहुधा उमाधव कौं भेद छाँड़ि मन कौं।।

शब्दार्थ: नंदी = भगवान शिव का वाहन, आसा = आशा, घनसार = कपूर, सुधा = अमृत, दुति = आभा, सेखर = मस्तक पर धारण किया हुआ, रति = प्रेम, मदन = कामदेव, भूतन = प्राणियों, अन्तर निवासी = हृदय में निवास करने वाला, नगन = नग्न, उमाधव = उमा के पति भगवान शिव।
सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्य सेनापति की शिव-वन्दना से सम्बन्धित है, जिसमें कवि ने भगवान शिव के स्वरूप एवं महिमा का वर्णन किया है।
प्रसङ्ग: कवि भगवान शिव के विविध रूपों और उनके अद्भुत स्वरूप का वर्णन करते हुए उनकी सर्वव्यापकता तथा महिमा को स्पष्ट करता है।
हिन्दी व्याख्या: सेनापति भगवान शिव की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि जिनके वाहन नंदी हैं और जिनके मस्तक पर चन्द्रमा सुशोभित है, जिनका शरीर कपूर के समान उज्ज्वल है, वे भगवान शिव सबको सुख प्रदान करते हैं। वे कामदेव का दमन करने वाले तथा माता पार्वती के प्रिय हैं। वे समस्त प्राणियों के हृदय में निवास करते हैं और अनेक प्रकार के रूप एवं वेश धारण करते हैं। कवि कहते हैं कि भगवान शिव के स्वरूप को जानना अत्यन्त कठिन है; उनके अनेक रूपों के भेद को छोड़कर मन को उनके चरणों में समर्पित कर देना ही उचित है।
टिप्पणी: 1. अलंकार: उपमा — शिव के शरीर की तुलना कपूर से की गई है। अनुप्रास — 'जानि बिन कहैं जानि' में वर्ण-साम्य है।
2. रस: भक्ति रस
3. छन्द: कवित्त
4. भाव: भगवान शिव की महिमा, सर्वव्यापकता और भक्तिभाव का भाव व्यक्त हुआ है।
पद संख्या 03

लाल लाल टेसू फूलि रहे हैं बिलास संग, स्याम रंग भेटि मानौ मसि में मिलाये हैं। तहाँ मधु काज आइ बैठे मधुकर पुंज, मलय पवन उपवन बन घाये हैं।। 'सेनापति' माधव महीना मे पलास तरु, देखि देखि भाव कविता के मन आये हैं। आधे अंग सुलगि सुलगी रहे आधे मानौ, विरही दहन काम क्वैला परचाये हैं।।

शब्दार्थ: टेसू = पलाश का फूल, बिलास = शोभा/विलास, स्याम रंग = काला रंग, मसि = स्याही, मधु = फूलों का रस, मधुकर पुंज = भौंरों का समूह, मलय पवन = मलय पर्वत से आने वाली सुगन्धित हवा, माधव महीना = वसन्त ऋतु का महीना, विरही = वियोगी, क्वैला = अंगारा।
सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्य सेनापति के वसन्त-वर्णन से सम्बन्धित है, जिसमें पलाश के फूलों तथा वसन्त के प्राकृतिक सौन्दर्य का चित्रण किया गया है।
प्रसङ्ग: वसन्त ऋतु के आगमन पर पलाश के लाल फूल, भौंरों का समूह और मलय पवन प्रकृति को अत्यन्त मनोहर बना देते हैं; परन्तु यही वातावरण विरही के लिए कामाग्नि को बढ़ाने वाला बन जाता है।
हिन्दी व्याख्या: सेनापति वसन्त ऋतु का वर्णन करते हुए कहते हैं कि पलाश के लाल-लाल फूल अत्यन्त शोभायमान हो रहे हैं। ऐसा लगता है मानो उनमें श्याम रंग मिलाकर स्याही बना दी गई हो। फूलों का रस लेने के लिए भौंरों के समूह आकर बैठ गए हैं और मलय पवन समस्त उपवन में सुगन्ध फैला रही है। वसन्त के इस मनोहर रूप को देखकर कवि के मन में कविता की भावनाएँ उमड़ने लगती हैं। परन्तु विरही व्यक्ति के लिए यह वसन्त सुखद न होकर कामाग्नि को और अधिक भड़काने वाला है; उसका आधा शरीर मानो जल रहा है और आधा अंग भी अंगारों की तरह सुलग रहा है।
टिप्पणी: 1. अलंकार: उपमा — पलाश के लाल फूलों की तुलना स्याही में मिले रंग से तथा विरही की दशा की तुलना अंगारों से की गई है। रूपक — वसन्त को विरही के लिए कामाग्नि बढ़ाने वाला माना गया है।
2. रस: शृंगार रस तथा विप्रलम्भ शृंगार
3. छन्द: कवित्त
4. भाव: वसन्त के प्राकृतिक सौन्दर्य और विरही के हृदय में उत्पन्न काम-वेदना का भाव व्यक्त हुआ है।
पद संख्या 04

वृष को तरनि तेज सहसों किरन करि, ज्वालन के जाल विकराल बरसत है। तचति घरनि, जग जरत झरनि, सीरी, छाँह कौं पकरि पंथी पंछी बिरमत है।। 'सेनापति' नैंक दुपहरि के ढरत होत धमका विषम, ज्यौं न पात खरकत है। मेरे जान पौनौं सीरी ठौर कौं पकरि कौनौं, घरी एक बैठि कहूँ घामैं बितवत है।।

शब्दार्थ: वृष = वर्षा/वर्ष, तरनि = सूर्य, किरन = किरण, ज्वालन = जलाने वाली, घरनि = पृथ्वी, सीरी = शीतल, पंथी = राहगीर, बिरमत = विश्राम करता है, दुपहरि = दोपहर, धमका = धधकना/प्रचण्ड ताप, पौनौं = वायु।
सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्य सेनापति के ग्रीष्म-वर्णन से सम्बन्धित है, जिसमें कवि ने ग्रीष्म ऋतु की प्रचण्ड गर्मी का स्वाभाविक चित्रण किया है।
प्रसङ्ग: ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की तीव्र किरणों से पृथ्वी तप रही है। इस असह्य गर्मी से बचने के लिए मनुष्य और पक्षी शीतल छाया का आश्रय लेते हैं।
हिन्दी व्याख्या: सेनापति कहते हैं कि ग्रीष्म ऋतु में सूर्य अपनी हजारों किरणों से भयंकर अग्नि बरसा रहा है। उसकी प्रचण्ड गर्मी से पृथ्वी तप रही है और सम्पूर्ण संसार जल रहा है। गर्मी से व्याकुल होकर राहगीर और पक्षी शीतल छाया का आश्रय लेकर विश्राम करते हैं। दोपहर होते-होते गर्मी इतनी अधिक बढ़ जाती है कि चारों ओर सन्नाटा छा जाता है और वृक्षों के पत्ते तक नहीं हिलते। कवि को लगता है कि वायु भी किसी ठंडी जगह को पकड़कर बैठ गई है और धूप में एक क्षण भी चलना कठिन हो गया है।
टिप्पणी: 1. अलंकार: अतिशयोक्ति — ग्रीष्म की प्रचण्डता का अत्यधिक विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। उपमा — सूर्य की किरणों की अग्नि से तुलना की गई है।
2. रस: शान्त रस
3. छन्द: कवित्त
4. भाव: ग्रीष्म की असह्य गर्मी, नीरवता और उससे उत्पन्न विश्राम की आकांक्षा का भाव व्यक्त हुआ है।
पद संख्या 05

दामिनी दमक सुरचाप की चमक स्याम, घटा की अमक अति घोर घनघोरतैं। कोकिला, कलापी, कल कूँज है जित तित, सीकरतें सीतल समीर की झकोर हैं।। 'सेनापति' आवन कह्यो है मनभावन सु, लाग्यो तरसावन बिरह जुर जोर हैं। आयो सखि सावन मदन सरसावन सु, लाग्यो बरसावन सलिल चहूँ ओर तैं।।

शब्दार्थ: दामिनी = बिजली, सुरचाप = इन्द्रधनुष, अमक = चमक/प्रकाश, घनघोर = बहुत घना और भयंकर, कलापी = मोर, कूँज = मधुर ध्वनि, सीकर = जल की बूँदें, झकोर = तेज झोंका, तरसावन = तड़पाने वाला, बिरह = वियोग, मदन = कामदेव, सलिल = जल।
सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्य सेनापति के वर्षा-वर्णन से सम्बन्धित है, जिसमें कवि ने सावन के प्राकृतिक सौन्दर्य और विरही हृदय पर उसके प्रभाव का चित्रण किया है।
प्रसङ्ग: सावन के आगमन पर आकाश में घने बादल छा गए हैं, बिजली चमक रही है, मोर और कोयल मधुर ध्वनि कर रहे हैं तथा चारों ओर शीतल वर्षा हो रही है। यह वातावरण विरही के हृदय में वियोग-वेदना को और तीव्र कर देता है।
हिन्दी व्याख्या: सेनापति कहते हैं कि सावन के आने पर आकाश में घने और भयंकर बादल छा गए हैं। बिजली चमक रही है और इन्द्रधनुष अपनी शोभा बिखेर रहा है। चारों ओर कोयल और मोर मधुर ध्वनि कर रहे हैं तथा वर्षा की बूँदों से युक्त शीतल हवा के झोंके चल रहे हैं। कवि कहते हैं कि यह मनोहर वातावरण सामान्य लोगों को सुख देता है, परन्तु विरही व्यक्ति के लिए यही सावन अत्यन्त पीड़ादायक है। प्रिय के वियोग में उसका हृदय और अधिक तड़प उठता है। ऐसा लगता है कि सावन कामदेव को प्रसन्न करने और विरह की पीड़ा बढ़ाने के लिए आया है तथा चारों दिशाओं में जल बरसने लगा है।
टिप्पणी: 1. अलंकार: अनुप्रास — 'दामिनी दमक', 'घोर घनघोर' तथा 'सावन मदन सरसावन' में वर्ण-साम्य है। रूपक — सावन को मदन को सरसाने वाला कहा गया है।
2. रस: विप्रलम्भ शृंगार रस
3. छन्द: कवित्त
4. भाव: सावन की प्राकृतिक शोभा के साथ विरही नायक-नायिका के हृदय में बढ़ती वियोग-वेदना का भाव व्यक्त हुआ है।
पद संख्या 06

सिसिर तुषार के बुखार से उखारत है, पूस बीते होत सून हाथ-पाई ठिरि कै। द्यौस की छुटाई की बड़ाई बरनी न जाइ, 'सेनापति' पाई कछू सोचि कै सुमिरि कै।। सीत तैं सहस कर सहस-चरन है कै, ऐसे जात भागि तम आवत है घिरि कै। जौ लौं कोक कोकी कौं मिलत तौं लौं होति राति, कोक अधबीच ही तैं आवत हैं फिरि कै।।

शब्दार्थ: सिसिर = शीत ऋतु, तुषार = पाला/ओस, बुखार = पीड़ा/ताप, उखारत = दूर करता है, पूस = पौष मास, ठिरि कै = ठिठुरकर, द्यौस = दिन, छुटाई = छोटा होना/घटना, सीत = ठंड, सहस = हजार, तम = अन्धकार, कोक = चकवा, कोकी = चकवी।
सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्य सेनापति के शिशिर ऋतु-वर्णन से सम्बन्धित है, जिसमें कवि ने पौष मास की ठिठुरन, छोटे होते दिन और लम्बी रात का चित्रण किया है।
प्रसङ्ग: शीत ऋतु में पाले और अत्यधिक ठंड के कारण मनुष्य काँपने लगते हैं। दिन छोटे और रातें बड़ी हो जाती हैं। चकवा-चकवी के मिलन-विरह के माध्यम से कवि ने रात की लम्बाई को स्पष्ट किया है।
हिन्दी व्याख्या: सेनापति कहते हैं कि शिशिर ऋतु में पड़ने वाला पाला और अत्यधिक ठंड लोगों को व्याकुल कर देती है। पौष मास बीतते-बीतते हाथ-पैर ठंड के कारण ठिठुरने लगते हैं। दिन इतने छोटे हो गए हैं कि उनके घटने की सीमा का वर्णन करना कठिन है। कवि कहते हैं कि ठंड के कारण ऐसा लगता है मानो अन्धकार चारों ओर से आकर घिर रहा हो। जब तक चकवा और चकवी मिलते हैं, तब तक रात हो जाती है और उनके मिलने का समय बहुत कम रह जाता है; रात के बीच में ही चकवा फिर अपनी चकवी से अलग हो जाता है। इस प्रकार कवि ने शिशिर ऋतु की ठंड और लम्बी रात का सुन्दर चित्रण किया है।
टिप्पणी: 1. अलंकार: अतिशयोक्ति — दिन के अत्यधिक छोटे और रात के अधिक लम्बे होने का प्रभावपूर्ण वर्णन है। मानवीकरण — अन्धकार के चारों ओर से घिरकर आने की कल्पना की गई है।
2. रस: विप्रलम्भ शृंगार रस
3. छन्द: कवित्त
4. भाव: शिशिर ऋतु की तीव्र ठंड, छोटे दिन, लम्बी रात और चकवा-चकवी के वियोग के माध्यम से विरह की अनुभूति का भाव व्यक्त हुआ है।
सेनापति

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