अभिज्ञानशाकुन्तलम् का नामकरण
अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाम संस्कृत नाटक-परम्परा में कालिदास की सर्वप्रशंसित रचना के रूप में जाना जाता है। इस नाम का शाब्दिक अर्थ है — “शाकुन्तला का अभिज्ञान” अर्थात् शकुन्तला की पहचान (recognition)।
नामकरण में 'अभिज्ञान' (recognition/identity-revealing) और 'शाकुन्तलम्' (शकुन्तला से सम्बन्धित) — दोनों तत्व नाटक की मुख्य घटना और केन्द्र-भाव को सूचित करते हैं।
नाम का व्युत्पत्ति और अर्थ (हिन्दी में)
अभिज्ञानशकुन्तल इस नामकरण के औचित्य जानने के पहले इस नाम के अर्थ को जानना आवश्यक है। अभिपूर्वक ज्ञा धातु से ल्युट प्रत्यय करके अभिज्ञान शब्द व्युत्पन्न हुआ है। अब प्रश्न होता हैं कि प्रकृत अभिज्ञान शब्द में ल्युट्प्रत्यय किस अर्थ में हुआ है ? भाव के अर्थ में ? अथवा करण के अर्थ में यदि भाव के अर्थ में ल्युटप्रत्यय माना जाय तो अर्थ होगा, अभिज्ञायते यत् तत् अभिज्ञानम् । अभिज्ञानञ्च तत् शाकुन्तलम्, अभिज्ञान शाकुन्तलम् । यहाँ पर मयूरव्यंसकादित्वात् समास समझना चाहिए। इस तरह अभिज्ञान शाकुन्तल का अर्थ हुआ शकुन्तला की पहचान । अभेदोपचार के कारण नाटक भी अभिज्ञान शाकुन्तलम् कहलाता है । अथवा अभिज्ञान शाकुन्तलम् यत्र तत् अभिज्ञान शाकुन्तलम् बह नाटक का नामार्थ है। अर्थात् वह नाटक जिसमें शकुन्तलम् पहचानी जाती है। यह नाटक का नामार्थ विवेचन हुआ।
इस नामकरण का कारण यह है कि राजा दुष्यन्त जब ऋषियों के यज्ञ की रक्षा के पश्चात् अन्तर्वत्नी शकुन्तला को कण्वाश्रम में ही छोड़कर अपनी राजधानी जाने लगा, उस समय वह पहचान के लिए अपने नाम से अंकित एक अंगूठी, यह कर कर देता गया कि हमारे मंत्री शीघ्र ही आकर तुम्हें यहीं से ससम्मान ले जायेंगे । दुष्यन्त को गए कुछ दिन बीतने लगे और शकुन्तला दुष्यन्त की ही याद में रात दिन खोयी-खोयी सी रहने लगी। यहाँ तक कि वह आतिथ्य के लिए पधारे महर्षि दुर्वासा की 'अयमहं भो: ?' यह आवाज भी नहीं सुन सकी। और उसकी उस अनवधानता को अपना अपमान समझकर महर्षि ---'विचिन्तयन्ती यमनन्य मानसा, तपोनिधि वेरिस न मामुपस्थितम् । स्मरिष्यति त्वां न स बोधितोऽपि सन्,कथां प्रमत्तः प्रथमं कृतामिव।'
यह शाप देकर उल्टे पाव लौट जाते हैं । किन्तु प्रियम्बदा की प्रार्थना से इतना मात्र वरदान देते हैं कि .... 'आभरणाभिज्ञानदर्शनेन अस्याः शापो निवर्तिष्यति।'
प्रवास से लौटे महर्षि कण्व अपनी अग्निशाला में जाकर अशरीरिणी छन्दोमयी-
'दुष्यन्तेनाहितं तेजो दधानां भूतये भुवः ।
अवेहि तनयां ब्रह्मन्नग्निगर्भा शमीमिव ।।'
इस वाणी को सुनकर अपने शार्ङ्गरव एवं शारद्वतनामक दो शिष्यों तथा गौतमी नामक अपनी धर्मभगिनी के साथ शकुन्तला को दुष्यन्त के पास भेज देते हैं । किन्तु दुष्यन्त महर्षि दुर्वासा के शाप से ग्रस्त होने के कारण शकुन्तला को पहचानते ही नहीं हैं। शकुन्तला अपनी पहचान के लिए दुष्यन्त को वह अंगूठी दिखाना चाहती है, किन्तु वह अंगूठी तो शक्रावतार में शचीतीर्थ पर बन्दना करते समय जल में पहले ही गिर चुकी थी। शकुन्तला, अपनी अंगुली अंगूठी से रहित देखकर अपनी पहचान देने में पूर्ण असमर्थ हो जाती है। दुर्वासा के शाप से ग्रस्त राजा भी शकुन्तला का प्रत्याख्यान कर देता है।
दुष्यन्त के द्वारा प्रत्याख्यात शकुन्तला रोती हुई ज्यों हि राजमहल से बाहर आती है, त्योंहि मेनका उसे वहाँ से उठा ले जाती हैं, और उसको मारीचाश्रम में रख देती है।
इधर एक दिन कुछ राजकर्मचारी एक धीवर के पास से राजा के नाम से अंकित एक अंगूठी बरामद करते हैं और उस धीवर को चोर समझते हैं। उस अंगूठी को लेकर राजश्यालक राजा दुष्यन्त के पास जाता है। उस अंगूठी को देखकर राजा को अपनी पूर्व परिणीता पत्नी शकुन्तला की याद आ जाती है। राजा अपने पूर्वकृत्यों को सोचकर अत्यन्त दुःखी होता है । यह तक कि वह शकुन्तला को याद में पागल सा हो जाता है।
अपने नाम से अंकित अंगूठी को देखकर राजा दुष्यन्त को जो अपनी पूर्व परिणीता पत्नी शकुन्तला की याद आ जाती है, वह घटना ही इस नाटक की प्रमुख घटना है। इस घटना को ही दृष्टि पथ में रखकर नाटक का नाम अभिज्ञान शाकुन्तल रखा गया है। इस तरह यह नाटक नाम अन्वर्थक नाम है। मारीच आश्रम में जो राजा दुष्यन्त शकुन्तला को पहचानता है, वह अभिज्ञान नहीं प्रत्यभिज्ञान है। अतएव अंगूठी के द्वारा छठे अंक में राजा को अपनी पत्नी शकुन्तला की पहचान होती है वहीं अभिज्ञान है । वही घटना इस नामकरण का कारण है।
अभिज्ञानशाकुन्तलम् नामकरणम् (संस्कृत)
प्रकृतस्य नाटकस्य नाम अभिज्ञान शाकुन्तलम् वर्तते, अस्य नामकरणस्य किम् कारणमास्ते? नामेदन्मवर्थ संज्ञकमुतान्यथा? इत्यादिका: विचाराः अत्र प्रकान्ताः सन्ति । तदिदमत्र विचार्यते।
सर्वप्रथमम् अभिज्ञान शाकुन्तलमितिशब्दस्यार्थः कः इति विचार्यते तदनन्तरमस्थः नामकरणस्य कारणं विचारयिष्यते । तथाहि-शकुन्तलायाः इदम् इत्यस्मिन्नर्थ 'तस्येदम्' सूत्रेणाणिकृते शाकुन्तलमिति पदम् व्युत्पद्यते । अभिज्ञायतेयत् तत् इत्यस्मिन्नर्थे अभिपूर्वकात् ज्ञाधातो: भावे ल्युटि च. अभिज्ञानमिति पदम् व्युत्पद्यते। अभिज्ञानञ्च तत् शाकुन्तलञ्च इति अभिज्ञान शाकुन्तल पदस्य विग्रहः । अत्र मयूरध्यसकादित्वात् समासोबोध्यः । शकुन्तलाया अभिज्ञानम् इति नाम्नोऽस्यार्थः ।
अस्य नामकरणस्य कारणं किमस्ति इति कारणान्वेषणेतु कुलपतेः कण्वस्यानुपस्थितौ महर्षीणाम् यज्ञरक्षार्थम् कण्वाश्रमे समागतो राजा अद्वितीय सुन्दरीम् शकुन्तलाम् गान्धर्वण विधिनोपयेमे । पुनः यज्ञ समाप्तौं अन्तर्वत्नी शकुन्तलाम् कण्वाश्रम एव विहाय स्वराजधानी प्रति गच्छन् राजा एकम् एव नामाङ्कितमङ्गलीयकम् अभिज्ञानाय तस्यै दत्त्वा प्राह-शीघ्रमेव मम कर्मचारिण अत्रागत्य त्वाम् मम राजधानी नेष्यन्तीति । दुष्यन्तात् विप्रयुक्ता शकुन्तला शन्यहृदयेव संजाता। एतस्मिन्नेवकाले महर्षिः दुर्वासाः कण्वाश्रमे आतिथ्याय समागतः प्राह-अयमहं भोः इति । किन्तु दुष्यन्तात् विप्रयुक्ता सततं तमेकं संस्मरन्ती शून्य हृदया शकुन्तला तां वाणी नहि अश्रोषीत् । महर्षिश्च तस्याः तामनवधानताम् स्वापमानम् ज्ञात्वा-'विचिन्तयन्ती यमनन्य मानसा, तपोनिधि वेत्सि न मामुपस्थितम् । स्मरिष्यति न प्रतिबोधितोऽपि सन् कथा प्रमत्तः प्रथमं कृत्तामिव ।'इति शप्त्वा प्रतिनिवृत्तः सन् प्रियम्वदयाप्रार्थित: 'आभरण दर्शनेन अस्या: शापो निवत्तिष्यतीति वरदानेनानुग्रा ह्यान्तरितो बभूव ।
प्रवासात् प्रति निवृत्तो महर्षिः कण्वः, स्वकीयेऽग्निशाले प्रविश्य-'दुष्यन्तेनाहितं तेजोदधानां भूतये भुवः ।अवेहि तनयां ब्रह्मन् अग्निगर्भाम् शमीमिव ।'इति छन्दोमयी वाणीं श्रुत्वा ज्ञात्वा च सकलं वृत्तान्तम् शकुन्तलाम्, गौतमी-शाङ्गरवशारद्वतः साकम् दुष्यन्तस्य सविधे प्रेषयामास । किन्तु महर्षेः दुर्वाससः शापाद् यस्तो राजा स्वपूर्वमूढामपि पत्नी शकुन्तलाम् नहि परिचिनोतिस्म । आत्मानं परिचाययितुम् शकुन्तला तदङ्ग रीयकम् दर्शीयतुमियेष। किन्तु मार्गे शकावतारे शचीतीर्थवन्दनावसर एव तदङ्ग रीयकम् जले निपतितमासीत् । अतएव तस्याः अङ्गुलि अङ्गुरीयकेण विरहितमासीत् । तत् दृष्ट्वा भाग्यं क्रोशन्ती विमप्य विज्ञानं दातुमक्षमा स्वात्मपरिचयप्रदानेऽक्षमा बभूव ।
राजा दुष्यन्तेन प्रत्याख्याता शकुन्तला यदा राजभवनानिसृता बभूव तदैव तामङ्के आदाय तस्याः माता मेनका अदृश्यावभूव, स्थापितवती च ताम् मारीचा श्रमे । तत्रैव शकुन्तला सर्वदमनाख्यं सुतं सुषुवे एकदा राज्ञः कर्मचारिणः कस्यचिद् धीवरस्य पार्वतः राज्ञो नामाङ्कितमङ्गरीयकं लब्ध्वा तं चौरं मत्त्वा ताडिवन्तः । राज्ञः श्यालक: अङ्गुरीयकमादाय राज्ञः सविधे जगाम । तदङ्ग रीयकं दृष्ट्वैव राजा पूर्वपरिणीतां स्वप्रेयसी शकुन्तलाम्, स्वेन कृतम् तस्याः प्रत्याख्यानं च संस्मृत्य, अतीव दुःखितो बभूव । शकुन्तलायाः विरह जन्यं दुःखमनुभूय राजा विक्षिप्ततामगमत् । यस्मात् कारणात् राजा अङ्ग रीयकरूपम् तदभिज्ञानमवलोक्य स्वेन पूर्वमूढाम् धर्मपत्नी शकुन्तलाम् सस्मार तस्मादेव
कारणादस्य नाटकस्य नामधिज्ञान शाकुन्तलम् कृतम् कविना।मारीचाश्रमे यत् शकुन्तलामवेक्ष्य राजा तां प्रत्यभिजज्ञे तत्तु प्रत्यभिज्ञानमासीनतु अभिज्ञानम् । शकुन्तलाया अभिज्ञानमेवास्य नाटकस्य प्रमुख घटना वर्तते । अतएवेमां घटनामाश्रित्य नाटकस्यास्य नामकरणम् चितमाभातीतिशम् ।
संयोगत: नाम पूरा मिलकर नाटक के केंद्रीय घटनाक्रम — शकुन्तला का भूल जाना और बाद में उसका पहचान-प्राप्ति — का संक्षेप देता है।
इतिहास: नामकरण कब और क्यों हुआ
'अभिज्ञानशाकुन्तलम्' नामकरण का कारण अभिज्ञानशाकुन्तल का नायक राजा दुष्यन्त कण्व ऋषि के आश्रम को प्राप्त करता है और समयानुसार कण्व की धर्मसुता शकुन्तला का गान्धर्वविधि से पाणिग्रहण कर अपनी राजधानी लौटते समय शकुन्तला को अभिज्ञान (पहचान) स्वरूप अपनी अँगूठी प्रदान करता है, जिस पर ‘दुष्यन्त' नाम खुदा हुआ है। शकुन्तला के पूछने पर कि पुनः आपका दर्शन कब होगा, राजा कहता है कि इस अँगूठी पर खुदे हुए अक्षरों की एक-एक करके गणना करना (दु-ष्य-न्त)। जब तुम अन्तिम अक्षर पर पहुँचोगी तो इसी बीच हमारे अन्तःपुर के सेवक तुम्हें हमारे अन्तःकरण में पहुँचा देंगे। दैववश शकुन्तला आश्रम में दुष्यन्त के विरह में व्याकुल हो अपनी सुध-बुध खोई हुई पड़ी होती है तभी उत्तम तपस्वी किन्तु क्रोधी दुर्वासा आश्रम में प्रवेश करते हैं, किन्तु शकुन्तला दुष्यन्त के चिन्तन में निमग्न अपने द्वार पर उपस्थित अतिथि को न जान सकी, आतिथ्यसत्कार तो दूर रहा। दुर्वासा ऋषि अपना अतिथिसत्कार न पाकर शाप दे देते हैं कि ओह ! अतिथि का तिरस्कार करने वाली! अनन्य भाव से जिसका तू चिन्तन कर रही है, वही तुझे भूल जाएगा। इसके बाद प्रियम्वदा के अनुनय-विनय करने पर ऋषि कहते हैं कि अभिज्ञान (पहचान) का आभूषण अँगूठी दिखलाने से मेरा शाप समाप्त हो जाएगा। शकुन्तला के दैव को अनुकूल करने के लिए सोमतीर्थ गये हुए कण्व ऋषि जब पुनः अपने आश्रम में वापस आते हैं तब उन्हें शकुन्तला व दुष्यन्त के विवाह का समाचार प्राप्त होता है। फिर वे शकुन्तला को राजा के पास भेज देते हैं, किन्तु दुर्वासा के शाप के कारण राजा उसे नहीं । पहचानता है। फिर शकुन्तला राजा के नाम की अँगूठी दिखलाना चाहती है, किन्त त तो दैवातू शचीतीर्थ का वन्दन करते समय जल में गिर चुकी थी। निराश हो जब अपने दैव को धिक्कारती हुई रुदन करने लगती है तभी उसकी माँ मेनका ने अदृश्य होकर तेजोमयी मूर्ति बनकर उसे उठा ले गई और उसे हेमकूट पर्वत पर स्थित मारीच आ पहुँचा दिया। इसी आश्रम में शकुन्तला एक पुत्र को जन्म देती है, जो सर्वदमन और भरत के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसके बाद राजपुरुषों को राजा के नाम की अँगूठी एक धीवर के पास से प्राप्त हुई। उस अँगूठी के साथ धीवर को भी उपस्थित किया जाता है। राजा जब अंगठी देखता है तब उसे शकुन्तला के साथ गान्धर्वविवाह का वृत्तान्त स्मरण हो जाता है। तब वह धीवर को पुरस्कृत करवाता है तथा स्वयं शकुन्तला के विरह में दुःखी रहने लगता है। इस प्रकार इस नाटक के पञ्चम अंक में अँगूठी देखकर राजा को शकुन्तला की याद आती है। अतएव प्रकृत नाटक को ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्' कहते हैं। इसमें दो अंश हैं—एक अभिज्ञान दूसरा शकुन्तला । अभिज्ञान का अर्थ है पहचानने का साधन-अभिज्ञायतेऽनेनेति अभिज्ञानम्। व्युत्पत्ति कई प्रकार से की जाती है-(१) अभिज्ञानम्=अभिज्ञानभूतं तत् शाकुन्तलम् इति अभिज्ञानशाकुन्तलम् । अर्थात् शकुन्तलाविषयक वह नाटक जो अभिज्ञानस्वरूप हो। (२) अभिज्ञानेन स्मृतं शाकुन्तलं=शकुन्तलाविषयकं वृत्तान्तं यस्मिन् तत् अभिज्ञानशाकुन्तलम्-अर्थात् शकुन्तला- विषयक विवाह का वृत्तान्त, जिसमें निशानी के रूप में स्मृत हो आया हो। (३) अभिज्ञानम्=परिचयस्वरूपं शाकुन्तलम्=शकुन्तलासम्बन्धिचुरितं यत्र=यस्मिन् नाटके तत् अभिज्ञानशाकुन्तलम् । अर्थात् जिस नाटक में शकुन्तला का विवाह आदि वृत्तान्त अभिज्ञान प्रधान हो। (५) अभिज्ञानं च शकुन्तला च अभिज्ञानशाकुन्तले ते अधिकृत्य कृतं नाटमिति अभिज्ञानशाकुन्तलम् । अर्थात् शकुन्तला के विषय में निशानी या परिचय जिस नाटक में निबद्ध हो, उसे अभिज्ञानशाकुन्तल कहते हैं। (६) अभिज्ञानेन स्मृता स्मृतिपथमानीता शकुन्तला अभिज्ञानशकुन्तला तामधिकृत्य कृतं नाटकमिति अभिज्ञानशाकुन्तलम् । अर्थात् जिस नाटक में अभिज्ञान से स्मृत ‘शाकुन्तलम्' नाम मिलता है। ऐसी स्थिति में इसकी व्याख्या इस प्रकार होगी–‘अभिज्ञायते अनेन इति अभिज्ञानम्, अभिज्ञानेन स्मृता=स्मृतिपथमानीता शकुन्तला यस्मिनु (नाटके) तत् अभिज्ञानशाकुन्तलम् । शाकपार्थिवादि समास होने से ‘शाकपार्थिवादीनां सिद्धये उत्तरपदलोपस्योपसंख्यानम्' वार्तिक द्वारा स्मृति का लोप हो जाता है। नाटक का विशेषण होने के कारण दोनों में अभेद मानकर नपुसंकलिंग में ह्रस्व हो जाने से ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम् । होगा। विशेष प्रचलित नाम ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्' ही है।। | अभिज्ञान (पहचान) शब्द का प्रयोग आदिकाव्य वाल्मीकीय रामायण में भी प्राप्त होता है। संभवतः महाकवि के द्वारा ‘अभिज्ञान' शब्द यहीं से ग्रहण किया गया हो। सुन्दरकाण्ड में हनुमान जी सीता जी से कहते हैं कि मेरे द्वारा आपका दर्शन कर लिया गया है। इसके प्रमाणस्वरूप आप हमें कोई अपनी निशानी दे दें, ताकि श्रीरामचन्द्र जी को भी ज्ञात हो जाय-“अभिज्ञानं प्रयच्छ त्वं जानीयाद् राघवो यतः ।।३८/१०।। सीता जी ने पहचान बताते हुए कहा-“इदं श्रेष्ठमभिज्ञानं ब्रूयास्त्वं तु मम प्रियम् ।।३८/१२ ।।
नाटक के संस्कृत-पण्डितों और बाद के अनुवादकों ने इसे सामान्यत: अभिज्ञानशाकुन्तलम् ही कहा, क्योंकि 'अभिज्ञान' घटना नाटक के भावात्मक और कथात्मक केंद्र में है।
विविध नाम और रूपांतर
- शाकुन्तलम्: कभी-कभी संक्षेप में सिर्फ़ 'शाकुन्तलम्' लिखा/बोला जाता है।
- अभिज्ञानम्: कुछ टिप्पणीकार नाटक को उसके वैज्ञानिक विषय के कारण 'अभिज्ञान' भी कहते हैं।
- अभिज्ञानशाकुंतकम: वर्तनी और छापों में भिन्नता के कारण विविध रूप पाये जाते हैं।
परंपरा में canonical रूप वही रहा — अभिज्ञानशाकुन्तलम् — क्योंकि यह नाम नाटक की प्रमुख घटना को स्पष्ट करता है।
नामकरण का साहित्यिक महत्त्व
नाम नाटक की थीम, संरचना और भाव को संक्षेप में प्रस्तुत करता है। 'अभिज्ञान' शब्द दर्शक के मन में पहचान-क्षण की प्रत्याशा जगाता है — जिससे नाटक के 동안द्रव और भावोत्पादक क्रिया अधिक प्रभावी बनती है।
कालिदास के नामकरण ने नाटक को ऐसा शीर्षक दिया जो न केवल कथानक को परिभाषित करता है, बल्कि पाठक/दर्शक की अपेक्षा और संवेदना को भी निर्देशित करता है।
विद्वानों के मत
शास्त्रीय आलोचना में विद्वान इस नाम की उपयुक्तता पर सहमत हैं — अनेक आलोचक मानते हैं कि 'अभिज्ञान' ही नाटक की नैतिक और भावनात्मक केंद्रिका है। कुछ ने यह भी संकेत किया कि नाम नाटक के सामाजिक-ऐतिहासिक प्रसंग और पहचान-विषयों की व्यापक व्याख्या को भी खोलता है।
