जहाँ रूप, रंग, गुण अथवा धर्म के आधार पर उपमेय (प्रस्तुत) की तुलना लोकप्रसिद्ध उपमान (अप्रस्तुत) से की जाती है, वहाँ उपमा अलंकार होता है। उपमा के चार अनिवार्य अंग होते हैं— उपमेय, उपमान, साधारण धर्म तथा वाचक शब्द।
आचार्य मम्मट (काव्यप्रकाश) :
"साधर्म्यमुपमा भेदे..."
अर्थात् उपमेय और उपमान में भेद (भिन्नता) रहते हुए भी जो साधर्म्य (समान धर्म का प्रतिपादन) होता है, उसे उपमा कहते हैं।
आचार्य विश्वनाथ (साहित्यदर्पण) :
"साम्यं वाच्यमवैधर्म्यं वाक्यैक्ये उपमा द्वयोः ।"
दो भिन्न पदार्थों में एक ही वाक्य के भीतर जहाँ वैधर्म्य रहित वाच्य-सादृश्य का कथन हो, वहाँ उपमा अलंकार होता है।
उदाहरण :
"पीपर पात सरिस मन डोला ।"
स्पष्टीकरण: यहाँ मन = उपमेय, पीपर पात = उपमान, डोला (चंचलता) = साधारण धर्म, तथा सरिस = सादृश्यवाचक शब्द है। चारों अंग उपस्थित होने से यह पूर्णोपमा है।
मुख्यतः उपमा के दो भेद प्रसिद्ध हैं (तथा विस्तार में मालोपमा व रसनोपमा भी आते हैं):
1. पूर्णोपमा (चारों अंग विद्यमान)
3. मालोपमा (एक उपमेय, अनेक उपमान)
2. लुप्तोपमा (एक या अधिक अंग लुप्त)
4. रसनोपमा (श्रृंखलाबद्ध उपमा)
1. पूर्णोपमा :—
जहाँ उपमा के चारों अंग (उपमेय, उपमान, साधारण धर्म, वाचक शब्द) स्पष्ट रूप से उपस्थित हों।
"मुख मयंक सम मंजु मनोहर ।"
2. लुप्तोपमा :—
जहाँ चारों अंगों में से किसी एक, दो अथवा तीन अंगों का लोप हो (धर्मलुप्ता, वाचकhandleलुप्ता, उपमानलुप्ता आदि)।
"मुख कमल जैसा है ।" (यहाँ 'मनोहर' साधारण धर्म लुप्त है—धर्मलुप्ता)
3. मालोपमा :—
जहाँ एक ही उपमेय के लिए माला की भाँति कई उपमानों का प्रयोग किया जाए।
"चन्द्रमा सा कान्तिवाला, कुसुम सा कोमल, समुद्र सा गम्भीर है वह।"
4. रसनोपमा :—
जहाँ पूर्व उपमान आगे चलकर उपमेय बनता चला जाए और एक रश्मि/श्रृंखला बन जाए।
"काव्य से रस, रस से चित्तद्रव, चित्तद्रव से आनन्द उत्पन्न होता है।"
पहली पंक्ति: उपमा को सभी सादृश्यमूलक अलंकारों की जननी (मातृका) कहा गया है।
दूसरी पंक्ति: पूर्णोपमा और लुप्तोपमा के श्रौती और आर्थी भेद भी आचार्य मम्मट ने निरूपित किए हैं।
तीसरी पंक्ति: सादृश्यवाचक शब्द (सा, सी, से, सम, सरिस, सदृश, ज्यों, इव, तुल्य) इसकी पहचान हैं।
चौथी पंक्ति: महाकवि कालिदास उपमा प्रयोग के लिए विश्वविख्यात हैं (उपमा कालिदासस्य)।
पाँचवीं पंक्ति: जब चारों अंग उपस्थित न हों तो परीक्षा में निःसंकोच 'लुप्तोपमा' का चयन करें।
2. रूपक अलंकार
परिभाषा :
जहाँ अत्यधिक सादृश्यता के कारण उपमेय में उपमान का अभेद (अन्तर रहित) आरोप किया जाता है, वहाँ रूपक अलंकार होता है। इसमें उपमेय और उपमान को एक रूप मान लिया जाता है।
आचार्य मम्मट (काव्यप्रकाश) :
"तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः ।"
उपमान और उपमेय के बीच अत्यन्त सादृश्य के कारण अभेद का प्रतिपादन ही रूपक है।
आचार्य विश्वनाथ (साहित्यदर्पण) :
"रूपकं रूपितारोपाद् विषये निरपह्नवे ।"
जहाँ उपमेय (विषय) का निषेध (अपनुति) किए बिना उस पर उपमान (विषयी) का आरोप किया जाए।
उदाहरण :
"चरन कमल बन्दौ हरिराई ।"
स्पष्टीकरण: यहाँ चरणों को कमल के समान न बताकर सीधे 'चरण ही कमल' का अभेद आरोप कर दिया गया है।
"मैया मैं तो चन्द्र-खिलौना लैहों ।"
स्पष्टीकरण: यहाँ 'चन्द्रमा रूपी खिलौना'— चन्द्रमा पर खिलौने का अभेद आरोप है।
प्रमुख भेद :
रूपक के मुख्य रूप से तीन प्रमुख भेद स्वीकृत हैं —
1. सांग रूपक (अंगों सहित आरोप)
3. परम्परित रूपक (एक आरोप दूसरे का कारण)
2. निरंग रूपक (केवल मुख्य रूप का आरोप)
1. सांग रूपक :—
जहाँ उपमेय के प्रधान अंग के साथ-साथ उसके अन्य सभी गौण अंगों पर भी उपमान के अंगों का सविस्तार आरोप हो।
स्पष्टीकरण: यहाँ श्रीकृष्ण के श्याम शरीर पर पीताम्बर धारण करने में 'नीलमणि पर्वत पर प्रातःकालीन धूप' पड़ने की मनोरम सम्भावना (मनहुँ) व्यक्त की गई है।
"उस काल मारे क्रोध के तन काँपने उनका लगा ।
मानो हवा के जोर से सोता हुआ सागर जगा ॥"
स्पष्टीकरण: अर्जुन के क्रोध से काँपते शरीर (उपमेय) में क्षुब्ध सागर (उपमान) की सम्भावना 'मानो' वाचक शब्द से की गई है।
प्रमुख भेद :
उत्प्रेक्षा के प्रधान रूप से तीन भेद माने जाते हैं —
1. वस्तुत्प्रेक्षा (वस्तु की सम्भावना)
3. फलोत्प्रेक्षा (अफल में फल की कल्पना)
2. हेतूत्प्रेक्षा (अहेतु में हेतु की कल्पना)
1. वस्तुत्प्रेक्षा :—
जहाँ एक वास्तविक वस्तु (उपमेय) में किसी दूसरी वस्तु (उपमान) की सीधे सम्भावना की जाए।
"मुख मानो चन्द्रमा है ।"
2. हेतूत्प्रेक्षा :—
जहाँ अहेतु (जो वास्तविक कारण न हो) को कारण मानकर सम्भावना की जाए।
"अरुण पल्लव भये मानहुँ, पावक तपे बसन्त ।" (वसन्त की तपन लाल पत्तों का वास्तविक कारण नहीं है)
3. फलोत्प्रेक्षा :—
जहाँ जो फल न हो, उसे ही फल मानकर सम्भावना व्यक्त की जाए।
"बढ़त ताड़ को पेड़ यह, मनु चुमन आकास ।" (ताड़ का बढ़ना स्वाभाविक है, आकाश चूमना कल्पित फल है)
पहली पंक्ति: उत्प्रेक्षा के वाचक शब्द हैं— मानो, मनु, मनहुँ, जानो, जनु, जनहुँ, इव।
दूसरी पंक्ति: रूपक में 'अभेद निश्चय' होता है जबकि उत्प्रेक्षा में केवल 'संभावना/तर्कणा' होती है।
तीसरी पंक्ति: अभिव्यक्ति के आधार पर इसके दो रूप होते हैं— वाच्या (वाचक शब्द युक्त) और प्रतीयमाना (वाचक शब्द रहित)।
चौथी पंक्ति: हेतूत्प्रेक्षा में कल्पित कारण और फलोत्प्रेक्षा में कल्पित प्रयोजन मुख्य होता है।
पाँचवीं पंक्ति: 'दादुर धुनि चहुँ दिसा सुहाई, बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई' में वाच्योत्प्रेक्षा अलंकार है।
4. अनन्वय अलंकार
परिभाषा :
जहाँ उपमेय के समान संसार में किसी अन्य उपमान के न मिलने के कारण उपमेय की तुलना स्वयं उपमेय से ही कर दी जाए, वहाँ अनन्वय अलंकार होता है (अन्वय = सम्बन्ध; अनन्वय = जिसका अन्य से सादृश्य-सम्बन्ध न हो)।
आचार्य मम्मट (काव्यप्रकाश) :
"उपमानोपमेयत्वमेकस्यैव त्वनन्वयः ।"
जब एक ही वस्तु को एक साथ उपमान और उपमेय दोनों बना दिया जाए, तब अनन्वय अलंकार होता है।
स्पष्टीकरण: यहाँ श्रीराम के समान केवल श्रीराम और सीता के समान केवल सीता ही हैं; कोई दूसरा उपमान न पाकर स्वयं उपमेय को ही उपमान बना दिया गया है।
"भारत के सम भारत है, नहिं दूजा जग में कोय ।"
स्पष्टीकरण: भारत की तुलना के लिए संसार में कोई अन्य देश योग्य नहीं मिला, अतः भारत की समता भारत से ही दी गई है।
पहली पंक्ति: अनन्वय का मूल भाव है— उपमेय का अद्वितीय, अनुपम और अतुलनीय होना।
दूसरी पंक्ति: इसमें उपमेय ही स्वयं अपना उपमान बन जाता है।
तीसरी पंक्ति: 'गगनं गगनाकारं सागरः सागरोपमः' संस्कृत साहित्य में अनन्वय का सर्वाधिक प्रसिद्ध श्लोक है।
चौथी पंक्ति: यह अलंकार किसी वस्तु की सर्वोत्कृष्टता प्रतिपादित करने के लिए प्रयुक्त होता है।
पाँचवीं पंक्ति: जब एक ही नाम दोनों पक्षों (उपमेय-उपमान) में समान रूप से दोहराया जाए, तो तुरंत अनन्वय पहचानें।
5. प्रतीप अलंकार
परिभाषा :
'प्रतीप' का शाब्दिक अर्थ है— 'उल्टा' या 'विपरीत'। जहाँ प्रसिद्ध उपमान का तिरस्कार (अनादर) करके उसे उपमेय बना दिया जाए अथवा उपमेय को उपमान से अत्यधिक श्रेष्ठ सिद्ध कर दिया जाए (उपमा का ठीक विपरीत), वहाँ प्रतीप अलंकार होता है।
उपमान को उपमेय कल्पित कर देना अथवा उपमेय के आधिक्य से उपमान का अनादर करना प्रतीप कहलाता है।
आचार्य दण्डी :
"प्रतीपं नाम तदाहुर्यत्रोपमानस्य हीनता ।"
उदाहरण :
"उतरि नहाए जमुन जल, जो सरीर सम स्याम ।"
स्पष्टीकरण: सामान्यतः शरीर को यमुना-जल जैसा श्याम कहा जाता, किन्तु यहाँ प्रसिद्ध उपमान 'यमुना-जल' को उपमेय 'श्रीकृष्ण के शरीर' के समान बताकर उपमा को उल्टा कर दिया गया है।
"सिय मुख समता पाव किमि, चंद बापुरो रंक ।"
स्पष्टीकरण: सीताजी के मुख की समता बेचारा निष्प्रभ और कलंकी चन्द्रमा कैसे पा सकता है? यहाँ उपमान (चन्द्र) का तिरस्कार है।
प्रमुख 5 भेद :
काव्यशास्त्र में प्रतीप के 5 प्रमुख भेद माने गए हैं —
1. उपमान को उपमेय बना देना
4. उपमान का उपमेय के सम्मुख व्यर्थ होना
2. उपमेय से उपमान की हीनता दिखाना
5. उपमेय को उपमान जैसा मानकर सन्तोष करना
3. उपमेय के रहते उपमान को व्यर्थ कहना
पहली पंक्ति: प्रतीप अलंकार 'उपमा अलंकार' का सर्वथा विपरीत (उल्टा) होता है।
दूसरी पंक्ति: इसमें प्रसिद्ध उपमानों (कमल, चन्द्रमा आदि) को दीन-हीन या तुच्छ सिद्ध किया जाता है।
तीसरी पंक्ति: नायिका के सौन्दर्य को लोकोत्तर दिखाने हेतु रीतिकालीन कवियों ने इसका प्रचुर प्रयोग किया।
चौथी पंक्ति: 'नेत्र के समान कमल है' कहना प्रतीप का प्राथमिक स्वरूप है।
पाँचवीं पंक्ति: 'बापुरो', 'रंक', 'दीन' जैसे शब्द उपमान के साथ जुड़े दिखें तो वहाँ प्रतीप अलंकार होता है।
6. व्यतिरेक अलंकार
code
Code
परिभाषा :
जहाँ सादृश्य होने पर भी कारण सहित उपमान की अपेक्षा उपमेय का उत्कर्ष (श्रेष्ठता) अथवा अपकर्ष दिखाया जाए, वहाँ व्यतिरेक अलंकार होता है।
आचार्य मम्मट (काव्यप्रकाश) :
"उपमानाद्यदन्यस्य व्यतिरेकः स एव सः ।"
उपमान की तुलना में अन्य (उपमेय) का जो उत्कर्ष या वैशिष्ट्य दिखाया जाता है, वही व्यतिरेक है।
आचार्य विश्वनाथ (साहित्यदर्पण) :
"व्यतिरेको विशेषश्चेदुपमानोपमेययोः ।"
उपमान और उपमेय में सादृश्य रहते हुए भी जहाँ उपमेय में किसी विशेष गुण की अधिकता हो।
उदाहरण :
"संत हृदय नवनीत समाना ।
कहा कबिन्ह परि कहै न जाना ॥
निज परिताप द्रवै नवनीता ।
पर दुख द्रवै सुसंत पुनीता ॥"
स्पष्टीकरण: यहाँ संत-हृदय (उपमेय) और मक्खन (उपमान) दोनों को कोमल बताया गया है, किन्तु मक्खन अपनी आँच से पिघलता है जबकि संत दूसरों के दुःख से पिघलते हैं—अतः कारण सहित संत-हृदय का उत्कर्ष दिखाया गया है।
"चन्द्र सकलंक, मुख निष्कलंक ।"
स्पष्टीकरण: चन्द्रमा (उपमान) में दाग/कलंक है, किन्तु मुख (उपमेय) निष्कलंक है, अतः मुख की श्रेष्ठता सिद्ध होने से व्यतिरेक है।
पहली पंक्ति: प्रतीप में उपमान का सीधा अनादर होता है, जबकि व्यतिरेक में 'सकारण विशेषता' दिखाई जाती है।
दूसरी पंक्ति: व्यतिरेक के मुख्य रूप से हेतु-गर्भित और अहेतु-गर्भित भेद किए जाते हैं।
तीसरी पंक्ति: उपमेय का उत्कर्ष 'गुण की अधिकता' अथवा 'दोष के अभाव' दोनों आधारों पर सम्भव है।
चौथी पंक्ति: 'काव्यप्रकाश' में व्यतिरेक के 24 उपभेदों का विस्तृत विवेचन प्राप्त होता है।
पाँचवीं पंक्ति: परीक्षा में 'उपमेय > उपमान + कारण' का सूत्र दिखते ही व्यतिरेक का चयन करें।
7. उपमेयोपमा अलंकार
परिभाषा :
जहाँ दो वस्तुओं के बीच पर्याय से (बारी-बारी से) एक को उपमेय और दूसरे को उपमान, फिर उलटकर दूसरे को उपमेय और पहले को उपमान बनाकर उपमा दी जाए, ताकि यह सिद्ध हो सके कि उन दोनों के समान संसार में कोई तीसरा नहीं है, वहाँ उपमेयोपमा अलंकार होता है।
आचार्य मम्मट (काव्यप्रकाश) :
"द्वयोः पर्यायेणोपमानोपमेयत्वे उपमेयोपमा ।"
दो वस्तुओं का पर्याय (क्रम-परिवर्तन) से उपमान और उपमेय भाव उपमेयोपमा कहलाता है।
स्पष्टीकरण: पहले चरण में कमल उपमान और नैन उपमेय हैं, दूसरे चरण में नैन उपमान और कमल उपमेय बना दिए गए हैं ताकि तीसरे किसी पदार्थ का निषेध हो सके।
पहली पंक्ति: उपमेयोपमा = उपमेय + उपमा (परस्पर उपमा का विनिमय)।
दूसरी पंक्ति: इसका मुख्य उद्देश्य 'तृतीय सादृश्य का व्यवच्छेद' (तीसरे उपमान का अभाव बताना) है।
तीसरी पंक्ति: अनन्वय में एक ही वस्तु होती है, जबकि उपमेयोपमा में दो वस्तुएँ परस्पर उपमान-उपमेय बनती हैं।
चौथी पंक्ति: यह वस्तुतः दो उपमाओं का परस्पर सुगठित युग्म होता है।
पाँचवीं पंक्ति: 'A = B और B = A' का समतुल्य काव्य-समीकरण उपमेयोपमा का परिचायक है।
8. स्मरण अलंकार
code
Code
परिभाषा :
जहाँ किसी वस्तु, रूप अथवा दृश्य को देखकर उसके सादृश्य (समानता) के कारण पूर्व-अनुभूत (पहले देखी हुई) किसी वस्तु की स्मृति संस्कारवश जाग उठे, वहाँ स्मरण अलंकार होता है।