शब्दालंकार — अनुप्रास, यमक और श्लेष वक्रोक्ति

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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शब्दालंकार संग्रह • वर्ग 00
✻ प्रमुख शब्दालंकार संग्रह (वर्ण, पद एवं वाक्य चमत्कार) ✻
⚡ परीक्षा उपयोगी त्वरित दृष्टि (10-Second Tricks) :
अनुप्रास: जहाँ स्वरों की विषमता होने पर भी केवल व्यंजनों/वर्णों की बार-बार आवृत्ति हो (जैसे — तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये)।
यमक: जहाँ एक ही शब्द दो या अधिक बार आए और हर बार उसका अर्थ भिन्न हो (जैसे — कनक कनक ते सौ गुनी)।
श्लेष: जहाँ शब्द एक ही बार प्रयुक्त हो किन्तु प्रसंगवश उसके एकाधिक भिन्न अर्थ निकलें (जैसे — सुबरन को खोजत फिरत, कवि, व्यभिचारी, चोर)।
वक्रोक्ति: वक्ता के कहे कथन का श्रोता द्वारा श्लेष या कंठ-ध्वनि (काकु) से जानबूझकर दूसरा अर्थ लगाना (जैसे — 'को तुम?'- 'घनस्याम हम'- 'तौ कितहूँ बरसो')।
📑 इस अध्याय में सम्मिलित अलंकार (अनुक्रमणिका) :
  1. अनुप्रास अलंकार
  2. यमक अलंकार
  3. श्लेष अलंकार
  4. वक्रोक्ति अलंकार
1. अनुप्रास अलंकार
व्युत्पत्ति एवं परिभाषा :

व्युत्पत्ति: अनु + प्र + आस् = 'अनु' (बार-बार), 'प्र' (प्रकर्ष/रस के अनुकूल), 'आस्' (रखना/न्यास)।
अर्थात् रस के अनुकूल वर्णों की पास-पास योजना (प्रास)। जिस काव्य-पंक्ति में स्वर की विषमता (समानता न होने) पर भी व्यंजनों/वर्णों की बार-बार आवृत्ति होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।

आचार्य मम्मट (काव्यप्रकाश) :
"वर्णसाम्यमनुप्रासः ।"

वर्णों (व्यंजनों) की समता/सादृश्य को अनुप्रास अलंकार कहते हैं।

आचार्य विश्वनाथ (साहित्यदर्पण) :
"अनुप्रासः शब्दसाम्यं वैषम्येऽपि स्वरस्य यत् ।"

स्वरों की विषमता (असमानता) होने पर भी जहाँ केवल व्यंजनों/शब्दों का सादृश्य हो, वहाँ अनुप्रास होता है।

अग्निपुराण :
"स्यादावृत्तिरनुप्रासो वर्णानां पदवाक्ययोः ।
एकवर्णोऽनेकवर्णो वृत्तिर्वर्णगणो द्विधा ॥"

पद और वाक्यों में वर्णों की आवृत्ति का नाम अनुप्रास है, जिसके एकवर्णावृत्ति और अनेकवर्णावृत्ति रूप भेद हैं।

आचार्य भामह (काव्यालंकार) :

"सरूप वर्णों के विन्यास को अनुप्रास कहते हैं।" इन्होंने इसके दो प्रमुख रूप— नागरिक अनुप्रास और ग्राम्य अनुप्रास बताए हैं।

आचार्य वामन (काव्यालंकारसूत्रवृत्ति) :
"शेषः सरूपोऽनुप्रासः ।"

यमक के अतिरिक्त सरूप (समान रूप वाले) पदों/वर्णों के विन्यास का नाम अनुप्रास है।


विविध उदाहरण :
"तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये ।
झुके कूल सों जल परसन हित मनहुँ सुहाये ॥"
स्पष्टीकरण: यहाँ 'त' वर्ण की आवृत्ति एक से अधिक बार लगातार हुई है।
"चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल-थल में ।"
स्पष्टीकरण: प्रथम चरण में 'च' वर्ण तथा द्वितीय चरण में 'ल' वर्ण की क्रमिक आवृत्ति से नाद-सौन्दर्य उत्पन्न हुआ है।
"मुदित महीपति मंदिर आए । सेवक सचिव सुमंत बुलाए ॥"
स्पष्टीकरण: प्रथम अर्धाली में 'म' वर्ण तथा द्वितीय अर्धाली में 'स' वर्ण की आवृत्ति है।

अनुप्रास के पाँच प्रमुख भेद :

आचार्यों द्वारा अनुप्रास के 5 मुख्य भेद स्वीकृत किए गए हैं —

  • 1. छेकानुप्रास
  • 4. अन्त्यानुप्रास
  • 2. वृत्यानुप्रास
  • 5. लाटानुप्रास
  • 3. श्रुत्यानुप्रास
1. छेकानुप्रास :—

जहाँ अनेक व्यंजनों की स्वरूपतः और क्रमतः केवल एक ही बार आवृत्ति (अर्थात् दो बार कथन) हो। ('छेक' = चतुर)।

"बन्दउँ गुरु पद पदुम परागा । सुरुचि सुबास सरस अनुरागा ॥"
स्पष्टीकरण: 'पद पदुम परागा' में 'प-द' तथा 'सुरुचि सुबास सरस' में 'स-र' का क्रम से एक ही बार दोहराव है।
2. वृत्यानुप्रास :—

जहाँ एक या अनेक वर्णों की आवृत्ति दो से अधिक बार (अनेक बार) वृत्तियों (मधुरा, प्रौढ़ा, परुषा आदि) के अनुकूल हो।

"कल कानन कुंडल मोरपखा, उर पे बनमाल बिराजति है ।"
स्पष्टीकरण: 'क', 'न', 'ल', 'ब' वर्णों की दो से अधिक बार बहुविध आवृत्ति हुई है।
3. श्रुत्यानुप्रास :—

जहाँ मुख के एक ही उच्चारण स्थान (जैसे केवल दन्त्य, केवल कण्ठ्य या केवल तालव्य) से उच्चरित होने वाले वर्णों की बहुलता हो, जो कानों को सुनने में अत्यन्त मधुर लगे।

"दिनान्त था थे दीननाथ डूबते, सधेनु आते गृह ग्वाल बाल थे ।"
स्पष्टीकरण: यहाँ 'द, न, त, थ' सभी एक ही उच्चारण-स्थान (दन्त्य) के वर्ण हैं।
4. अन्त्यानुप्रास :—

जहाँ छन्द के चरणों के अन्त में समान स्वर और व्यंजन की तुक (अन्त्य वर्ण साम्य) मिलती हो।

"जय हनुमान ज्ञान गुन सागर ।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥"
स्पष्टीकरण: दोनों चरणों के अन्त में 'आगर' (सागर / उजागर) तुकान्त साम्य है।
5. लाटानुप्रास :—

जहाँ समान अर्थ वाले शब्दों या पूरे वाक्यखण्डों की आवृत्ति हो, किन्तु अन्वय (तात्पर्य/सम्बन्ध) करने पर अर्थ में भेद आ जाए। (लाट देशवासियों को प्रिय होने से 'लाटानुप्रास' नाम पड़ा)।

"पूत सपूत तौ क्यों धन संचय ।
पूत कपूत तौ क्यों धन संचय ॥"
स्पष्टीकरण: 'तौ क्यों धन संचय' पूरे वाक्य की आवृत्ति है, किन्तु 'सपूत' और 'कपूत' के अन्वय से भावार्थ बदल जाता है।

पहली पंक्ति: अनुप्रास में स्वरों का मिलना आवश्यक नहीं है, केवल व्यंजनों की समानता अनिवार्य है।
दूसरी पंक्ति: छेकानुप्रास में वर्णों की आवृत्ति केवल 'एक बार' (कुल 2 बार प्रयोग) होती है।
तीसरी पंक्ति: वृत्यानुप्रास में वर्णों की आवृत्ति 'अनेक बार' (3 या अधिक बार) होती है।
चौथी पंक्ति: लाटानुप्रास को 'पदानुप्रास' या 'शब्दानुप्रास' भी कहा जाता है।
पाँचवीं पंक्ति: 'रहिमन पानी राखिये..' की अन्तिम तुक में भी अन्त्यानुप्रास का सौन्दर्य समाहित रहता है।
2. यमक अलंकार
परिभाषा :

'यमक' का शाब्दिक अर्थ है— 'युग्म' या 'जोड़ा'। जहाँ काव्य में समान शब्द की दो या दो से अधिक बार आवृत्ति हो, किन्तु प्रत्येक बार उसका अर्थ भिन्न-भिन्न हो (अथवा सार्थक वर्ण-समूह के साथ निरर्थक वर्ण-समूह की आवृत्ति हो), वहाँ यमक अलंकार होता है।

आचार्य मम्मट (काव्यप्रकाश) :
"अर्थे सत्यर्थभिन्नानां वर्णानां सा पुनः श्रुतिः ।"

सार्थक होने पर भिन्न-भिन्न अर्थ वाले तथा निरर्थक होने पर केवल वर्ण-समूह की पुनः उसी क्रम से आवृत्ति को यमक कहते हैं।

आचार्य विश्वनाथ (साहित्यदर्पण) :
"सत्यर्थे पृथगर्थायाः स्वरव्यंजनसंहतेः ।
क्रमेण तेनैवावृत्तिर्यमकं विनिगद्यते ॥"

स्वर और व्यंजनों के समूह की उसी क्रम से पुनः आवृत्ति होना, जहाँ अर्थ होने पर वे भिन्न-भिन्न अर्थ वाले हों।


विविध उदाहरण :
"कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय ।
वा खाये बौराय जग, या पाये बौराय ॥"
स्पष्टीकरण: यहाँ 'कनक' शब्द दो बार आया है— पहले कनक का अर्थ धतूरा (नशीला फल) तथा दूसरे कनक का अर्थ स्वर्ण (सोना) है।
"काली घटा का घमंड घटा, नभ मंडल तारक वृंद खिले ।"
स्पष्टीकरण: पहली 'घटा' = काले बादल, और दूसरी 'घटा' = कम हो गया (घट जाना)।
"तीन बेर खाती थीं वे तीन बेर खाती हैं ।"
स्पष्टीकरण: भूषण कृत पंक्ति में प्रथम 'तीन बेर' = तीन बार (समय) तथा द्वितीय 'तीन बेर' = तीन बेर के फल।
"जेते तुम तारे, तेते नभ में न तारे हैं ।"
स्पष्टीकरण: प्रथम 'तारे' = उद्धार किया तथा द्वितीय 'तारे' = आकाश के नक्षत्र/तारे।

यमक के प्रमुख भेद :

यमक के मुख्य रूप से दो भेद प्रचलित हैं —

  • 1. अभंग पद यमक (बिना तोड़े भिन्न अर्थ)
  • 2. सभंग पद यमक (शब्द तोड़कर भिन्न अर्थ)
1. अभंग यमक :—

जहाँ शब्द को बिना तोड़े-मरोड़े ही उसके मूल रूप में भिन्न अर्थ निकल आएँ।

"सजना है मुझे सजना के लिए ।" (प्रथम सजना = श्रृंगार, द्वितीय सजना = पति/प्रियतम)
2. सभंग यमक :—

जहाँ शब्दों को जोड़-तोड़ कर (विभक्त करके) दूसरा अर्थ प्राप्त किया जाए।

"कुमोदिनी मानस-मोदिनी कही ।"
स्पष्टीकरण: 'कुमोदिनी' (कमलिनी) तथा 'मोदिनी' (आनन्द देने वाली) में पद-भंग द्वारा साम्य है।

पहली पंक्ति: यमक में शब्दों की आवृत्ति और अर्थों की भिन्नता दोनों का होना अनिवार्य है।
दूसरी पंक्ति: लाटानुप्रास में शब्दार्थ वही रहता है (केवल अन्वय बदलता है), जबकि यमक में शब्दार्थ सर्वथा भिन्न होता है।
तीसरी पंक्ति: महाकवि केशवदास की 'रामचन्द्रिका' में यमक अलंकार का प्रचुर चमत्कार मिलता है।
चौथी पंक्ति: शब्द को बिना तोड़े भिन्न अर्थ निकले तो 'अभंग' और तोड़कर निकले तो 'सभंग' यमक होता है।
पाँचवीं पंक्ति: 'सारंग ले सारंग उड़्यो, सारंग पूग्यो आय' यमक अलंकार का एक प्रसिद्ध बहुअर्थी उदाहरण है।
3. श्लेष अलंकार
व्युत्पत्ति एवं परिभाषा :

व्युत्पत्ति: 'श्लिष्' धातु से निष्पन्न, जिसका अर्थ है— 'चिपकना' या 'मिलना' (श्लिष्यन्ते अस्मिन् अनेके अर्थाः इति श्लेषः)।
जहाँ काव्य में एक शब्द का प्रयोग केवल एक ही बार हो, किन्तु प्रसंग भेद से उसके एकाधिक (दो या अधिक) अर्थ चिपकते हों, वहाँ श्लेष अलंकार होता है।

आचार्य विश्वनाथ (साहित्यदर्पण) :
"श्लिष्टैः पदैरनेकार्थाभिधाने श्लेष इष्यते ।"

श्लिष्ट (एक से अधिक अर्थों को समेटे हुए) पदों द्वारा जब अनेक अर्थों का अभिधान (कथन) हो, तो उसे श्लेष कहते हैं।

आचार्य मम्मट (काव्यप्रकाश) :
"वाच्यभेदेन भिन्ना यद् युगपद्भाषणस्पृशः ।
श्लिष्यन्ति शब्दाः श्लेषोऽसौ..."
आचार्य दण्डी (काव्यादर्श) :
"श्लेषः सर्वासु पुष्णाति प्रायो वक्रोक्तिषु श्रियम् ।"

विविध उदाहरण :
"रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून ।
पानी गये न ऊबरै, मोती, मानुष, चून ॥"
स्पष्टीकरण: तीसरी पंक्ति के 'पानी' शब्द के तीन प्रसंगों में तीन भिन्न अर्थ हैं—
1. मोती के पक्ष में = चमक/आभा
2. मानुष के पक्ष में = प्रतिष्ठा/इज़्ज़त
3. चून (आटा) के पक्ष में = जल।
"चरन धरत चिंता करत, चितवत चारहुँ ओर ।
सुबरन को खोजत फिरत, कवि, व्यभिचारी, चोर ॥"
स्पष्टीकरण: 'सुबरन' शब्द एक बार आया है, जिसके तीन अर्थ हैं—
1. कवि के लिए = सुन्दर वर्ण/अक्षर
2. व्यभिचारी के लिए = सुन्दर रंग-रूप (स्त्री)
3. चोर के लिए = स्वर्ण (सोना)।
"जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय ।
बारे उजियारो करै, बढ़े अँधेरो होय ॥"
स्पष्टीकरण: यहाँ 'बारे' (जलाने पर / बचपन में) और 'बढ़े' (बुझ जाने पर / बड़ा होने पर) दोनों शब्दों में श्लेष है।

श्लेष के प्रमुख भेद :

शब्द-संरचना के आधार पर श्लेष के दो प्रमुख भेद हैं —

  • 1. अभंग श्लेष (शब्द तोड़े बिना अनेक अर्थ)
  • 2. सभंग श्लेष (शब्द को तोड़कर अनेक अर्थ)
1. अभंग श्लेष :—

जहाँ शब्द के टुकड़े किए बिना ही मूल रूप में अनेक अर्थ निकलते हों (जैसे उपर्युक्त सुबरन एवं पानी)।

"माया दीपक नर पतंग, भ्रमि-भ्रमि इवैं पड़ंत ।"
2. सभंग श्लेष :—

जहाँ शब्द को अलग-अलग खण्डों में तोड़कर अलग-अलग अर्थ निकाले जाएँ।

"अजौं तरयौना ही रह्यौ, श्रुति सेवत इक रंग ।"
स्पष्टीकरण: 'तरयौना' का एक अर्थ कान का आभूषण (अभंग) है, तथा खण्ड करने पर तर+यौ+ना = 'जो भवसागर से पार न उतर सका' (सभंग) अर्थ निकलता है।

पहली पंक्ति: यमक में शब्द दोहराया जाता है, जबकि श्लेष में शब्द एक ही बार आकर कई अर्थ देता है।
दूसरी पंक्ति: श्लेष को शब्दश्लेष और अर्थश्लेष दोनों वर्गों में स्थान प्राप्त है।
तीसरी पंक्ति: जहाँ शब्द बदलने पर चमत्कार नष्ट हो जाए, वह शब्दश्लेष होता है।
चौथी पंक्ति: आचार्य दण्डी ने श्लेष को समस्त वक्रोक्तियों का प्राण माना है।
पाँचवीं पंक्ति: 'चिरजीवौ जोरी जुरै... वे रहीम घटि ये वृषभानुजा वे हलधर के बीर' सभंग श्लेष का उत्कृष्ट उदाहरण है।
4. वक्रोक्ति अलंकार
व्युत्पत्ति एवं परिभाषा :

व्युत्पत्ति: वक्र + उक्ति = 'टेढ़ा या वैचित्र्यपूर्ण कथन'।
जहाँ वक्ता (बोलने वाले) द्वारा एक अभिप्राय से कहे गए कथन का, श्रोता (सुनने वाला) श्लेष के द्वारा अथवा काकु (कण्ठ-ध्वनि के उतार-चढ़ाव) द्वारा जानबूझकर दूसरा कल्पित अर्थ निकाल लेता है, वहाँ वक्रोक्ति अलंकार होता है।

आचार्य मम्मट (काव्यप्रकाश) :
"यदयुक्तमन्यथा वाक्यमन्यथान्येन योज्यते ।
श्लेषेण काक्वा वा ज्ञेया सा वक्रोक्तिस्तथा द्विधा ॥"

वक्ता द्वारा किसी एक अभिप्राय से कहे वाक्य का श्रोता द्वारा श्लेष या काकु से अन्य अर्थ में योजन करना वक्रोक्ति कहलाता है।

आचार्य विश्वनाथ (साहित्यदर्पण) :
"अन्यस्यान्यथार्थोक्तं वाक्यमन्येन योज्यते ।
श्लेषेण काक्वा वा ज्ञेया सा वक्रोक्तिस्तथा द्विधा ॥"
आचार्य कुन्तक (वक्रोक्तिजीवितम्) :

"वक्रोक्तिः काव्यजीवितम्" — कुन्तक ने वक्रोक्ति को केवल अलंकार न मानकर काव्य की आत्मा घोषित किया और इसे 'वैदग्ध्यभङ्गीभणितिः' (विदग्धतापूर्ण चमत्कारिक कथन) कहा।


विविध उदाहरण :
"को तुम हौ इत आए कहाँ? घनस्याम हौ तौ कितहूँ बरसो ।
चितचोर कहावत हैं हम तौ, तहँ जाहु जहाँ धन हैं सरसो ॥"
स्पष्टीकरण: राधा के पूछने पर श्रीकृष्ण कहते हैं— 'हम घनश्याम (कृष्ण) हैं'; राधा ने श्लेष से घनश्याम का अर्थ 'काले बादल' लगाकर उत्तर दिया— 'तो यहाँ क्या काम, कहीं जाकर बरसो!'
"एक कह्यो वर देत भव, भावसहित चित लाय ।
दूजे कह्यो भव चाहिए, भवहिं कहो किमि जाय ॥"
स्पष्टीकरण: प्रथम वक्ता ने 'भव' का अर्थ शिव लिया, दूसरे ने 'भव' का अर्थ संसार लगाकर भिन्न अर्थ निकाला।
"आये हौ मधुमास के प्रियतम ऐहैं नाहिं ।
आये हौ मधुमास के प्रियतम ऐहैं नाहिं? ॥"
स्पष्टीकरण: पहली पंक्ति साधारण कथन है (प्रियतम नहीं आएँगे), दूसरी पंक्ति में कंठ-स्वर (काकु) बदलकर सखी कहती है— 'क्या वसन्त आने पर भी प्रियतम नहीं आएँगे? अवश्य आएँगे!'

वक्रोक्ति के दो प्रमुख भेद :

अर्थ-परिवर्तन की प्रक्रिया के आधार पर वक्रोक्ति के दो भेद होते हैं —

  • 1. श्लेष वक्रोक्ति (श्लेष द्वारा भिन्न अर्थ)
  • 2. काकु वक्रोक्ति (कंठ-ध्वनि के लहजे से भिन्न अर्थ)
1. श्लेष वक्रोक्ति :—

जहाँ श्रोता श्लेषयुक्त शब्दों के एकाधिक अर्थों का लाभ उठाकर दूसरा अर्थ ग्रहण करता है। (इसके भी सभंग व अभंग दो उपभेद हैं)।

"हे गिरिजे! भिक्षु कहाँ गयौ? बलि द्वार गयौ बलि माँगन को ।"
स्पष्टीकरण: लक्ष्मी जी ने 'भिक्षु' (शिव) पूछा, पार्वती जी ने श्लेष से 'भिक्षु' (वामन विष्णु) अर्थ लेकर उत्तर दिया।
2. काकु वक्रोक्ति :—

जहाँ वक्ता का वाक्य सामान्य 'निषेध' या 'विधि' का होता है, किन्तु श्रोता कंठ-स्वर (टोन) बदलकर उसका विपरीत अर्थ निकाल लेता है।

"मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू । तुम्हहि उचित तप मो कहँ भोगू ॥"
स्पष्टीकरण: सीताजी काकु-स्वर से कहती हैं कि 'क्या मैं सुकुमारी हूँ और आप ही केवल वन के योग्य हैं? ऐसा कदापि नहीं हो सकता।'

पहली पंक्ति: वक्रोक्ति का आधार वक्ता और श्रोता के बीच का संवाद-वैचित्र्य है।
दूसरी पंक्ति: 'काकु' का अर्थ बोलने के विशेष लहजे या कंठ-ध्वनि का विकार होता है।
तीसरी पंक्ति: आचार्य कुन्तक ने वक्रोक्ति के 6 समग्र भेद (वर्णविन्यास से लेकर प्रबन्ध वक्रता तक) माने हैं।
चौथी पंक्ति: रूद्रट और मम्मट ने इसे शब्दालंकार के रूप में व्यवस्थित किया।
पाँचवीं पंक्ति: 'कौ तुम? पशुपति... कित धौं धन्धा करत फिरत' श्लेष वक्रोक्ति का प्रसिद्ध संवाद है।

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