शब्दालंकार — अनुप्रास, यमक, श्लेष
शब्दालंकार वे अलंकार हैं जिनमें सौन्दर्य की उत्पत्ति मुख्यतः शब्दों की योजना, ध्वनि या पुनरावृत्ति से होती है। इनका उद्देश्य भाषा को मधुर, प्रभावशाली और गेय बनाना है।
काव्यशास्त्र में अनुप्रास, यमक और श्लेष प्रमुख शब्दालंकार माने गए हैं जो कवि की वाणी को संगीतात्मक बना देते हैं।
अनुप्रास अलंकार
एक ही वर्ण या ध्वनि की पुनरावृत्ति से अनुप्रास अलंकार बनता है।
“चंचल चपल चकोर चपलता चमत्कार।”
यहाँ 'च' वर्ण की पुनरावृत्ति से अनुप्रास का सौन्दर्य झलकता है।
शब्दालंकार
जिस अलंकार में शब्दों के प्रयोग के कारण कोई चमत्कार उपस्थित हो जाता है और उन शब्दों के स्थान पर समानार्थी दूसरे शब्दों के रख देने से वह चमत्कार समाप्त हो जाता है,वहाँ पर शब्दालंकार माना जाता है।
शब्दालंकार के प्रमुख भेद है - १.अनुप्रास २.यमक ३.श्लेष, ४.वक्रोक्ति
1.अनुप्रास अलंकार
परिभाषा: अनु + प्र + आस् = 'बार-बार', 'प्रकर्ष (के साथ) रखना'।
अर्थात् रस के अनुकूल वर्णों की पास-पास रचना (प्रास)। जिस वाक्य काव्य अथवा काव्यांश में वर्णों की आवृत्ति हो, उसे अनुप्रास अलंकार कहते हैं।
जहाँ स्वर की समानता के बिना भी वर्णों की बार-बार आवृत्ति होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है। आचार्यों की परिभाषाएँ आचार्य का नाम परिभाषा / विवरण आचार्य भामह “सरूप वर्षों के विन्यास को अनुप्रास अलंकार कहते हैं।” उन्होंने इसके रूपों की ओर संकेत किया है। जैसे: नागरिक अनुप्रास, ग्राम्य अनुप्रास। आचार्य वामन “शेषः सरूपोऽनुप्रासः” – यमक के अतिरिक्त (शेष) तुल्यरूप पद का नाम अनुप्रास है। अग्निपुराण “स्यादावृत्तिरनुप्रासो वर्णानां पद वाक्ययोः। एक वर्णोऽनेकवर्णों वृत्ते, वर्णगणो द्विधा।” पद और वाक्यों में वर्णों की आवृत्ति का नाम अनुप्रास है। इसके दो भेद: एकवर्णागतावृत्ति और अनेकवर्णागतावृत्ति। आचार्य विश्वनाथ “अनुप्रासः शब्दसाम्यं वैषम्येऽपि स्वरस्य यत्।” आचार्य मम्मट “वर्णसाम्यमनुप्रासः।” सारांश: अनुप्रास वह अलंकार है जिसमें वर्णों की आवृत्ति और समानता रस के अनुसार की जाती है। यह काव्य को सुंदर और मधुर बनाता है। यह पाँच प्रकार का होता है – 1.छेकानुप्रास, 2.वृत्यानुप्रास, 3.श्रुत्यानुप्रास, 4. अन्त्यानुप्रास, 5. लाटानुप्रास
यमक अलंकार
एक ही शब्द की पुनरावृत्ति जब भिन्न अर्थ में होती है तो यमक अलंकार कहलाता है।
“राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।”
यहाँ ‘राम’ शब्द बार-बार भिन्न अर्थ-संकेतों में प्रयुक्त हुआ है। २.यमक अलंकार :- जहाँ एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आये ,लेकिन अर्थ अलग-अलग हो वहाँ यमक अलंकार होता है। उदाहरण - कनक कनक ते सौगुनी ,मादकता अधिकाय । वा खाये बौराय नर ,वा पाये बौराय। । यहाँ कनक शब्द की दो बार आवृत्ति हुई है जिसमे एक कनक का अर्थ है - धतूरा और दूसरे का स्वर्ण है । यह तीन प्रकार का होता है- आदिपद यमक, मध्यपद यमक, अन्तपद यमक
श्लेष अलंकार
एक ही शब्द से एक से अधिक अर्थ प्रकट हों तो उसे श्लेष अलंकार कहते हैं।
“गजः पतितो मातङ्गः — गिरा पतितो वागीशः।”
‘पतितो’ शब्द से यहाँ ‘गिरना’ और ‘गिरना (गौरव खोना)’ — दो अर्थ उत्पन्न हुए हैं। ३.श्लेष अलंकार :- जहाँ पर शब्द एक ही बार आए किन्तु अर्थ अलग-अलग हो वहाँ श्लेष अलंकार होता है । ऐसे शब्दों का प्रयोग हो ,जिनसे एक से अधिक अर्थ निलकते हो ,वहाँ पर श्लेष अलंकार होता है । साहित्य दर्पण में इसे आठ प्रकार का बताया गया है । चिरजीवो जोरी जुरे क्यों न सनेह गंभीर । को घटि ये वृष भानुजा ,वे हलधर के बीर। । यहाँ वृषभानुजा के दो अर्थ है - १.वृषभानु की पुत्री राधा २.वृषभ की अनुजा गाय । इसी प्रकार हलधर के भी दो अर्थ है - १.बलराम २.हल को धारण करने वाला बैल ।
वक्रोक्ति अलंकार
परिभाषा- “सादृश्य लक्षणा वक्रोक्तिः” जहाँ पर श्लेषार्थी शब्द से अथवा काकु (कंठ की विशेष ध्वनि) से प्रत्यक्ष अर्थ के स्थान पर दूसरा अर्थ कल्पित करे, वहाँ वक्रोक्ति होती है । यह दो प्रकार का होता है- श्लेष वक्रोक्ति, काकु वक्रोक्ति । हौं घनश्याम विरमि-विरमि, बरसौ नेह लगाय । प्रिय, हरि हौं, कित हौं यहाँ, रमौ कुंज बन जाय ।
शब्दालंकार का सौन्दर्य
शब्दालंकार काव्य की ध्वन्यात्मकता को बढ़ाते हैं। इनसे भाषा में मधुरता, लय और गेयता आती है। भारतीय काव्य में इनका प्रयोग विशेष रूप से रसवृद्धि और पाठकीय आकर्षण हेतु किया जाता है।
