ज्ञानाश्रयी शाखा (सन्त काव्य)- इतिहास, प्रवित्तियाँ, विशेषताएँ,रचना एवं संम्पूर्ण अध्ययन ।

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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ज्ञानाश्रयी शाखा (सन्त काव्य) — इतिहास, प्रवित्तियाँ, विशेषताएँ

भक्तिकाल की निर्गुण काव्यधारा के अंतर्गत ज्ञानाश्रयी शाखा (सन्त काव्य) का दार्शनिक आधार, उद्भव, कबीर आदि सन्तों का योगदान एवं इसकी समस्त प्रवृत्तियों का विस्तृत विवेचन।

शाखा : ज्ञानाश्रयी (सन्त काव्य)
धारा : निर्गुण भक्ति
प्रमुख प्रणेता : कबीरदास
प्रेरणास्रोत : स्वामी रामानन्द
दार्शनिक आधार : अद्वैतवाद, नाथपंथ, इस्लाम, सूफी
मुख्य केंद्र : उत्तर भारत

१. सन्त काव्य क्या है?

सन्त काव्य—जिसे हम यहाँ 'ज्ञानाश्रयी शाखा' कहते हैं—भक्ति-परम्परा की वह धार है जो शिक्षात्मक, दार्शनिक और आध्यात्मिक तत्वों पर अधिक केन्द्रित रहती है। यह शाखा केवल भक्ति भाव तक सीमित नहीं; यहाँ ज्ञान-विभूषण, श्लोकों में नैतिक शिक्षा और आध्यात्मिक निर्देशों का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है।

निर्गणभक्ति शाखा की ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रमुख सन्तों में कबीर का नाम सर्वोपरि है। यद्यपि कबीर से पहले सन्त नामदेव का नाम आता है किन्तु हिन्दी में इनकी रचनाएँ बहुत कम हैं। यही कारण है कि उत्तर भारत की सन्त-काव्य-परम्परा पर उनका कम प्रभाव पड़ा, फिर भी हिन्दी के प्रायः सभी सन्तों में नामदेव का श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है। भक्तिकाल के आरम्भ में कबीर भक्ति-आन्दोलन के एक शक्तिशाला प्रवर्तक के रूप में हमारे सामने आते हैं। स्वामी रामानन्द वस्तुतः भक्तिकालीन हिन्दा साहित्य के प्रेरणास्रोत और पथ-प्रदर्शक थे। कबीर इनके बारह शिष्यों में से एक थे।

सन्त काव्यधारा के निर्माण में अनेक विचारधाराओं का योगदान है:

  • उपनिषद् : ब्रह्म, जीव और माया संबंधी विचारधारा का प्रभाव।
  • अद्वैतदर्शन : आचार्य शंकर का प्रभाव, जहाँ जीव को ब्रह्म का अंश माना गया और अविद्या को भिन्नता का कारण।
  • नाथपंथ : गुरु की प्रतिष्ठा, शून्यवाद और योग-साधना का मूल स्रोत।
  • इस्लाम : एकेश्वरवाद, मूर्तिपूजा का विरोध और सामाजिक समानता की भावना।
  • सूफी दर्शन : प्रेम तत्त्व, दाम्पत्य प्रतीकों का प्रयोग और भावनात्मक मधुरता।
निर्गुण भक्ति के मूल तत्त्व
मूल मंत्र : निर्गुण-सगुण से परे अनादि, अनंत, अनाम ब्रह्म की 'मानसिक भक्ति'।
  1. नाम-जप : 'नाम' को समस्त संशयों और बंधनों को काटने वाला माना गया।
  2. आडम्बरविहीन भक्ति : यहाँ कर्मकांडीय नवधा भक्ति का स्थान सरल मानसिक भक्ति ने लिया।
  3. सहज साधना : कृत्रिमता का त्याग कर शुद्ध अंतःकरण की स्वाभाविक शक्ति पर बल।
  4. विश्वधर्म की भावना : जाति, वर्ग और वर्ण भेद से मुक्त मानवीय धर्म की स्थापना।

२. सन्त काव्य का उद्भव एवं इतिहास (दार्शनिक आधार)

ईसा की सातवीं-आठवीं शताब्दी तक बौद्ध धर्म में अनेक प्रकार की बुराइयाँ पैदा हो गयी थीं, फलतः वज्रयानी तंत्रवादी स्वरूप का प्रचलन हुआ, इन सिद्धों की संख्या चौरासी मानी गयी है। इन सिद्धों ने ब्राह्मणों के पाखण्ड, बाह्याडम्बर और अन्धविश्वास का तीव्र विरोध किया। वज्रयानियों ने अपनी साधना के बल पर धार्मिक एवं सामाजिक क्रान्ति उत्पन्न कर दी। सरहपा, कण्हपा, लुईपा आदि प्रमुख वज्रयानी सिद्ध थे। इसी परम्परा का कुछ विकसित रूप नाथ-साहित्य में मिलता है जिसके प्रमुख गोरखनाथ थे। सिद्धों और नाथों का व्यापक और पुष्ट रूप ज्ञानाश्रयी शाखा के सन्तों में मिलता है।

सन्त कवियों पर भिन्न-भिन्न धार्मिक एवं दार्शनिक चिन्तनों का प्रभाव अवश्य पड़ा। किन्तु इन कवियों ने सभी प्रभावों को आत्मसात् करके अपने नवीन विचारों और उपासना-पद्धति को जनवादी स्वरूप प्रदान किया है। यही कारण है कि उसे सामान्य जनता ने स्वीकार किया। सन्तों ने मानव की सामाजिक परिस्थिति और महत्त्व को समझते हए एक ऐसी उपासना-पद्धति का प्रवर्तन किया जिसे गृहस्थ रहते हुए भी अपनाया जा सकता था। सन्तों की योग-साधना चमत्कार प्रदर्शन के लिए नहीं थी, अपितु शुद्ध रूप से वैयक्तिक साधना थी। योग-साधना द्वारा शरीर को शुद्ध तथा मन को स्थिर करना और मानव- कल्याण हेतु शक्ति अर्जित करना उनका उद्देश्य था।

संत काव्यधारा के दार्शनिक-सांस्कतिक आधार अनेक हैं, जिनमें से प्रमुखरूपेण उल्लेखनीय हैं- उपनिषद्, शंकराचार्य का अद्वैतदर्शन, नाथपंथ, इस्लाम धर्म तथा सूफीदर्शन। संतों के चिंतन, जीवन दर्शन और काव्यधारा पर उपनिषदों का व्यापक प्रभाव है। उपनिषदों में प्रतिपादित ब्रह्म, जीव और माया संबंधी विचारधारा के साथ ही बह्म के स्वरूप-वर्णन से संबद्ध उपमानों और अप्रस्तुत योजनाओं को संतकवियों द्वारा प्रायः उसी रूप में ग्रहण कर लिया गया है। उपनिषदों के अनन्तर संतकाव्यधारा और संतदर्शन का मख्य आधार है-शंकर का अद्वैतदर्शन। संतों की विवर्त भावना प्रतिबिंब-भावना, प्रणव-भावना, साधनापक्ष और भक्तिपद्धति पर आचार्य शंकर की विचारधारा का व्यापक प्रभाव है। आचार्य शंकर और निर्गुण संत कवि, दोनों इस विषय में एकमत है कि जीव विशुद्ध ब्रह्मतत्व है और जो भिन्नता की उपलब्धि होती है, वह माया अथवा अविद्याजनित उपाधि है। संतों ने आत्मा की सर्वरूपता, सर्वात्मभावना एवं सर्वशक्तिमत्ता प्रतिपादित की है। ये भावनाएं भी शंकर के सिद्धांत के अनुकूल हैं। संतपरंपरा में आत्मा की अखंडता, एकरसता, अद्वैतरूपता एवं अकथनीयता का प्रतिपादन भी शंकर-सिद्धांत के अनुरूप है।

संतकाव्य और संतदर्शन पर नाथपंथ का भी प्रचुर प्रभाव है। नाथपंथी कवियों एवं विचारकों के शून्यवाद, उनके द्वारा गुरु की प्रतिष्ठा और सृष्टिक्रम आत्मा, जीव आदि के विषय में उनकी मान्यताओं से संत कवि अनेकशः प्रभावित रहे हैं। संतसाधना में योगप्रक्रिया की जो प्रधानता है, उसका मल स्रोत नाथपंथी साधनापद्धति ही है। तंत्र साधना का भी संतमत पर प्रभाव रहा है। यद्यपि कबीरदास ने स्पष्टतया कहा है :"तंत्र न जानू, मंत्र न जानूं सुंदर काया" तथापि कबीर के अनंतर उनकी परंपरा में अवतरित और विकसित संप्रदायों में तंत्र-साधना का स्वरूप प्रमुख रहा। मलूक-पंथ और निरंजनी संप्रदाय में इस प्रभाव को सहज ही लक्षित किया जा सकता है। इस्लाम के संपर्क और प्रभाव के कारण संतों की विचारधारा एकेश्वरवाद से प्रभावित हुई। इस्लाम की देन निषेधात्मक अधिक रही, विधेयात्मक कम। मूर्तिपूजा तथा अवतारवाद के बहिष्कार का मूलाधार इस्लाम धर्म में ही है। इस्लम ने सामाजिक असमानता को दूर करने की भी चेष्टा की।

सत्य यह है कि एकेश्वरवाद उस समय की सबसे बड़ी आवश्यकता थी। अत: कबीर प्रभृति संत कवियों ने हिंदू-मुसलमान दोनों को एकेश्वरवाद का संदेश सुनाया, जिसके परिणामस्वरूप जनता को बहुदेवोपासना के अभिशाप से छुटकारा मिला। इस संदर्भ में दार्शनिक व सांस्कृतिक धरातल पर सूफी मत से प्राप्त प्रेरणा भी उल्लेखनीय है। संतकाव्य में दांपत्य प्रतीकों की उपलब्धि सूफीदर्शन के प्रभाव का ही परिणाम है। सूफीमत ने संतों की विचारधारा को ही नहीं, अभिव्यंजनाशैली को भी प्रभावित किया। इस संप्रदाय के साधनात्मक एवं भावनात्मक आदर्श संतकवियों को निरंतर प्रभावित करते रहे। सूफीमत ने देशव्यापी धार्मिक कटुता को समाप्त करके प्रेम, सहिष्णुता, औदार्य एवं मधुरता की भावना का प्रसार किया। यह कार्य ज्ञानमार्गी संतों के साहचर्य व सहयोग से ही संभव हुआ। उस युग में ज्ञानमार्गी संतकवियों ने धार्मिक सांस्कृतिक क्षेत्र की रूढ़ियों की उपेक्षा एवं आलोचना की है। उन्होंने निगम, आगम, पुराण आदि को महत्त्वहीन प्रमाणित किया। किंतु बौद्धों का दु:खवाद एवं शून्यवाद, वज्रयानियों की तांत्रिक साधना, सिद्धों की गूढोक्तियों के रूप में उलटबांसियां, नाथ संप्रदाय की योगसाधना तथा काव्यसाधना किसी-न-किसी रूप में संतकाव्य में समाहित हईं। संत कवियों ने वैदिक साहित्य, वैदिक परंपराओं एवं बाह्याचारों की जो आलोचना आद्योपांत की है, वह सब बौद्ध धर्म का ही प्रभाव है। यह भी उल्लेखनीय है कि मध्ययुग में निर्गणभक्ति के मुख्य संस्थापक स्वामी रामानंद ने साधना एवं भक्ति के द्वार शूद्रों तथा निम्न वर्गों के लिए भी खोल दिये। भक्ति में प्रेमतत्त्व का समावेश कर उन्होंने उसे और भी सुसाध्य एवं स्पृहणीय स्वरूप प्रदान किया।

निर्गुणभक्ति का मूल तत्त्व है-निर्गुण-सगुण से परे अनादि अनंत. अनाम, अज्ञात ब्रह्म का जप। संतों ने नाम-जप को साधना का आधार माना है। 'नाम' समस्त संशयों और बंधनों को विच्छिन्न कर देता है। 'नाम' ही भक्ति और मुक्ति का दाता है। निर्गुणभक्ति का द्वितीय मूल तत्त्व है- मानसिक भाक्ति। संतमत के अनुसार भक्ति आडंबरविहीन होती है। इसीलिए सतकाव्य में वैष्णवों की नवधा भाक्त (पादसेवन, अर्चन, वंदना आदि) का कर्मकांड-सम्मत तथा परंपरा-समर्थित रूप नहीं मिलता। साधनामार्ग को व्यावहारिक सरल स्वरूप प्रदान करने में ही संतमत की सार्थकता है। इस भक्तिपद्धति का तृतीय मूल तत्त्व है-प्रेम के माध्यम से कर्मकांड की अनपेक्षित दुरूहताओं को दूर करना। निर्गुणभक्ति का चतुर्थ एवं सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व है मानव को एक ऐसे विश्वव्यापी धर्म के सूत्रों में निबद्ध करना, जहां जाति, वर्ग और वर्ण संबंधी भेद न हों। साधना का यह द्वार सबके लिए उन्मुक्त था। इस क्षेत्र में हिंदू-मुसलमान का भेद भी विलुप्त हो गया और भक्ति के क्षेत्र में सब समान प्रमाणित हुए। निर्गुणभक्ति का पंचम तत्त्व है सहज साधना। संतों की भक्तिपद्धति आनंद और शांति से संयुक्त शुद्ध अंत:करण की वह स्वाभाविक शक्ति है, जहां कृत्रिमता स्वत: विलीन हो जाती है। सहज साधना का यह मार्ग सर्वथा अभिनव और क्रांतिकारी था तथा इसने धार्मिक जीवन की दुरूहताओं को सदैव के लिए हटा दिया।

संतसंप्रदाय विश्वसंप्रदाय है और उसका धर्म विश्वधर्म है। इस विश्वधर्म का मूलाधार है-हृदय की पवित्रता। पवित्रता-सम्मत स्वाभाविक और सात्त्विक आचरण ने ही यहां धर्म का बृहत् रूप ग्रहण किया। समस्त वासनाओं, इच्छाओं एवं द्वेषों से रहित हृदय की नि:सीम सीमाओं में विशाल धर्म का प्रवेश और समावेश संभव है। यह सब सद्गुरु की कृपा से ही संभव है। वह भक्ति और मुक्ति का दाता तथा ज्ञानचक्षुओं का उद्घाटक है। संतसंप्रदाय ने गुरु को ब्रह्म से भी महान माना है।

३. ज्ञानाश्रयी शाखा (सन्त काव्य) की प्रमुख विशेषताएँ

  1. सभी सन्त निर्गुण ईश्वर में विश्वास रखते हैं। निर्गुण ईश्वर ही घट-घट में व्याप्त है और एकमात्र ज्ञानगम्य है। वह अविगत है उसे बाहर ढूढ़ने की आवश्यकता नहीं है।
  2. भक्ति की जगह ज्ञान को अधिक महत्व दिया गया है।
  3. सन्त कवियों ने अवतारवाद एवं बहुदेववाद का निर्भीकतापूर्वक खण्डन किया। शंकर का अद्वैतवाद एवं इस्लाम पंथ का एकेश्वरवाद इनकी कविताओं के मूल में है।
  4. सभी सन्त कवियों ने गुरु को ईश्वर से भी अधिक महत्व दिया, कबीरदास जी का मानन था कि रामकृपा तभी होती है जब गुरु की कृपा होती है।
  5. समस्त सन्त कवियों ने जाँति-पाँति, वर्ग-भेद, ऊँच-नीच, छुआछूत, एवं हिन्दू मुसलमान का प्रबल विरोध किया। हिन्दू-मुसलमानों में एकता स्थापित करने के लिए सामान्य भक्तिमार्ग की प्रतिष्ठा की।
  6. सिद्धों एवं नाथपंथियों से प्रभावित होकर प्रायः सभी सन्त कवियों ने रूढ़ियों एवं आडम्बरों का विरोध किया, मूर्तिपूजा, तीर्थ-व्रत, हज-नमाज, रोजा सहित सभी बाह्याडम्बरों का कबीरदास जी ने डटकर विरोध किया है।
  7. प्रेम और विरहानुभूति की अभिव्यक्ति सन्तकाव्य की प्रमुख विशेषता है। इस काव्य में अलौकिक प्रेम की अभिव्यंजना है। प्रणयानुभूति के क्षेत्र में पहुँचकर ये खण्डन-मण्डन की प्रवृत्ति को भूल जाते हैं।
  8. सन्त संप्रदाय में रहस्यवाद शंकर के अद्वैतवाद से प्रभावित है, जिस पर योग का भी स्पष्ट प्रभाव है। सूफियों का भी प्रभाव इनके रहस्यवाद पर है।
  9. सन्त काव्य में ईश्वर की प्राप्ति के लिए नाम स्मरण को परमावश्यक माना। वेद-शास्त्र का खण्डन करके सहज सुमिरन को अधिक प्रश्रय दिया।
  10. इनकी कविताओं में लोक-संग्रह की भावना है, व्यक्तिगत अनुभूतियों की प्रधानता है, कागज-लेखी की जगह आखिन-देखी का आग्रह है, ब्रहम और जीव में कोई अन्तर नहीं है उसमें दिव्य रस की आद्रता है, वासना की अविलता नहीं। माया से सावधान रहने का उपदेश है तथा जीवन पानी तेरा बुदबुदा और प्रभातकालीन तारों जैसा निस्सार है।
  11. सन्त कवियों ने नारी को माया का प्रतीक माना और कठोर निन्दा की कनक-कामिनी को दुर्गम घाटिया माना।
  12. सन्त कवियों की भाषा सामान्य लोक जीवन की भाषा है। प्रायः सन्त कवि पढ़े-लिखे नहीं थे इसलिए उनकी भाषा में उत्कर्ष नहीं है। कबीर की भाषा को पंचमेल खिचड़ी कहा जाता है। प्रबन्ध काव्य की जगह मुक्तक का प्रयोग सर्वाधिक है। काव्यशास्त्र का ज्ञान न होने से छन्द, अलंकार, रस योजना का अभाव है।
  13. सम्पूर्ण सन्तकाव्य सहजानुभूति का काव्य है, इसमें काव्यशास्त्र की कसौटी नहीं है।

५. ज्ञानाश्रयी शाखा (सन्त काव्य) के प्रमुख रचनाकार एवं उनकी रचनाएँ

  • कबीर: विरोधाभासों को चुनौती देने वाले अभिव्यंजक दोहे — निर्लिप्त आध्यात्म और समाज-सुधार का संदेश। इनकी रचनाओं का संग्रह 'बीजक' (साखी, सबद, रमैनी) नाम से प्रसिद्ध है।
  • रविदास: सरल, प्रेममय उपदेश जिनमें आत्म‑शुद्धि और समानता का प्रतिपादन है। इनके पद 'गुरु ग्रंथ साहिब' में संकलित हैं।
  • गुरू नानक: श्रेणीबद्ध सामाजिक भेदों के विरुद्ध एकात्मक आध्यात्म का संदेश। इनकी प्रमुख रचनाएँ जपुजी, आसादीवार, रहिरास और सोहिला हैं।
  • मलूकदास: नीतिजनक पदों का योगदान। इनकी रचनाओं में 'रत्नखान' और 'ज्ञानबोध' प्रमुख हैं।

६. सन्तकाव्य का सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रभाव

ज्ञानाश्रयी सन्त काव्य ने भारतीय समाज में नैतिक चिंतन, समता‑विचार और आध्यात्मिक जागरण को प्रभावित किया। इसके श्लोक और दोहे जनजीवन का अंग बन गए और लोकशिक्षा का कार्य किया।

"गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पांय। बलिहारी गुरु आपने जिन गोविंद दियो बताय॥"
"हरि रस पीया जानिए, जे कबहूं न जाय खुमार। मैमंता घूमत फिरै, नाहीं तन की सार।"

७. परीक्षा-उपयोगी प्रश्नोत्तर (FAQs)

प्र. १. ज्ञानाश्रयी शाखा का सबसे प्रमुख कवि किसे माना जाता है और क्यों?

उत्तर : ज्ञानाश्रयी शाखा का सबसे प्रमुख कवि कबीरदास जी को माना जाता है। उन्होंने न केवल निर्गुण भक्ति का प्रचार किया, बल्कि समाज में व्याप्त पाखण्ड, बाह्याडम्बर और जाति-पाँति का निर्भीकता से खण्डन किया।

प्र. २. सन्त काव्य में गुरु की क्या भूमिका है?

उत्तर : सन्त काव्य में गुरु को ईश्वर से भी ऊपर माना गया है। कबीर के अनुसार गुरु की कृपा के बिना ईश्वर की प्राप्ति सम्भव नहीं है, क्योंकि गुरु ही ज्ञान चक्षु खोलकर जीव को सत्य से परिचित कराता है।

प्र. ३. सन्त कवियों की भाषा शैली कैसी थी?

उत्तर : सन्त कवियों की भाषा सामान्य लोक जीवन की भाषा थी, जिसे 'सधुक्कड़ी' या 'पंचमेल खिचड़ी' कहा जाता है। इसमें अवधी, ब्रज, राजस्थानी और पंजाबी के शब्दों का मेल मिलता है। इन्होंने प्रबन्ध के स्थान पर मुक्तक काव्य और दोहों का प्रयोग किया।

प्र. ४. सन्त काव्य पर किन दार्शनिक मतों का प्रभाव पड़ा?

उत्तर : सन्त काव्य पर उपनिषदों, शंकर के अद्वैतवाद, नाथपंथ की योग-साधना, इस्लाम के एकेश्वरवाद और सूफी दर्शन की प्रेमानुभूति का व्यापक प्रभाव पड़ा।

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