अनुसूया तथा प्रियम्वदा का चरित्र-चित्रण (हिन्दी एवं संस्कृत में)

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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अनसूया–प्रियंवदा का चरित्र-चित्रण

अभिज्ञानशाकुन्तलम् में अनसूया और प्रियंवदा के व्यक्तित्व, स्वभाव, सहृदयता, कर्तव्य-बोध और नाट्यगत भूमिका का विश्लेषण।

अनुक्रमणिका
1. अनसूया तथा प्रियंवदा का चरित्र-चित्रण (हिन्दी) 2. अनसूया–प्रियंवदयोः चरित्रचित्रणम् (संस्कृत) 3. तुलनात्मक अवलोकन

अनसूया तथा प्रियंवदा का चरित्र-चित्रण (हिन्दी में)

अनसूया तथा प्रियंवदा शकुन्तला की प्रियसखियाँ हैं। उन तीनों के रूप तथा अवस्था में विशेष अन्तर नहीं है, इसीलिए राजा जब उन्हें देखता है तो कहता है— ‘समानवयोरूपरमणीयं सौहार्दमत्र भवतीनाम्।’ इन दोनों में अनसूया की अवस्था अधिक प्रतीत होती है, इसीलिए शकुन्तला के अपने पतिगृह जाने पर महर्षि कण्व पहले अनसूया को और बाद में प्रियंवदा को सम्बोधित करके कहते हैं— ‘अलं रुदितेन।’

प्रथमाङ्क में राजा जब तपोवन में प्रवेश करते हैं तो पहले अनसूया ही राजा के साथ बातचीत करना प्रारम्भ करती है तथा राजा को शकुन्तला के राजर्षि विश्वामित्र तथा मेनका की पुत्री के रूप में बतलाती है। इससे लगता है कि अनसूया प्रियंवदा तथा शकुन्तला दोनों से बड़ी है।

यद्यपि शकुन्तला, अनसूया तथा प्रियंवदा—ये तीनों देखने में सुन्दर हैं, किन्तु शकुन्तला इन सभी में अधिक सुन्दर है। जिस तरह शकुन्तला कुमारी है, उसी तरह प्रियंवदा तथा अनसूया भी कुमारियाँ हैं।

अनसूया तथा प्रियंवदा दोनों शकुन्तला से निःस्वार्थ तथा वास्तविक प्रेम करती हैं। ये दोनों सखियाँ शकुन्तला के साथ मिलकर आश्रम के वृक्षों को सींचने का काम करती हैं। वे दोनों कण्वपालिता पुत्री शकुन्तला का सब प्रकार से उपकार करना चाहती हैं। यही कारण है कि कामार्त शकुन्तला के वेदनाव्याकुल होने पर दोनों मिलकर उसे राजा से मिला देती हैं तथा दुष्यन्त एवं शकुन्तला के मिल जाने पर यहाँ से दूर हट जाती हैं कि वे दोनों अपनी इच्छाओं को निःसंकोच पूरा कर सकें। गौतमी को आते देखकर दूर से ही वे व्याजान्तर से सूचित कर देती हैं, जिससे कि दुष्यन्त तथा शकुन्तला दोनों एक-दूसरे से दूर हो जाएँ।

जब दुष्यन्त के विरह में व्याकुल शकुन्तला द्वार पर आए अतिथि महर्षि दुर्वासा का आना नहीं जान पाती है तो महर्षि दुर्वासा उसे शाप देकर लौट जाते हैं। उस समय ये दोनों सखियाँ महर्षि दुर्वासा को मनाने का प्रयास करती हैं और प्रियंवदा की प्रार्थना से प्रसन्न होकर महर्षि यह वरदान देते हैं कि आभरण को देख लेने पर शाप का प्रभाव समाप्त हो जाएगा।

शकुन्तला के पतिगृह चले जाने पर दोनों अनुभव करती हैं कि शकुन्तला के अभाव में तपोवन सूना हो गया है। ये दोनों सखियाँ बातचीत करने में चतुर तथा बुद्धिमान हैं। दोनों का व्यवहार तथा व्यवहार-भद्रता आकर्षक है।

उपर्युक्त प्रकार से अनसूया तथा प्रियंवदा दोनों में साम्य होने पर भी दोनों में अन्तर यह है कि अनसूया गम्भीर स्वभाव वाली है। अतः वह उपहासादि में सहभागिता का निर्वाह नहीं करती है। किन्तु प्रियंवदा मुखर प्रकृति की है। वह बातों ही बातों में शकुन्तला का मनोज्ञ उपहास भी करती है। किन्तु उसके उपहास के कारण शकुन्तला मन ही मन प्रसन्न ही होती है। वह प्रियंवदा से कहती है— ‘अतएव प्रियंवदेति भण्यसे।’ अनसूया के माध्यम से राजा अब यह जान लेते हैं कि शकुन्तला मेनका से उत्पन्न राजर्षि विश्वामित्र की पुत्री है तो राजा कुछ सोचने लगते हैं। इस समय की बात को आगे बढ़ाती हुई प्रियंवदा कहती है— ‘पुनरपि वक्तुकाम इव आर्यो लक्ष्यते।’

प्रियंवदा की बातों से कुछ रुष्ट होने का स्वाँग बनाकर शकुन्तला वहाँ से अन्यत्र जाने की बात करती है तो प्रियंवदा कहती है— ‘हला चण्डि! नार्हसि गन्तुम्। द्वे मे वृक्षसेचनके धारयसि, ताभ्यां तावदात्मानं मोचय, ततो गमिष्यसि।’ यद्यपि यह प्रियंवदा का शकुन्तला को वहाँ रोके रखने का बहाना मात्र है।

सब कुछ होने के पश्चात् अनसूया और प्रियंवदा दोनों तापस-कन्याएँ तथा शकुन्तला की प्रिय सखियाँ हैं। वे दोनों शकुन्तला के सुख में सुखी तथा दुःख में दुःखी होती हैं। उन दोनों का शकुन्तला से प्रगाढ़ स्नेह है।

अनसूया–प्रियंवदयोः चरित्रचित्रणम् (संस्कृत में)

अनसूया प्रियंवदा च शकुन्तलायाः प्रियवयस्ये स्तः। असूयायाः अभावादेव अनसूयेत्यभिधीयते। द्वितीयायास्तु प्रियभाषणमेव स्वभावः। शकुन्तलानसूयाप्रियंवदानां रूपावस्थे समाने इव प्रतीयते सहसा विलोकनात्। अतएवैकान्ते वृक्षसेचनं कुर्वन्ती इमाः विलोक्य राजा वक्ति— ‘समानवयोरूपरमणीयं सौहार्दमत्र भवतीनाम्।’

यद्यपि प्रियंवदानसूययोः समायावस्थे प्रतीयते, किन्तु नूनमनसूया प्रियंवदापेक्षया ज्येष्ठावस्थावती। एतस्मादेव राजनि समागते अनसूयैव सर्वप्रथम राज्ञा सह वार्तयति। राजानं वार्तालापप्रसङ्गेन बोधयति यत् शकुन्तलेयं वस्तुतः मेनकायां संजाता राजर्षेः विश्वामित्रस्य पुत्री वर्तते, कण्वस्तु मेनकया परित्यक्तायाः तस्याः शरीरसंवर्द्धनादिभिः पिता। तृतीयाङ्केऽपि यदा राजा शकुन्तलायाः समक्षमायाति तदा अनसूयैव शकुन्तलायाः भाविकल्याणकामनया राज्ञा सह वार्तयन्ती वक्ति— ‘इतः शिलातलैकदेशमनुगृह्णातु महाभागः। बहुवल्लभाः खलु राजानः श्रूयन्ते। तद्यथा इयं नः प्रियसखी बन्धुजनशोचनीया न भवति, तथा करिष्यति।’ इत्यादिकम्।

यद्यपि प्रियंवदानसूये उभे अपि मनोज्ञे स्तः, किन्तु शकुन्तला तासु तिसृषु मनोज्ञासीदिति स्पष्टम्। शकुन्तला, प्रियंवदा तथा अनसूया—तिस्रः एव कुमार्यः सन्ति।

प्रियंवदानसूये उभे अपि शकुन्तल्याः निःस्वार्थं स्नेहं कुरुतः। तयोः स्नेहे क्वापि कृत्रिमता नास्ति। इमे द्वे अपि सख्यौ शकुन्तलया साकं वृक्षाणां सेचनं कुरुतः। शकुन्तला कण्वेन कुलपतिना पालिता पुत्र्यासीत्। अतएव इमे उभे तस्याः सर्वप्रकारेण उपकारं कर्तुमिच्छतः। एतस्मादेव हेतोः राज्ञो दुष्यन्तस्य विलोकनकालादेव कामार्तां कामवेदनाव्यग्रां शकुन्तलां ज्ञात्वा ते तथाविधमुपायं कुरुतः येन शकुन्तला-दुष्यन्तयोः संयोगो जायेत। तयोः मिलिते सति प्रियंवदानसूये तस्माल्लतामण्डपान्मृगपोतकसंरक्षणव्याजेन निःसरतः, येन तौ ससुखं स्वेच्छां पूरयितुं क्षमौ स्याताम्।

अनेनैव प्रकारेण यदा दुष्यन्तः शकुन्तलां विहाय स्वराजधानीं गच्छति तदा शकुन्तला तं स्मरन्ती शून्यहृदया जायते। फलतः आतिथ्यग्रहणाय द्वारि समागतमपि महर्षिं दुर्वाससं न जानाति। तस्याः अतिरामनवधानतां स्वकीयमनादरं मत्वा तां शप्त्वा च गच्छति दुर्वासाः। अपि तं संप्रार्थ्य प्रसन्नं कुरुतः, येन महर्षिः ‘आभरणदर्शनेन पुनः शापो निवृत्तो भविष्यति’ इति वरदानेनानुगृह्णाति। शकुन्तलायां स्वपतिगृहं गतायां पित्रा कण्वेन साकं स्वाश्रममागच्छन्त्यौ सख्यौ कथयतः— ‘शकुन्तलारहितं शून्यमिव तपोवनं विशामः।’ इति।

अनेन प्रकारेण तयोः उभयोरनेकाकारके साम्ये विद्यमाने अपि तयोः किमपि वैषम्यमपि वर्तते। अवस्थायाम् अनसूया ज्येष्ठा, प्रियंवदा तु तस्याः अपेक्षयाल्पवयस्कास्ति। स्वभावेन अनसूया गम्भीरस्वभावा वर्तते, अतएव तस्याः वार्तालापाः सात्त्विकाः, परिहासादिरहिताः च भवन्ति।

यथा वृक्षाणां सेचनविषये सा शकुन्तलां वक्ति— ‘हला शकुन्तले! इयं स्वयम्वरवधूः सहकारस्य त्वया कृतनामधेया वनतोषिणीति नवमल्लिका; एनां विस्मृतासि?’ इति। किन्तु प्रियंवदा मधुरभाषिणी परिहासप्रिया च वर्तते। तस्याः— ‘त्वया समीपस्थितया लतासनाथ इव अयं चूतवृक्षः प्रतिभाति।’ इति वचो निशम्य प्रसन्ना शकुन्तला वक्ति— ‘अतएव त्वं प्रियंवदेति भण्यसे।’ इति। अनेनैव प्रकारेण प्रियंवदा परिहासप्रिया च सा शकुन्तलां परिहसन्ती अनसूया वक्ति— ‘यथा वनतोषिणी अनुरूपेण पादपेन सङ्गता, तथा अहमपि अनुरूपं वरं लभेय।’ इति। एकदा तु राज्ञा सह तस्याः विषये बहुवादिन्याः प्रियंवदायाः परिहासेनोद्विग्ना इव शकुन्तला अनसूयां वक्ति— ‘इमां सम्बद्धप्रलापिनीं प्रियंवदामार्यायै गौतम्यै निवेदयामि।’

यदा प्रियंवदायाः वार्ताभिः रुष्टा च शकुन्तला अन्यत्र यियासति तदा प्रियंवदा वक्ति— ‘हला! चण्डि! नार्हसि गन्तुम्। द्वे मे वृक्षसेचनके धारयसि, ताभ्यां तावदात्मानं मोचय, ततो गमिष्यसि।’ इति च।

संक्षेपतः प्रियंवदानसूये तापसकन्यके स्तः, किञ्च ते शकुन्तलायाः प्रियवयस्ये स्तः। ते उभे शकुन्तलायाः सुखेन सुखमनुभवतः, दुःखेन च दुःखमनुभवतः। तयोः उभयोः शकुन्तलायां प्रगाढः स्नेहो वर्तते।

तुलनात्मक अवलोकन

दोनों पात्रों की भूमिकाओं में संतुलन नाटक की खूबसूरती है—जहाँ अनसूया स्थिरता और विचार लाती है, वहीं प्रियंवदा उत्साह और गति देती है।

अनसूया — विचारशील, संयत, मातृवत्।

प्रियंवदा — हँसमुख, चपल, उत्साही।

• दोनों मिलकर शकुन्तला की भाव-भूमि को पूरा करती हैं—संतुलन, समर्थन और कथा-गति।

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