सेनापति1.
सारंग धुनि सुनावै धन रस बरसावै,
मोर मन
हरषावै अति अभिराम है।
जीवन
अधार बड़ी गरज करनहार,
तपति हरनहार
देत मन काम है।।
सीतल
सुभग जाकी छाया जग 'सेनापति'
पावत अधिक
तन मन बिसराम है।
संपै
संग लीने सनमुख तेरे बरसाऊ,
आयौ घनस्याम
सखि मानौं घनस्याम है।।
2. सदा
नंदी जाकौं आसा कर है विराजमान,
...
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